मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

दर्शन-दर्शन का खेल

दर्शन-दर्शन का खेल
मानव जीवन में संसाधनों के मामले में कोई अमीर-गरीब हो सकता है लेकिन समय सबके लिये सीमित है। 24 घंटे का दैनिक माप सबके लिये है। इसलिये वाग््जाल में समय नष्ट करने का मैं पक्षधर नहीं रहा, ना ही किसी को हराने-जिताने का। हम बिहारी 1000 साल से यह झेल रहे हैं। मंडन मिश्र-शंकराचार्य को झेला, तब नव्य न्याय की सांदर्भिक सुष्पष्ट पदावली वाली शैली विकसित की कि आपको जो कहना हो निश्चयात्मक सांदर्भिक अर्थों के साथ कहें।
दुर्भाग्य से यह भी नहीं टिका। लगभग 5-6 सौ वर्षों तक तो तर्क, अलंकार शास़्त्र (साहित्य समीक्षा शास्त्र) तक यह शैली मान्य रही लेकिन उसके बाद उससे भी गंदी आदत हमारे पुर्खों ने लगा ली। वह आदत है- पूर्व पक्ष (विरोधी पक्ष) को दूषित एवं भिन्न रूप में कहने की। इस चर्चा में सत्य तो आरंभ में ही छूट गया। यह चर्चा चर्चा न हो कर युद्ध हो गई।
मतलब कि दूसरे की बात को बदल कर कहेंगे तो उसका खंडन करना आसान होगा और अपनी बात भी स्पष्ट तथा निश्चयात्मक रूप से नहीं कहेंगे। जब जो मन में आयेगा अर्थ निकाल लेंगे। शास्त्रार्थ के नाम पर लंठई और कुतर्क का बोलबाला हो गया।
इस हाल में कौन अपना समय खराब करे? मजाक के रूप में प्रचलित हुआ ‘‘हुज्जते बंगाल’’।
हमारे यहां 20 वीं शदी में प्रो. रामावतार शर्मा हुए पटना यूनिवर्सिटी में। वे कहते थे 1 सप्ताह में चाहो तो एक नया दर्शन पूरी तर्क पद्धति के साथ गढ़ लो। यह तो हो सकता है लेकिन जैसे ही उस नवगठित दर्शन को सामाजिक जीवन में लाने की बात होगी, उसकी हवा निकल जायेगी क्योंकि समाज और प्रकृति किसी पुराने या नये गढ़े हुए दर्शन और तर्क पद्धति से नहीं चलते।
तब क्या करें? क्या बातचीत ही बंद कर दें? ऐसा कैसे कहा जा सकता है? सच्चे दिल दिमाग वाली ‘वाद’ कथा तो हो ही सकती है। उसकी आरंभिक पहचान होती है वक्ता जब अपने वक्तब्य का संदर्भ स्पष्ट करता है।


कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें