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मंगलवार, 1 मार्च 2016

मुझे शिकायत है

मुझे शिकायत है
1 एक शब्द से, जिसके कारण रोज मेरी हेठी होती है।
2 अपने गांवों वाले देश में मुझे घटिया किश्म का आदमी समझा जाता है।
3 मेरी पहचान कानूनी तौर पर बदल दी जाती है, वह भी झूठे अर्थ में।
4 यदि मैं उसे न मानूं तो आप मुझे देश द्रोही भी कह सकते हैं।
5 मैं पूरा देशी-देहाती आदमी हूं, न कभी विदेश गया न जाने का सपना है नेपाल तक जाने का मौका नहीं मिला, जो पास में है और पसासपोर्ट की भी दरकार नहीं है।
6 हम से ऐसी हिकारत क्यों?
सवाल मेरे भी हैं-
7 क्या यह देश केवल नागरिकों का है?
8 या फिर शहरी लोगों का?
9 या सिटिजन्स का
10 गांव में रहने वालों, उस पहचान से जीने वालों का क्यों नहीं?
यह नागरिकता क्यों इतनी कीमती है? मेरे मन की पीड़ा क्या किसी को कभी साली? क्या इस शब्द को बदल नहीं देना चाहिए? 

शनिवार, 20 जून 2015

इस योग का मतलब क्या?

बाबा! इस योग का मतलब क्या?
शब्दार्थ
योग शब्द युज् धातु से बना है, यज् से नहीं। यज् से यज्ञ होता है। युज् मतलब जुड़ना, इसी धातु से भाव वाचक योग शब्द बना है। इसलिये योग शब्द का इससे अलग वस्तुतः अपना कोई अर्थ नहीं है। जैसा प्रसंग, वैसा अर्थ ।
हो भी यही रहा है। अभी यह राजनैतिक योग है, सतही, हंगामेदार, व्यापक प्रचार-प्रसार वाला एकदिनी। इसमें बड़ी बात है कि इतने लोग एक साथ कुछ करेंगे तो विरोधियों में भय का योग होगा। घृणा प्रधान, व्यायाम प्रधान, मानसिक-वाचिक तपरहित, श्रद्धारहित, बुद्धिभ्रष्टक, उग्र हिंदुत्व की कक्षा वाला योग होगा क्योंकि इस धारा का ही इस समय सत्ता में योग है। 
खैर एक भूल/कपट का सुधार करना पड़ा है। संघ वालों ने ‘‘सूर्य नमस्कार’’ नाम को स्वीकार कर लिया। पहले तो उन्होंने इसका नाम भी बदल रखा था।
चर्चाएं कई हैं। किसी ने कहा बाबा रामदेव जी के जन्मदिन पर आयोजित है। मुझे इस पर भरोसा नहीं हुआ।  बाबा रामदेव जैसे शुद्ध व्यवसायी और निष्ठा हीन व्यक्ति के लिये भाजपा इतना करेगी??? इघर बी.एन. मिश्र जी ने बताया कि पूर्व संघ प्रमुख हेडगेवार जी के जन्मदिन पर यह आयोजित हो रहा है। इनका योग के प्रचार7प्रसार में क्या योग दान???? मुझे तो कुछ नहीं मालूम। यह है संयोग, राजयोग, गुप्तयोग का मिश्रित योग।
गलती तो पहले ही हुई जब हठयोग के आंशिक पक्ष को ही योग नाम दिया जाने लगा कि कम से कम कुछ लोग इसी बहाने, स्वास्थ्य रक्षा के लिये ही सही इधर आकृष्ट होंगे। ईमानदार लोगों ने स्वास्थ्य रक्षा के नाम पर लोगों का ध्यान तो आकृष्ट किया लेकिन परंपरा की रक्षा करते हुए योग के अन्य पक्षों पर पूरा ध्यान दिया और ध्यान योग, भक्तियोग, कुंडलिनी योग, लय योग, स्वरयोग, नाद योग आदि को आगे बढ़ाया। राजनीति और उसके साथ दवा एवं उपभोक्ता सामग्री आदि के व्यसाय को नहीं जोड़ा। आयुर्वेद उनका अंग नहीं रहा। राम कृष्ण परमहंस तथा उनके,  शिष्यगणों, महर्षि रमन, स्वामी शिवानंद के प्रमुख शिष्यों, स्वामी कैवल्यानंद, स्वामी प्रणवानंद, परमहंस योगानंद के गुरु स्वामी युक्तेश्वर गिरि, दक्षिण के गृहस्थ योगाचार्य श्री ......... अय्यर आदि असली साधकों ने किसी ने योग को व्यवसाय या राजनीति के साधन के रूप में इश्तेमाल नहीं किया।
इसके विपरीत आर्यसमाज, उससे निकली धाराएं, जैसे- गायत्री परिवार आदि ने कार्यकर्ताओं के आर्थिक संरक्षण के लिये दवा एवं उपभोक्ता सामग्री आदि के व्यसाय को समानांतर कार्यक्रम के रूप में जोड़ा। इसके बाद इस शैली को आशाराम आदि सभी बाबाओं ने अपनाया। बाबा रामदेव ने इसे कारपोरेट कल्चर दे आकार दे दिया।  राजनीति के मामले में अभी हाथ पैर मार रहे हैं। देखें!! सत्तायोग उनके भाग्य में है या नहीं??
योग साधना वाले गीता आदि में वर्णित राजयोग में तो उनकी रुचि ही नहीं।

