सोमवार, 19 अगस्त 2013

रक्षा बंधन : एक युक्ति

देवता एवं असुर के बीच सामंजस्य की एक युक्ति रक्षा बंधन
रक्षा बंधन साल में केवल एक ही बार नहीं होता। हां, भाई बहन के बीच वाला एक ही बार होता है। वर्तमान में रक्षा बंधन की जो चलन है वह कई बातों की मिली जुली खिचड़ी है। वैसे सावन पूर्णिमा के दिन जो कई प्रकार के व्रत तथा उत्सवों की पुरानी पंरपरा थी, जिसकी बहुत लोगों को आज जानकारी भी नहीं है, मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूं। 
मेरी बात केवल रक्षा बंधन तक सीमित है। प्रश्न है किसके द्वारा किसको बांधना और क्यों? ताज्जुब यह कि जिसे बांधा जाय उससे ही रक्षा की उमीद भी। बांधने वाला कमजोर और बंधने या बंधवाने वाला मजबूत। मोटे तौर पर जिसकी चर्चा फेसबुक पर जरूरी होने पर भी अन्य किसी मित्र के द्वारा नहीं की जायेगी मैं अपनी सीमित जानकारी आप तक पहुंचाने का प्रयास करूंगा।
भारत विभिन्न समुदायों, जीवन शैलियों के संघर्ष तथा समन्वय से बना है। संघर्ष तो समुदायों के बीच हुआ लेकिन इस संघर्ष के साथ-साथ संघर्षशील समुदाय एक बृहत् समाज के भाग भी बनते चले गये। समन्वय ऐसा हुआ कि पहचानना कठिन। आज मुझे ऐसी अच्छी बातों को विश्लेषित कर इसलिये बताना जरूरी लगता है क्योंकि पाश्चात्य अक्लमंदी से सम्मोहित अनेक आधुनिक संप्रदाय लोगों को उलटी-सीधी बातें बताते हैं। हमारे बहुरंगी समाज को केवल एक ही रंग में रंगना चाहते हैं।
यक्ष-यक्षिणियों की पूजा हमारा समाज करता रहा है। वे भी भारतीय संस्कृति के अभिन्न भाग हैं। इसी तरह राक्षसों की कथा के बगैर जिन्हें असुर, दैत्य आदि शब्दों से भी संबोधित कर घालमेल का प्रयास किया गया संस्कृति की कथा पूरी नहीं होती। छल एवं बल मोटे तौर पर अपराध की ये दो आधार हैं। देवता छल में विश्वास करते हैं, राक्षस बल में। असुरों/राक्षसों की वचनबद्धता सुप्रतिष्ठित है। देवता वचन दे कर भी मुकरने का बहाना बनाने में दक्ष हैं। इन्होंने पुण्यात्मा असुरों को भी खूब सताया, ऐसी पीड़ा शायद ही किसी असुर ने किसी देवता की दी हो।
यक्षों के समक्ष अगर समर्पण कर उनसे मांगा जाय तो वे देने से नहीं कतराते। अगर उनकी प्रतिज्ञा को स्मरण करा कर कोई धागा या कुछ भी कहीं बांध दिया जाय  तो वे रक्षा का काम भी करते हैं। वह रक्षा सूत्र, ताबीज या आभूषण कोई अपने शरीर के किसी भी भाग पर बांध सकता है। बौद्धों का रक्षा सूत्र देखने में बिहार में प्रचलित जीउतिया के धागे जैसा होता है। राक्षस वचन के तो पक्के हैं पर उनसे रक्षा का वचन पाने के लिये उनकी ही कलाई पर सूत्र बांधना पड़ता है। 
कालांतर में राक्षस ही नहीं हर मजबूत की कलाई पर बांधना होता है। सामान्य पूजा पाठ के उपरांत बांधा जाने वाला धागा आज फैसन, रंगदारी, एक खास राजनैतिक दल आदि का प्रतीक बनाने की प्रक्रिया तो चल रही है जो विविधता के गर्त में गिर कर कोई निश्चित अर्थ ग्रहण नहीं कर पायेगा यह यक्ष परंपरा वाला है और जजमान के घर जा कर उसकी कलाई पर बांधा जाने वाला और बहन के द्वारा भाई की कलाई पर बांधा जाने वाला राक्षस परंपरा का जो आज बिलकुल घुल मिल गया है। आज न कोई देवता है, न असुर, न यक्ष, न राक्षस, न शक, न हूण, न यवन, न किरात। सभी मिल कर भारत बन गये। सबों ने सबकी बातों को अपनी सुविधा एवं जरूरत के साथ अपना लिया। बिहार में तो राजा बलि की दुहाइ्र दे कर ही रक्षा बांधी जाती है। बाकी के लोग अपना मंत्र मिला सकते हैं।

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