शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

आजादी की कीमत


आजादी की कीमत: आकाशवृत्ति
अंग्रेजों को हटाने के पहले भी भारत आजादी के सवालों से हजारो सालों से जूझ रहा है। आजादी का आध्यात्मिक, भौतिक और सामाजिक स्वरूप लंबे समय से चिंतन, प्रयोग और जीवन में आचरण का विषय रहा है। इसीलिए शायद वर्तमान आजादी को मुख्य सूत्रकार ने कहा - आजादी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। आजादी दुलर्भ है, इसलिए आजादी की कीमत भी बहुत अधिक चुकानी पड़ती है। मुफ्त में तो मिली हुई कोई भी आजादी टिकनेवाली नहीं है।
मोक्ष, मुक्ति, आजादी नकारात्मक अर्थोवाले शब्द हैं अतः इनके साथ, तटस्थता, अवज्ञा, असहयोग, उपेक्षा, अस्वीकृति जैसे उपाय भी अंतर्निहित रहते हैं, मामले चाहेे भौतिक हों या आध्यात्मिक। इससे भिन्न स्वतंत्रता शब्द में तंत्र और स्व (अपना) दोनों ही सकारात्मक अर्थो वाले शब्द हैं। सच पूछिये तो आजादी या मुक्ति की वास्तविक पहचान तो आजादी के बाद अपने तंत्र के असली स्वरूप के सामने आने पर होती है, जैसा भारत का अपना यह गणतंत्र।
भारत में पहले जो आजाद खयाल के लोग थे उनका अपना तंत्र (व्यवस्था) क्या था और दूसरे तंत्र (व्यवस्था) के लोगों के बीच जीने के लिए उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ती थी और आज भी क्या सहना पड़ता है यह जान कर आप भी कुछ कीमत .चुका कर भी सही शायद आजादी पसंद करेंगे।
मैं अपने गाँव में नदी पार करने के लिए नाव पर अकेला यात्री था और दूसरे व्यक्ति थे केवट श्री. सगुन चौधरी । परंपरानुसार मुझे किराया नहीं देना था। हम दोनों फुरसत में भी थे। उन्होंने कहा- बच्चा जी आज तो बोहनी ही नहीं हुई, इसलिए मजबूरी है। शाम हो रही है अतः कुछ बोहनी कर दीजिए। मैंने कहा ये लिजिए दो रूपये। यह घटना साल 1973 के आस पास की है। मुझसे 2 रूपये उनके लिए अप्रत्याशित था। मैंने पूछा- ऐसा महीने में कितनी बार होता है और आप आज नाव पर अकेले ही क्यों हैं? चौधरी बोले ऐसा कई बार होता है इसीलिए तो लोग इस पेशे को छोड़कर दूसरे काम में लगे रहते हैं। फिर आप क्यों नहीं? चौधरी बोले यही तो आजादी है। अपना काम है कोई हुक्म चलाने वाला नहीं।
सवारी नहीं आए तो जाल की मरम्मत  और मछली पकड़ने का काम, नहीं तो खुले आकाश को निहारना, रात में तारे दिन में बादल और पंछी देखना। जिंगदी तो चल ही रही है। इस तरह जो चले, उसे आकाशवृत्ति कहते है। पता नहीं कब आकाश से टपक पड़े नहीं तो कोई बात नहीं। अमीरी - गरीबी उठापटक, कमो-वेश की विविधता के साथ जीना लेकिन किसी के आदेश के अनुसार नहीं जीना।
भारत में ब्राह्मण एवं श्रमण दोनों ने आजादी के साथ जीने एवं समाज के लिये व्यवस्था देने दोनों की कोशिशे की। ब्रह्मणों में परिवार वालों नेे भी और श्रमण का तो मतलब ही है अनागारिक बिना घर-परिवार वाला साधु। ब्राह्मणों में जो राजा एवं समाज दोनों के समक्ष केवल सत्य बोलना चाहते थे और किसी के इशारों पर नहीं नाचना चाहते थे वे न तो संपत्ति रखते थे कि उसके हरण का खतरा हो, न ही राज्याश्रय लेते थे न ही किसी सेठ की गुलामी, न गुरुकूल चलाना, न खेती करना। ऐसे आजाद ख्याल लोगों ने अपनी जीविका निर्वाह का बहुत कठोर व्रत रखा था। जंगल से कंद-मूल  और गाय से दूध (गाय का व्यापार नहीं) के अतिरिक्त फसल कटने पर जो दाने जमीन पर रास्ते में गिर जाएँ वे उन दानों का संग्रह कर अपने लिए अन्न की व्यवस्था करते थे। इस वृति को शीलोंछ वृत्ति कहते है। शीलोंछ वृत्ति  वालों के त्याग, तपस्या एवं सदाचार की समाज में बड़ी धाक थी। हमारे यहाँ जिन गाँवों में ऐसे ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी, उन्हे आज भी सिलौझा नाम से जाना जाता है। ये क्षेत्रीय ब्राह्मण आज भी बाकी से अधिक सज्जन और सदाचारी हैं।
