शनिवार, 3 सितंबर 2016

वागर्थ

वागर्थ 1
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे, पार्वती-परमेश्वरौ।।
वाक्-वाणी एवं उसका अर्थ मिलकर हुए वागर्थ। ये आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े रहते हैं। ऐसे वागर्थ की तरह जुड़े हुए, संसार के माता-पिता पार्वती एवं परमेश्वर की मैं वंदना करता हूं, वाक्-वाणी एवं उसके अर्थ की ठीक समझ के लिए।
मैं बचपन से महा कवि कालिदास एवं गोस्वामी तुलसीदास जी की, रामचरित मानस वाली  मंगलाचरण वंदना दुहरा रहा हूं।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।
 वाक्-वाणी एवं उसके अर्थ की ठीक समझ के प्रयास में मैं भी लगा हुआ हूं। कुछ समझा भी बाकी का शेष है। जब कालिदास/तुलसीदास जी जैसे लोग लगे हुए रहे तो मुझे देर लग रही है तो इसमें बहुत घबराने की बात नहीं है। बात ही बहुत तगड़ी है- पहले तो वाक् एवं उसके अर्थ के स्वरूप को समझना, फिर वाक् एवं उसके अर्थ के बीच जुड़ाव को समझना, फिर इस संसार में इनकी व्यापक भूमिका को पहचानना होगा तब जा कर कहा सकूंगा कि हां, अब मैं ने भी ठीक से समझ लिया है।
आप चाहे तुलसीदास जी को मानें न मानें, आस्तिक हों या नास्तिक, वैदिक हों या बौद्ध या अन्य मतावलंबी वाक् एवं उसके अर्थ की व्यूह रचना से बच नहीं सकते। हमारे जीवन में परस्पर संबंधों का बहुत बड़ा भाग इसी सरल या जटिल व्यूह रचना पर आधारित है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है और हम कई बार पता नहीं सच या झूठ गौरवान्वित महसूस कराए जाते हैं कि भाषा हमें अन्य जीवों से विशिष्ट बनाती है। मैं ने सोचा कि कोई व्यक्ति यदि मुझे अन्य जीवों-योनियों में घूमने की विद्या सिखा दे तभी कह सकूंगा कि मनुष्य की अभिव्यक्ति एवं अन्य जीवों की अभिव्यक्ति में क्या अंतर है क्योंकि अभिव्यक्ति और संवाद तो अन्य जीवों में भी हो ही रहा है।
खैर, फिलहाल अन्य जीवों की बात छोडि़ए जरा मनुष्य के भीतर ही वाक् एवं उसके अर्थ की स्थिति को जानने-समझने का प्रयास किया जाए। यह एैसा विषय है कि आप नहीं कह सकते कि आप इसे परिचित नहीं है या इसकी आपको कोई जरूरत नहीं है। उलटे आप भी रोजमर्रे में इसकी समस्या से जूझते-जुझाते, कुंढते-हंसते या अपनी चालाकी पर मंद-मंद मुस्कराते हुए अथवा अट्टाहास करते हुए जीते हैं। फिर भी यह वागथ्र हमारे कब्जे में आता ही नहीं है, यह हमारी बेचैनियों में से एक है। हममें से जो जितने पढ़े लिखे औब बातों का व्यवसाय करने वाले या बातों के माध्यम से जीवन चलाने वाले होते हैं, उन्हें यह समस्या बहुत सताती है। धर्म, राजनीति, बाजार, सत्ता के विभिन्न केन्द्र और उनके प्रतिद्वंद्वियों तथा प्रतिस्पधिंयों के बीच रातदिन वाक्-युद्ध चलता रहता है। भारत के लोगों ने इसे अपने ढंग से समझने का प्रयास किया, बहुत विस्तार और गहराई में जा कर।
मैं अपने पश्चिम प्रेमी वामपंथी और दक्षिण पंथी दोनो प्रकार के मित्रों से उनके इस प्रचार के विरुद्ध जाने के लिए क्षमा भी नहीं मांग सकता कि भारत में तो कोई ज्ञान-चिंतन कभी था ही नहीं, न आज की समस्याओं की व्याख्या करने की उसमें क्षमता है, फिर भला समाधान कैसे मिलेगा? सच यह है कि आपने तो यह शब्कि पाखंड ही इसलिए किया ताकि हमारी विशाल ज्ञान राशि और वांग्मय में आपके मौलिक होने का दावा ही न डूब जाए। कई अन्य कारण भी हैं, फिलहाल हम रुकेंगे केवल वाक् एवं उसके अर्थ तक।
इसके लिए भारतीय चिंतन-ज्ञान परंपरा में एक यायावरी करते हैं और देखते हैं कि कहां क्या मिल जाता है और किसके काम का, उसमें से क्या निकलता है? आप साथ देंगे तो मेरी यात्रा का एकांत मुझे कम सतायेगा। वैसे मैं यह तो कह नहीं सकता कि यह पूर्णतः स्वांतः सुखाय है लेकिन उसके मूल में वह जरूर है क्योंकि इस यात्रा का निपर्णय तो मैं ने स्वयं लिया है।
मेरी यह यात्रा कथा नाना पुराण-निगम-आगम से सम्मत ही रहेगी। मैं इस लायक ही नहीं कि कोई नई बात कह सकूं। मुझमें कोई नयापन है ही क्या? न आप लोगों से पूर्णतः भिन्न ऐसी कोई मौलिकता है जो कुछ नया कहने की औकात दे सके। इसीलिए मुझे अपने पर भरोसा है कि इस कथा में कुछ न कुछ आपके लिए भी अपना कहने-समझने के लायक जरूर मिलेगा।
यह शृंखला मेरे ब्लाग बहुरंग और फेसबुक पर दोनो जगह उपलब्ध रहेगी। जो लोग पूरे या किसी छूटे हुए अंश को पढ़ना देखना चाहें, वे मेरे ब्लाग बहुरंग के लेवेल वागर्थ को क्लिक कर एक साथ सारे पोस्ट देख सकेगे।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

