शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

भारतीय इतिहास लेखन के पूर्वाग्रह

भारतीय इतिहास लेखन के पूर्वाग्रह
यह मुद्दा इतिहास के छात्रों के बीच प्रायः और राजनेताओं तथा आम आदमी के बीच रुकरुक कर चर्चित होता रहता है।
भारतीय इतिहास की कुछ प्रवृत्तियां ऐसी हैं कि वर्तमान कालीन उपयोग की दृष्टि से हमेशा उलझनें ही मिलेंगी। उलझनें इतिहास में नहीं वर्तमान समाज की प्रवृत्तियों में है क्योंकि इतिहास केवल जानने और जानकारी से शिक्षा ग्रहण करने के लिये नहीं, वर्तमान विभिन्न समुदायों, जातियों एवं समूहों की परस्पर विरोधी आकांक्षाओं में हैं। इन उलझनों का प्रभाव इतना गहरा है कि भारत के सहज सामाजिक वर्गीकरणों, जैसे - परिवार, जाति, कुल-रेस, संप्रदाय, धर्म एवं आधुनिक आदर्शवादी पहचान, जैसे- साम्यवादी, समाजवादी, अंबेदकरवादी, संघी, गांधीवादी आदि वर्गीकरणों में बंटे लोग केवल अपने अनुकूल इतिहास को ही स्वीकार करना चाहते हैं।
चूंकि अतीत को तो सुधारा जा नहीं सकता अतः लोग उससे केवज अनुकूल को स्वीकार करने एं प्रकिूल को नकारने की कोशिश करते हैं। यदि कोई व्यक्ति दूसरे पक्ष को सामने लाये तो इनकी प्रतिक्रिया बहुत भयानक होती है। उसमें भी एक सुविधावादी तर्क यह है कि कुछ लोगों को, जो कुल मिला कर अल्पसंख्यक हैं, उन्हें अन्य लोगों के साथ जोड़ कर उन पर आक्रमण किया जाय और फिर उन्हें अकेला पा कर सारी समस्याओं का जड़ उन्हें ही बताया जाय। इसके बाद उन पर आक्रमण, शोषण करना आसान हो जाता है। यह पूर्णतः शत्रुता की भावना पर आधारित इतिहास लेखन है।
विडंबना यह है कि आधुनिक आदर्शवादी पहचान, जैसे- साम्यवादी, समाजवादी, अंबेदकरवादी, संघी, गांधीवादी आदि वर्गीकरणों में बंटे लोग सहज सामाजिक वर्गीकरणों, जैसे - परिवार, जाति, कुल-रेस, संप्रदाय, धर्म एवं रोजगार की दृष्टि से एक ही साथ परस्पर विरोधी पहचान वाले हो जाते हैं। उनकी सबसे अधिक दुर्गति है। एक जन्मना ब्राह्मण को कम्यूनिस्ट होने के नाते हिंदू धर्म, ही नहीं ब्राह्मण जाति को भी रोज गाली देनी होती है और इस्लाम, ईशाइयत के क्रूरता के प्रति चुप रहना ही नहीं, उसे झुठलाना होता है। इसी तरह नास्तिकतावादी और मूलतः राजनैतिक संगठन रा.स्व.से.संघ के नजरिये से ही इतिहास को लिखने की जिद ठन जाती है। वस्तुतः तथ्य की हत्या दोनो ही निर्मम ढंग से करते हैं। 
इस समस्या के कुछ अचर्चित या अल्प चर्चित मामलों की क्रमशः चर्चा होगी।

