सोमवार, 22 सितंबर 2014

विधवाओं की स्थिति का रहस्य 3


स्त्री के स्वतंत्र संस्कार की अवधारणा और अनुभव का महत्त्व आध्यात्मिक रूप से भी तभी रहेगा जब बंगाल से पूरब आसाम की जनजातियों या संथालों जैसी सामाजिक संरचना रहे, जिसमें स्त्री को संपत्ति पर अधिकार रहे और पुरुष प्रधान समाज में प्रचलित वैधब्य को कोई महत्त्व न हो, न तो सामाजिक, धार्मिक व्यवहार में न ही संपत्ति पर अधिकार के मामले में।
बंगाल मिथिला में ऐसा नहीं हुआ। स्त्री को देवी भी माना गया लेकिन भीतर-भीतर विधवा को घर से बाहर कर उसकी संपत्ति हड़पने की क्रूर सामाजिक स्वीकृति के खिलाफ आंदोलन नहीं हुआ बल्कि व्यभिचार, वेश्यावृत्ति के लिये एक स्वतंत्र संभावना बना दी गई। पहले यह अत्याचार संतानहीन विधवाओं पर किया जाता था बाद में अति क्रूर स्वार्थी पुत्रों द्वारा मां को भी घर से निकाल बाहर किया जाने लगा। 
कलकत्ता भारत में पाश्चात्य संस्कृति की पहली पाठशाला है। इसके बुरे प्रभावों में एक रहा घर के वृद्धों की सेवा न करना। ऐसे हाल में विधवा मां जो बूढ़ी हो गई हो या बूढ़ी हो रही हो, उसे कौन पूछे? धनाढ्यों ने तो काशी में आश्रम बनवा कर वहां भेज दिया। मध्यवर्गीय और उनके नकलची लोगों ने बस मांग मूड़ कर काशी या पश्चिम की ओर जाने वाली किसी ट्रेन में बिठा देना ही पर्याप्त समझा। मैं निजी तौर भी इस व्यवहार से पीडि़त अनेक विधवाओं से मिल चुका हूं। काशी में और गया में भी। गंगालाभ, काशी करवट, हरि बोल आदि शब्दों/मुहावरों का वास्तविक और दूसरा अर्थ जो अत्ंयत क्रूर है, वह है- गंगा में डूबो कर मारना, उसके मुंह पर तब तक पानी छिड़कना जब तक उसकी सांस बंद न हो जाये। इस प्रक्रिया को 19वीं शताब्दी तक बंगाल में मौन स्वीकृति रही। ऐसे हाल में कोई भी विधवा परिवार की क्रूर मानसिकता की भनक पाते ही स्वतः घर छोड़ने को तैयार हो जाती है। विधवाओं की बाढ़ ने काशी में कहावत प्रचलित की- ‘‘रांड़, सांढ़, सीढ़ी, संन्यासी, इनसे बचे तो सेवे काशी’’। क्रमशः जारी

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें