शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

योग तंत्र के अनुभव सच्चे या झूठे


योग तंत्र के अनुभव सच्चे या झूठे
1. नशा का अनुभव भी अनुभव तो है ही, वह नशे के उतरने के बाद भी सच है या झूठ यही निर्णायक बात है। हम नशा एवं नशे के अनुभव को झुठला नहीं सकते। गहरी आस्था में हमें वे हीं बातें सच लगने लगती है, जो हम पसंद करते हैं। यह कल्पना लोक वाला अनुभव है। यह अनेक बार झटके खाकर डरता है।
2. मूर्ति से लाख सच्ची भक्ति जान नहीं बचाती। आज तक तोड़े गए सभी प्रसिद्ध मंदिरों की मूर्तियाँ अपनी रक्षा नहीं कर सकीं। किसी जमाने में नालंदा गया और आज तिब्बत की हालात आपके सामने है। तंत्र से न कोई आक्रांता डरा ही नहीं। मूर्ति तो साधना का आरंभ बिंदु और एकाग्रता का आलंबन मात्र है।
3. आँख, नाक, कान आदि ज्ञानेन्द्रियों से जो अनुभव होता है उसके अतिरिक्त इसी मन-मस्तिष्क द्वारा स्वप्न, निद्रा, स्मृति, कल्पना आदि क्रियाएँ एंव अनुभव भी होते हैं। इन आंतरिक अनुभवों को कैसे झुठलाया जा सकता है। ये अनुभव हमारे व्यवहार को बाहरी अनुभव से कम प्रभावित नहीं करते। योग एवं तंत्र में इन आंतरिक अनुभवों, उनकी कार्य प्रणाली, मन-मस्तिष्क की कार्य प्रणाली का साक्षात्कार एवं जीवन में उसके सदुपयोग की विधियाँ सिखाई जाती हैं।
सम्मोहन एवं विमोहन दोनों सिखाया जाता है। प्रकृति में स्थित सूक्ष्म ध्वनियों, शरीर की सहज क्रिया से उत्पन्न होनेवाली ध्वनियों, तरंगों सबके साथ अनुकूल रिश्ता बनाना सिखाया जाता है। ये सब वास्तविक है। मार्डन सायंस वाले अब धीरे-धीरे यंत्रों द्वारा इन्हें मापने लगे हैं। इसे एक साधक स्वयं अनुभव करता है और जरूरत के अनुसार उन्हें नियंत्रित भी करता है। आप भी कर सकते हैं। पतंजलि की धारा में साधना अकेले की जाती है। तंत्र एवं कर्मकांड में सामूहिक सामाजिक तौर पर। यहां तो जबरन भी उच्च अनुभव करा ह दिये जाते हैं। जैसे राजा का राज्याभिषेक कर सामाजिक स्वीकृति के बल पर उसे महान बना दिया जाता है, उसी तरह अभिषेक की विधियों द्वारा 1 सप्ताह, 9 दिन 21 दिन एवं 3 महीने के अंतंर्गत वर्षो की साधना में होने वाले अनुभव बहंत कम समय में सुरक्षित वातावरण में सिखा दिये जाने के तरीके प्रचहलत हैं।
एक छोटा उदाहरण लेते हैं। सभी वर वधू को दांपत्य में यौन सुख एवं प्रजनन कार्य में लगना होता है लेकिन उनके दांपत्य की सफलता संयम में होती है असंवेदनशीलता या नपुंसकता में नहीं। तंत्र प्रधान इलाकों में 10-15 वर्षाें पूर्व तक घर की बड़ी-बूढ़ी स़्ित्रयों के नेतृत्व मेंल्दी उबटन एवं अभिषेक की विधि से यह अभ्यास करा कर एवं वरवधू के अनुभवात्मक संयम की परीक्षा कर उसे दांपत्य के योग्य बना दिया जाता था। सबसे कड़ी परीक्षा मिथिला में ली जाती रही है। मुझे आज का हाल मालूम नहीं है। मंदिरों में होनेवाली शादी की चलन में इसके लिये समय नहीं मिलता। मजेदार यह है कि घर की शादी के लिये समय नहीं निकालने वाले कुछ लोग फिर किसी तांत्रिक मंडली के सदस्य बन कर, मोटी दक्षिणा दे कर असुरक्षित वातावरण में उसी अनुष्ठान को दुहराते हैं। इसलिये समझने एवं समझाने की सार्थकता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें