सोमवार, 11 मई 2015

चार पुरुषार्थ और आज का समय

चार पुरुषार्थ और आज का समय
- रवीन्द्र कुमार पाठक

सभागत सज्जन, विद्वानगण, 
सादर वंदन, अभिनन्दन।

आपके बीच इस विषय पर कुछ कहने-सुनने का जो अवसर मिला है इसके लिए आदरणीय श्री विजय प्रताप जी और श्री अनुपम भाई जी का आभारी हूं।
मैं जो आपके बीच रखने वाला हूं, उसमें शास्त्रीय विद्वता का पक्ष बिल्कुल नहीं है। मैंने इन विषयों को अपने लिए समझने की कोशिश में जो समझा और पाया, वही आपके सामने प्रस्तुत करूंगा। चूंकि इसमें मेरी अपनी नई बात न के बराबर है अतः सहज ही शब्दों से लेकर अर्थ और भाव तक शास्त्र एवं परंपरा पर ही आधारित है।
चार पुरुषार्थ मतलब- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन्हें पुरुषार्थ शब्द से तो जाना ही जाता है साथ ही इन्हें चतुर्वर्ग नाम से भी जाना जाता है। एक प्रसिद्ध पुस्तक है - चतुर्वर्ग चिंतामणि। धर्मशास्त्र से लेकर संस्कृत काव्य शास्त्र तक सबका लक्ष्य चतुर्वर्ग में सफलता प्राप्ती है।
मानव जीवन के ये चारों लक्ष्य सबके लिए हैं। इनमें सबका अधिकार है और सारे लोग देश, काल एवं अपनी पात्रता के भेद से भिन्न है अतः स्वाभाविक है कि सबके लिए एक ही प्रकार का धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष उपयुक्त नहीं होगा। इसमें भी विविधताएं हैं फिर भी उसमें संगति के सूत्र हैं।
चर्चा के पहले संक्षेप में इन चारों शब्दों के प्रचलित अर्थों पर ध्यान देने से सुविधा होगी। 
धर्म - स्वभाव, कर्त्तव्य एवं व्यवस्था 
अर्थ - आजीविका- संपत्ति और कर 
काम - इच्छा, विशेषकर यौन इच्छा और उसकी तृप्ति
मोक्ष - अज्ञान, दुःख-अतृप्ति के बंधन से मुक्ति, संपूर्ण सीमाओं से मुक्ति।

पुरुषार्थ - ‘पुरुष $ अर्थ‘ में अर्थ शब्द, शब्द और अर्थ वाला अर्थ है। 
जब धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अलग गणना करते हैं उस समय प्रयुक्त अर्थ शब्द एक पारिभाषिक परंपरागत अर्थ वाला है। उसका मतलब संपत्ति, संसाधन के साथ अर्थशास्त्र (भारतीय, विदेशी नहीं) वाला है। 
इन अर्थों का कुछ लोगों ने विस्तार किया तो कुछ लोगांे ने संकोच। ऐसा देख मैं भी अनेक बार दुविधाग्रस्त हुआ। धीरे-धीरे पता चला कि दुविधा का मूल कारण सुुविधा खोजना है। सुविधावादी या एकांगी दृष्टि से विचार करने पर तो समस्या होगी ही। भारतीय समाज विविधताआंे से भरा है। जिस किसी के लिए यह विविधता ही समस्या है उसके लिए मेरे पास कहने को कुछ नहीं है। जो विविधता को स्वीकार करते हैं उनके साथ कुछ कहने और बांटने को मेरे पास भी कुछ है।

