सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

जरा संभल कर 1


    आज कल अतिवादी धाराओं को अवसर मिल गया है। एक अतिवाद दूसरे का सहारा होता है। एक गाली दे तो फिर आगे का सिलसिला जारी रहता है। इस प्रक्रिया में दोश्ती और दुश्मनी दोनों की असली बातें छूट जाती हैं। ध्यान हट जाता है कि आखिर झगड़े का असली कारण क्या है? उससे किसे लाभ है किसे हानि?
    चिंतन और चिंता इस बात पर आ जाती है कि किसकी गाली किसे कितनी चुभती है। गालियां सच में चुभती हैं अन्यथा इतने जतन से न जुगाड़ कर रखी जातीं न ही उनके निशाने की तलाश कर कर उनका प्रयोग किया जाता।
मेरे एक वरिष्ठ विद्वान सहकर्मी थे, लगभग 10 साल वरिष्ठ। 3 भाषाओं की एम.ए. उपाधि में स्वर्णपदक प्राप्त प्रो. ब्रजमोहन पांडेय ‘नलिन’। भाषा विज्ञान पर भी अच्छी पकड़ थी।
उसके बाद उन्होंने दक्षिण बिहार की गालियों पर गहन अघ्ययन किया और नियमित रूप से उसका उपयोग भी खूब किया। मैं भी 2-3 बार शिकार हुआ उसके बाद मैं ने हार मान ली। श्रीमान जी श्वसुर देवता कोटि के थे। बाद में जब उन्हे महसूस हुआ कि गालियों में मेरा रस नहीं है तो बस ‘ दसवां ग्रह’ कह कर संतोष कर लेते थे। जामाता दसमो ग्रहः। दामाद 9 ग्रहों से बड़ा दसवां ग्रह होता है।
    उनकी संगति में सहज उपजब्ध गालियों का भाषाई, सामाजिक, आर्थिक संदर्भों पर ध्यान देने पर अनेक अद्भुत बातें समझ में आईं। भाषाई हथियारों में यह सबसे घातक साथ ही आकर्षक और आसान है, बस परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। यह अनेक मनो रोगों को नष्ट भी करता है। आध्यात्मिक जगत में भी इसका बहुत आकर्षण है। जो गाली न दे उसकी साधुता और भक्ति संदिग्ध मानी जाती है।
    भारतीय राजनैतिक धाराओं ने भी अनेक गालियां गढ़ीं और कुछ का परिष्कार भी किया। हिंदी की वामपंथी धारा में राहुल सांकृत्यायन ने अपने लिये एक गाली चुन ली और उसका अर्थ ही उनके अनुयायियों ने बदल दिया। ‘महा पंडित’। उसके पहले केवल पंडित होते थे। पंडित ही काफी है, उसमें महा क्या लगाना? महा पंडित तो मूर्ख होगा? खैर तब से महा पंडित की प्रतिष्ठा बढ़ गयी।
ध्यान देने की बात यह कि इसमें किसी का दिल दुखाया नहीं गया। आज कल समाज के असली मुद्दों से ध्यान हटाने के लिये गाली गलौज की खतरनाक प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। महौल बिगड़ा ही था कि कर्नाटक के एक साहित्यकार कलबुर्गी साहब की हत्या कर दी गयी। तबसे विवाद बढ़ता ही जा रहा है। हत्या तो किसी हत्यारे ने ही की है। उस हत्या से जो प्रसन्न हों वे मानसिक रूप से हत्यापसंद लोग हैं। उन्हें शांति एवं सहजीवन पसंद नहीं है।
हमारा दुर्भाग्य यह है कि भारत में अभी भी हत्यापसंद बुद्धिजीवियों की कोई कमी नहीं है। वे केवल अपने पक्ष के लोगों के मारे जाने पर रोते हैं, हल्ला मचाते हैं दूसरे के समय तो उत्सव मनाने लगते हैं। कोई हत्यारे को क्रांतिकारी कहता है कोई सेवक या कि जेहादी और भक्त। अभी मुझे अंग्रेजी वाला शब्द पता नहीं चला है।
यह बुद्धिजीविता नहीं है। यदि आप असहमत हैं तो पूरी दृढ़ता से कहें, विरोध करें और विरोधी के उग्र होने पर उसकी असहिष्णुता को प्रगट करें, गाली-गलौज मारपीट से हत्या तक जाने की परंपरा स्वयं को नष्ट करने वाली है। यह स्वयं को कैसे नष्ट करती है - इस पर अगली किश्त में।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

The Geetaa, as I found.



Only for those, who have not still concluded there study of Geetaa.

