सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

स्वास्थ्य हमारा स्वधर्म है- 1


इघर कुछ दिनों से मृत्यु पर लगातार लिखने से मित्रगण कुछ नाखुश से लग रहे थे। चलिए छोड़ते हैं और वसंत के आगमन की तैयारी करते हैं। वसंत का मजा बिना स्वसथ रहे कैसे मिलेगा अतः कुछ दिनों तक स्वास्थ्य पर चर्चा होगी।
स्वास्थ्य हमारा स्वधर्म अर्थात जन्मसिद्ध अधिकार और कर्तब्य है। आजकल स्वस्थ्य की चर्चा नकारात्मक ढंग से अधिक होती है। मतलब कि रोग का न होना या ठीक हो जाना स्वास्थ्य है। यह परिभाषा और नजरिया संकीर्ण है। यह हमें मूर्ख और संकीर्ण ही नहीं झूठा और पाखंडी बनाता है। झूठे और पाखंडी लोग मुसीबतों का सामना नहीं कर पाते और बाजार के षडयंत्र में भी आसानी से फंस जाते हैं। आजकल यह संकट दिनानुदिन बढ़ता जा रहा है।
वैसे आपको सुनने में लगेगा कि मैं क्या बेमतलब कि उलटी-पलटी बात कर रहा हूं लेकिन आप जरा कुछ सामान्य बातों पर गौर कर देखें कि दानों बातों का अंतर कितना जबरदश्त है।
अब नये जमाने के हिसाब से बात करते हैं। रोगों के इतने कारण और प्रकार हैं कि शायद ही कोई व्यक्ति पूरी तरह निरोग रह सके, यह असंभव जैसा है। मतलब कि कोई भी पूर्णतः निरोग नहीं रह सकता, तब? तब निष्कर्ष यह भी निकलता है कि निरोगिता का प्रयास कभी सफल नहीं हो सकता। उसके बाद का तर्क यह कि राज्य , समाज या बाजार यदि आपके स्वास्थ्य से खिलवाड़ करे तो उसे क्यों गंभीर मामला माना जाए? अब तो हालात ऐसी है कि रोग के पैमाने दवा बनाने वाली कंपनियां तय करती हैं। सबसे प्रचलित विवाद-बहस का नमूना डायबिटिज का है। मेरे परदादा और मेरे नाना दोनो डायबिटिक थे। उन्होंने पूरी उम्र भोगी और सक्रिय जीवन बिना इंसुलिन के या समतुल्य दवा के, लगभग 90 साल या कुछ अधिक। स्व. सुदर्शन वैद्य जी से ले कर अनेक उदाहरण मेरे सामने हैं।
अनेक साधक-संत रोगी हुए, कुछ रोग से ही मरे। हर रोग या कुछ लक्षण क्या सचमुच इतने भयानक हैं कि उनके डर से जीने की हिम्मत ही छोड़ दी जाए? क्या रोगों पर हमारा वश है? और नहीं, तो क्या हम उसके लिये जिम्मेवार हैं? रोग तो छोडि़ए दवा एवं चिकित्सक पर ही हमारा वश क्या उस तक पहुंच भी है? ऐसे अनेक मामले हैं जो स्वास्थ्य की अवधारणा पर पुनः विचार करने के लिए प्रेरित करती हैं। अतः अगली किश्तें वैसी ही लगेंगी।

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