यह जो चार का वर्गीकरण है, वह किसी एक ही धारा की बौद्धिक संपदा नहीं है। शब्दों की दृष्टि से भी धर्म और अर्थ लगभग सबको मान्य है। काम और मोक्ष की जगह निर्वाण, सुरति, महासुख आदि शब्दों का भी प्रयोग हुआ है।
अर्थ की दृष्टि से यदि विचार करें, वर्गीकरण एवं उसके औचित्य पर विचार करें तभी वर्तमान कालिक संदर्भ में इसके स्वरूप और सार्थकता पर भी विचार किया जा सकता है।
मुझे तो लगता है कि मानव ही नहीं जीव मात्र इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति में लगा है। काम के बिना सृष्टि ही नहीं और अर्थ के बिना जीवन नहीं। ये दोनों एक अकेले हो नहीं पाते तो व्यवस्था तो बनानी ही पड़ती है और मानना भी पड़ता है। इस प्रकार व्यवस्था रूपी धर्म का अर्थ भी अन्य जीवों में लागू है। रही बात बंधन और मुक्ति की तो मनुष्य तो था अन्य जीव धर्म के बंधन में तो सभी हैं। इससे मुक्ति के बारे में कुछ दुविधाएं और उलझनें हैं। उन उलझनों से कैसे पार पाएं इसकी खोज में भारत के भी लोग लगे और प्रकृति के तरीकों को जानकर उससे शारीरिक/भौतिक तथा मानसिक स्तर पर भी मुक्ति पाई।
धर्म तथा अर्थ के संदर्भ में राज्य की अवधारणा का प्रवेश एक महत्वपूर्ण घटना है और राज्य को व्यक्तिगत या पारिवारिक संपत्ति माना जाना उससे बड़ी उलझन।
इसी प्रकार काम के क्षेत्र में काम दहन की घटना के बिंब का सीधा अर्थ है कि मनुष्य अन्य जीवों की भांति गंध, ध्वनि और स्पर्श आदि से ही कामोत्तेजित होने की जगह मनुष्य में समरस, इच्छा, संकल्प आदि से कामोत्तेजना की आदत/संस्कार विकसित हुआ- इससे भारतीय साधक तो बहुत इठलाने लगे।
काम जानामि ते मूंल संकल्पात् किल जायसे। 
नाहं संकल्पायिष्यामि तेन त्वं न भविष्यसि।

हे काम! मैं तुम्हारा मूल जानता हूं। तुम संकल्प से पैदा होते हो। न मैं संकल्प करूंगा न तुम पैदा होगे।
इन चारों अनेक प्रकार की नई-नई खोज होती गई। और आज भी जारी है इसके कारण ही अर्थ बदलते गए।
चतुर्वर्गों की चर्चा अत्यंत रोचक, ज्ञानवर्धक साथ ही करुण भी है। आज पूजनविहीन रतिसुख, समलैंगिकता, उत्तराधिकार आदि की उलझनें हैं तो बलात्कार तथा अनेक प्रकार के यौन अपराधों की भी समस्या कम नहीं हो रही। राज्य की सत्ता केवल पृथ्वी तक नहीं रही, अंतरिक्ष तक पहुंच गई है। परिणामतः जंगल और उसकी स्वायत्तता को कोई मान ही नहीं रहा। ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं संगति के सूत्र छूट रहे हैं। एक कोशिश उन्हें ढूंड़ने की होनी चाहिए मैंने उन्हें ढूंडने की कोशिश की है। आशा है आपने भी की होगी। ये सू़त्र हाथ आ गए तो पता चलेगा कि धर्म का मतलब क्या है? क्या है दीर्घकालिक और उसमें से आज के लिए कितने अंश कितने प्रसांगिक हैं। स्वर्धम, न्यायधर्म के बीच संतुलन का सूत्र क्या था और आज क्या हो गया?
अर्थ और उसकी एक व्यवस्थित शास्त्र परंपरा भी भारत में रही है। इस बात को बहुत लोग जानते ही नहीं। अर्थशास्त्र एकोनोमिक्स का तर्जुमा बन कर रह गया है। ऐसी समझ खतरनाक है, आत्मघाती है। मैं मगध से हूं। हमारी बड़ी निंदा है, ‘मागध‘ एक पुरानी गाली है। संस्कृत वाली मंडली में कोई अपने को मागध नहीं कहता। मगध में जाने से कर्म का नाश होता है। ऐसा अखिल भारतीय विरोध एक देश के लिए क्यों? ऐसे दो-चार उदाहरणों के अर्थ को समझने पर ही भारतीय बिंबों, पदावलियों उनके अर्थ तथा विस्तार को समझा जा सकता है।
कौटिल्य ने भी अर्थशास्त्र लिखा लेकिन वो अकेला शास्त्र नहीं है। हजारों साल तक प्रयोग कर नई प्रस्तुतियां देता रहा। बार-बार अपने को और समस्त भारत की चेतना को झकझोड़ता रहा इसलिए उसे शैतानी, उत्पाती आदि पदवियां दी गईं।
मैंने उसी प्रयोगिक परंपरा से सीखने की कोशिश की है। मगध दूसरे क्षेत्रों के बगैर बेकार और अधूरा रहेगा। दिल्ली में राजधानी में अनेक लोगों से बात करने का अवसर मिलेगा इसकी खुशी हो रही है। 
काम के बाह्य पक्ष का नाम मैंने लिया लेकिन भारत के लोगों ने तो कुछ सैकिडों वाला नहीं; घंटो, दिनों वाले काम/सुरति का रहस्य खोजा और मजा लिया। इसमें बुराई क्या है? इससे किसका बुरा होता है? उसे मोक्ष का प्रथम चरण कहा तो अनेक विवाद हो गए।