Please don’t waste your time.
Please don’t waste your time with my findings if you have already concluded or you are such a wise person far beyond question.
You must not read this if you believe that the Geetaa is not to be understood. Any person whosoever is authority in your opinion can only speak about it and others are duty bound to accept his/her verdict.
This series is about me and my finding on the Geetaa. They too must not waste their time in reading and commenting on me or the Geetaa who hate either of us.
It is for my friends and beloveds only, who can think – let this be read and verified, some facts and new finding may appear.
Proposal
I propose just to read it. No request to conclude or conceive or to conceal.

सोमवार, 5 अक्टूबर 2015

बहुरंग ब्लाग से ताला हटा लिया गया


बहुत दिनों से कई लोगों की शिकायत रहती थी कि मैं ने अपने ब्लाग पर ताला लगा रखा है। इससे दर्शकों/पाठकों को नकल करने में असुविधा होती है। पढ़ने के लिये नेट लगातार खुला रखना पड़ता है, उसे आनलाइन नहीं पढ़ा जा सकता। न ही कापी कर कहीं पेस्ट किया जा सकता है।
मेरे मन में बात इतनी ही थी कि लोग बिना पढे कापी पेस्ट न करें। पढ़ने समझने के बाद तो ज्ञान किसी एक का रहता नहीं, उसे कोई सौजन्य उल्लेख के साथ या उसके बिना भी उपयोग कर ही सकता है।
अब मैं ने ताला हटा लिया है। आगे आपकी मर्जी।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

हर बार वैष्णव ही क्यों जीतते हैं?

जीउत, जीउतिया, जीमूतवाहन-2

हर बार वैष्णव ही क्यों जीतते हैं?
शायद इसलिये कि हार-जीत के द्वंद्व में नियम नहीं कपट ही जीतता है। भारत में बहुसंख्यक समाज में 3 देवों में ब्रह्मा जी तो लगभग आउट ही हैं। कुछेक चुनिंदा अवसरों और स्थानों पर ही उन्हें स्मरण किया जाता है।
यज्ञ में एक तटस्थ निष्क्रिय जैसा व्यक्ति ब्रह्मा बना दिया जाता है। बचे शिव और विष्णु साथ ही इनके प्रतिपक्षी जैन, बौद्ध और अन्य तटस्थ लोग। इनके बीच मतलब - इनके और अनुयायियों के बीच आपसी झगड़े होते रहते हैं। इसमें सांस्कृतिक स्तर पर यह स्थापित परंपरा है कि हर हाल में जीत वैष्णव की ही होनी है।
हद तो यह कि दूसरा व्यक्ति भला या बुरा हो, इससे कोई मतलब नहीं, वैष्णव वर्चस्व तो होना ही चाहिए। उत्तर भारत में तो यह अकाट्य जैसा है। अनेक भले असुरों- गय, बाण, बलि आदि की इन्होंने भयानक दुर्गति की और हर बार छल तथा अन्याय के पक्ष में वैष्णव रहे।
मेरे मन में एक प्रश्न आया कि सनातन समाज और संस्कृति में ऐसा कैसे होगा कि इस पापमय आचरण के लिये दुड का प्रावधान नहीं होगा? तब तो न समाज बचेगा, न धर्म न साधना की विविध पद्धतियों की सार्थकता होगी। खैर मुझे भी शांति मिली जब यह समझ में आया कि वैष्णव खुद के बनाये जाल में कैसे फंसते हैं और उन्हें कभी भी मुक्ति नहीं मिलती। किसी ने सच ही कहा है- ‘‘ जस करनी, तस भोगहु ताता’’ मैं अपनी ओर से जोड़ रहा हूं-‘‘ स्वर्ग गये भी क्यों पछताता’’?
ऐसा ही एक शिकार जीउत-जीमूतवाहन भी हुआ। अब आइये ‘जीमूतवाहन’ जो देशी बोली में ‘जीउत’ हैं, उनके बहाने जीउतिया व्रत तथा इसमें वैष्णव हिंसा, कपट, वर्चस्व आदि पक्षों को भी जानते हैं।