रस की अनुभूति होती है। कैसे? यह न पूछिए

रसानुभूति 2
रस की अनुभूति होती है। कैसे? यह न पूछिए क्योंकि यह तो सभी को कमोबेश होती ही है, कम से कम षट् रस वाली या नव रस वाली या उससे भी अधिक।
असली मामला यह है कि मन भरता नहीं है। भरे तो कैसे? क्योंकि कभी मात्रा में कमी तो कभी बहुत कम समय मिला। मन करता हे कि काश यह अनुकूल अनुभूति कुछ देर और रहती। स्वादिष्ट भोजन थोड़ा और मिलता, मन भरा नहीं। तब किया क्या जाय? मानव इसी जुगाड़ में लगा है।
कुछ सोचते हैं रसानुभूति के पर्याप्त या उससे अधिक संसाधन इकट्ठे करें तो मन भर जाए। कुछ सोचते हैं - इसमें तो भोगने का समय ही नहीं बचेगा तो समय का भी प्रबंध करें और जल्दी जल्दी भोग लें। यह जल्दबाजी भी कम संकट नहीं पैदा करती। मन हो या इन्द्रियां या तन वे ही थक जाते हैं बीमार पड़ जाते हैं। तन एवं इन्द्रियों के लिए अनुकूलता या प्रतिकूलता में तो समानता भी रहती है ओर कुछ टिकाउपन भी लेकिन मन का क्या भरोसा अभी कुछ चाहिए और कुछ देर बाद उससे बिलकुल अलग, तो फिर पूरी, मन भर रसानुभूति हो कैसे?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में रसायन वाले रस से शरीर को ठीक रखने, षड् रस तथा पुष्टिकारक रक्त, मज्जा आदि से तन एवं इन्द्रियों को पुष्ट करने तथा भाव रस से मन एवं संजीवनी रस से आत्म तत्त्व मतलब संपूर्ण व्यक्तित्व को सरस बनाने की कला का विकास भारत में हुआ। यह तब तक सार्थक है जब तक मानव जीवन है। नाम, रूप, परंपरा तथा कुल एवं क्षेत्र की दृष्टि से विधियें में अंतर आता है लेकिन रस मूलतः एक है।
रस मूलतः एक ही है, इस बात की चर्चा अगले पोस्ट में।