मेरी समझ से हमें इन चारों पुरुषार्थों के स्वरूप तथा उनके अंतरसंबधों को समझना चाहिए और सत्य की भारतीय संस्कृति की विविधताओं में विकसित भिन्न-भिन्न आचार शैलियों तथा उसकी सार्थकता को न केवल समझना चाहिए बल्कि अमल भी करना चाहिए।
इसके लिए विवाह, प्रजनन, जाति, उत्तराधिकार आदि के क्षेत्रीय अंतरों को ध्यान में रखना जरूरी है।
केवल विविधताओं से समाज नहीं बनता न चलता है। आज राष्ट्रीय एकता की चिंता तो अनके लोग करते हैं लेकिन समाज की एकता बना कर रखने वाली व्यवस्थाओं को महत्व नहीं देते।
तीर्थ व्यवस्था उनमें से एक है। एक तीर्थ व्यवस्था धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के क्षेत्र में इतना निर्णायक प्रभाव डालती है कि सारे क्षेत्रीय अंतरों, युद्धों, प्रतिस्पर्धाओं के बाद भी वर्ण व्यवस्था के शीर्ष अंकित कुलीन ब्राह्मणों एवं राजाआंे तक को भी दूसरों के सामने झुकने, उनकी वंदना करने और उनसे आर्शीवाद प्राप्त करने पर विवश करती है। यह तो बस एक उदाहरण मात्र है।
आज के समय में भी ये चारों वर्गीकरण सार्थक हैं। जरूरत है उन्हें समयानुरूप परिवर्तनों से मिला कर समझने की। जो बातें नहीं बदली जैसे आहार, निद्रा, भय एवं मैथुन की प्रवृति। जिज्ञासा तथा संतता की इच्छा, उसे मानना होगा। जो बदल गए, जैसे रोजगार, स्थापन, विस्थापन, रोजगार आधारित जातीय व्यवस्था, राज्य सत्ता में हस्तक्षेप की प्रक्रिया, प्रजनन संबंधी गांठें। जिम्मेदारियों उनके परिप्रेक्ष्य में ज्ञानी-गुणी लोगों को नई व्यवस्था प्रस्तुत करनी चाहिए।
मगध के लोगों ने पहले भी ऐसा काम नहीं किया। यह काम महाराष्ट्र और कश्मीर के लोग सदियों से कर रहे हैं। वे सूत्र हम से लें और शास्त्र लिखें तो दोआबा के लोग उसे सिर आंखों पर उठा लेंगे।
दक्षिण में थोड़ा अंतर है। मैंने केवल सुना है। उस क्षेत्र के लिए उसकी संहिता बनाना शायद कर्नाटक या केरल के जिम्मे होगा, मुझे ठीक से पता नहीं है।

रविवार, 10 मई 2015

क्या ऐसे भक्ति की साधना होगी?