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

पुराना/नया जीवन

पुराना/नया जीवन शुरू हो रहा है- 
सुनने में बात जितनी अटपटी लगे, सच्चाई में वैसा ही है। हम सभी जैसे जैसे बड़े होते हैं परिवार और समाज  हमें कुछ खांचों में साजने और मांजने लगता है। कुछ लोग बच्चों को ढालने तक की कल्पना करते हैं, जैसे कि उसकी कोई जन्मजात मौलिकता ही नहीं हो। कोई भ्रम चाहे जो पाल ले लेकिन कद-काठी की तरह मन और वाणी की बनावट में भी अनेक बातें जन्मजात रूप से मौलिक होती हैं।
कृत्रिम प्रशिक्षण से जो जितना दूर होता है, उसके व्यक्तित्व का विकास उतना ही अधिक अपनी जन्मजात मौलिकता के अनुरूप होता है।
योग साधना की दृष्टि से अपनी इस जन्मजात मौलिकता के अनुरूप संरचना में रहना स्व-भाव है। इसमें रहने का पहला पुरस्कार स्वास्थ के रूप में मिलता है। स्वास्थ्य का शाब्दिक अर्थ होता है- स्व में स्थित होने का भाव। हमारे यहां निरोगिता और स्वास्थ्य दानों के दो अर्थ हैं। एक योगी रोगी हो सकता है, अस्वस्थ नहीं। अस्वास्थ्य अपने मौलिक रूप में न रहने के कारण होता है। अस्वास्थ्य का आयुर्वेद में पर्यायवाची होगा ‘‘निज रोग’’ जो गलत आहार-व्यवहार और प्रज्ञापराध के कारण उत्पन्न होते हैं। जिनका कारण आंतरिक होता है न कि बाह्य। बाह्य कारण, कीटाणु, विषाणु जैसे रुद्रगण के प्रकोप और दुर्घटना या राजा और प्रकृति के प्रकोप से होने वाले रोग बाहरी हैं, जो आगंतुक हैं। इनसे पूरी तरह बच पाना संभव नहीं है। न ही स्वयं को या किसी अन्य को ऐसे रोगों के लिये दोषी ठहराना उचित है। 
अपने स्वास्थ के लिये अपनी जन्मजात मौलिकता/प्रकृति के अनुरूप जीवन जाना जरूरी होता है। इसलिये  शिक्षण-प्रशिक्षण से आई नकली बातों, मूल प्रकृति के विपरीत बातों से तन-मन को मुक्त कर पुराना/नया जीवन शुरू हो रहा है। पुराना इसलिये कि जन्मजात प्रकृति आधारित है, नया इसलिये कि बीच में प्रशिक्षण एवं भ्रम आधारित जीवन से भिन्न होगा।