अहिंसा का प्रयोग करने वाले आदि पुरुष गांधी नहीं, जीमूतवाहन


जीउत, जीउतिया, जीमूतवाहन- 1
अभी हाल में ही गांधी जयंती हुई। उनके योगदान को और उन्हें नमन, आभार लेकिन यह जो कहा जाता है कि वे अहिंसा का प्रयोग करने वाले आदि पुरुष हैं, यह अतिशयोक्ति वाली झूठ है।
प्रचंड सत्ता के विरुद्ध अहिंसा का प्रयोग करने वाले आदि पुरुष गांधी नहीं जीमूतवाहन हैं। फिर भी गांधी की ही आज महिमा गाई जाती है क्योंकि वे जीमूतवाहन से नये हैं। फिर भी दिलों में राज तो जीउत जीमूतवाहन का ही है। आज भी वैष्णव पंडित और बिहार-झारखंड के बाहर के मूर्ख या वर्चस्ववादी दुष्ट कर्मकांडी ब्राह्मण जीउत जीमूतवाहन से बहुत जलते हैं।
वे प्रायः जीउतिया व्रत को भ्रष्ट करने के उपाय बताते रहते हैं या बेमतलब इसमें ज्योतिष काल गणना की बारीकियां घुसेड़ कर इसे काशी परंपरा की अष्टमी व्रत से जोड़ने का षडयंत्र करते हैं। अभी तक ये अपनी योजना में पूरी तरह सफल नहीं हुए क्योंकि जीमूतवाहन का असली बिहारी , बाहर से आकर वर्चस्व जमाने वाले नहीं, ब्राह्मणों से ले कर भूइयां तक के दिलों में वास है। परंपरा से अपरिचित या सांप्रदायिक ब्राह्मण मर्द भले ही जीमूतवाहन की उपेक्षा कर दें, मजाक उड़ा लें औरतों के दिलों में तो उसी का राज है। औरतों के 2 ही मुख्य व्रत हैं- तीज और जीउतिया। इनमें किसी में अभी तक इष्ट/आराध्य विष्णु नहीं हैं। वैष्णवों के गोलमाल का षडयंत्र अभी भी जारी है।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

श्राद्ध है क्या?


आज कल गया में पितृपक्ष मेला है, मतलब? मेला मतलब भीड़ जुटी हुई है, जैसे मेले में जुटती है। यह भीड़ पितरों के पक्ष में है या नहीं, इस पर विचार हो सकता है लेकिल एक बात तय है कि पितरों के नाम पर निश्चित किये पक्ष अर्थात पखवाड़े की अवधि में जुटी है।
इस समय पितृश्राद्ध और पिंड दान हो रहा है। सवाल यह है कि यह हो क्या रहा है? मरे हुए लोगों के लिये यह पिंड क्या काम करेगा और कैसे? उनके लिए श्राद्ध की क्या जरूरत?
मैं यह सवाल बिना किसी पूर्वाग्रह के डाल रहा हूं कि मैं सनातन धर्म का अनुयायी हूं या नहीं। यदि हूं और जैसा की हूं ही तो कम से कम भारतीय बिंबों, पदावलियों, समझ तथा विधियों के अनुसार तो स्पष्ट होनी ही चाहिए श्राद्ध है क्या? यह क्या कि ग्रंथों में इसका यह माहात्म्य है, यह तो केवल श्रद्धा और विश्वास का मामला है।
यदि वस्तुतः हमारे तन, मन, समाज व्यवस्था जैसी भौतिक बातों से इसका कोई लेना देना नहीं हो तो केवल परंपरा के नाम यह कितने दिनों तक चलेगा?
जो भी लोग इसके पक्ष में लिखते-बोलते हैं, उनकी जिम्मेवारी बनती है कि वे इस स्तर पर आ कर इस विषय को स्पष्ट करें कि सामान्य व्यक्ति को भी श्राद्ध और गया श्राद्ध समझ में आ जाए।

सोमवार, 28 सितंबर 2015

मेरी राजनैतिक निष्ठा : किश्त दो


सत्ता मेरे ऊपर हावी रही, चारो तरफ से। सत्ता के कुछ अंश एवं प्रकार सहज रूप से मुझे भी उपलब्ध हुए, चलन के हिसाब से आधे-अघूरे ही सही। मेरे लिये वे पर्याप्त रहे। मूल पीड़ा तीनों प्रकार की सत्ता से प्रताड़ना की रही जो, आज भी जारी है।
मैं यह मान नहीं पाया कि दुखी रहना भी कोई आदर्श हो सकता है। कोई मुझे रुलाए और मैं उसे ही उचित और सहज मानूं, ऐसा आदर्शवादी न बन सका इसलिये सत्ता मेरे विरुद्ध भी जम कर रही। ऐसे में समानधर्मी, हमदर्द और मित्र खूब काम आए। फिर मैं ने  अत्याचारियों से लड़ने के भी खूब प्रयोग किये। आहत भी खूब हुआ। इस प्रकार राजनीति भी की ही। 
हां, दलगत चुनावी राजनीति की न ठीक से समझ बना पा सका, ना ही उसमें शामिल हो सका। समझते-समझते हर बार राजनीति ही बदल गई। अब न विचार है, न निष्ठा, न मतदाता की दृष्टि से दलों में कोई अंतर समझ में आता है। ऐसे में किया क्या जाए?क तंत्र कहने को भले ही हो, जातीय कुछ विचार आधारित ए कुछ धर्म आधारित समूह हैंए जिनके भीतर भसी कई समूह और गुट हैं। साथ ही कुछ सम्मोहक नारे जैसे विकास आदि हैं,  जिनका कोई अर्थ निश्चित कर पाना मुश्किल है। फिर भी अवसर मिलने पर मतदान तो करना है इसलिये सोचना पड़ता है, तो मैं ने भी सोचा वह अगली बार लिखूंगा।