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मंगलवार, 1 मार्च 2016

मुझे शिकायत है

मुझे शिकायत है
1 एक शब्द से, जिसके कारण रोज मेरी हेठी होती है।
2 अपने गांवों वाले देश में मुझे घटिया किश्म का आदमी समझा जाता है।
3 मेरी पहचान कानूनी तौर पर बदल दी जाती है, वह भी झूठे अर्थ में।
4 यदि मैं उसे न मानूं तो आप मुझे देश द्रोही भी कह सकते हैं।
5 मैं पूरा देशी-देहाती आदमी हूं, न कभी विदेश गया न जाने का सपना है नेपाल तक जाने का मौका नहीं मिला, जो पास में है और पसासपोर्ट की भी दरकार नहीं है।
6 हम से ऐसी हिकारत क्यों?
सवाल मेरे भी हैं-
7 क्या यह देश केवल नागरिकों का है?
8 या फिर शहरी लोगों का?
9 या सिटिजन्स का
10 गांव में रहने वालों, उस पहचान से जीने वालों का क्यों नहीं?
यह नागरिकता क्यों इतनी कीमती है? मेरे मन की पीड़ा क्या किसी को कभी साली? क्या इस शब्द को बदल नहीं देना चाहिए? 

रविवार, 10 मई 2015

क्या ऐसे भक्ति की साधना होगी?


परंपरागत रूप से वर्तमान समय को भारत में कलि काल कहा जाता है। इसमें भक्ति और नाम स्मरण का महत्त्व बताया गया है। भक्ति ओर प्रेम दोनो शब्द चलन में हैं। कोई इसे लौ लगाना भी कहते हैं।
ईश्वर है या नहीं? इस बहस का यहां कोई मतलब नहीं, उसे मानकर ही भक्ति की साधना होती है। मैं फिलहाल भक्ति या उसके उत्कृष्ट प्रकारों पर चर्चा करने नहीं जा रहा। पहले सामान्य प्रेम और भक्ति के प्रति समाज और खाश कर परिवार का क्या नजरिया है, जरा इसी पर गौर कर लें। क्या ऐसे माहौल में सचमुच प्रेम की साधना शुरू हो सकती है, जहां प्रेम करना पाप करने जैसा हो। जब प्रेम के अभ्यास और विकास का उचित अवसर और काल हो, ठीक उसी समय उन लोगों के बीच भी, जहां प्रेम के विभिन्न रूपों का विकसित होना अनिवार्य हो, जैसे- पति-पत्नी, माता-पिता और उनकी संतानें, वहीं प्रेम करना परिवार विरोधी और समाज विरोधी तक माना जाता हो। जब उम्र बढ़ जाये तब यही बात जरूरी और समाज के अनुकूल कैसे हो जायेगी? आधुनिक नौकरी पेशा समाज की परिस्थिति में काफी बदलाव आया है लेकिन गांव-देहात में अभी भी पुरानी चलन का ही प्रभाव है, जो दो पीढि़यों के संघर्ष का मुख्य कारण है। भाई-भाई में प्रेम हो, बहनों में हो लेकिन अन्य के साथ न हो। मर्द का ससुराल से और औरत का नैहर से प्रेम न हो। यह सामान्य घरों की बात है किसी अंतरजातीय विवाह वाले की नहीं। 
  इन्हीं बातों को आदर्श घोषित किया गया लेकिन सौभाग्य से हर आदर्श की तरह इस आदर्श का भी पूरी तरह पालन समाज ने नहीं किया, इसी कारण घर-परिवार कुछ बचा हुआ है। मेरे मन में यह सवाल बार-बार उभरता है कि क्या ऐसे भी भक्ति की साधना पनप सकती है? जब कुटंब भावना ऐसी रहे तो वसुधैव कुटुंबकम् का क्या होगा?