समाधिस्थ बालक का सच

समाधिस्थ बालक का सच
बचपन में मेरे पास खिलौने एवं खेलने वाले दोनों की कमी थी। संयुक्त परिवार में चौथी पीढ़ी का पहला एवं दुर्लभतुल्य बालक था।
मुझे पढ़ाने के लिए विद्वानों की बैठक बुलाकर शिक्षा पद्धति तय की गई। तय यह हुआ कि इस बच्चे को (क) बच्चों की संगति से दूर रखा जायेगा (ख) विद्यालय नहीं भेजा जायेगा (ग) स्वतंत्र पाठ्यक्रम बनाकर घर पर पढ़ाया जायेगा (घ) परदादा जी की निगरानी में पढ़ाई होगी (ड़) 12-14 साल तक शास्त्रार्थ सभा में विजेता बनाया जाएगा।
मेरा गाँव सुदूर देहात में है। मेरे दो प्रपितामह थे। छोटे वाले सांख्य, वेदांत, व्याकरण साहित्य में 4 विषयों में तीर्थ अर्थात स्नातकोत्तर उपाधिधारी थे।
7 वर्ष तक में मुझे गीता एवं अमरकोश, एक कांड कंठस्थ हो गया। मैं स्वयं खिलौना हो गया। घर रिश्तेदारी के बच्चे मुझे भोंपू कहते थे, ननिहाल में बहुत मजाक उड़ता था। जैसे ग्रामोफोन ; उस जमाने में वही थाद्ध की कुंडली, घुमाकर रिकार्ड/तवा बजता वैसे ही मेरे काम में आदेश मिलते ही बुजुर्गों के सामने गीता पाठ करना एवं मिठाई फल वगैरह खाना पड़ता था। वस्तुतः मैं बहुद उदास और दुखी रहता था।खेलने पर मनाही थी और बेवजह खूब पिटाई भी होती थी। इसके साथ बुजुर्गों की अपसी बहस भी समानांतर चलती रहती कि बच्चे को पीटने से लाभ है या हानि। इस पर मैं भीतर ही भीतर सुलगता रहता क्योंकि कुछ कर तो सकता था नहीं।
एक बार मेरे बड़े प्रपितामह को काशीवास के लिए बनारस लाया गया। अस्सी घाट पर नहाकर गीता सुनाने की मेरी ड्यूटी लगी। मैं भी स्नान कर पालथी मारकर ”धर्म क्षेत्रे कुरूक्षेत्रे“ से शुरू हो गया। पाठ चालू, सामने मिठाई, फल, हो सकता है कुछ भक्तों ने कुछ सिक्के भी रखे होंगे, किसी ने मना किया होगा कि हमें दान नहीं लेना। मैं तो रोज के गीता पाठ से ऊबा गंगा की धारा में खड़ी बड़ी नौका, और उसपार पतंग उड़ाते बच्चे को देख रहा था। बच्चे और पतंग में इतन निमग्न था कि मुझे न तो आस-पास का दृश्य दिखाई दे रहा था, न ध्वनि सुनाई पड़ रही थी, मैं एकटक बस पंतग देख रहा था। स्नानार्थी भक्त आते-जाते रहे, टोक-टाक का भी असर नहीं हुआ तो लोगों ने घेर लिया कि कोई दिव्य, चमत्कारी बालक आया हैं। खुली आँख से समाधि लगाता है। मेरे पितामह ताड़ गए वे मुझे बहुत प्यार करते थे। उन्होेंने झकझोर कर सचेत किया। मैं फल-मिठाई लेकर डेरे पर लौटा।
बडे़ प्रपितामह तो नहीं मरे छोटे प्रपितामह मर गए। अनौपचारिक शिक्षा बंद हो गई। मेरी रुचि एवं पीड़ा को ध्यान में रखकर पितामह ने स्वयं पतंग खरीदा एवं मुझे पतंग उड़ाना सिखाया। पतंग उडाने में मुझे बहुत मन लगा।
बाद में मैं ने एक निबंध लिखा - पतंगबाजी: बच्चांे की चिदाकाश धारणा।
कायदे से पतंग उड़ाने से बच्चों की आँख की कई बीमारियाँ ठीक होती हैं। यह मेरा व्यक्तिगत प्रयोग है। यह संस्मरण गांधी मार्ग में छप गया है।

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

दीक्षा तिथि की पूर्व संध्या पर

दीक्षा तिथि की पूर्व संध्या पर आप सबों को वंदन, अभिनंदन
ब्रह्मलीन गुरुदेव, स्वैच्छिक जन्म की प्रतीक्षा में लगे पितामह एवं अपने से बड़े सभी लोगों को सादर चरण स्पर्श पूर्वक प्रणाम और शिष्यों को उनके सफल होने की मंगल कामना।
मैं कल, अर्थात गीता जयंती के ब्राह्म मुहूर्त में विधिवत साधना की दृष्टि से 36 साल का हो जाऊंगा। 1978 में एकादशी द्वादशी के बीच वाले ब्राह्म मुहूर्त में दीक्षा हुई और पहले ही ध्यान में सूर्योदय हो गया। गुरु जी ने आशीर्वाद दिया जो होना था सो हो गया। मेरे जैसे अज्ञानी को भरोसा करने में ही 20 साल से अधिक लग गये। इस बीच बहुत उलझा, फिर सुलझा।
तीन युग बीत गये। चौथे में अब सब समेटने की साधना शुरू और सबसे पहले आंकांक्षाओं फिर साधना को भी तो समेटना है क्योंकि इसके बाद तो यह शरीर भी क्या पता उस लायक रहे या न रहे। उसे भी तो समेटना होता ही है।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

