शनिवार, 21 अप्रैल 2012

भारतीय कालबोध


भारतीय कालबोध, काल गणना एवं उसकी पारंपरिक पहचान
विशेष अनुरोध –
भारतीय दृष्टि से काल के बोध एवं उसकी सामाजिक पहचान तथा व्यवस्था को समझने के पूर्व कुछ सावधानियां आवश्यक हैं। दरअसल आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से वर्तमान कालबोध प्रगट रूप से यूरोपीय एवं अंदरूनी तौर पर ईशाई है क्योंकि आधुनिक सायंस एवं सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का विकास मुख्यतः यूरोप में हुआ है। इसलिये भारतीय काल बोध एवं काल गणना को समझने के पूर्व अपने मन को कुछ देर के लिये ही सही भारतीय बनाना जरूरी होगा। निबंध पढ़ लेने के बाद आपकी मर्जी आप सहमत हों या न हों परंतु यदि आप यूरोपीय पैमाने एवं चश्मे से भारतीय विषयों को समझना चाहेंगे तो कुझ भी समझ में तो नहीं ही आयेगा, आपके अज्ञान एवं अहंकार का विकास अवश्य होगा। मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि भारतीय समझ में दोष नहीं है, फिर भी पहले उस समझ को उसके मूल रूप में समझना ज्ञान का लक्षण होगा न कि बिना समझे ही नकार देना या मजाक उड़ाना या यूरोपीय पैमाने में फिट करने की व्यर्थ कोशिश करना। काल संबंधी भारतीय दृष्टि एवं यूरोपीय दृष्टि में आसमान जमीन अंतर है। यूरोपीय दृष्टि में काल रेखीय है। उसके आरंभ एवं अंत के विंदुओं की पहचान है। मानव जीवन के संदर्भ में जन्म से आरंभ हो कर स्वर्ग या नरक जाने तक काल की सीमा है। भारतीय दृष्टि से काल चक्रीय एवं आवृत्तिमूलक होने से अनादि और अनंत है।
इतना ही नहीं देश तथा काल की सीमा में रहने और देश तथा काल के प्रभाव एवं सीमा से बाहर जाने की भी व्यवस्था है। यह समझ और अभ्यास का विषय है। दिक एवं काल को वैशेषिक की परिभाषा में द्रव्य कहा गया है।
कई पारंपरिक शब्दों को आधुनिक समय की हिन्दी ने इस तरह निगल लिया है कि परंपरागत बातों को हिन्दी में प्रगट करने में समस्या खड़ी हो जाती है। विज्ञान एक ऐसा ही शब्द है। विज्ञान उस सूक्ष्म स्तर के बोध एवं बोध की प्रणाली के लिये प्रयुक्त होता है जिस स्तर पर ज्ञाता एवं ज्ञेय लगभग एक हो जाते हैं। जहां से कलन अर्थात गणना शुरू की जा सकती है। यह गणना ही तो काल का आधार है। गणना करने वाली पद्धति एवं शक्ति को काली कहते हैं। इसलिये स्पष्टीकरण को बचाने हेतु इस आलेख में विज्ञान की जगह सायंस शब्द का प्रयोग किया गया है। तांत्रिक कहने का अर्थ विस्तृत शास्त्र या प्रणाली में विश्वास करने वाला एवं उनकी रचना करने वाला है न कि काला जादू जैसे छिछले अर्थ में प्रयोग हुआ है। तंत्र अर्थात व्यवस्था।
काल के विविध रूप -
काल क्या है? इसका अस्तित्व है भी या नहीं? इस मुददे पर भारत में भी काफी मतभेद हैं फिर भी यह माना गया है कि भारतीय दृष्टि से काल एक बोध है। यह काल बोध गतिसापेक्ष पारस्परिक अनुपातिक बोध है। इस प्रकार कालबोध के लिये गति, पारस्परिक संदर्भ एवं उनमें अनुपातिक अंतर ये तीन मूल घटक हैं। भूगोल एवं खगोल शब्द हिन्दी अनुवाद हेतु गढ़े हुए शब्द नहीं हैं। ये पुराने शब्द हैं। पुराणों में भूगोल का वर्णन अनिवार्य है। खगोल का वर्णन ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में आता है। सूर्य चन्द्र एवं अन्य नक्ष्त्रों के सापेक्ष भूगोल (पृथ्वी) की गति संबंधी बोध काल के बोध का आधार है। जैसे भू अर्थात धरती गोल है, ख माने आकाश गोल है, नक्षत्रों राशियों के परिक्रमापथ गोल हैं उसी प्रकार काल कभी गोल है। इसी प्रकार बाह्य अंतरिक्ष में स्थित सूर्य एवं पृथ्वी के सापेक्ष बोध को देश बोध कहते हैं। देश बोध पौर्वा पैर्य (आगे-पीछे) का बोध है, जिसका नियामक सूर्योदय तथा सूर्यास्त है। चन्द्रमा कालबोध का            आधार होता है, देश बोध का नहीं क्योंकि इसके उदय एवं अस्त का स्थान निश्चित नहीं है। इसके बाद पर्वत समुद्र ध्रुव तारा आदि से बोध कराया जाता है।
