रविवार, 22 सितंबर 2013

विमोहन 10


गया श्राद्ध की बहुरंगी दुनिया
     
   ऐसा न सोचिये कि भारत में सब कुछ पूर्ण वैदिक, पूर्ण इस्लामी या किसी भी तरह से केवल एक ही विचारधारा या पहचान के आधार पर चलता है या चल पायेगा। नीचे की तस्वीरें धर्मारण्य, बोधगया, बिहार पितृश्राद्ध पिंडदान परिसर की हैं। मजार मंदिर परिसर में है और मजार वालों को भी पिंडदान से समस्या नहीं है। पंडा जी के अनुसार यह मजार देवीजी के मशालची का है, जो देवी के आगे आगे मशाल लेकर चलते हैं। जब मशालची को मुसलमान होना तय है तो फिर झगड़ा किस बात का? और भगवती के मंदिर के आहाते में उनके सेवक का मजार क्यों न बने? बिहार उत्तर प्रदेश में नाई जाति का इस्लामीकरण भारी संख्या में हुआ है। फिर भी जाति के सामने धर्म गौण है। ऐसे ‘‘तुर्कनौआ’’ पूरी सुविधा से पूजा पाठ शादी श्राद्ध सबमें स्वीकृत हैं।
                                 

दूसरे चित्र भी कम मजेदार नहीं हैं। यह इलाका बुद्ध को खीर खिलानेवाली सुजाता का है। ब्राह्मणों ने कंकालमय बुद्ध की प्रतिमा इसी परिसर में लगवा दी कि कुछ बौद्ध तीर्थयात्री तो बेसमय भी आ जायेंगे।  ब्राह्मणा की इस लालच का लाभ बौद्ध आंदोलनकारी उठाते हैं। आप मानिये बुद्ध को विष्णु का अवतार या जा भी वे तो परिसर का सीधा बंटवारा या पूर्ण स्वामित्व ले कर ही रहते हैं। आजकल यह खेल खूब हो रहा है। फिलहाल तो बुद्ध पर पिंडदानी हावी हैं।





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