बिरहोर हमारे यहाँ आदिवासियों की विलुप्त होती प्रजाति है। बिरहोर किसी के भी यहाँ न तो मजदूरी करते हैं, न खेती जैसा बंधनकारी कार्य। जंगल से शिकार और लकड़ी तथा जंगली उत्पाद बेंचना, इनका अपना अर्थ तंत्र है इसी में ये स्वतंत्र है। इनका जीवन भी अधिक अस्थिरता में बीतता है।
आगरिया उत्तम लोहा बनाते हैं। इनके द्वारा बनाये गए लोहे में आज भी जंग नहीं लगती। ये घने जंगलों में आज भी डरे-डरे, मारे-मारे फिरते हैं। कहा जाता है कि अगरिया लोगों ने अपनी विद्या किसी को नहीं दी या लोहे के कारखानों से विकसित लोहे की गुणवत्ता की चुनौती या फिर जिन राजाओं ने पहले लोहे के बड़े खंभे ढलवाए उन्होंने अगरिया लोगों का नरसंहार किया। नरसंहार का कारण जो हो भय अभी भी व्याप्त है। इनके द्वार बनाये गयो लोहे की गुणवत्ता की जाँच भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बी.एच.यू. ने की है। रपटें प्रकाशित हैं। यह अपनी विद्या के तंत्र को स्वाधीन रखने की कीमत है।
विचार करने पर मुझे तो लगता है कि सामाजिक जीवन में स्वयं अपने तंत्र के अधीन रहना और दूसरे के तंत्र का सम्मान करना  स्व सयंम के बिना संभव नहीं है और आकाशजीविता सबसे बड़ा आत्म सयंम भी है तथा स्वाधीनता और स्वतंत्रता के साथ आजादी की भौतिक कीमत भी।
यह मामला अतिवाद तक जाता है। जो समाज का कोई नियम मानना नहीं चाहते उन्हंे भी समाज ने जीने का हक दिया इस शर्त के साथ कि आप हमारी व्यवस्था के अंग नहीं होंगे। ऐसे लोग श्मशान में, एकांत निर्जन स्थान पर रहते हैं और केवल मरे हुए जीवों (मार कर नहीं) का मांस खाते है। इनके लिये मरा हुआ मनुष्य भी अपवाद नहीं है।
भारत में मुंडित भिक्षु, मुंडित संन्यासी और लुंचित (जिनका बाल नोचा गया हो) जैन मुनि का शादी, विवाह श्राद्ध, गृह प्रवेश यात्रारंभ आदि के अवसर पर उपस्थित अशुभ मानी जाती रही है । ये घर में न तो आमंत्रित होते हैं न आमंत्रण स्वीकार करते हैं। अपनी आजादी की कीमत एक सीमा तक सामाजिक बहिस्कार के रूप में में चुकानी ही पड़ती है। आज के अरबपति, मठपति, टी. वी. चैनलपति साधुओं पर तो पता नहीं कौन सा नियम लागू होता है?
आजादी आंदोलन से निकली भारत की वर्तमान राज्य सत्ता ने अपनी संप्रभुता में सभी प्रकार की आजादी की संभावनाओं को सीमित या समाप्त कर दिया है और इसे ही स्वतंत्रता या गणतंत्रता का नाम दिया है। न कोई व्यक्ति या समुदाय लोहा बना सकता है, न बिजली, न जंगल से फल-फूल चुन सकता है न नदियों से पानी, बालू या पत्थर ले सकता है। सब पर राज्य का स्वामित्व है। वह चाहे जिस कीमत पर या कर लेकर धरती जल, अग्नि, वायु और आकाश किसी को बेंच दे या दान में दे दे।
व्यक्ति, समुदाय और राज्य के आपसी संबंध और सीमा के निर्धारण के बगैर राज्य की संप्रभुता का सिद्धांत आजादी का सबसे बड़ा दुश्मन है। जबसे लोक कल्याण की जगह कारपोरेट कल्याण आदर्श बना है, समीक्षा और सुधार की संभावना भी समाप्त हो गई है। हाँ अभी भी मतदान करने भर की सीमित आजादी है। इसका सही प्रयोग और शांतिमय आंदोलन की संभावना बची है जो राज्य की सत्ता, अंहकार और तिकड़म के समक्ष डरती रहती है कि पता नहीं अपनी आजादी की क्या-क्या कीमतें चुकानी पड़ेगी। जंगल में भाग कर बसने , नदी का उपयोग करने या गुफा में बसने की संभावना तो रही नहीं। सब अब सरकारी हैं। इसलिये जरूरी है कि कुछ अधिक कीमत चुका कर भी अपनी आजादी को बचाया जाय।

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