परंपरागत रूप से वर्तमान समय को भारत में कलि काल कहा जाता है। इसमें भक्ति और नाम स्मरण का महत्त्व बताया गया है। भक्ति ओर प्रेम दोनो शब्द चलन में हैं। कोई इसे लौ लगाना भी कहते हैं।
ईश्वर है या नहीं? इस बहस का यहां कोई मतलब नहीं, उसे मानकर ही भक्ति की साधना होती है। मैं फिलहाल भक्ति या उसके उत्कृष्ट प्रकारों पर चर्चा करने नहीं जा रहा। पहले सामान्य प्रेम और भक्ति के प्रति समाज और खाश कर परिवार का क्या नजरिया है, जरा इसी पर गौर कर लें। क्या ऐसे माहौल में सचमुच प्रेम की साधना शुरू हो सकती है, जहां प्रेम करना पाप करने जैसा हो। जब प्रेम के अभ्यास और विकास का उचित अवसर और काल हो, ठीक उसी समय उन लोगों के बीच भी, जहां प्रेम के विभिन्न रूपों का विकसित होना अनिवार्य हो, जैसे- पति-पत्नी, माता-पिता और उनकी संतानें, वहीं प्रेम करना परिवार विरोधी और समाज विरोधी तक माना जाता हो। जब उम्र बढ़ जाये तब यही बात जरूरी और समाज के अनुकूल कैसे हो जायेगी? आधुनिक नौकरी पेशा समाज की परिस्थिति में काफी बदलाव आया है लेकिन गांव-देहात में अभी भी पुरानी चलन का ही प्रभाव है, जो दो पीढि़यों के संघर्ष का मुख्य कारण है। भाई-भाई में प्रेम हो, बहनों में हो लेकिन अन्य के साथ न हो। मर्द का ससुराल से और औरत का नैहर से प्रेम न हो। यह सामान्य घरों की बात है किसी अंतरजातीय विवाह वाले की नहीं। 
  इन्हीं बातों को आदर्श घोषित किया गया लेकिन सौभाग्य से हर आदर्श की तरह इस आदर्श का भी पूरी तरह पालन समाज ने नहीं किया, इसी कारण घर-परिवार कुछ बचा हुआ है। मेरे मन में यह सवाल बार-बार उभरता है कि क्या ऐसे भी भक्ति की साधना पनप सकती है? जब कुटंब भावना ऐसी रहे तो वसुधैव कुटुंबकम् का क्या होगा?