बुधवार, 3 जून 2015

इंडोलाजी : यूरोपीय वैचारिक षडयंत्र 1


आप यदि भारतीय संस्कृति, सभ्यता, समाज में रुचि रखते हैं, धर्म, कर्म, परंपरा, इतिहास, पूजापाठ अनुष्ठान, रीति रिवाजों से संबंधित लिखने पढ़ने या कर्म कांड, तंत्र, योग, पौरोहित्य, राजनीति आदि से संबंधित काम रोजगार से जुड़े हों तो इस बात का पूरी खतरा है कि आप जाने-अनजाने कहीं यूरोपीय वैचारिक षडयंत्र के शिकार बन कर रोज बरोज अपनी ही समझ की बलि तो नहीं चढ़ा रहे???????
योरप वालों ने भारत को समझने की कोशिश की क्योंकि वे बाहरी थे, अनजान थे। राज काज चलाने के लिये जो आवश्यक हो उतना जानना तो बहुत जरूरी था ही साथ ही फुरसत में कुछ जन भी लिया जाये तो हर्ज ही क्या है? उनके लिये यदि सतही ज्ञान भी हो जाये तो क्षम्य है क्योंकि वे अनजान, विदेशी और बाहरी लोग थे। हमें समझने का उनका पैमाना भी वैसा ही होना स्वाभाविक था। वस्तुतः केवल ऐसा ही नहीं हुआ, कुछ विदेशियों ने भारत की हर परत को अंदरूनी तौर पर समझने की ही नहीं जो उनके लिये सभव था, उसकी चरम सीमा तक जा कर भारतीय विद्या और संस्कृति को जीने की कोशिश की। ऐसा एक नाम सर जॉन वुडरफ का है।
ऐसे उदार लोग साम्राज्यवादियों को बहुत खटके। अतः बाकायदा षडयंत्र कर इंडोलाजी एवं ओरयेंटोलोजी जैसे शब्द गढ़े गये, उन्हें कुछ खाश अर्थों तक सीमित किया गया, भारत को समझने के लिये यूरोपीय पैमानों की शर्तें थोपी गईं, वगैरह। आज के अनेक बुद्धिजीवी उन्हीं उलझनों और सतही तथा यूरोपीय पदावली एवं पैमाने के अहंकार से ओत प्रोत हो कर भारतीय परंपरा तथा विद्या के क्षेत्र में उतरते हैं। यूरोपीय साम्राज्यवादी बुद्धिजीवी आज भी विधिवत उस काम में लगे हैं और कई बार निर्लज्जता पूर्वक भारतीय लोगों को गलत काम के लिये उकसाते भी हैं। मेरा सामना एक बार ऐसे ही एक प्रतिष्ठित महानुभाव - सर मार्क टुली से हुआ। अगले किश्तों में जारी........

रविवार, 22 सितंबर 2013

विमोहन 10


गया श्राद्ध की बहुरंगी दुनिया
     
   ऐसा न सोचिये कि भारत में सब कुछ पूर्ण वैदिक, पूर्ण इस्लामी या किसी भी तरह से केवल एक ही विचारधारा या पहचान के आधार पर चलता है या चल पायेगा। नीचे की तस्वीरें धर्मारण्य, बोधगया, बिहार पितृश्राद्ध पिंडदान परिसर की हैं। मजार मंदिर परिसर में है और मजार वालों को भी पिंडदान से समस्या नहीं है। पंडा जी के अनुसार यह मजार देवीजी के मशालची का है, जो देवी के आगे आगे मशाल लेकर चलते हैं। जब मशालची को मुसलमान होना तय है तो फिर झगड़ा किस बात का? और भगवती के मंदिर के आहाते में उनके सेवक का मजार क्यों न बने? बिहार उत्तर प्रदेश में नाई जाति का इस्लामीकरण भारी संख्या में हुआ है। फिर भी जाति के सामने धर्म गौण है। ऐसे ‘‘तुर्कनौआ’’ पूरी सुविधा से पूजा पाठ शादी श्राद्ध सबमें स्वीकृत हैं।
                                 