रसो वै सः वह रस है

रसानुभूति 2
रसो वै सः वह रस है
इस वेद वाक्य को भी ब्रह्म का अर्थ बताने वाला माना जाता है। मतलब कि वह ब्रह्म रस है। रस शब्द कई अर्थों  में प्रयुक्त हुआ है, जिनमें मुख्य हैं- 1 जीभ से चखा जाने वाला स्वाद रूपी रस- षट् रसए 2 द्रव का पर्यायवाची जैसे सभी तरल पदार्थ, जो अपने साथ जुड़ी चीजों को संभाल कर रखते हैं, जीवन देते हैं, जल आदि, 3 पारा एवं गंधक का योग एवं ऐसी दवाएं, जिनमें पारा-गंधक का योग मिला हो, अनेक आयुर्वेदिक दवाएं, 4 काब्य/नाट्य या गान से मिलने वाली मन को खुश करने वाली अनुभूति, 5 ध्यान, योग, तंत्र आदि के अभ्यास से अपने भीतर के आनंद स्रोत तथा जीवन स्रोत से कण एवं/या विपुल रूप में चखा/अनुभूत किया जाने वाला।
रस के इन 5 अर्थों के अतिरिक्त इनके अर्थ विस्तार से भी कई अर्थ निकल सकते हैं। कोई रस के किसी एक पक्ष के बारे में बताते हुए भी कह सकता है कि वह (उसके अभिप्रेत या विवेच्य) अर्थ, भोजन, काव्य, दृश्य, अनुभूति, आदि कुछ भी रस है या सरस रसयुक्त है। साथ ही वह ब्रह्म का ही अंश है।
यदि कोई अपने को योगी, तांत्रिक (परंपरागत अर्थ में न कि काला जादू वाले) या किसी दर्शन के प्रणेता/भाष्यकार मान कर बात करे तो उसकी जिम्मेवारी उपर्युक्त सभी अर्थों में रस के अर्थ, महत्व, स्वरूप, उसकी अनुभूति/उपलब्धि का मार्ग बताने की होती है।
रससिद्धांत का निरूपण किसी आदर्शवाद, कल्पना, मिथ, चाली बात नहीं है। यहां तो बताना पड़ेगा कि भोजन कैसे स्वादु बनेगा? मूर्तियों या कला के अन्य उपादानों में सौंदर्यबोध की प्रक्रिया क्या होगी? और पैमाने क्या होंगे? वगैरह।  इसी तरह मंचीय प्रक्रिया का विधान भी बताना होगा और काव्य मीमांसा भी जिसे संस्कृत में अलंकार शास्त्र भी कहते हैं।  इन सबके साथ पूजा-पाठ, ध्यान, योग लोक-व्यवहार, कृषि, संगीत, और पता नहीं कितनी सारी बातें, जैसे - मृत्यु तथा उसके बाद सरस जन्म भी।
इन बातों के एक एक पक्ष पर तो कई लोगों ने प्रकाश डाला है लेकिन उनसे आगे बढ़ कर तंत्रालोक जैसे महान ग्रथ के रचयिता श्रीमान अभिनव गुप्त ने सभी पक्षों पर प्रकाश डाला है और उसकी प्रक्रिया अनेक उपायों के साथ बताई है।
भरत मुनि का प्रसिद्ध सूत्र है- ‘‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’’। काव्य कला आदि में विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारि भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
इन सारी बातों के विस्तार की मूल प्रक्रिया एवं रहस्य मनुष्य के तन, मस्तिष्क, इन्द्रियां, मन एवं उससे गहरी जो भी मानें, उनकी कार्य प्रणालियों का संसार की सामग्रियों से उनके संबंधों के विवेचन में निहित है।
संक्षेप में कहें तो व्यक्तित्व, अंतःकरण का बाह्य संसार से संबंध तथा उसके परिणामस्वरूप होने वाली अनुभूति या अंतस्थ जप, ध्यान आदि से प्राप्त होने वाली जीवनदायी अनुभूतियां  रस के स्रोत तथा प्रक्रियाएं हैं।
अगली किश्तों में जारी