गुरुवार, 5 मार्च 2015

हाय कबीरा तू फंसा, अपने घर की फांस


मेरा कबीर पंथियों से बहुत पुराना लगाव है। इसलिये उन पर रोना आता है, खाश कर कबीर पर। कबीर पंथियों ने अनेक विलक्षण काम किये हैं लेकिन कबीर अपनी ही फांस बरबाद हुए क्योंकि संच्चाई की जगह चालाकी करने लगे।
संत और सिद्ध अपनी मौज में रहते हैं, ना काहू से दोश्ती ना काहू से बैर। बातें सीधी करते हैं, मानना हो मानो, न मानना हो, मत मानों। कबीर ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने सरलीकरण की जगह वही जटिलीकरण चुना, जिसकी निंदा वे कर रहे थे, अपने विरोधियों से कई गुना जटिल। बाकी बची खुची पहचान को उनके अनुयायियों ने समाप्त कर दिया।
होली के समय कबीरा और जोगीरा गाया जाता है, उपहास के रूप में भी। वामपंथी हिंदी समालोचक इसके लिये भी हर समस्या के एक मात्र कारण की तरह इस समस्या का भी एक मात्र कारण तथाकथ्ज्ञित रूप से ब्राह्मणों को ठहरा देते हैं। अब जरा आप भी मिलाइये--
1 कबीर को सरल भाषा में बोलने में क्यों परेशानी हुई?
2 अपने ज्ञान को पूर्ववर्तियों से भी गूढ़ या दुरूह कहने की लालच क्यों हुई?
3 कैसी हिंदू मुस्लिम एकता? कोई मुसलमान मानता भी है क्या?
4 माने भी कैसे़? कबीर की तो मूर्तियां भी बनीं और उनके मंदिर भी बने तो पूजा तो           होगी ही।
5 पोथी विरोधी कबीर ने भी फिर मौखिक ही सही, ग्रंथों की रचना क्यों की?
6 पतन भी उसी तरह हुआ, कबीर पंथ एक संप्रदाय बन गया। गृहस्थ की जगह साधु         आये।
7 भारत जैसे अन्य संप्रदायों के मठ बने, वैसे ही कबीर पंथ के।
8 गजब की लंगई कि अभी भी कबीरपंथी पोथी और मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं।
9 बनारस केन्द्र बना तो बनारस का सबसे धनी स्वर्ण भंडार वाला मठ कबीर मठ               हुआ।
10 बाबा भोले नाथ के घर से सोने की पत्तर और दीवार में जड़े सिक्कों की चोरी हुई तो        कबीर जी के चबूतरे से सोने की ईंटों की।
11 और अंतिम बात कि जातिवर्चस्व भी तो आना ही था। इस संप्रदाय में कोईरी जाति के लोगों तक महंथी रिजर्ब हो गई तो कुछेक अक्ल के मारे सवर्णों ने बगावत कर एक नया ग्रुप बना लिया।
बेचारे कबीर की गालियां अब किस पर पड़ें? हाय कबीरा तू फंसा, अपने घर की फांस।

रविवार, 1 मार्च 2015

पता नहीं, वह कैसी है?

पता नहीं, वह कैसी है?
कल कई वर्षों बाद एक लड़की दिखी, जो कभी मेरी बेटी जैसी थी और आज 2 बच्चियों की मां है। उसके साथ उसका शौहर भी था और संभवतः उस शौहर की मां भी। वह लड़की मुझे अक्सर याद आती है क्योंकि मैं ने उसे प्यार दिया और उसकी गलतियों (जो मुझे लगीं) पर समझाया बुझाया भी। उसे दिल खोल कर पढ़ा रहा था कि एक काबिल पारंपरिक चिकित्सका लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था। पता नहीं किस चीज की कमी उसे इतना सता रही थी कि उसने बगावत कर इस्लाम स्वीकार किया और शादी की।
समझाने के अतिरिक्त न मैं कुछ कर सकता था न किया लेकिन मुझे उसका मुसलमान बनना और बुर्के से ढंक जाना अच्छा नहीं लगा। आज के समय में ऐसा धर्मांतरण? न समझ में आया न ही अच्छा लगा। उसे पढ़ने, सीखने, घूमने-फिरने, सजने-संवरने, मित्रता करने, कला, कविता घर गृहस्थी हर काम की आजादी उसके परिवार से मिलती दिखती थी। न पर्दा, न बुरका? ब्राह्मण होने के नाते हिंदू धर्म संबंधी स्थिति भी उसकी अच्छी ही थी। स्वयं शिक्षित और खूबसूरत भी। फिर भी उसने एक असवर्ण, मुसलमान, बेरोजगार, धूर्त, कट्टर, सुन्नी मुसलमान से शादी की। परिवार ने उससे संबंध तोड़ लिया, शायद उसकी मंा छुपे-छुपे संबंध रखती हों लेकिन वह सबसे जुदा हो गई।
मुझे उसके बारे में सूचनाएं मिलती थीं लेकिन कल कार के गैराज में उसका पति भी परिवार सहित अचानक आ गया। उसने अभिवादन किया, मैं ने उत्तर दिया लेकिन न उस लड़की ने मुझसे मिलना या अभिवादन करना जरूरी समझा न मेरी हिम्मत हुई जबरन उसके पास जाने की क्योंकि अब तो वह एक पर्दानशीन कही जाने वाली औरत थी। पता नहीं, वह अपने ससुराल में कैसी जिंदगी बिता रही होगी? लड़का अभी भी बेरोजगार ही है या संदिग्ध किश्म का कारोबार कर रहा है, पहले की तरह। बस खैरियत इतनी कि वह बुर्के में नहीं थी।
सुविधा के लिये कह सकता हूं, जो सच नहीं भी हो सकता-- बेचारी ‘‘लभ जेहाद की मारी’’।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