बौद्ध एवं शांकर अद्वैत वेदांत तथा तांत्रिक शाक्त मत में सापेक्ष बोध की तात्त्विक प्रामाणिकता नहीं है। अतः देशातीत एवं कालातीत होने की बात भी कही गई है। थेरवादी विभज्यवादी पालि साहित्य में वर्णित बौद्ध परंपरा तो काल नक्षत्र आदि की विद्या को तिरच्छान विज्जा अर्थात् मनुष्य को उलझाने वाली विद्या मानती है। उसके विपरीत बौद्धों की दूसरी शाखा के महायानियों एवं वज्रयानियों ने इस पर व्यापक कार्य किया है।
दर असल देश एवं काल के पैमाने अतिसूक्ष्म एवं अति व्यापक-विराट स्तर पर एक से होने लगते हैं। प्रकाश एवं ध्वनि के तरंगों की स्थिति भी ऐसी होने लगती है। अतिसूक्ष्म स्तर पर आजकल काल गणना सूक्ष्म आणविक घड़ी से की जाती है। परंपरागत भारतीय शैली में यह गणना एकाग्रता एवं ध्यान  की विधियों से की जाती है। उस पद्धति में भी अतिसूक्ष्म स्तर पर काल गणना करना कठिन होने लगती है। अंतर मिटने लगते हैं। विराट स्तर पर भी आज की सायंस की शैली में दूरी का माप प्रकाश वर्षों में करना पड़ता है। इसकी चर्चा आगे होगी। भारतीय संस्कृति में अति सूक्ष्म स्तर पर इस मिलन विंदु को नाद-विंदु का मिलन कहते हैं। नाद मतलब घ्वनि, विंदु मतलब दृश्य। यही योगियों, ध्यानियों तांत्रिकों का मध्यम स्तरीय लक्ष्य है। इसके बाद संसार के रहस्य उनकी ध्यान भूमि में प्रगट होते हैं। संसार का रहस्य सूक्ष्मतम पदार्थाे के अस्तित्व एवं उनके स्वभाव के ज्ञान से ही संभव हो सकता है, यह बात सभी को मान्य हो सकता है।
भारतीय ज्ञान के अनुसार जैसे मनुष्य की श्वास एवं चेतना की तीन प्रकार की गतियाँ थोड़े-थोड़े अंतराल पर देखी जाती हैं उसी प्रकार प्रकृति में भी तीन प्रकार की गतियाँ हेाती हैं, - 1. बहिर्मुखता, विघ्वंस और क्रियाशीलता, 2. अंतर्मुखता, संवेदनशीलता, रचनात्मकता और स्वीकार्यता, 3. ज्ञान, तटस्थता और सिमटना। यह अनुभवात्मक विषय है। नाक के बाएँ छिद्र से श्वास चलना, दाहिने से चलना और फिर दोनों से बराबर चलना, अभी तक मार्डन सायंस की दृष्टि से अव्याख्यायित है। फिर भी ऐसा होता है ही। दोनों से चलने की अवधि छोटी होती है। यहाँ मामला साधारणीकरण या मानवीकरण का नहीं है। मनुष्य में यह आवृत्ति और उसका समय व्यक्ति के भेद से भले ही भिन्न हो, प्रकृति में यह स्थिर है। संध्याकाल मध्यकाल है, उसके बाद ढ़ाई घंटे पर आवृत्ति बदलती है अर्थात् सवा घंटा बायाँ, सवा घंटा दायाँ दोंनो में से ढाई मिनट कम कर पाँच मिनट मध्य। प्रकृति के इस काल स्वभाव के अनुरूप मनुष्य यदि अपनी गतिविधियां संचालित करे तो वह प्रकृति के स्व-भाव के साथ उचित तालमेल बनाए हुए होेता है। इसका पहला और सीधा लाभ स्व (रूप) में स्थित होना और स्वास्थ्य की प्राप्ति है। यह अहर्निश दिनरात के बीच आवृत्ति करने वाली काल की प्रक्रिया है।
स्वर साधना, प्राणायाम, ध्यान, संध्या, गायत्री, सभी विधियाँ प्रकृति की श्वास प्रक्रिया के साथ अपनी श्वास क्रिया को समरूप बनाने की हैं। इसका लाभ स्वास्थ्य, शांति, सजगता एवं एकाग्रता का विकास है। इसमें गड़बड़ी हुई की बीमारियाँ पैदा होंगी क्योंकि शरीर की अनैक्षिक गतिविधियाँ अंतःस्रावी प्रणालियाँ प्रकृति की घड़ी से नियंत्रित हैं। विविध प्रकार की साधना की पूरी प्रक्रिया घड़ी मिलाने, ठोक-ठाककर, मरम्मत कर ठीक करने जैसी है। तरंगों की तुलना की जाती है। देश एवं काल के पैमाने मिले-जुले होने लगते हैं। सौरमंडल या ब्रह्माण्ड का संदर्भ लेते हीं समस्या खड़ी हो जाती है। आधुनिक जियोग्राफी में नक्शे केवल अक्षांश या देशांतर या लंबाई के मैट्रिक  पद्धति से नहीं समझे जा सकते। उसमें भी डिग्री, मिनट एवं सेकेण्ड की व्यवस्था की गई है। चौकोर नक्शे में गोल पृथ्वी को को कैसे ठीक से लपेटा जा सकता है।