मरने को समझौता

कभी कभी अपने साथ भी समझौता करना पड़ता है। वस्तुतः जीने का मजा वही ले सकता है, जो या तो यह माने कि वह अभी मरेगा नहीं या वो, जो हमेशा मरने को तैयार हो। मुझे मरना, अपने या अपनों के लिये पसंद नहीं आया बशर्ते कि वे भारी पीड़ा में न हों। दुश्मन मरें तो मरें, उनसे अपना क्या?
जहां तक याद है 8 साल तक तो किसी के भी मरने की खबर से ही मैं मायूस हो जाता था। मेरे मुख्य प्रशिक्षक, मेरे बाबा (पितामह) को यह बात पसंद नहीं आई। इतना छोटा बच्चा, क्या जानता है मृत्यु के बारे में? उसके बावजूद? डरे, यह उचित नहीं है। इसलिये उन्होंने मृत्यु से मेरे डर को भगाने के अनेक उपाय किये और अंत में मरने की कला भी सिखा गये। पता नहीं मैं ने कितना आत्मसात किया, यह तो मेरे मरने के बाद ही पता चल सकेगा।
12 साल से 54 साल तक मुझे पूरा विश्वास था कि मैं मरने वाला नहीं अतः मौत की परवाह किये बिना अनेक काम किये, दुर्घटनाएं और मेरे ऊपर आक्रमण सालाने रूटीन की तरह रहे लेकिन 50 साल पूरे होते ही एक दिन मैं डरने लगा कि अब तो मेरा नंबर भी देर सबेर आयेगा ही। बहाना बनाने की वैसे भी अपने पास सुविधा नहीं है और यह तो बिलकुल सच है।
मैं ने सोचा कि इस प्रकार भीतर में डर बना रहे तो जीवन कैसे चलेगा? इस मुद्दे पर उन प्राचीन भारतीय मनीषियो को पढ़ना शुरू किया, जो थोथे आदर्शवादी न हो कर उतने ही व्यवहारिक और अनुभवी भी माने जाते हैं।  भर्तृहरि इसमें सबसे अच्छे लगे। उनका कथन है- ‘‘विद्या और धन की चिंता तो यूं करे कि कभी मरना ही नहीं है और धर्म का पालन इस तरह करे कि बस अभी तुरत मौत आने ही वाली है। ’’ यह बात दिल को भाई नहीं, इसमें दुहरी और नकली जिंदगी है।
फिर अचानक भीतर से सचाई कौंधी कि अपने आप को किसी भी क्षण मरने के लिये तैयार ही क्यों न कर ली जाये। मेरे पितामह ने किया था तो लगा कि लोग कर तो लेते ही हैं। मेरी पात्रता शायद उतनी नही, फिर भी यह प्रश्न जब भीतर में उठ गया तो क्यों न अभी से तैयारी शुरू कर दी जाये। मुझे 4 साल लगे किसी तरह अपने को मनाने में कि इस सत्य को स्वीकार करने के अतिरिक्त तो दूसरा कोई उपाय नहीं है।
मित्रों मन फिर भी पूरी तरह नहीं माना तो एक समझौता हुआ है कि जब मरने का पता ही नहीं तो टेंसन क्यों लेना? जब मरना होगा मरेंगे, इससे डर कर तो जाना भी मुश्किल है अतः मौत से बिना डरे पहले की तरह जीन है। और जो यह सवाल है कि मौत के बाद क्या होगा तो एक दो बार तो पहले भी लगभग जीते जी मरे ही हैं तो इस बार कायदे से होश में रहते हुए अंतिम यात्रा के पहले पिछली मौतों का अनुभव कर लेते हैं, फिर अंतिम निर्णय होगा कि मरना है या नहीं?
आज 95 साल के एक सुल वृद्ध से मिल कर मेरा मनेबल और बढ़ा कि देखिये इनकी हिम्मत? अभी पढ़ते हैं, सीखते हैं, तब लौटते समय याद आया कि हमारे यहां के एक पहलवानजी ने तो संभवतः 95 साल की आयु में शादी ही की थी 85 साल की महिला पहलवान से। अभी मेरी उम्र ही क्या है?