दूसरे चित्र भी कम मजेदार नहीं हैं। यह इलाका बुद्ध को खीर खिलानेवाली सुजाता का है। ब्राह्मणों ने कंकालमय बुद्ध की प्रतिमा इसी परिसर में लगवा दी कि कुछ बौद्ध तीर्थयात्री तो बेसमय भी आ जायेंगे।  ब्राह्मणा की इस लालच का लाभ बौद्ध आंदोलनकारी उठाते हैं। आप मानिये बुद्ध को विष्णु का अवतार या जा भी वे तो परिसर का सीधा बंटवारा या पूर्ण स्वामित्व ले कर ही रहते हैं। आजकल यह खेल खूब हो रहा है। फिलहाल तो बुद्ध पर पिंडदानी हावी हैं।





गुरुवार, 12 सितंबर 2013

Branding of Indian Saadhanaa Systems

विमोहन 9
मित्रो, धर्म एवं राजनीति अपनी क्षेत्रीय एवं सामयिक सांदर्भिकता में शुरू भले ही होते हों कुछ समय बाद उनकी branding शुरू हो जाती है। भारत की विविधतापूर्ण स्थिति इसके लिये और अधिक सुविधा देती है। क्षेत्रीय  आचार भेद से धर्म संबंधी व्यवहार का अलग होना तो उचित है लेकिन जब एक सनातन, वैदिक हिंदू जो कहें धर्म सभी जगह है तो मौलिक और बड़ी बातें तो एक ही तरह की होंगी लेकिन राजा अपने राज्य को ही पूरा भारत बनाने की इच्छा रखते थे और पुजारी बस चले तो केवल अपने मंदिर में ही भगवान का वास बताते। लाचारी में पुजारी अपने मंदिर को सबसे जाग्रत, संपूर्ण मनोकामनाओं को पूरा करने वाला बता कर शांत हो जाते हैं। इसके विपरीत समानांतर रूप से ‘एक ब्रांड विरोधी’ और ‘‘सर्व ब्रांड विरोधी’’ धारा भी सक्रिय रहती है।
मंदिर क्या अधिक महत्त्वाकांक्षी मंडली अपने प्रिय किसी एक देवता के अधीन, उनके अंतर्गत, उनका ही दूसरा स्वरूप बता कर पहले विचार के स्तर से किसी एक के महत्त्व को समाप्त कर देती है फिर उस मंदिर के पुराने विग्रह/मूर्ति को। यह है तिरोभाव का खेल। पहले विचार, फिर पुस्तक, फिर मूर्ति। ऐसा विष्णु, बुद्ध, सूर्य एवं शिव के उपासकों ने कई बार किया है। अधिक मंदिर और मूर्तियां भी तो इन्हीं की हैं। सूर्य का विष्णु एवं शिव में अंतर्भाव एवं फिर तिरोभाव खूब किया गया। बुद्ध का व्यक्तित्व वैष्णवों एवं संपत्ति शैवों ने ली बौद्ध साधना विधियों का लाभ शाक्तों ने उठाया। इसके उलटा भी किया गया। ऐसे अनेक खेल हजारों साल चले।
साधना की मूल विधियां लगभग वहीं होंगी, सामग्री भी वहीं होगी। नामकरण एवं लाभ कमाने वाले अलग होंगे। आजकल सर्वधर्म समभाव वाले ऐसा खेल खूब करते है। मुझे उनसे आये दिन निपटना पड़ता है। ये है Super Branding of Indian Hindu Saadhanaa Systems. All God Jaya Shri Krishnaa. Branding of Indian Political Schools में आगे लिखूंगा..................

