मंगलवार, 17 सितंबर 2013

जय हो विश्वकर्मा जी

जय हो विश्वकर्मा जी

जहां प्रजापिता ब्रह्माजी पहले से ही विराजमान हों, पूरी सृष्टि रच रहे हों वहां विश्वकर्मा जी की क्या जरूरत? जरूरत तो पड़ती ही है। जब शिल्प और उद्योग खेती से अधिक लाभ देनेवाले हो जायं तो उन बिरादरियों के लिये जरूरत पड़ती है।
जब देवताओं ने कोई उपयोगी चीज खुद बनाई नहीं केवल उसे हथियाया, हड़पा तो धीरे-धीरे दूसरों के गुण, क्षमता तथा कर्म की अवहेलना करने की जरूरत देवता तथा उनके समर्थकों को पड़ती है। यह एक ऐसे देवता की कल्पना है जिसने सूर्य को बनाया तो नहीं पर उसे भी अपनी मशीन यंत्र पर काट-छांट कर ऐसा बनाया जिससे मनुष्य अपना संबंध बना सके। इन विश्वकर्मा जी के बहाने मय असुर आदि की शिल्प कहानियों पर पर्दा डालने में सुविधा जो हो जाती है।

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