बुधवार, 12 नवंबर 2014

एक था मैत्री क्लब

एक था मैत्री क्लब
मैं इसके कुछ सदस्यों से मिला हूं- स्व. बुधमल शामसुखा जी और श्री रुद्रमान भाई। इन दोनों से मिल कर मुझे लगा कि इस क्लब के लोग सच में लाजवाब होंगे। ये लोग यह समझ रखते थे कि मैत्री के भाव को कुछ लोग भूल गये हैं और अनेक इसमें अन्य विषयों की मिलावट के कारण इसका सुख नहीं ले पाते जबकि यह मनुष्य के विकास और तृप्ति का अनिवार्य साधन है। अतः एक ऐसे मंच/मंडली की व्यवस्था रहनी चाहिये जहां लोग मैत्री जी सकें उसका सुख ले सकें।
मैत्री क्लब के कुछ नियम थे-
1 मैत्री किसी से भी हो सकती है, इसमें लिंग, जाति, धर्म, राष्ट्रीयता की सीमा नहीं हो सकती, बशर्ते दोनो पक्ष चाहे। इस माध्यम से हम दूसरे को समझ सकते हैं, उसे एक हद तक स्वीकार कर सकते हैं और बचे अंतरों के साथ मैत्री पूर्वक जीने का राश्ता भी निकाल सकते हैं।
2 अतः अपनी ओर से मैत्री का प्रस्ताव/विज्ञापन किसी व्यक्ति के सामने या  खुलेआम दोनों प्रकार से रखा जा सकता है। परस्पर सहमति और उसमें खुशी मैत्री का मूल है।
3 इस क्लब का सदस्य किसी दूसरे सदस्य से या खुले आम किसी से कुछ भी मांग सकता है या देने का प्रस्ताव रख सकता है। दूसरे सदस्य को भी वैसे ही हक है कि वह दूसरे के प्रस्ताव को स्वीकार करे या ठुकरा दे। इस क्लब में स्वनिर्णय और परस्पर लेन-देन की भी व्यवस्था है अतः केवल बालिग व्यक्ति ही सदस्य हो सकता है।
4 मैत्री अनमोल है और उस भाव के द्वारा लिया गया या दिया गया सामान, व्यवहार या भाव भी।
5 कम से कम साल में 1 बार सभी सदस्यों को किसी एक स्थान में जुटना चाहिये और मैत्री विकास के बारे में सोचना चाहिये।
6 मैत्री व्यक्ति से आगे बढ़ कर परिवार तक में जाये इसलिये यदि कोई मित्र किसी के घर जाता है तो कम से कम 3 शाम/1 रात रहने भर की यथा संभव व्यवस्था उसे करनी चाहिये। कुछ नियम और भी हो सकते हें जो मुझे याद न हों।
प्रायः ऐसा देखा गया है कि अगर कोई प्रयोग सफल होने लगे तो संसार की हर समस्या का समाधान लोग उसी में खोजने लगते हैं और मूल उद्देश्य के साथ या उसकी जगह अन्यान्य बातें भी जोड़ने लगते हैं। परिणाम होता है कि सब डूब जाता है। मेरी जानकारी में यह मैत्री क्लब भी इस घटना के कारण बिखर गया।
यदि कोई व्यक्ति चाहे तो इस दिशा में प्रयोग कर सकता है। संयोजक बन सकता है। मैं दूसरा सदस्य बनने को तैयार हूं।

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

भारत को समझने की दृष्टियां

मगध-आंध्र संबंध के क्रम में

भारत को समझने की दृष्टियां
वैसे तो अनेक लोग अपनी अपनी सुविधा के हिसाब से भारत को आधा- अघूरा समझते रहे फिर भी भारत को समझने की प्रमुख 2 दृष्टियां हैं- 1 देशी 2 विदेशी। देशी दृष्टि में इसे पूरी तरह ठीक से समझना पड़ता है तो विदेशी में किसी एक पक्ष का ही अध्ययन मुख्यतः किया जाता है।

देशी दृष्टि - 
इसमें किसी क्षेत्र विशेष की संरचना एवं भारत के अन्य क्षेत्रों के साथ उसके संबंध को समझने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार के अध्ययन में उस क्षेत्र की सांस्कृतिक-राजनैतिक सीमा, चौहद्दी, भाषा, खानपान, सामाजिक मूल्य, इस संसार तथा उसके बाहर के बनावट की मूल समझ एवं विश्वास, आबादी का मूल वर्गीकरण (जातियां) तथा उन पर वर्ण व्यवस्था का प्रभाव, प्रमुख ऋषि, सिद्ध एवं वीर व्यक्ति, सामाजिक संघटन-विघटन की कथाएं, रोजगार-कृषि एवं शिल्प के प्रकार, भूमि के प्रकार उत्तराधिकार एवं परिवार व्यवस्था, मुख्य आचार संहिता अर्थात विधिमान्य/राजमान्य तथा लोकस्वीकृत धर्मशास्त्र/स्मृति ग्रंथ, बाहर से आकर बसे लोग एवं स्थानीय समाज से उनका संबंध, हार-जीत की याादें एंव कथाएं, ऐतिहासिक कृतज्ञता एवं प्रतिबद्धता, मनोरंजन के प्रकार एवं स्वरूप,  नई परिस्थितियों से तालमेल के सिद्धांत/सूत्र, शासन प्रणाली और कर, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार का स्वरूप।
इस समग्र दृष्टि को देशी दृष्टि कहते हैं। उपर्युक्त सभी बातों को ध्यान में रख कर उस खे़ के आम लोगों की जीवन शैली तथा उसके लिये आखर संहिता तैयार की जाती थी। उसे स्मृति पंरपरा कहते हैं। समय समय पर समाज के विभिन्न वर्गों के लोग सभा कर इसमें संशोधन भी करते थे और जरूरत पड़ने पर नई किताब भी लिख ली जाती थी। इन नियमों का पालन करने वाले लोगों को स्मार्त कहा जाता है। न मानने पर इन पर राजदंड भी तय होता था। इस शास्त्र के सामाजिक पक्ष वाले शास्त्र को धर्मशास्त्र तथा शासन व्यवस्था एवं कर संग्रह वाले पक्ष को अर्थ शास्त्र कहा जाता था।
विदेशी दृष्टि- 
भारत को ठीक से नहीं समझ पाने वाले विदेशियों की दृष्टि है। इसमें किसी एक विषय या किसी एक पक्ष का अध्ययन अनजान की तरह किया जाता है। भारतीय दृष्टि की जगह अब विदेशी दृष्टि हावी हो गई है। भारतीय विद्वान भी पूरे संदर्भ को साथ रख कर अध्ययन करने की जगह कुछेक नमूनों का संग्रह कर दनजाने व्यक्ति की तरह केवल सतही जानकारी देते हैं तो उसमें जानने का सुख नहीं मिलता। 
मैं देशी दृष्टि से संबंधों को खोजता हूं, उसके लिये पहले अपने देश की समाज व्यवस्था और परंपरा को समझना पड़ता है। मगध तेलंगाना संबंध के लिये मुझे तेलगू भाषा सीखना पड़ेगा और प्राचीन मार्ग से एक बार यात्रा करनी पड़ेगी। जारी क्रमशः..........