शनिवार, 3 अक्तूबर 2015

अहिंसा का प्रयोग करने वाले आदि पुरुष गांधी नहीं, जीमूतवाहन


जीउत, जीउतिया, जीमूतवाहन- 1
अभी हाल में ही गांधी जयंती हुई। उनके योगदान को और उन्हें नमन, आभार लेकिन यह जो कहा जाता है कि वे अहिंसा का प्रयोग करने वाले आदि पुरुष हैं, यह अतिशयोक्ति वाली झूठ है।
प्रचंड सत्ता के विरुद्ध अहिंसा का प्रयोग करने वाले आदि पुरुष गांधी नहीं जीमूतवाहन हैं। फिर भी गांधी की ही आज महिमा गाई जाती है क्योंकि वे जीमूतवाहन से नये हैं। फिर भी दिलों में राज तो जीउत जीमूतवाहन का ही है। आज भी वैष्णव पंडित और बिहार-झारखंड के बाहर के मूर्ख या वर्चस्ववादी दुष्ट कर्मकांडी ब्राह्मण जीउत जीमूतवाहन से बहुत जलते हैं।
वे प्रायः जीउतिया व्रत को भ्रष्ट करने के उपाय बताते रहते हैं या बेमतलब इसमें ज्योतिष काल गणना की बारीकियां घुसेड़ कर इसे काशी परंपरा की अष्टमी व्रत से जोड़ने का षडयंत्र करते हैं। अभी तक ये अपनी योजना में पूरी तरह सफल नहीं हुए क्योंकि जीमूतवाहन का असली बिहारी , बाहर से आकर वर्चस्व जमाने वाले नहीं, ब्राह्मणों से ले कर भूइयां तक के दिलों में वास है। परंपरा से अपरिचित या सांप्रदायिक ब्राह्मण मर्द भले ही जीमूतवाहन की उपेक्षा कर दें, मजाक उड़ा लें औरतों के दिलों में तो उसी का राज है। औरतों के 2 ही मुख्य व्रत हैं- तीज और जीउतिया। इनमें किसी में अभी तक इष्ट/आराध्य विष्णु नहीं हैं। वैष्णवों के गोलमाल का षडयंत्र अभी भी जारी है।

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