गुरुवार, 15 अगस्त 2013

स्वतंत्रता और आजादी


स्वतंत्रता , ‘‘स्व’’ अर्थात अपनी ‘‘तंत्रता’’ व्यवस्था का होना यह भारतीय शब्द एवं समझ है, उसी तरह जैसे- स्वस्थ, स्वाध्याय आदि। इसमें तंत्र अर्थात व्यवस्था का भी ‘स्व’’ की तरह महत्त्व है। आजादी के लिये मुक्ति शब्द अधिक करीब है। आजादी लोगों को अधिक पसंद आती है। इसमें कोई बंधन जो नहीं हैं लेकिन दूसरे की आजादी को महत्त्व देने पर कोई न कोई व्यवस्था तो अपनानी ही होगी। आज तक की सभी व्यवस्थाओं में कोई न कोई कमी रह ही गई है क्योंकि धूर्त तथा अत्याचारी सबसे पहले व्यवस्था के भीतर ही पक्षपात को सम्मिलित कर उसे नैतिक रूप देने का काम कर देते हैं, जैसे- आज का नव उदारवादी मुक्त बाजार सिद्धांत, बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सारी समस्याओं का समाधान मानना आदि। परिणाम स्वरूप वर्तमान शासन का आदर्श है इनके पक्ष में काम करना फिर चाहे हमारा तंत्र लोक तंत्र हो या कोई दूसरा।
मेरा जन्म 1959 में हुआ, आजादी के बाद, आजादी के लिये लड़ने वाले (पैत्रिक परिवार) एवं अ्रगरेजों की फौज-पुलिस में काम करने वाले जंमीदार (ननिहाल) परिवारों के बीच। इसलिये मेरे बचपन में आजादी मिलने का जोश बचा हुआ था। अपने पितामह की जेल की डायरी मेरे निजी पाठ्य पुस्तकोें में से एक थी, जो 3 खंडों में थी, पूरा मिलाकर एक समकालीन पैनोरमा क्योंकि जिला स्तरीय क्रंातिकारी नेताओं को तत्कालीन कलेक्टर से अधिक काबिल बनाने का लक्ष्य रखने वाले गुरु लोग भी जेल में होते थे। क्रांतिकारी कूप मंडूक हो यह मान्य नहीं था। ऐसे ही एक स्वतंत्रता सेनानी मेरे बाबा थे और उन्हें जेल में पढ़ाने वाले गुरु थे स्वामी विज्ञानानंद। मेरे बाबा पुराने शाहाबाद जिले के और स्वामी विज्ञानानंद पुराने छपरा जिले के।


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