बुधवार, 9 मार्च 2016

उदार समावेशी धर्म की जरूरत 2nd

संकीर्णतावादी धाराओं की प्रमुख विशेषताएं
समावेशी उदार सनातन धर्म ? सच कहें तो ऐसा कोई एक छोटा-मोटा समूह नहीं है। यह भारतीय बहुसंख्यक समाज का धर्म है, जिसमें अनेक संकीर्णतावादी धाराएं पनपती और विलुप्त होती रहती हैं। अंततः वे भी उसी मुख्य धारा में शामिल हो जाती हैं।
इन संकीर्णतावादी धाराओं के प्रति समाज के कुछ लोगों में प्रबल आकर्षण होता है क्योंकि वे निम्न दावे करती हैं, जो प्रचलित परंपराओं के विरुद्ध या भिन्न होती हैं, जैसे- वे प्रचलित रूढि़यों के विरुद्ध हैं, उनके प्रवर्तक ज्ञान पहले वालों से श्रेष्ठ है, इसमें नयापन है, पुराने बंधन नहीं हैं, काफी प्रभावशाली लोग इसे अपना रहे हैं, या अमुक विचार या पहचान वाले लोगों के विरुद्ध है, वगैरह।
कुछेक भक्ति आंदोलनों को छोड़ दें तो ऊपर से सुधारवादी या उदारवादी लगने वाली ये धाराएं मूलतः बड़े पैमाने पर समाज के बहुसंख्यक वर्ग के प्रति हिकारत और द्वेष भाव तथा प्रतिक्रयावादी कार्यक्रमों से भरी होती हैं। इनकी प्रेरणा के मूल स्रोत प्रायः बाहरी होते हैं और कई बार इनकी कार्यप्रणाली भी बाहरी शैली वाली होती है। कई बार तो समकालीन राजनीति से प्रचारित, प्रसारित और पोषित भी होते हैं।
भीड़, नयापन, प्रतिक्रिया और नये किश्म के संगठन के कारण उदार समावेशी समाज इन्हें भी एक नये प्रयोग के तौर पर लेता है। बाद चल कर अपने ही पाखंड तथा अंतर्द्वंद्वों के कारण आकर्षण खोते ही इनके अनुयायियों को भी बहुसंख्यक धारा में पुनः वापस आ जाना पड़ता है। सबसे नए और बड़े उदाहरणों में आर्य समाज है। आर्यसमाजी लोग तेजी के साथ सनातनी धारा में लौटे और लौट रहे हैं। कुछ दिनों बाद बस कुछेक औपचारिकताओं के अतिरिक्त सनातनी तथा आय्रसमाजी का फर्क करना कठिन हो जाएगा क्योंकि बहुसंख्यक समाज ने आर्यसमाज की वैचारिक बातों को छोड़ सुविधा वाली बातें अपना लीं तो फिर क्या आर्यसमाजी? क्या सनातनी? जब जैसी सुविधा, तब वैसी पहचान और काम।

धर्म सबंधी मेरा प्रस्ताव: किश्त 1


एक उदार समावेशी धर्म की जरूरत
आज धर्म के नाम पर चारो तरफ घृणा और हिंसा का माहौल है। धर्म को अनमोल बनाने वाले सत्य, करुणा, मैत्री जैसे मूल्य तो लगता है कि धर्म से बाहर ही हो गए हैं। कहीं मिलते भी हैं तो किसी गुप्त योजना के मुखौटों के रूप में। ऐसे अनमोल जीवन को सार्थक एवं सुखद बनाने वाले भावों की जगह विभिन्न समूहों की सामाजिक पहचान, उनका वर्चस्व, संसाधनों पर कब्जा आदि ही धर्म शब्द के अर्थ हो गए हैं और बाकी की बातें बेकार मान ली गई हैं।
आज धर्मों के देश भारत में भी न केवल अल्पसंख्यक बल्कि बहुसंख्यक हिंदू धर्म भी अंदरूनी तथा बाहरी दोनो तौरों पर खतरे में है। इस्लाम अपने ही इलाके में और ईशाइयत अपने इलाके में संकट में है। ये सभी अपनी समस्याओं को पहचानने की हिम्मत भी गंवा बैठे हैं और केवल बाहरी संकट का ही हवाला देते हैं कि एक धर्म एवं उसके मानने वालों पर दूसरे धर्म के लोगों द्वारा खतरा पैदा किया जा रहा है।
एक हद तक यह सच भी है। योरप-अमेरिका आदि के ख्रीस्त पंथ को इस्लाम के जेहादी विस्फोट और भारतीय धर्म न सही, योग-तंत्र के प्रचारकों से खतरा तो है ही। भौतिकता और सायंस टेक्नोलोजी से सभी धर्म वाले डरते हैं। साम्यवादी तथा उपभोक्तावादी दोनो नजरिए खतरा पैदा किए रहते हैं क्योंकि ये दोनो ही सायंस को मानते हैं। इनसे डरे हुए धर्म प्रचारक, व्यास आदि बार-बार सांयस का हवाला देते मिलते हैं।
यह संकट इसलिए है क्योंकि धर्म के प्रवक्ता और अधिकारी धर्म के अतीतकालिक रूपों में ही उलझे रहना चाहते हैं। काल के प्रवाह के साथ उसमें परिष्कार और समावेशी प्रणाली से डरते या चिढ़ते हैं। तब समस्या का समाधान कैसे हो? 
मैं कई सालों से इस पर सोचता रहा हूं और प्रयोग भी करता रहा हू कि शायद कोई राह मिले। अब मुझे स्पष्ट हो गया है कि एक उदार और समावेशी धर्म की जरूरत है। वह धर्म कैसा हो? किस धर्म के करीब हो? ऐसे प्रश्नों के आते ही सारे विवादों और आशंकाओं का खड़ा होना सहज है। किसे उदार या अनुदार कहा जाए? आदर्श के स्तर पर और व्यवहार के तौर पर भी अंतर कम नहीं हैं।
मुझे कुछ समाधान सूझे, जिन्हें मैं अगले 3-4 किश्तों में आपसे साझा करूंगा ताकि अपनी समझ और जीवन शैली में मैं भी समावेश कर सकूं। केवल निंदा या घृणा आधारित सुझाव न ही भेजें क्योंकि अब यह प्रगट है, रहस्य नहीं है।

