रविवार, 1 मार्च 2015

पता नहीं, वह कैसी है?

पता नहीं, वह कैसी है?
कल कई वर्षों बाद एक लड़की दिखी, जो कभी मेरी बेटी जैसी थी और आज 2 बच्चियों की मां है। उसके साथ उसका शौहर भी था और संभवतः उस शौहर की मां भी। वह लड़की मुझे अक्सर याद आती है क्योंकि मैं ने उसे प्यार दिया और उसकी गलतियों (जो मुझे लगीं) पर समझाया बुझाया भी। उसे दिल खोल कर पढ़ा रहा था कि एक काबिल पारंपरिक चिकित्सका लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था। पता नहीं किस चीज की कमी उसे इतना सता रही थी कि उसने बगावत कर इस्लाम स्वीकार किया और शादी की।
समझाने के अतिरिक्त न मैं कुछ कर सकता था न किया लेकिन मुझे उसका मुसलमान बनना और बुर्के से ढंक जाना अच्छा नहीं लगा। आज के समय में ऐसा धर्मांतरण? न समझ में आया न ही अच्छा लगा। उसे पढ़ने, सीखने, घूमने-फिरने, सजने-संवरने, मित्रता करने, कला, कविता घर गृहस्थी हर काम की आजादी उसके परिवार से मिलती दिखती थी। न पर्दा, न बुरका? ब्राह्मण होने के नाते हिंदू धर्म संबंधी स्थिति भी उसकी अच्छी ही थी। स्वयं शिक्षित और खूबसूरत भी। फिर भी उसने एक असवर्ण, मुसलमान, बेरोजगार, धूर्त, कट्टर, सुन्नी मुसलमान से शादी की। परिवार ने उससे संबंध तोड़ लिया, शायद उसकी मंा छुपे-छुपे संबंध रखती हों लेकिन वह सबसे जुदा हो गई।
मुझे उसके बारे में सूचनाएं मिलती थीं लेकिन कल कार के गैराज में उसका पति भी परिवार सहित अचानक आ गया। उसने अभिवादन किया, मैं ने उत्तर दिया लेकिन न उस लड़की ने मुझसे मिलना या अभिवादन करना जरूरी समझा न मेरी हिम्मत हुई जबरन उसके पास जाने की क्योंकि अब तो वह एक पर्दानशीन कही जाने वाली औरत थी। पता नहीं, वह अपने ससुराल में कैसी जिंदगी बिता रही होगी? लड़का अभी भी बेरोजगार ही है या संदिग्ध किश्म का कारोबार कर रहा है, पहले की तरह। बस खैरियत इतनी कि वह बुर्के में नहीं थी।
सुविधा के लिये कह सकता हूं, जो सच नहीं भी हो सकता-- बेचारी ‘‘लभ जेहाद की मारी’’।

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