दीक्षा तिथि की पूर्व संध्या पर

दीक्षा तिथि की पूर्व संध्या पर आप सबों को वंदन, अभिनंदन
ब्रह्मलीन गुरुदेव, स्वैच्छिक जन्म की प्रतीक्षा में लगे पितामह एवं अपने से बड़े सभी लोगों को सादर चरण स्पर्श पूर्वक प्रणाम और शिष्यों को उनके सफल होने की मंगल कामना।
मैं कल, अर्थात गीता जयंती के ब्राह्म मुहूर्त में विधिवत साधना की दृष्टि से 36 साल का हो जाऊंगा। 1978 में एकादशी द्वादशी के बीच वाले ब्राह्म मुहूर्त में दीक्षा हुई और पहले ही ध्यान में सूर्योदय हो गया। गुरु जी ने आशीर्वाद दिया जो होना था सो हो गया। मेरे जैसे अज्ञानी को भरोसा करने में ही 20 साल से अधिक लग गये। इस बीच बहुत उलझा, फिर सुलझा।
तीन युग बीत गये। चौथे में अब सब समेटने की साधना शुरू और सबसे पहले आंकांक्षाओं फिर साधना को भी तो समेटना है क्योंकि इसके बाद तो यह शरीर भी क्या पता उस लायक रहे या न रहे। उसे भी तो समेटना होता ही है।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

मरने को समझौता

कभी कभी अपने साथ भी समझौता करना पड़ता है। वस्तुतः जीने का मजा वही ले सकता है, जो या तो यह माने कि वह अभी मरेगा नहीं या वो, जो हमेशा मरने को तैयार हो। मुझे मरना, अपने या अपनों के लिये पसंद नहीं आया बशर्ते कि वे भारी पीड़ा में न हों। दुश्मन मरें तो मरें, उनसे अपना क्या?
जहां तक याद है 8 साल तक तो किसी के भी मरने की खबर से ही मैं मायूस हो जाता था। मेरे मुख्य प्रशिक्षक, मेरे बाबा (पितामह) को यह बात पसंद नहीं आई। इतना छोटा बच्चा, क्या जानता है मृत्यु के बारे में? उसके बावजूद? डरे, यह उचित नहीं है। इसलिये उन्होंने मृत्यु से मेरे डर को भगाने के अनेक उपाय किये और अंत में मरने की कला भी सिखा गये। पता नहीं मैं ने कितना आत्मसात किया, यह तो मेरे मरने के बाद ही पता चल सकेगा।
12 साल से 54 साल तक मुझे पूरा विश्वास था कि मैं मरने वाला नहीं अतः मौत की परवाह किये बिना अनेक काम किये, दुर्घटनाएं और मेरे ऊपर आक्रमण सालाने रूटीन की तरह रहे लेकिन 50 साल पूरे होते ही एक दिन मैं डरने लगा कि अब तो मेरा नंबर भी देर सबेर आयेगा ही। बहाना बनाने की वैसे भी अपने पास सुविधा नहीं है और यह तो बिलकुल सच है।
मैं ने सोचा कि इस प्रकार भीतर में डर बना रहे तो जीवन कैसे चलेगा? इस मुद्दे पर उन प्राचीन भारतीय मनीषियो को पढ़ना शुरू किया, जो थोथे आदर्शवादी न हो कर उतने ही व्यवहारिक और अनुभवी भी माने जाते हैं।  भर्तृहरि इसमें सबसे अच्छे लगे। उनका कथन है- ‘‘विद्या और धन की चिंता तो यूं करे कि कभी मरना ही नहीं है और धर्म का पालन इस तरह करे कि बस अभी तुरत मौत आने ही वाली है। ’’ यह बात दिल को भाई नहीं, इसमें दुहरी और नकली जिंदगी है।
फिर अचानक भीतर से सचाई कौंधी कि अपने आप को किसी भी क्षण मरने के लिये तैयार ही क्यों न कर ली जाये। मेरे पितामह ने किया था तो लगा कि लोग कर तो लेते ही हैं। मेरी पात्रता शायद उतनी नही, फिर भी यह प्रश्न जब भीतर में उठ गया तो क्यों न अभी से तैयारी शुरू कर दी जाये। मुझे 4 साल लगे किसी तरह अपने को मनाने में कि इस सत्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त तो दूसरा कोई उपाय नहीं है।
मित्रों मन फिर भी पूरी तरह नहीं माना तो एक समझौता हुआ है कि जब मरने का पता ही नहीं तो टेंसन क्यों लेना? जब मरना होगा मरेंगे, इससे डर कर तो जाना भी मुश्किल है अतः मौत से बिना डरे पहले की तरह जीन है। और जो यह सवाल है कि मौत के बाद क्या होगा तो एक दो बार तो पहले भी लगभग जीते जी मरे ही हैं तो इस बार कायदे से होश में रहते हुए अंतिम यात्रा के पहले पिछली मौतों का अनुभव कर लेते हैं, फिर अंतिम निर्णय होगा कि मरना है या नहीं?
आज 95 साल के एक सुल वृद्ध से मिल कर मेरा मनेबल और बढ़ा कि देखिये इनकी हिम्मत? अभी पढ़ते हैं, सीखते हैं, तब लौटते समय याद आया कि हमारे यहां के एक पहलवानजी ने तो संभवतः 95 साल की आयु में शादी ही की थी 85 साल की महिला पहलवान से। अभी मेरी उम्र ही क्या है?