मेरी समझ एवं प्रस्ताव--
1 ऐसे धर्म की बात, जिसमें सबको सम्मान एवं स्वीकृति मिले। अतः व्यक्ति, समूह या समुदाय के जय-पराजय का यहां कोई मूल्य नहीं है। वे तो विभिन्न कारणों से उत्पन्न हुई घटनाएं हैं, जिनमें एक कारण धर्म की पूर्ववर्णित संकीर्ण एवं वर्चस्ववादी व्याख्या भी है।
2 किसी प्रस्ताव के साथ वर्तमान में एवं व्यवहार में आचरण के स्तर पर मिलान भी जरूरी है। जब मिलान करते हैं तो देखते हैं कि कुछ धर्म अपनी मूल अवधारणा के ही स्तर पर ऐसे बंधे हैं कि उनका समावेशी होना संभव नहीं है। उनकी मूल अवधारणा में ही एक व्यक्ति या उसके दूत को छोड़ अन्य किसी का भी पूर्ण ज्ञानी एवं भरोसे मंद होना संभव नहीं है। ऐसी कट्टरता के साथ दिली रिश्ता तो मुमकिन ही नहीं है। बस, केवल कुछ क्षणों वाला, मजबूरी वाला समझौता होगा और भीतर में चालबाजी भी चलती रहेगी कि कब अपने को श्रेष्ठ स्थापित करें और दूसरे को नीचा दिखाएं।
3 इसलिए स्पष्ट है कि ऐसे समावेशी विचार से वे लोग ही सहमत हो सकते हैं जो अनेक पुराने ज्ञानियों के साथ अनेक वर्तमान तथा भावी ज्ञानियों को स्वीकार करने को तैयार हों। ऐसी वैचारिक उदारता केवल सनातनी हिंदुओं तथा महायानी बौद्धों एवं जैनों में पाई जाती है। बौद्धों में थेरवादी तथा सांप्रदायिक एवं सुधारवादी हिंदू विविधता एवं बहुलता को स्वीकार नहीं कर पाते। लिहाजा यह प्रस्ताव भी आरंभिक तौर पर उन्हें ही दिया जा सकता है किसी मुसलमान, ईशाई या संकीर्णतावादी बौद्ध को नहीं। 
हां, इस प्रस्ताव पर अपने को तटस्थ, धर्मनिरपेक्ष या नास्त्कि मानने वाले भी विचार कर सकते हैं क्योंकि यहां ईश्वर न मानना भी एक विकल्प है और उसका भी मान बराबर है।
4 आचरण के स्तर पर भी यदि देखें तो उपर्युक्त समुदाय को विविधता में जीने का पुराना अभ्यास है। यदि यह अपने को और अधिक उदार बनाए तो सहज ही अन्य निष्ठा एवं पहचान वाले लोग राजी खुशी इस जमात में शामिल होना चाहेंगे, जैसे आज सायंस टेक्नेलोजी आधारित जीवन शैली के प्रति सबका आकर्षण है।