रहस्य, चमत्कार एवं अंध विश्वास

विमोहन 9

रहस्य, चमत्कार एवं अंध विश्वास

रहस्य चमत्कार एवं अंधविश्वास, ये तीनों शब्द अति प्रचलित एवं विवादास्पद रहे हैं। इन शब्दों के प्रति आकर्षण तथा विकर्षण से अधिक इनके उदाहरणों एवं अर्थों के प्रति हजारों साल से खींचतान चल रही है।
भारत के संदर्भ में इस विषय को समझना जरूरी है तभी सही दिशा का निर्धारण हो सकेगा। संसार में हर बात तब तक रहस्य है, जब तक हम जानते नहीं। हमारा शरीर एवं मन विभिन्न भौतिक साधनों, रंग, ध्वनि, सुर, स्वरों के आरोह-अवरोह से प्रभावित होता है। ऐसी हर सामग्री में एक विशेष प्रकार की शक्ति है। इनकी कार्यप्रणाली का शास्त्रों में विस्तृत विवरण उपलब्ध है। इन शक्त्तियों का आप जिस किसी शक्ति या देवी देवता के नाम से पुकारें, उससे केवल नाम का अंतर होगा।

इनकी कार्यप्रणाली न जानने पर सबकुछ चमत्कार है, और जानने पर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कहाँ केवल मानसिक स्तर पर घटना घटित हो रही है और कहाँ केवल भौतिक या फिर मिश्रित रूप में।
सामान्य प्रकाश से शांति, गहरे लाल रंग से जोश एवं गुस्सा काले रंग से गहन शांति या भय उत्पन्न होता है। बिना मिर्च-मसाले के भोजन से मन को एकाग्र करने में सुविधा होती है। इससे आगे बढ़ने पर जामितीय आकृतियों का अर्थ एवं अवचेतन मन से उनके रिश्ते एवं कार्य प्रणाली को जानना पड़ता है। कोई व्यक्ति किसी देवी-देवता को माने या न माने फिर भी ये प्राकृतिक शक्तियाँ सही स्थान में संयोजित होने पर सामान्य भौतिक घटनाओं की तरह काम करती ही हैं।

दो प्रकार की सूचनाओं ने पूरे समाज को भ्रम में डाल दिया है और उनसे बचना जरूरी है। पहली प्रकार की सूचनाएँ हैं - फलसु्रति संबंधी अर्थात् ऐसा करने से इतने प्रकार के लाभ होते हैं। जैसे - अमुक मंदिर में जाने से सारी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं - ऐसा संभव ही नहीं है। मन तो परस्पर विरोधी इच्छाओं में फँसा रहता है। इस मंत्र के जपने से राजा या स्त्री मुग्ध हो जाती है।

दूसरे प्रकार की सूचनाएँ - वे हैं जो द्वयर्थक भाषा में इस प्रकार लिखी गई हैं, जिससे उसकी कोई नकल न कर सके और विद्या के असली जानकारों की मर्जी और उन्हें उसके लिये भुगतान किये बगैर कोई लाभ न उठा सके। यह बात भी लिखी रहती है कि धूर्त, कृतघ्न एवं भिन्न परंपरा के लोग इन पुस्तकों को पढ़कर दिग्भ्रमित, पागल या बीमार हो कर बरबाद हो जायें।
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एक दृष्टि से ऐसा साहित्य सृजन बहुत ही अमानवीय लगता है। दूसरी दृष्टि से विचार करें तो बिना पूरी और सही जानकारी प्राप्त किये, किसी विद्या के विद्याधरों को दाक्षिणा दिये बगैर उसका लाभ उठाने की कृतघ्नता क्या उचितहै? भारतीय कॉपी राइट का यह संरक्षण वाला जवाबी तरीका बहुत सुरक्षित और दुश्मनों के लिये खतरनाक है।

आज भी इसी चालाकी में अनेक लोगों का अनिष्ट हो रहा है। छोटी-छोटी अप्रामाणिक पुस्तक खरीद कर साँप बिच्छु का जहर उतारने, यक्षिणी सिद्ध कर सोने की मुहर पाने की जुगत में लोग बरबाद होते हैं।
इस युग के भी कई बड़े-बड़े विद्वानों ने समाज को गुमराह करने के पूरे उपाय कर दिये है। उपन्यास शैली में तांत्रिक कथाएँ लिखी हैं, लोग उन्हें अक्षरशः सच मानते हैं।

उपर्युक्त की जगह पतंजलि के योगसूत्र, विज्ञान भैरवतंत्र की विधियाँ, ध्वनियों के स्वरूप संबंधी पाणिनीय शिक्षा, बौद्ध तंत्रों के लिये महायान सूत्र, उनके पटविधान, मंत्र साधना संबंधी अध्यायों को ठीक से पढ़ने-
समझने पर ये भ्रांतियाँ नहीं होतीं।

