सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

भारतीय समाज को जोड़ने में आदि शंकराचार्य की भूमिका

भारतीय समाज को जोड़ने में  आदि शंकराचार्य की भूमिका


      किसी भी व्यक्ति के काम को ठीक से जाने-समझे बगैर उसकी निंदा करना सही नहीं है। ऐसा करना अपनी ही मूर्खता को प्रश्रय देना है। यदि कोई व्यक्ति किसी विंदु पर किसी की आलोचना करे तो इसका मतलब यह नहीं कि वह उसका विरोधी हो गया।
      आदि शंकराचार्य भी मनुष्य थे। उनकी परंपरा में भी मनुष्य ही संन्यासी हुए तो कमियां तो रहेंगी ही अन्यथा संन्यास की साधना की जरूरत ही क्या रहेगी?
      आदि शंकराचार्य ने भारत को सांस्कृतिक-धार्मिक रूप से जोड़ने का सपना देखा। समकालीन बौद्ध मत को मुख्यतः एवं अन्य मतों को अपना विरोधी प्रतिद्वंद्वी माना। उनकी दृष्टि से वे एकांगी एवं अपूर्ण हैं। हम आदि शंकराचार्य की समझ से बेशक असहमत हो सकते हैं लेकिन समाज को जोड़ने के लिये उन्होने जो किया उसे झुठलाया नहीं जा सकता।
उनके कामों में 2 बहुमूल्य हैं-
1 भारत की सांस्कृतिक विविधता की स्वीकृति-
आदि शंकराचार्य ने यह नहीं कहा कि मंडन मिश्र के पराजित होने के बाद मंडन मिश्र तथा उनके अनुयायियों को दक्षिण भारतीय नंबूदरी व्यवस्था को स्वीकार करना होगा। उनके तरह कपड़े पहनने होंगे या कि दक्षिण भारत में प्रचलित पूजापाठ एवं समाज व्यवस्था संबंधी धार्मिक व्यवस्था को मानना होगा। इसके विपरीत उन्होने मिथिला के लोगों को अपनी पंरपरा के अनुसार जीने की सहज छूट दी।
आदि शंकराचार्य से अलग अन्य संप्रदाय क्या यही सुविधा अपनी परंपरा में लाये गये लोगों को देते हैं? जी नहीं। रामानुज एवं अन्य संप्रदाय के वैष्णव जानबूझ कर अपने आचार अपने गांव-गोत्र के लोगों से अलग रखते हैं। यह है सांप्रदायिकता का देशी रूप। पहचान बदलना-बदलवाना और अलग दिखने-दिखाने के साथ दूसरे से दूरी बनाना एवं अपने को श्रेष्ठ मान कर दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश। माथे की साज सज्जा ही नहीं बदली जाती खानेपीने में दूसरों से अछूत जैसा व्यवहार इस परिवर्तन में अनिवार्य होता है। आदि शंकराचार्य और उनकी परंपरा इस मामले में बहुत उदार रही।
2 पंचदेवोपासना 5 देवताओं की एक साथ उपासना का नियम
सांप्रदायिकता संकीर्णकता की पराकाष्ठा पर तब पहुचती है जब अपनी ही मूल परंपरा के किसी एक मात्र देवता, बिंब एवं जीवन शैली की पहचान में सिमटने का आदर्श प्रस्तुत करती है। यह प्रवृत्ति वैदिक, बौद्ध एवं जैन तीनों में मिलती है। अपने लोगों से वे कम नहीं लड़ते? कभी भीतरी या कभी बाहरी व्यक्ति भी झगड़ा सुलझाने की कोशिश करता है, जैसे - हालफिलहाल में विनोबाजी ने श्वेतांबर-दिगंबर जैन संप्रदायों के लिये समणसुत्तं नामक एक संकलन बनाया और अनेक जैन मुनियों से सहमति भी दिलायी लेकिन इससे वह मान्य थोड़े ही हो गया। जैन मुनियों में प्रतिस्पर्धा जबर्दश्त है।
एक तथाकथित आधुनिक साधु ने तो हनुमान जी को अपनाने लेकिन राम आदि किसी का नाम भी लेने से मना कर दिया। अपने गुरु स्थान के मूर्तियों को तोड़ताड़ कर फेंकवा दिया।
आदि शंकराचार्य ने एक उपाय सोचा और 5 देवताओं की एक साथ उपासना नियम की व्यापक स्वीकृति दिलायी कि आप यदि किसी नये मंदिर का निर्माण करेंगे तो उसमें केवल एक ही देवता की मूर्ति की स्थापना नहीं कर सकते। कम से कम 5 देवताओं की मूर्ति तो लगानी ही होगी। उसमें आप एक को प्रधान और बाकी को गौण आकार भले ही दे सकते हैं। इस प्रकार कम से कम आराध्य देवीदेवताओं के प्रति असहिष्णुता तो मिटी। ऐसी समझदारी आखिर किसने दिखाई? इस क्रम में 5 देवताओं के भक्तों को भी तो परस्पर स्वीकृति सिखाई।
आज भी इसके विपरीत आधुनिक हिंदू संप्रदाय और उनके मंदिरों में यह प्रवृत्ति आपको नहीं मिलेगी। भारत की राजधानी के हाल में बने बड़े मंदिरों में जा कर देखिये। सच सामने आयेगा। सामाजिक दृष्टि से इन बड़े मंदिरों से लाख गुना अच्छे वे मंदिर हैं जो आम लोगों ने अपने चंदे वगैरह से अतिक्रमित जमीन पर बिना किसी शास्त्र या परंरपरा के अपनी भावना के आधार पर बनाये हैं। जब जिसे जिस देवता को बिठाने की इच्छा हुई, जहां जगह मिली वहां बिठा दिया या दीवार में चिपका दिया। 5 क्या अनेक देवी देवता इन मंदिरों में मिलेंगे।
इसलिये केवल उत्तेजक बातों में ही रुचि लेने की जगह गुणग्राही होने में भलाई है। गुण ना हिरानो, गुणग्राहक हिरानो है। अगली किश्त में - क्या सच में शंकरचार्य ने बौद्धों को भारत से भगाया?

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