गुरुवार, 12 सितंबर 2013

Branding of Indian Saadhanaa Systems

विमोहन 9
मित्रो, धर्म एवं राजनीति अपनी क्षेत्रीय एवं सामयिक सांदर्भिकता में शुरू भले ही होते हों कुछ समय बाद उनकी branding शुरू हो जाती है। भारत की विविधतापूर्ण स्थिति इसके लिये और अधिक सुविधा देती है। क्षेत्रीय  आचार भेद से धर्म संबंधी व्यवहार का अलग होना तो उचित है लेकिन जब एक सनातन, वैदिक हिंदू जो कहें धर्म सभी जगह है तो मौलिक और बड़ी बातें तो एक ही तरह की होंगी लेकिन राजा अपने राज्य को ही पूरा भारत बनाने की इच्छा रखते थे और पुजारी बस चले तो केवल अपने मंदिर में ही भगवान का वास बताते। लाचारी में पुजारी अपने मंदिर को सबसे जाग्रत, संपूर्ण मनोकामनाओं को पूरा करने वाला बता कर शांत हो जाते हैं। इसके विपरीत समानांतर रूप से ‘एक ब्रांड विरोधी’ और ‘‘सर्व ब्रांड विरोधी’’ धारा भी सक्रिय रहती है।
मंदिर क्या अधिक महत्त्वाकांक्षी मंडली अपने प्रिय किसी एक देवता के अधीन, उनके अंतर्गत, उनका ही दूसरा स्वरूप बता कर पहले विचार के स्तर से किसी एक के महत्त्व को समाप्त कर देती है फिर उस मंदिर के पुराने विग्रह/मूर्ति को। यह है तिरोभाव का खेल। पहले विचार, फिर पुस्तक, फिर मूर्ति। ऐसा विष्णु, बुद्ध, सूर्य एवं शिव के उपासकों ने कई बार किया है। अधिक मंदिर और मूर्तियां भी तो इन्हीं की हैं। सूर्य का विष्णु एवं शिव में अंतर्भाव एवं फिर तिरोभाव खूब किया गया। बुद्ध का व्यक्तित्व वैष्णवों एवं संपत्ति शैवों ने ली बौद्ध साधना विधियों का लाभ शाक्तों ने उठाया। इसके उलटा भी किया गया। ऐसे अनेक खेल हजारों साल चले।
साधना की मूल विधियां लगभग वहीं होंगी, सामग्री भी वहीं होगी। नामकरण एवं लाभ कमाने वाले अलग होंगे। आजकल सर्वधर्म समभाव वाले ऐसा खेल खूब करते है। मुझे उनसे आये दिन निपटना पड़ता है। ये है Super Branding of Indian Hindu Saadhanaa Systems. All God Jaya Shri Krishnaa. Branding of Indian Political Schools में आगे लिखूंगा..................

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