शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

हर बार वैष्णव ही क्यों जीतते हैं?

जीउत, जीउतिया, जीमूतवाहन-2

हर बार वैष्णव ही क्यों जीतते हैं?
शायद इसलिये कि हार-जीत के द्वंद्व में नियम नहीं कपट ही जीतता है। भारत में बहुसंख्यक समाज में 3 देवों में ब्रह्मा जी तो लगभग आउट ही हैं। कुछेक चुनिंदा अवसरों और स्थानों पर ही उन्हें स्मरण किया जाता है।
यज्ञ में एक तटस्थ निष्क्रिय जैसा व्यक्ति ब्रह्मा बना दिया जाता है। बचे शिव और विष्णु साथ ही इनके प्रतिपक्षी जैन, बौद्ध और अन्य तटस्थ लोग। इनके बीच मतलब - इनके और अनुयायियों के बीच आपसी झगड़े होते रहते हैं। इसमें सांस्कृतिक स्तर पर यह स्थापित परंपरा है कि हर हाल में जीत वैष्णव की ही होनी है।
हद तो यह कि दूसरा व्यक्ति भला या बुरा हो, इससे कोई मतलब नहीं, वैष्णव वर्चस्व तो होना ही चाहिए। उत्तर भारत में तो यह अकाट्य जैसा है। अनेक भले असुरों- गय, बाण, बलि आदि की इन्होंने भयानक दुर्गति की और हर बार छल तथा अन्याय के पक्ष में वैष्णव रहे।
मेरे मन में एक प्रश्न आया कि सनातन समाज और संस्कृति में ऐसा कैसे होगा कि इस पापमय आचरण के लिये दुड का प्रावधान नहीं होगा? तब तो न समाज बचेगा, न धर्म न साधना की विविध पद्धतियों की सार्थकता होगी। खैर मुझे भी शांति मिली जब यह समझ में आया कि वैष्णव खुद के बनाये जाल में कैसे फंसते हैं और उन्हें कभी भी मुक्ति नहीं मिलती। किसी ने सच ही कहा है- ‘‘ जस करनी, तस भोगहु ताता’’ मैं अपनी ओर से जोड़ रहा हूं-‘‘ स्वर्ग गये भी क्यों पछताता’’?
ऐसा ही एक शिकार जीउत-जीमूतवाहन भी हुआ। अब आइये ‘जीमूतवाहन’ जो देशी बोली में ‘जीउत’ हैं, उनके बहाने जीउतिया व्रत तथा इसमें वैष्णव हिंसा, कपट, वर्चस्व आदि पक्षों को भी जानते हैं।

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