बुधवार, 3 जून 2015

इंडोलाजी : यूरोपीय वैचारिक षडयंत्र 1


आप यदि भारतीय संस्कृति, सभ्यता, समाज में रुचि रखते हैं, धर्म, कर्म, परंपरा, इतिहास, पूजापाठ अनुष्ठान, रीति रिवाजों से संबंधित लिखने पढ़ने या कर्म कांड, तंत्र, योग, पौरोहित्य, राजनीति आदि से संबंधित काम रोजगार से जुड़े हों तो इस बात का पूरी खतरा है कि आप जाने-अनजाने कहीं यूरोपीय वैचारिक षडयंत्र के शिकार बन कर रोज बरोज अपनी ही समझ की बलि तो नहीं चढ़ा रहे???????
योरप वालों ने भारत को समझने की कोशिश की क्योंकि वे बाहरी थे, अनजान थे। राज काज चलाने के लिये जो आवश्यक हो उतना जानना तो बहुत जरूरी था ही साथ ही फुरसत में कुछ जन भी लिया जाये तो हर्ज ही क्या है? उनके लिये यदि सतही ज्ञान भी हो जाये तो क्षम्य है क्योंकि वे अनजान, विदेशी और बाहरी लोग थे। हमें समझने का उनका पैमाना भी वैसा ही होना स्वाभाविक था। वस्तुतः केवल ऐसा ही नहीं हुआ, कुछ विदेशियों ने भारत की हर परत को अंदरूनी तौर पर समझने की ही नहीं जो उनके लिये सभव था, उसकी चरम सीमा तक जा कर भारतीय विद्या और संस्कृति को जीने की कोशिश की। ऐसा एक नाम सर जॉन वुडरफ का है।
ऐसे उदार लोग साम्राज्यवादियों को बहुत खटके। अतः बाकायदा षडयंत्र कर इंडोलाजी एवं ओरयेंटोलोजी जैसे शब्द गढ़े गये, उन्हें कुछ खाश अर्थों तक सीमित किया गया, भारत को समझने के लिये यूरोपीय पैमानों की शर्तें थोपी गईं, वगैरह। आज के अनेक बुद्धिजीवी उन्हीं उलझनों और सतही तथा यूरोपीय पदावली एवं पैमाने के अहंकार से ओत प्रोत हो कर भारतीय परंपरा तथा विद्या के क्षेत्र में उतरते हैं। यूरोपीय साम्राज्यवादी बुद्धिजीवी आज भी विधिवत उस काम में लगे हैं और कई बार निर्लज्जता पूर्वक भारतीय लोगों को गलत काम के लिये उकसाते भी हैं। मेरा सामना एक बार ऐसे ही एक प्रतिष्ठित महानुभाव - सर मार्क टुली से हुआ। अगले किश्तों में जारी........

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