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सोमवार, 18 अगस्त 2014

श्री कृष्ण जी के नाम संदेश


कहा सुना जाता है कि आप सभी कलाओं में पारंगत एवं लीलाओं में महारत वाले महान व्यक्ति हुए। आपकी कथाएं अद्भुत हैं। वैसे तो चूंकि आप भगवान हैं अतः मैं यह नहीं कह सकता कि मैं जो कहने जा रहा हूं वह आपको पता नहीं होगा, फिर भी अगर ध्यान से हट गया हो तो इस समाचार पर विचार कर लें।
आपके संसार छोड़ने के अनेक वर्षों बाद भारत के लीला विशेषज्ञों को लगा कि आपकी अनेक लीलाओं की नकल करने में पूरा मजा नहीं आ रहा है। अतः उन्होंने सोचा कि सबको छकाने वाले नटवर नागर को ही क्यों न छकाया जाय? और इस बार ऐसा छकाया जाय कि फिर दुबारा आप किसी को छकाने की हिम्मत ही न करें। भक्त के अनुसार भगवान को चलना होता है न? भक्त भगवान के अनुसार क्यों चले?
कुछ लीला आपके चिर शत्रु प्राचीन संन्यासियों ने की और बाकी का काम संन्यासी फिल्म वालों ने पूरा कर दिया। इस काम के लिये आपने अपनी लीलाओं से जो संदेश दिया था, पहले उसकी पैरोडी बनाई गई फिर उसे फिल्मी गाने में सरसतापूर्वक परोसा गया, जैसे यह आपका ही उपदेश हो। विस्तार में कितना कहूं, संक्षेप में सुनिये- ‘कर्म किये जा फल की इच्छा, मत कर रे इंसान, जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान।’ मैं ने इसका संस्कृत श्लोक गीता में कम से कम 5000 बार खोजा लेकिन नहीं मिला। और तो और, एक ‘गीता सार’ नामक पोस्टर छपा, फिर तो उसके प्रिंट भी कपड़े पर आये। अब हर हिंदू नाई की दुकान पर लगभग टंगा रहता है क्योंकि अपने किसी नाई को प्रश्रय नहीं दिया।
बड़े चले थे न गीता में असली नकली संन्यास का मर्म बताने कि जो आग नहीं छूता और काम नहीं करता वह असली संन्यासी नहीं है, असली तो कुछ और होता है.............। उन्हीं आग न छूने वालों और कर्म न करने वालों ने आपकी गीता को अपना धार्मिक हथियार बना लिया।
अब लोग मेरे जैसे कम पढ़े लिखे संस्कृत वाले से पूछते हैं कि जो कर्मों में कुशलता को योग मानता हो, उस आदमी ने ऐसी बेवकूफी वाली बातें कैसे कीं? मैं क्या करूं? अब आपकी कथा सुनाने वाले कथा वाचक भी सीधी बात नहीं कहते कि आपने ऐसा नहीं कहा था। आपने तो कहा था कि कोई काम जब 5 कारकों/घटकों से संभव होता है तब केवल तुम केवल कर्ता हो कर पूरा हक कैसे जमा सकते हो? पैरोडी के मार में आपकी अपनी ही गीता के अपने विवरण कब के अंतर्ध्यान हो गये? ‘अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ............’’ श्लोक की चर्चा कोई नहीं करता क्येंकि अगर ऐसा करने लगे तो कार्य कारण संबंध सबकी समझ में आ जायेगा? फिर महान संतों की महत्ता कैसे बनेगी?
कैसा रहा लीला का यह समाचार?

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

अगला पोस्ट ‘जीउतिया’ पर


 मित्रो,
मैं बौराया नहीं हंू, यह चौमासे का असर है। चौमासे में विष्णु भगवान भले ही 4 महीनों के लिये सो जायें उनके लोग थोड़े ही सो जाते हैं। वे जम कर जश्न भी मनाते हैं और उत्पात भी करते हैं। इसलिये चौमासे के भीतर अनेक व्रत उत्सव भी होते हैं। इसीलिये मजबूरी में मुझे भी ताबड़तोड़ पोस्टिंग करनी पड़ रही है।
विष्णु भगवान के सो जाने पर फुरसत पा कर उनके प्रिय वाहक गरुड महाराज क्या करें? तो वे इस समय विष्णु भगवान के नाम पर अपना साम्राज्य बढ़ाने में लग जाते हैं। यह जो पूरा पितृपक्ष और वैष्णव परंपरा का श्राद्ध है, उसके प्रवर्तक गरुड हैं। उनके ही नाम पर गरुड पुराण है। आज जो स्वर्ग-नरक की अवधारणा प्रचलित है, उसका सर्वाधिक विस्तृत विवरण गरुड पुराण में ही मिलता है।
उनके उत्पात और परम करुणामय बोधिसत्त्व जीमूतवाहन के आत्मोत्सर्ग तथा उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का उत्सव भी तो आ गया। जीउतिया का पूरा ऐतिहासिक संदर्भ एवं पूरी कथा भी आ रही है। टाइप हो कर तैयार है। मेरे दो मित्र सर्वश्री राजबल्लभ जी और विनय रंजन जी ने तो भूइयां जाति पर बहुत काम किया है। वे अगर कुछ चित्र डाल सकें तो बहुत अच्छा लगेगा।