काल की सापेक्षता के अन्य संदर्भ भी हैं। वय एवं आयु दो बातें हैं। वय के बाद जन्म से जिस दिन की गणना हो 10/20/50 साल हो सकता है। आयु जन्म से मृत्यु पर्यन्त की अवधि है। समझने की सुविधा के नाम पर हिन्दी में इस अंतर को मिटा दिया गया। इस अवधि में श्वास एवं हृदय की गति की संख्या स्थिर मानी जाती है। दीर्घ जीवन का आधार है धीमी हृदय गति, लंबी श्वास ताकि गिनती पूरी न हो। इसके पूर्व की मृत्यु अकाल मृत्यु है। मरने के बाद भी उतने समय तक वह जीव अंतरिक्ष में रहता है, यह विश्वास है।
भारतीय संस्कृति में कालचक्र की मापक घड़ियाँ मोटे तौर पर तीन स्तरों पर काम करती हैं -
    सूर्य घड़ी - सूर्य एवं पृथ्वी के सम्बन्ध पर आधारित
    निमिष-पल घड़़़ी - काल की छोटी ईकाई नापने के लिए
            (यह अनेक प्रकार की होती थी, पानी का बरतन इसका सबसे प्रचलित उदाहरण है)
     चेतना प्रवाह की घड़ी - योग एवं तंत्र शास्त्र में वर्णित स्वर शास्त्र।
भारतीय दृष्टि से इस प्रकार काल का स्वरूप गतिशील एवं सापेक्ष है। सूरज एवं चांद के डूबने-उगने से रात-दिन तथा पखवारे का ज्ञान होता है। गतिशील वस्तुओं के आपसी अंतर से काल का बोध होता है। तब भी काल स्थिर नहीं है। इसी प्रकार काल की अन्य इकाइयां बदलती रहती हैं। इस स्थिति में यह भी एक मौलिक प्रश्न है कि गतिशील काल एवं देश के पैमाने स्थिर ही क्यों रहें? ग्रीनविच टाइम को ही स्टैंडर्ड टाइम क्यों माना जाय?
इसी आधार पर काल की छोटी इकाई को भारत में क्षण कहा जाता है। यह संसार क्षणंभंगुर है। कहने का अर्थ है कि यहाँ सबकुछ क्षण-प्रतिक्षण बदल रहा है। सृष्टि, स्थिति, (अस्तित्व) एवं भंग (विनाश) सब साथ-साथ चल रहा है। इसी प्रकार देश (स्थान) का बोध भी सापेक्ष एवं इस ब्रह्माण्ड में निरंतर बदलते रहता है। पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ब्रह्माण्डीय सामग्रियों जैसे ग्रह, उपग्रह, तारे आदि भी पृथ्वी के मौसम तथा पर्यावरण को प्रभावित करते रहते हैं। पर्यावरण के विविध घटक जैसे पेड़-पौधे, चिड़ियों एवं अन्य जानवर इन सापेक्ष अंतरों को महसूस करते हैं। उनका ज्ञान अनुभवात्मक है। आधुनिक मनुष्य इसे कल्पना एवं विश्लेषण पर आधारित तर्क बुद्धि से ग्रहण करता है। मनुष्य में अनुभनात्मक ज्ञान एवं तार्किक ज्ञान दोनों की क्षमता है। भारत में दोनों प्रणालियों को महत्त्व दिया गया फिर भी अनुभवात्मक को अधिक। पाश्चात्य संस्कृति तर्क एवं यंत्र को अधिक महत्त्व ही नहीं देती अपितु वह अनुभवात्मक  ज्ञान को अप्रामाणिक बता कर यंत्र आधारित ज्ञान को अधिक महत्त्व देती है।
इसके पीछे के स्वार्थ एवं पेंच की कथा लंबी है। उनमें से एक चालाकी यह है कि समय का स्थिर मानक बनाया जाय। ग्रीनविच टाइम को स्टैंडर्ड टाइम बनाया गया। भारतीय स्थिति के अनुसार रात में जब सभी सोए रहते हैं तब दिन बदलता है। यह बदलाव आप बिना घड़ी के कैसे समझ सकते हैं? सूर्योदय के आधार पर जब दिन बदले तो उसे मनुष्य ही नहीं संपूर्ण प्राणिजगत अनुभव करता है। सूर्य का ताप, हवा का वेग एवं चिड़ियों की चहचहाहट की स्वतःस्फूर्त व्यवस्था सूर्योदय से है, न कि स्टैंडर्ड टाइम से।
भारतीय पंचांग में इसीलिए स्थानीय मान, कालमान, दिनमान निकालना, शुभ एवं अशुभ दोनों में जानना जरूरी होता है। यह समझना कि ब्राह्म मुहूर्त में उठना या सूर्याेदय से ढाई घड़ी पहले उठना या चौथे पहर के अंत में उठना एक अनुभव आधारित प्रक्रिया है, जिसमें हम प्रकृति एवं वातावरण से सहज जुड़ते हैं। ग्रीनबिच या स्टैंडर्ड टाइम को मानने वाले एवं हवाई यात्रा करने वाले को भी स्थानीय पर्यावरण एवं समय से बार-बार अनुभवात्मक संतुलन वाला संबंध स्थापित करना पड़ता है।
