मंगलवार, 20 अगस्त 2013

आजादी से अधिक दुखी आत्माएं

इस आजादी से अधिक दुखी आत्माएं
आजादी के 66 साल बाद भी इस आजादी से लोग पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। आम आदमी, नौकरी पेशा अफसर, किसान, छात्र, सवर्ण, असवर्ण, दलित, वुद्धिजीवी, अनपढ़, कंपनी वाले, मजदूर  सभी लोग। किसका किसका नाम गिनायें कुछ ही होंगे जो पूरी तरह संतुष्ट होंगे। सबकी असंतुष्टि के अलग अलग कारण हैं। यह असंतुष्टि कुछ लोगों की यह समझ बनाती है कि इस आजादी में बहुत सारी कमियां हैं जिन्हें दूर कर देने पर यह आजादी सार्थक हो जाती। इसके विपरीत अनेक लोग  तुलना करते मिलेंगे कि इस आजादी का क्या फायदा? इससे बेहतर तो आजादी के पहले वाली पुरानी व्यवस्था ही थी, यह देश सुधरने वाला ही नहीं, यहां के लिये तानाशाही ही ठीक है, इस आजादी में तो संभ्रांत, बुद्धिमान, शरीफ और संस्कारी लोगों की पूछ ही नहीं, इत्यादि।
ये दूसरे प्रकार के लोग सामान्य लोग नहीं हैं। इन सबों की अपनी मानसिक ग्रथियां हैं। इन्हें पहचानना चाहिये और स्वयं को उससे बचाना चाहिये। मैं कुछ उदारण दे रहा हूं-
1 आजादी और लोक तंत्र के प्रति अगंभीर लोग-
एक बार मुख्य चुनाव आयुक्त श्री शेषन ने कहा था कि जो चीज कीमती होती है, लूट उसी की होती है। आजादी और उसके परिणामस्वरूप मिले मतदान के अधिकार की रक्षा और उसके लिये संघर्ष तो करना ही पड़ेगा क्योंकि यह कीमती है। अति सुविधा भोगी लोग, अति डरपोक और पूर्णतः विसंगठित लोग हमेशा अपनी जिम्मेवारी दूसरे पर लादते हैं। राजनैतिक समझ को ही बेकार बताने वाले धूर्त ऐसे लोगों की खूब प्रशंसा कर उन्हें महान बताते हैं। यह लोक तंत्र के लिये खतरा है।
2 बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें इस आजादी के प्रति घृणा बिरासत में मिली है। अभी भी कुछ लोग जो बचे ही हैं, जो आजादी के समय किशोर या बच्चे थे और ऐसे लोगों की तो अभी भी पर्याप्त संख्या है, जिनके घर में गुलामी के समय के किस्से बताने वाले मौजूद हैं। इन बुजुर्गों ने अपनी अगली पीढ़ी को समझाया है कि उनकी निजी पारिवारिक समस्याओं का मूल कारण यह आजादी है, वरना पुराने जमाने में उनकी हुकूमत चलती थी। हिंदू जंमींदारों से अधिक मुस्लिम जमींदार इस दुख से दुखी रहते हैं कि अंगरेजों को तो मुल्क छोड़ के जाना था तो हुकूमत हम सभी राजा, महाराजाओं, नवाबों को सीधे सौंप कर जाना चाहिये था। उनकी अपनी सीधी हुकूमत वाली सत्ता तो कांगेसियों की जगह मुस्लिम हुक्मरानों को ही मिलनी चाहिये थी, आखिर वे ही तो अंगरेजों के पहले के शासक थे।
3 जो हिंदू राष्ट्र का सपना देखने वाले थे उन्हें पीड़ा सताती रही कि इनते लंबे समय के बाद जो आजादी मिली उसके बाद भी एक हिंदू बहुल राष्ट्र में भी हम हिंदू पंरपरा एवं संस्कृति को तरजीह नहीं दे सके, मिला भी तो बराबरी का दर्जा और वह।
4 हिंदू वादियों में भी अनेक उदास हो गये कि बहुसंख्यक बहुलतावादी सनातनी हिंदू संस्कृति के पक्ष में तो कोई है ही नहीं। न कांग्रेसी, न कम्यूनिस्ट, न संधी। इसीलिये आर.एस.एस के समानांतर हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद का भी गठन हुआ। स्व. नाथूराम गोडसे को अपना मानने का दावा आर.एस.एस के समानांतर हिंदू महासभा आज भी करती है। रामराज्य परिषद पारंपरिक विचारों वाला खुला राजनैतिक संगठन था, जो अपनी कालबाह्य एवं अनुदार विचार के कारण भारतीय समाज में स्वीकृत नहीं हो सका। स्वामी करपात्री जी ने काशी के सुप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर के समानांतर एक नया काशी विश्वनाथ मंदिर भी बनवा डाला। अनेक सेठ एवं राजा, जमींदार कुछ दिनों तक इनका समर्थन करते रहे लेकिन चुनावी राजनीति में इन्हें सफलता नहीं मिली।
5 1952 से शुरू हुए जमींदारी ऊन्मूलन, प्रीवी पर्स समाप्ति, खदानों के राष्ट्रीय करण, निजी बैंकों का राष्ट्रीय करण, भूमि हद बंदी आदि कार्यक्रमों ने पुराने सुविधा भोगी वर्ग को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि इससे तो अच्छा अ्रगरेजों का ही राज्य था।
अंगरेजी अत्याचार की जानकारी देने वाली किताबों की कोई कमी नहीं है। आप आज की उपलब्धियों को सामने रख कर खुले दिल विचार करें कि क्या सच में आज जैसी भी आजादी हमारे पास है, उससे बेहतर अंगरेजों का कंपनी राज ही है। 

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