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

जय हो विश्वकर्मा जी

जय हो विश्वकर्मा जी

जहां प्रजापिता ब्रह्माजी पहले से ही विराजमान हों, पूरी सृष्टि रच रहे हों वहां विश्वकर्मा जी की क्या जरूरत? जरूरत तो पड़ती ही है। जब शिल्प और उद्योग खेती से अधिक लाभ देनेवाले हो जायं तो उन बिरादरियों के लिये जरूरत पड़ती है।
जब देवताओं ने कोई उपयोगी चीज खुद बनाई नहीं केवल उसे हथियाया, हड़पा तो धीरे-धीरे दूसरों के गुण, क्षमता तथा कर्म की अवहेलना करने की जरूरत देवता तथा उनके समर्थकों को पड़ती है। यह एक ऐसे देवता की कल्पना है जिसने सूर्य को बनाया तो नहीं पर उसे भी अपनी मशीन यंत्र पर काट-छांट कर ऐसा बनाया जिससे मनुष्य अपना संबंध बना सके। इन विश्वकर्मा जी के बहाने मय असुर आदि की शिल्प कहानियों पर पर्दा डालने में सुविधा जो हो जाती है।

फुरसत किसे है?

फुरसत किसे है?
अभी नरेन्द्र मोदी के गुण गान और पितृपक्ष की कमाई के सामने सरकार, जी हां सरकार भी कमाती है, ब्राह्मणों की समिति, संघ, संगठन किसी को यह समझने की फुरसत ही नहीं है कि जाने-अनजाने यह जो खेल हो रहा है वह कल भारी तनाव पैदा कर सकता है।
बोधगया में बौद्ध नामक हर जीच की कीमत अधिक हो जाती है। बौद्ध ब्रांड अधिक बिकाऊ और फायदे का ब्रांड है। इसलिये धीरे से दूसरे मंदिर के पुजारी/पंडे भी अपने नियंत्रण की जगह को  बौद्ध धर्म से जोड़ने की कोशिश करते हैं ताकि विदेशी और बौद्ध श्रद्धालु वहां आकर दान दक्षिणा करें। बोधगया के पूरब धर्मारण्य में किया गया ऐसा प्रयास महंगा पड़ा और एक हिस्से पर बौद्धों ने कब्जा जमा लिया।
आज जब मैं सूटिंग की पूर्व तैयारी में घूम रहा था तो देखा कि गया के प्रसिद्ध शिव मंदिर ‘वृद्ध प्रपितामहेश्वर मंदिर’ का नाम चुपके से बदल कर दो नाम पट्ट लगा दिये गये हैं। हिंदू भक्तों ने उसे   ‘परमपितामहेश्वर’ बना दिया और प्रशासन ने ‘बुद्ध प्रपितामहेश्वर’ बना दिया। वृद्ध शब्द बुद्ध हो गया। दर्दनाक यह है कि आम हिंदी भाषी को पता ही नहीं कि परदादे के पिता को वृद्ध प्रपितामह कहते हैं। पंडितों में से किसी को फुरसत कहां है? धर्म चाहे जैसे बिके वही सही है, तब हिंदू धर्म पर बनियों का राज होना ही चाहिये, वे तो पहले से ही विशेषज्ञ हैं।

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

आजादी से अधिक दुखी आत्माएं

इस आजादी से अधिक दुखी आत्माएं
आजादी के 66 साल बाद भी इस आजादी से लोग पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। आम आदमी, नौकरी पेशा अफसर, किसान, छात्र, सवर्ण, असवर्ण, दलित, वुद्धिजीवी, अनपढ़, कंपनी वाले, मजदूर  सभी लोग। किसका किसका नाम गिनायें कुछ ही होंगे जो पूरी तरह संतुष्ट होंगे। सबकी असंतुष्टि के अलग अलग कारण हैं। यह असंतुष्टि कुछ लोगों की यह समझ बनाती है कि इस आजादी में बहुत सारी कमियां हैं जिन्हें दूर कर देने पर यह आजादी सार्थक हो जाती। इसके विपरीत अनेक लोग  तुलना करते मिलेंगे कि इस आजादी का क्या फायदा? इससे बेहतर तो आजादी के पहले वाली पुरानी व्यवस्था ही थी, यह देश सुधरने वाला ही नहीं, यहां के लिये तानाशाही ही ठीक है, इस आजादी में तो संभ्रांत, बुद्धिमान, शरीफ और संस्कारी लोगों की पूछ ही नहीं, इत्यादि।
ये दूसरे प्रकार के लोग सामान्य लोग नहीं हैं। इन सबों की अपनी मानसिक ग्रथियां हैं। इन्हें पहचानना चाहिये और स्वयं को उससे बचाना चाहिये। मैं कुछ उदारण दे रहा हूं-
1 आजादी और लोक तंत्र के प्रति अगंभीर लोग-
एक बार मुख्य चुनाव आयुक्त श्री शेषन ने कहा था कि जो चीज कीमती होती है, लूट उसी की होती है। आजादी और उसके परिणामस्वरूप मिले मतदान के अधिकार की रक्षा और उसके लिये संघर्ष तो करना ही पड़ेगा क्योंकि यह कीमती है। अति सुविधा भोगी लोग, अति डरपोक और पूर्णतः विसंगठित लोग हमेशा अपनी जिम्मेवारी दूसरे पर लादते हैं। राजनैतिक समझ को ही बेकार बताने वाले धूर्त ऐसे लोगों की खूब प्रशंसा कर उन्हें महान बताते हैं। यह लोक तंत्र के लिये खतरा है।
2 बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें इस आजादी के प्रति घृणा बिरासत में मिली है। अभी भी कुछ लोग जो बचे ही हैं, जो आजादी के समय किशोर या बच्चे थे और ऐसे लोगों की तो अभी भी पर्याप्त संख्या है, जिनके घर में गुलामी के समय के किस्से बताने वाले मौजूद हैं। इन बुजुर्गों ने अपनी अगली पीढ़ी को समझाया है कि उनकी निजी पारिवारिक समस्याओं का मूल कारण यह आजादी है, वरना पुराने जमाने में उनकी हुकूमत चलती थी। हिंदू जंमींदारों से अधिक मुस्लिम जमींदार इस दुख से दुखी रहते हैं कि अंगरेजों को तो मुल्क छोड़ के जाना था तो हुकूमत हम सभी राजा, महाराजाओं, नवाबों को सीधे सौंप कर जाना चाहिये था। उनकी अपनी सीधी हुकूमत वाली सत्ता तो कांगेसियों की जगह मुस्लिम हुक्मरानों को ही मिलनी चाहिये थी, आखिर वे ही तो अंगरेजों के पहले के शासक थे।
3 जो हिंदू राष्ट्र का सपना देखने वाले थे उन्हें पीड़ा सताती रही कि इनते लंबे समय के बाद जो आजादी मिली उसके बाद भी एक हिंदू बहुल राष्ट्र में भी हम हिंदू पंरपरा एवं संस्कृति को तरजीह नहीं दे सके, मिला भी तो बराबरी का दर्जा और वह।
4 हिंदू वादियों में भी अनेक उदास हो गये कि बहुसंख्यक बहुलतावादी सनातनी हिंदू संस्कृति के पक्ष में तो कोई है ही नहीं। न कांग्रेसी, न कम्यूनिस्ट, न संधी। इसीलिये आर.एस.एस के समानांतर हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद का भी गठन हुआ। स्व. नाथूराम गोडसे को अपना मानने का दावा आर.एस.एस के समानांतर हिंदू महासभा आज भी करती है। रामराज्य परिषद पारंपरिक विचारों वाला खुला राजनैतिक संगठन था, जो अपनी कालबाह्य एवं अनुदार विचार के कारण भारतीय समाज में स्वीकृत नहीं हो सका। स्वामी करपात्री जी ने काशी के सुप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर के समानांतर एक नया काशी विश्वनाथ मंदिर भी बनवा डाला। अनेक सेठ एवं राजा, जमींदार कुछ दिनों तक इनका समर्थन करते रहे लेकिन चुनावी राजनीति में इन्हें सफलता नहीं मिली।
5 1952 से शुरू हुए जमींदारी ऊन्मूलन, प्रीवी पर्स समाप्ति, खदानों के राष्ट्रीय करण, निजी बैंकों का राष्ट्रीय करण, भूमि हद बंदी आदि कार्यक्रमों ने पुराने सुविधा भोगी वर्ग को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इससे तो अच्छा अ्रगरेजों का ही राज्य था।
अंगरेजी अत्याचार की जानकारी देने वाली किताबों की कोई कमी नहीं है। आप आज की उपलब्धियों को सामने रख कर खुले दिल विचार करें कि क्या सच में आज जैसी भी आजादी हमारे पास है, उससे बेहतर अंगरेजों का कंपनी राज ही है।