इस दशा में भी मार्डन सायंस के पक्षघर लोग हर बात पीछे स्टैंडर्ड, वैश्विक स्टैंडर्ड की वकालत ही नहीं करते जो ऐसा नहीं मानते उन्हें निरामूर्ख एवं अन साइंटिपिफक बताते हैं। मैं जान-बूझकर विज्ञान शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा हूं। विज्ञान भारत का पारंपरिक तकनीकी शब्द है। इसलिए सायंस ही सीधे-सीधे ठीक है। इसी प्रकार देश स्थान भी ब्रह्ममाण्ड में स्थिर नहीं है। इसकी भावना लोग अपनी अपनी सुविधा से करते रहे हैं।
इसी प्रकार की स्थिति भवन निर्माण, मूर्तिशास्त्र आदि में सर्वत्र है। मूर्ति शास्त्र में अंगुल प्रमाण है। सबकी ऊंगलियां तो बराबर होती नहीं पिर क्या मूर्तियां सुंदर नहीं हैं। भवनों की भव्यता को कौन नकार सकता है? दरअसल आनुपातिक अंतर से ही दवा, मूर्ति, भवन सबका संतुलन, सौंदर्य एवं सौष्ठव बना रहता है। शिर, मध्यभाग एवं निचले भाग में आनुपातिक अंतर जरूरी है? चाहे वह अंगुल में नापें या ईंच में। ऐसी ही स्थिति संगीत साधना, अनुष्ठान सभी जगह है। उनका अपना सांस्कृतिक महत्त्व है? मंडप का आकार अनुष्ठान करने वाले के आकार के अनुरूप होता है। विवाह का देहाती मंडप दुल्हन के हाथ के नाप से बनता है। यहाँ दुल्हन के साथ मंडप का गहरा संबंध है। भारतीय संस्कृति के अंदरूनी संदर्भों को समझे बिना उसे सही या गलत कह देना सही नहीं है उसमें भी मानकांे का विकेन्द्रीकरण यहाँ की विविधतापूर्ण संस्कृति का सहज रूप है। इसमें प्रामाणिकता था स्टैण्डर्ड की बात को क्यों अनिवार्य माना जाय?
अंग्रेजी हुकुमत में गया जिले की जमींदारों के अहंकारी प्रयोग के किस्से मजेदार थी। उन्होंने अपने को काल से ऊपर सिद्ध करने का हास्यास्पद प्रयास किया। सभी ने मनमाने ढ़ंग से सोने-जगने के समय को ही सूर्योदय-सूर्यास्त एवं संध्या काल घोषित किया।
काल की सांदर्भिकता एवं उसमें तालमेल बिठाने का संकट आज तक खत्म नहीं हुआ। भारतीय संस्कृति में यह संकट बहुत गहरा है। कुछ उलझनों की चर्चा की जा रही है।
प्रचलित रूप से कालबोध के निम्न आधार हैं -
सूर्य एवं पृथ्वी, चन्द्रमा, नक्षत्र, राशियाँ, दिन, बड़ी घटनाएँ, महापुरूषों के जीवन-मृत्यु, उपर्युक्त के बीच घटनेवाली घटनाएँ, जैसे - संक्रांति, ग्रहण आदि, गणना संबंधी उलझनों का विवरण, जैसे - विक्रम संवत् प्रणाली में अधिक मास (मलमास) की व्यवस्था, इनके संबंधों की अनेक छोटी-मोटी बातें जिस पर ज्योतिषी लोग अधिक ध्यान दे पाते हैं, आम आदमी नहीं, जैसे - करण, योग आदि।
राशि-नक्षत्र की चाल अलग है। सूर्य-चन्द्र तथा पृथ्वी आधारित पृथ्वी की निकटवर्ती व्यवस्था में इनकी अवधि के साथ पूरी संगति बन नहीं पाती इसलिए तिथि को घटना-बढ़ाना पड़ता है। साल के 365 दिन, महीने के 30 दिन 15 दिन के पखवारे और सप्ताह में पूरी तरह तालमेल बिठाना एक चुनौती है। इसलिये तिथियों तारीखों को घटाने- बढ़ाने से ले कर तीन साल बाद एक अधिक मास की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।
सामाजिक मामलों की जटिलता अलग है। काल प्रवाह में आवृत्तियां तो हैं लेकिन ये सामानांतर हैं। कृष्ण का जन्म तिथि की दृष्टि से अलग, नक्षत्र की दृष्टि से अलग हो तो जन्माष्टमी मनाया कैसे जाय? किसी सम्प्रदाय ने तिथि को मुख्य माना तो उसकी जन्माष्टमी अलग। जिसने नक्षत्र को मुख्य माना उसकी जन्माष्टमी अलग। बिहार में जीभूतवाहन की जयंती जिउतियाके रूप में मनाई जाती है। आस-पास उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में अष्टमी मनाई जाती है, जिउतिया की उचित तिथि के बारे में बहस चलती रहती है। यह क्षेत्रीयता के सिमटने से उत्पन्न भ्रम की समस्या है।
