गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

घृणा और उन्माद की राजनीति आसान क्यों?


मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि अति दक्षिण, अति वाम, अति  हिंदू, अति मुस्लिम आदि पर आधारित राजनीति के प्रति लोगों का आकर्षण इतना अधिक क्यों होता है और प्रेम, सामंजस्य , जिम्मेवारी , सत्य तथ्य आधारित राजनीत या समाजिक प्रयोग इतने कठिन और विफल जैसे क्यो हो जाते हैं?
मुझे समझ में आया कि -
1 प्रेम में जिम्मेवार आती है और भार भी पड़ता है, घृणा में कोई ऐसा बोझ नहीं बनता? बिना कुछ किये भी घृणा तो कर ही सकते हैं और घृणा में उस व्यक्ति से कोई अपेक्षा नहीं होती, जिससे घृणा की जाती हो। इस प्रकार घृणा करना सुविधा जनक है और इसकी सफलता तथा विस्तार में सरलता भी अधिक है।
2 घृणा की गांठ तब और मजबूत हो जाती है जब उसका आलंबन कोई वर्तमान या ऐतिहासिक अथवा संभावित शत्रु हो।
3 वर्तमान शत्रु के तो भले बुरे दोनों व्यवहारों के प्रगट होने से समीक्षा की मजबूरी होती है लेकिन ऐतिहासिक अथवा संभावित शत्रु की हम चाहे जैसी छवि बना सकते हैं।
मावन मन की इस सुविधावादी और दुविधावादी प्रवृत्ति का लाभ राजनीत वाले खूब उठाते हैं। नेताओं की न जाति, न विचारधारा और लोग उनके लिये कट मर रहे हैं, जुबानी स्तर पर और खून खराबे तक भी।

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