मंगलवार, 1 मार्च 2016

मुझे शिकायत है

मुझे शिकायत है
1 एक शब्द से, जिसके कारण रोज मेरी हेठी होती है।
2 अपने गांवों वाले देश में मुझे घटिया किश्म का आदमी समझा जाता है।
3 मेरी पहचान कानूनी तौर पर बदल दी जाती है, वह भी झूठे अर्थ में।
4 यदि मैं उसे न मानूं तो आप मुझे देश द्रोही भी कह सकते हैं।
5 मैं पूरा देशी-देहाती आदमी हूं, न कभी विदेश गया न जाने का सपना है नेपाल तक जाने का मौका नहीं मिला, जो पास में है और पसासपोर्ट की भी दरकार नहीं है।
6 हम से ऐसी हिकारत क्यों?
सवाल मेरे भी हैं-
7 क्या यह देश केवल नागरिकों का है?
8 या फिर शहरी लोगों का?
9 या सिटिजन्स का
10 गांव में रहने वालों, उस पहचान से जीने वालों का क्यों नहीं?
यह नागरिकता क्यों इतनी कीमती है? मेरे मन की पीड़ा क्या किसी को कभी साली? क्या इस शब्द को बदल नहीं देना चाहिए? 

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

स्वास्थ्य हमारा स्वधर्म है- 1


इघर कुछ दिनों से मृत्यु पर लगातार लिखने से मित्रगण कुछ नाखुश से लग रहे थे। चलिए छोड़ते हैं और वसंत के आगमन की तैयारी करते हैं। वसंत का मजा बिना स्वसथ रहे कैसे मिलेगा अतः कुछ दिनों तक स्वास्थ्य पर चर्चा होगी।
स्वास्थ्य हमारा स्वधर्म अर्थात जन्मसिद्ध अधिकार और कर्तब्य है। आजकल स्वस्थ्य की चर्चा नकारात्मक ढंग से अधिक होती है। मतलब कि रोग का न होना या ठीक हो जाना स्वास्थ्य है। यह परिभाषा और नजरिया संकीर्ण है। यह हमें मूर्ख और संकीर्ण ही नहीं झूठा और पाखंडी बनाता है। झूठे और पाखंडी लोग मुसीबतों का सामना नहीं कर पाते और बाजार के षडयंत्र में भी आसानी से फंस जाते हैं। आजकल यह संकट दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है।
वैसे आपको सुनने में लगेगा कि मैं क्या बेमतलब कि उलटी-पलटी बात कर रहा हूं लेकिन आप जरा कुछ सामान्य बातों पर गौर कर देखें कि दानों बातों का अंतर कितना जबरदश्त है।
अब नये जमाने के हिसाब से बात करते हैं। रोगों के इतने कारण और प्रकार हैं कि शायद ही कोई व्यक्ति पूरी तरह निरोग रह सके, यह असंभव जैसा है। मतलब कि कोई भी पूर्णतः निरोग नहीं रह सकता, तब? तब निष्कर्ष यह भी निकलता है कि निरोगिता का प्रयास कभी सफल नहीं हो सकता। उसके बाद का तर्क यह कि राज्य , समाज या बाजार यदि आपके स्वास्थ्य से खिलवाड़ करे तो उसे क्यों गंभीर मामला माना जाए? अब तो हालात ऐसी है कि रोग के पैमाने दवा बनाने वाली कंपनियां तय करती हैं। सबसे प्रचलित विवाद-बहस का नमूना डायबिटिज का है। मेरे परदादा और मेरे नाना दोनो डायबिटिक थे। उन्होंने पूरी उम्र भोगी और सक्रिय जीवन बिना इंसुलिन के या समतुल्य दवा के, लगभग 90 साल या कुछ अधिक। स्व. सुदर्शन वैद्य जी से ले कर अनेक उदाहरण मेरे सामने हैं।
अनेक साधक-संत रोगी हुए, कुछ रोग से ही मरे। हर रोग या कुछ लक्षण क्या सचमुच इतने भयानक हैं कि उनके डर से जीने की हिम्मत ही छोड़ दी जाए? क्या रोगों पर हमारा वश है? और नहीं, तो क्या हम उसके लिये जिम्मेवार हैं? रोग तो छोडि़ए दवा एवं चिकित्सक पर ही हमारा वश क्या उस तक पहुंच भी है? ऐसे अनेक मामले हैं जो स्वास्थ्य की अवधारणा पर पुनः विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। अतः अगली किश्तें वैसी ही लगेंगी।