इसका सामाधान पहले निकाला गया था। धार्मिक विश्वास, विवाह, उत्तराधिकारी, संस्कार के प्रति दृष्टिकोण, जलवायु, मुख्य दार्शनिक विचार, प्रमुख ऋषि/आचार्य की दृष्टि से भारत को भौगोलिक स्तर पर बाँट कर सबके लिए अलग-अलग धर्मशास्त्र एवं पंचांग बनाए गये थे। उन पंचांगों में क्षेत्रीय पहचान एवं सामाजिक संरचना की स्पष्ट संगति दिखाई देती है। अ्रग्रेजी राज के सुधारवादी आंदोलन क्षेत्रीयता के घोर विरोधी रहे हैं। आर्य समाजी, ब्रह्मसमाजी, संधी, काँग्रेसी, साम्यवादी, सर्वोदयी सबका एक हाल है। समाजवादियों में लोहिया एवं नरेन्द्र देव अपवाद हैं । बाकी का हाल लगभग वहीहै। इस्लाम एवं ईशाई मत चूँकि क्षेत्रीयता का विरोधी है अतः इनके अनुकरण के आधार पर यहाँ भी विरोध की नकल की गई।
अभी भी उड़ीसा, बंगाल, मिथिला, काशी, पंजाब, उत्तरांचल, कूमायूँ, कश्मीर, राजस्थान, गुजरात, सौराष्ट्र, विदर्भ, कोकण, तेलंग (आंध्र) तमिल क्षेत्रों के अपने पंचांग प्रकाशित होते हैं। हिमाचल, आसाम, मणिपुर आदि के बारे में मैं नहीं कह सकता। ज्योतिष का मुख्य क्षेत्र मगध आज पंचांगहीन है। काशी, मालवा, उत्तर प्रदेश पर काशी पंचांग हावी है। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने एक समन्वयवादी पंचांग निकालना शुरू किया। वह काफी हद तक क्षेत्रीय प्रभाव से मुक्त है। परिणामतः कम लोकप्रिय है। बिहार में एक गुमनाम ज्योतिषी थे। चुटकलानंद की चिट्ठी तो लिखते ही थे बिहार सरकार, मिथिला वि0वि एवं सर्वोदय डायरी का पंचांग बनाते थे।
क्षेत्रीय पंचांग में स्थानीय विश्वास, महापुरुष, एवं मान्यताओं की संगति रहती थी। मगध में गुरू यानी बृहस्पति के समान सिद्ध गुरूपाद का महत्व है इसलिए बृहस्पति के उदय की अनिवार्यता शादी विवाह में नहीं है। वैसे भी मगध असुर संस्कृति का क्षेत्र है। मगध, झारखण्ड, उड़ीसा में मकर संक्रांति से वर्ष का आरंभ होता है। क्षेत्रीयता के ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगें। गया एवं गोदावरी क्षेत्र की यात्रा पर यात्रा काल का नियम नहीं लागू होता। पितृपक्ष के निषिद्ध काल में यात्रा की ही जाती है। तीर्थ व्यवस्था से क्षेत्रीयता के अंतरों के बीच भी संबंध दृढ़ होते रहे हैं और परस्पर सम्मान की भावना प्रबल होती रही है।
उपर्युक्त के अतिरिक्त दार्शनिकों, सौदर्यशास्त्रियों, साहित्य समीक्षकों (अलंकार शास्त्रीयों) कवियों ने भी काल एवं उसके बारे में स्वतंत्र रूप से सोचा है। तार्किक दृष्टि से विचार करें तो किसी भी बोध के लिए गति के तीन सूक्ष्म विभाग मानने पडं़ेगे। इन्हें क्षण कहा गया। उत्पत्ति क्षण, स्थिति क्षण एवं भंग क्षण। क्षणभंगवाद प्रसिद्ध बौद्ध मत है। वैदिक दृष्टि से संसार सरकने वाला है। वह ठीक से सरकता रहता है। परिवर्तन भी हेाता रहता है और पुरानी पहचान भी धीरे-धीरे बदलती है। यह बहस अत्यंत गंभीर और जटिल है। संसार की क्षणभंगुरता कहने का एक निश्चित अर्थ तो होना ही चाहिए।
इसी प्रकार की चिंता नया-पुराना को लेकर है। नये में सौदर्य हैं। सौंदर्यप्रिय लोगों को नवीनता आकृष्ट करती है। व्यवस्था एवं आधार के लिए दीर्घजीविता एवं प्राचीनता का महत्त्व है। इस विरोध की संगति इस प्रकार बनाई गई - सौंदर्य की आवृत्ति प्राचीन होने पर भी प्रत्येक उषा नवीन है। ‘‘दिने दिने यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः’’ महाकवि जगन्नाथ ने माना कि जो रोजबरोज नवीनता लिए हुए हो, वही रमणीय है। महाकवि कालिदास ने बीच का रास्ता निकाला - पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्संतः परीक्षान्यतरद्भजन्ते मूढ़ः परप्रत्ययनेयबुद्धिः। नवीनता की आवृत्ति और आवृत्ति की नवीनता दोनो ही समाज में स्वीकृत है। आज फैशन इसका सहज उदाहरण है। कुछ दिनों के अंतराल पर फैशन में पुरानी शैली नई बनकर लौटती रहती है।