किसी बात को जाने-समझे बिना ही उसके पक्ष या विपक्ष में तत्पर हो जाना अंधविश्वास है। अयोध्या में रामजन्म हुआ, यह कथा सिद्ध प्रसंग है। किसी स्थान विशेष पर ही उनका जन्म हुआ या नहीं यह निश्चय करना असंभव की तरह कठिन है। घट-घटवासी राम, सबके मन में रमण करने वाले राम के सूक्ष्म स्वरूप या चेतन आत्मा स्वरूप को राम नाम के किसी व्यक्ति विशेष में केन्द्रित या सीमित करना अंधविश्वास है। रावण नामक ब्राह्मण की हत्या करने वाले दशरथ पुत्र राम सभी ब्राह्ममणें को भी मान्य नही हैं, मुसलमान या ईशाई की बात क्या करें? ऐसे ब्राह्मणों की बहुत बड़ी संख्या अयोध्या के आसपास है। यह संख्या लाखों करोड़ों में जाएगी। नई पीढ़ी इस प्रसंग को भूल रही है। इसी में शांति है।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

विमोहन/ Dehypnotizing

विमोहन/ Dehypnotizing 7
A real book, which could not be believed, but absolutely real. It is my personal experience with the book. I have tried it many times and always found correct and true.
I was suffering from a hypertension and hyper acidity with uncontrolled apatite in my student life. Usually I needed food as for 6 people every day or very high protein diet. I know my guilt, it occurred due to some experiments in the field of meditation and other disciplines. High secretion was a psychosomatic disorder and it was non curable with drugs. Whenever I tried any method to resolve the issue, it worsened. Finding out the cause was not enough, at this stage the book helped me. I am grateful to the great author and my local social guardian Mr. S.P. Mittal a senior freedom fighter and social scientist. 
I had changed my own personality with the help of this book. Strange about this is that the author is neither a psychologist nor psychotherapist, he is a Plastic surgeon of Italy. Here “is”  denotes my wishes for him , actually he may not be alive.
In 1080 when the computer was not available for common people in India I have a theoretical idea about basic features of computer human mind as well. The author has well explained these items like a handling manual of any electronic instrument. We are not slave of mind rather we have a mind and we could take its services, operate it and we can change the settings with our effort as per our need.
Sleep is more useful for learning. Of course I learnt motor cycle driving in sleep, you may not believe. If I tell more it will reduce your interest.
One friend has told that there is a link to access the book from net. This amazing book is “Psycho Cybernetics” by Dr. Maxwell Maltz, 29th reprint was published in 1979 by Pocket Books, New York.



विमोहन/ Dehypnotizing 6
Be aware of twilit sentences of TANTRA books. They have been coded and there is an open declaration that let this book destroy our rival practitioner who is just like enemy and them too who are not grateful to the tradition of tantric practices of the particular school which that book belongs to.
I think Aashaaraam is also suffering from a mental problem. He is hypnotized by a twilit statement of Tantra- in Sanskrit –
‘NITYAM BAALAA SEBYAMAANAA NITYAM WAI BARDHATE BALAM’. The foolish and dangerous meaning will be ‘if girls are used regularly, the power increases always.’
Actual and fortunate meaning will be if the medicinal plant Balaa is used regularly it improves the strength of the personality.

विमोहन/ Dehypnotizing 5
World is suffering from various type of hypnosis. We all suffer any time. The agony is that sufferer does not recognize that he/she is sufferer. Till it becomes clear to the sufferer the time has gone away.
Once I had been little affected indirectly by Aashaaraam “Bhonpoo”. As I have interest in behavioral psychotherapy with Indian methods, symptoms of psychological illness are more obvious to me than a lay man. Once a lady relative of mine got hypnotized by so called SATSANG of Aashaaraam. Her entire personality was changed. A naughty and pleasant personality was doing Jap of Bhagawan and Guru without any break. Her family members were also very pleased on this. As a relative I warned them against such sudden change but they blamed me too.
Only after 2 months the lady has to be taken to the Psychotherapist and still she is not fully normal, suffering from long affects of seduction. Her husband also became depressed latter on.

Why it happened so? Actually they were in search of CHAMTKAAR to solve their family burden. But burden increased. A heavily loaded, burdened personality is afraid of his/her failure and wants to make other responsible for his/her failure and decision whether right or wrong. Such personalities are actually always ready to be seduced and cheated. Friends accept the reality whatsoever existing in your life. As a human we do more times right but sometimes wrong too. It is normal. Try to rectify if possible otherwise accept it this attitude will save you from such type of BAABAAS.