भारतीय काल बोध -
मानव मन पर कालबोध का गहरा प्रभाव पड़ता है। अतः समझदार लोग जो दुनिया को अपने मन से गुपचुप चलाना चाहते हैं वे कालबोध को प्रभावित करने का प्रयास अवश्य करते हैं।
इस जानबूझकर की गई दाव-पेंच के समानांतर नैसर्गिक कालबोध संस्कृतियों की बुनियादी पहचान है। प्राचीन भारतीय संस्कृति का कालबोध चक्रीय है। समय वापस आयेगा, आता है, लाया जाता है। वापस लाये बिना और काल के चक्रीय प्रवाह से उपर उठे बिना जीवन अधूरा है। मनुष्य का जीवन देश एवं काल के सापेक्ष तो है पर लक्ष्य है - उससे ऊपर जाने अर्थात् काल के प्रवाह से अलग होने की विधि जान लेना। समग्र ध्यान साधना का यही अर्थ है। ईशाई, इस्लाम एवं चार्वाक मत में काल रेखीय है। जीवन के आरंभ से स्वर्ग नरक की यात्रा तक। इसीलिए उनके यहाँ पुर्नजन्म संभव नहीं है। पूर्वजन्म पुनर्जन्म तो वैदिक, बौद्ध, जैन, सांख्य, शैव, शाक्त आदि ही मान सकते हैं। इसीलिए भारतीय संस्कृति में सुख-दुःख, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, कुशल-अकुशल जैसी व्यवस्था ही नहीं कर्म-फल का सिद्धान्त भी कई जन्मोवाली प्रणाली में संगत हो पता है। आज के मनुष्य का चिंतन रेखीय काल प्रवाह वाला है अतः उसे समग्र भारतीय संस्कृति गलत लगेगी ही। दुराचारी की सफलता-विफलता पर समाज का न्यायबोध टिका है। भारतीय दृष्टि से दुराचारी को दंड अगले जन्म में भी मिल सकता है। इसी जीवन में मिलना जरूरी नहीं है। पाप पुण्य की यह व्यवस्था स्वर्ग नरक से थोड़ी भिन्न है।
जन्मांतर ही नहीं इस जन्म संबंधी कालबोध भी भिन्न प्रकार के हैं। एक जन्मवाले कालबोध का महत्व कितना गंभीर है कि कालबोध के आधार पर जीवों (मृत एवं जीवित का वर्गीकरण किया जाता है।) कालबोध से जीव की मनोदशा का पता चलता है। जिस मनुष्य का मन जितनी अधिक देर तक एकाग्र रह सके वह उतना ही बडे मनोबल वाला है। सबसे कम समय तक एकाग्रता प्रेत की होती है। लगभग यही हाल उस व्यक्ति का होता है, जिसके किसी परम आत्मीय की मृत्यु हुई हो और उसने अपने उस मृत का अंतिम संस्कार किया हो। अतः देशी एवं तांत्रिक परम्परा के श्राद्ध के अनुष्ठान में मृत एवं जीवित के काल बोध को ठीक करने की कोशिश/उपाय किये जाते हैं ताकि काल के क्रम में बँधी स्मृतियाँ ठीक हो सकें क्योंकि यदि स्मृति भ्रंश हुआ तो सब गड़बड हो जा सकता है। काल का बोध रूपी होने के कारण स्मृतियों का बहुत महत्व है। काल की विपरीत गति का अर्थ ही है बोध रूपी स्मृतियों के भंडार में झांकना। यह कार्य घ्यान के द्वारा संभव होता है। इसी लिये अनेक जन्मों की जानकारी के लिये एक या अनेक बार मरने की कोई अनिवार्यता नहीं है। जन्म-मृत्यु भी बोध के रूप में मानव मन में संचित है ही। स्वयं जब तक अनेक जन्मों की जानकारी नहीं हो जाती तब तक न तो भले बुरे कर्मों की कार्यप्रणाली के प्रति विश्वास होगा न ही यह निश्चय हो सकेगा कि बार-बार जीने-मरने के काम में लगा रहा जाय या इससे बाहर निकल लिया जाय। स्मृतियों की उलटी यात्रा के सहारे अनेक अन्य सामयिक बातों की भी सही जानकारी होती है। चूंकि दुखद बातें याद करना आदमी नहीं चाहता अतः घ्यानविधियों से बहुत डरता है। उसने पूजा पाठ साधना को इसी कारण से स्मृति की जगह विस्मृति की विधियों के रूप में परिवर्तित कर लिया है। ऐसे कथावाचक एवं धर्माचार्य अधिक लोकप्रिय होते हैं जो दुखद पक्षेां से मनुष्य का घ्यान हटा सकें।
काल विराटतम है। काल के विराटतम से सूक्ष्मतम रूप की ओर मन को ले जाने से मन की अव्यवस्था कम होती है। अतः भारतीय संस्कृति में नियम बना कि काल के विराटतम रूप से सूक्ष्मतम रूप को याद करने की प्रक्रिया द्वारा पहले होश में आया जाय। मन, शांत, सजग एवं स्मृतिवान हो जाय तभी कोई भी संकल्प किया जाय। पता नहीं जिस कार्य का संकल्प किया जा रहा है, उसकी कोई सार्थकता भी है या नहीं इस प्रकार कालस्मरण को हर उपासना, अनुष्ठान, संस्कार, उत्सव एवं संकल्प का अनिवार्य घटक बना दिया गया। हर काम को होश में करने से अच्छी बात क्या हो सकती है। यह काल स्मरण नैसर्गिक कालबोध के अनुसार किया जाता है। सामान्य शुभ कार्यों के लिए शुभ कालखण्डों एवं मुक्ति के लिए शुभ एवं अशुभ दोनांे काल खंडों का स्मरण किया जाता है। उत्तर भारत में राजा विक्रमादित्य सर्वाधिक लोकप्रिय राजा है। अतः संकल्प में वर्तमान संवत्सर गणना में विक्रम संवत्सर का महत्व है। फिर भी शक संवत्सर का भी स्मरण किया जाता है।
काल स्मरण के इस भारतीय महत्व को भारत के राजा महाराजा न समझें यह कैसे हो सकता है। अतः अन्य राजाओं ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में अपना-अपना संवत्सर चलाया। यह संवत्सर उस राजा के राज्याधिरोहण वाले वर्ष से आरंभ होता है। शालिवाहन राजाओं एवं शकों का आपसी रिस्ता आधुनिक इतिहास की दृष्टि से चाहे जो हो शक शंवत्सर एवं शालिवाहन संवत्सर को एक माना जाता है। एक वर्ष को संवत्सर कहा जाता है। संक्षेप में संवत् भी कहा जाता है। इस समय नवंबर 2008 ई.सं. के समय विक्रम संवत् 2065, शक 1930 वंगीय 1414, हिजरी 1429 चल रहा है। नैसर्गिक संवत्सर गणना की दृष्टि से इस संवत्सर का नाम प्लव है।
भारत विविधताओं का देश है अतः विविधताएँ काल बोध में भी हैं। दक्षिणी बिहार उड़ीसा का कालबोध लगभग एक है। उत्तरी बिहार, झारखण्ड, छतीसगढ़ एक। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश का अलग। ऐसे ही अन्य क्षेत्रों का।
सूर्य से ऊर्जा ग्रहण करने एवं संचित ऊर्जा से सृष्टि की दृष्टि से काल के दो भाग हैं – आदान= ऊर्जा संचय काल) विसर्ग काल= वि मतलब विशेष, सर्ग मतलब रचना का काल । खेती एवं चिकित्सा के लिए यही काल बोध का बड़ा पैमाना है। ऋतु एवं नक्षत्र इसके भीतर के भाग हैं। ऋतु का महत्व मोटी एवं स्पष्ट बातों के लिए है। महीने एवं पक्ष चन्द्रमा के अनुसार चलते हैं। इसके महत्व को स्वीकार करने पर भी खेती, विवाह-शादी आदि सूर्य एवं नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार चलते हैं। किसान की समझ के स्तर पर वर्षा, फसलों के रोग, पुष्टि सब नक्षत्रों पर आधारित हैं। उसके बाद सबसे महत्व दिन का है। ये महत्व सांदर्भिक हैं। किसी काम के लिए चन्द्रमा, किसी के लिए सूर्य एवं किसी के लिए अन्य का महत्व है। मकर संक्रांति भारत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नैसर्गिक कालबिन्दु है, जहाँ से आम आदमी की वर्ष गणना शुरू होती है। होली, दशहरा आदि राजकीय व्यवस्थाएँ एवं तिथियाँ हैं। आज भी मुख्य निर्णय नैसर्गिक काल गणना पर अधारित होते हैं। इसी तरह अन्य तिथियों का महत्व है। वर्षा ऋतु के चार महीने  के सृष्टिकर्ता के हैं। पालनकर्ता एवं राजा को उस समय सोना पडे़गा। उत्सव मौजमस्ती बाद में होगी फसल आने पर। अतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी हरिशयनी एकादशी को विष्णु सोने चले जाते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थानी को जागते हैं। इस अवधि में व्रत, उपवास, अनुष्ठान होगें किंतु बड़े उत्सव से बचा जायेगा। राजाओं एवं संप्रदायों के धार्मिक वर्चस्व ने इस नियम को काफी तोड़ा भी है। खासकर प्राचीन एवं नवीन दोनो हीं नागर सभ्यताओं ने इसे स्वीकार नहीं किया और दीवाली, दशहरा आदि को व्रत से उत्सव बना दिया। ब्रह्मा काल के अधीन हैं, यह सृष्टिकाल के अधीन है, विष्णु भी काल की व्यवस्था को मानते हैं। शिव महाकाल या कालातीत है। वे संहार करनेवाले हैं। संहार का अर्थ केवल विनाश नहीं होता। संहार अर्थात् समेटना। समेटने में कल की व्यवस्था नहीं भी मानी जा सकती है।
पहले धार्मिक अनुष्ठानों में नैसर्गिक काल एवं उसके पड़ाव तथा काल माप की इकाइयों का बहुत अधिक महत्व था। यूरोपीय प्रभाव बढ़ने से एवं आधुनिक सायंस पर यूरोपीय एवं ईशाई मत का वर्चस्व होने से लोगों को लगता है कि ईशवी संवत् की गणना ही सबसे प्रामाणिक है। शक् संवत्सर की तिथि गणना की प्रामाणिकता अपने आप में भारतीय दृष्टि से अद्वितीय है। इसका बुरा असर यह हुआ कि ईशाई मत  का साइंटिस्टों से खूब झगड़ा होता रहा। संस्कृति के क्षेत्र में भी यूरोपीय सरकारों को लगता रहा कि ईशाई संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना जरूरी है ताकि हम सिद्ध कर सकें कि औपनिवेशिक सरकारें अज्ञानी, जंगली एवं पिछड़े लोगों को सभ्य बनाने का काम कर रही हैं। मैक्समूलर एवं विंटरनिट्ज ने सबसे घिनौने ढ़ंग से यह काम षडयंत्र पूर्वक किया। ब्रिटेन के National Archive से अब दस्तावेज उपलब्ध हैं और षडयंत्र की बात प्रगट हो चुकी है। आधुनिक भूगर्भ शास्त्र की मजबूरी है कि वह अरबों खरबों वर्ष का हिसाब रखे। उसमें हजार दो हजार साल के पैमाने का क्या महत्व ? लेकिन आधुनिक इतिहासकार इस उलझन से नहीं बच पा रहे क्योंकि उनकी दृष्टि यूरोपीय है, चाहे वे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी। दक्षिण पंथियों की पीड़ा है कि शक् संवत्सर राष्ट्रीय संवत्सर क्यों है ? राजा शालिवाहन एवं जीभूतवाहन की कल्याणकारी दृष्टि एवं प्रयास जानने की फुरसत कहाँ और किसे है ? राजा बलि, गयासुर, बाणासुर आदि ने कोई गलत काम नहीं किया, फिर भी षडयंत्रपूर्वक इन्हें बरबाद किया गया।  हिटलर के भारतीय अनुयायियों के लिए भारतीय संस्कृति की विविधता को पचाना कठिन है। यही हाल बामपंथियों का है। उनके लिए भी हर समस्या का सामाधान यूरोप में है तो A.D. या B.C. से अलग सोचने की जरूरत क्या है़, उनकी दृष्टि में में भी सारी अच्छी चीजों का आरंभ तो मार्क्स के बाद ही संभव है। प्रो0 यशपाल हों या अन्य उन्हें यह बुरा नहीं लगता कि आर्यभट्ट, वराहमिहिर आदि के समय को भूगोल भूगर्भ शास्त्र के Black History वाले खंड में रखकर पढ़ाई हेाती है और भारतीय विद्वानों का पक्ष न रखकर यूरोप के पागलपंथी कथाओं का गौरव गाया जाता है।
वराहमिहिर जैसा लोकोपयोगी विद्याओं का संग्रहकर्ता और उदार मन वाला मिलना कठिन है। उन्होंने यवनों को भी जो आचार्य हैं, उन्हें ऋषियों की तरह पूज्य माना है। यूरोप से भी सीखने में कोई बुराई नहीं है। हां, राजनीति एवं अर्थ के प्रपंच को तो समझना ही पड़ेगा। किसी के भी पक्ष में आंख मूंद लेना या गुटबंदी करना ज्ञान का परिचायक नहीं हो सकता। गांधी चतुर एवं नेहरू यूरापीय दृष्टि वाले हैं। उनकी पुस्तक भारत एक खोज में यह स्पष्ट है। काल की इस राजनीति के विरुद्ध भारत में सर्वप्रथम जोरदार से ढंग से विरोध करने वालों में तिलक प्रमुख विद्वान रहे हैं। विदेशी और आधुनिक शिक्षा संपन्न लोगों में प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने काल गणना के पेंच वाले मुद्दे पर अपनी विख्यात पुस्तक  Hints for Self Culture में विस्तार से लिखा है। काल के बोधरूपी होने की बात को अपनी नई बात सिद्ध करने वालों में इधर नागपाल चर्चित व्यक्ति हैं। Sir John Woodruff alias Arthur Avalon विदेशी विद्वानों में सबसे सुलझे हुए आदमी रहे हैं। हाल-फिलहाल काल के मुद्दे पर की गई सुनियोजित करनेवाली चालाकियों का विवरण ब्रिटेन के National Archive से निकाल कर आदरणीय धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तकों में छापा है।

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