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

हाय रे! दक्षिण/वामपंथी विद्वान


धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष और इन्हे देने वाले विज्ञान पांचांे शब्दों तथा उनके शास्त्र का नाम ही ये चबा गये। कहने को तो सभी अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं लेकिन केवल अंग्रजी में या केवल संस्कृत में लिखने-पढ़ने वाले तथा स्ययंभू या अंगरेजियत समर्थित विद्वानों ने तो अपनी अक्ल ही कब की बेंच दी। अंगरेजों ने योजना बना कर पहले भारत के बुद्धिजीवियों को गुमराह करने का काम किया। 
इसके लिये उन्होंने बहु आयामी योजना बनाई और गुमराह किया। रोना यह कि धुर वामपंथी और धुर दक्षिण पंथी, संघी और कम्यूनिस्ट दोनो की समझ एक जैसी है। दोनों ही यूरोपीय समझ को प्रमाण एवं आदर्श मानते हैं। इसलिये जब भारतीय समाज संस्कृति को सीधे तौर पर मार्ग दर्शन करने वाले शास्त्रों के अस्तित्व को ही नकारने का षडयंत्र होने लगा तो ये दोनों ही उन्हीं के सुर में सुर मिलाने लगे। शिक्षा के पाठ्यक्रमों से इन्हें निकाल दिया गया। 
जो बचा वह कुल परंपरा के आधार पर क्योंकि अनेक लोगों की रोजी-रोटी उसी से चल रही थी। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि अपवाद छोड़ दें तो अब कर्मकांडी ‘‘धर्म शास्त्र’’ शब्द का अर्थ नहीं जानते, ‘‘अर्थ शास्त्र’’  नाम से ज्ञान की कोई व्यवस्थित धारा होगी, जो राज्य एवं समाज की आर्थिक गतिविधियों को मर्यादित करती होगी, यह लोग सोचते ही नहीं। भारत में ‘‘अर्थ शास्त्र’’ का मतलब आदम स्मिथ वाला और उसके बाद वाला इकोनोमिक्स ही लिया जाता है। ‘‘काम’’ जी हां, सेक्स से भारतीय समाज को कोई समस्या नहीं रही। यहां अनेक प्रकार के विवाह और जीवन शैलियां रही हैं तो स्वाभाविक है कि इस क्षेत्र को भी व्यवस्थित तथा मर्यादित करने के लिये शास्त्र रचा गया होगा, जी हां, इस शास्त्र की भी लंबी चौड़ी पंरपरा है। रहा बचा ‘‘मोक्ष’’ इसके अर्थ को भी बदलने के लिये पुर जोर ताकत लगाई गई और वामपंथी अभी भी लगा रहे हैं लेकिन रामकृष्ण परंमहंस जैसे अनेक महान लोगों ने इसे बचा लिया।
आम आदमी के वास्तविक जीवन जहां समाज एवं राज्य द्वारा दंड एवं पुरस्कार की व्यवस्था हो वैसे जीवन जीने के लिये जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तथा इनके विज्ञान का शास़्त्र फिर है क्या? धर्म के लिये न गीता है, न महाभारत, न वेद न उपनिषद, इसके लिये हैं- धर्म सूत्र, गृह्य सूत्र, स्मृतियां, उनकी व्याख्याएं और उन पर आधारित विभिन्न नव्य स्मृति ग्रंथ, उसके बाद की किताबों को निबंध ग्रंथ और निर्णय ग्रंथ कहा जाता है। अर्थ मतलब आजीविका तथा राज्य के कर/शुल्क आदि को बताने वाला शास्त्र है- अर्थशास़्त्र। आज केवल चाणक्य के अर्थ शास्त्र की बात होती है जबकि चाणक्य के पहले और बाद में भी यह परंपरा रही। काम शास्त्र के नाम पर केवल वात्सायन का काम सूत्र ही नहीं है, वह तो केवल राजाओं, सेठों और सामंतों के व्यभिचार विद्या का शास्त्र है। कुट्टनीमतम एवं अन्य अनेक ग्रथ भी है जो वेश्यागामी होने से बचाने के लिये लिखे गये हैं। सबसे मूल्यवान विज्ञान की चोरी पर तो मैं पहले ही लिख चुका हूं। मोक्ष जहां पूर्णतः दुख से मुक्ति और असीम सुख के बड़े अर्थ में लिया गया उसे, वामपंथी राजनैतिक मुक्ति तक सीमित करना चाहते हैं। धर्म को राजनीति और सत्ता पर कब्जा का प्रबल हथियार मानने वाले बेचारे अंबेदकर जी एवं उनके अनुयायी इस षडयंत्र के सबसे बड़े शिकार हुए।
अगले किश्त में जारी........... ‘‘इंडोलोजी और रायशुमारी का चक्रव्यूह’’

आषाढ़ी संवत्सर

आषाढ़ी संवत्सर
भारत में अनेक संवत्सर मनाये जाते हैं। मकर संक्रांति आधारित, और राजा विक्रमादित्य वाला सबसे प्रचलित है। लेकिन इससे लोक व्यवहार नहीं चलता, खाश कर हिंदी पट्टी में। 31 मार्च गया, 1 अप्रैल भी अतः मैं मजाक नहीं कर रहा, तब आखिर हमारा पारंपरिक व्यावहारिक संवत्सर क्या है? व्यावहारिक ममतलब लेन देन खेती गृहस्थी, मजदूरी तनख्वाह वाली। ये सब काम विक्रम संवत्सर से नहीं होते। मैं सवाल पूछ कर ज्ञान की अभिवृद्धि में आपकी सहभागिता को सादर स्वीकार करता हूं और कुछ नई जानकारियों को इकट्ठा भी करता हूं।
हमारे यहां खेत की बंदोबश्ती आषाढ़ में होती है। भूइयां, मुसहर की एक पूजा आषाढ़ी पूजा होती है। कर्ज वापसी, लेनदेन, नये खेतीहर मजदूर की नियुक्ति वगैरह सब आषाढ़ में। मार्च से इसका रिश्ता नहीं, वह अंगरेजी सरकार वाला है। पता नहीं क्यों ? वित्तीय वर्ष को 2 सालों में फंसा कर रखा गया है। वह भी 1ली जनवरी से 31 दिसंबर तक का होता तो क्या संकट आता?
मेरे मन में सवाल है कि आषाढ़ में क्यों? क्या इसका कोई पुराना आधार है या कुछ और? इतना ही नहीं पहले क्या कर सूद आदि की गणना इसी प्रकार कुल दिवसों की संख्या के हिसाब से भिन्न संवत्सरों से की जाती होगी तब तो गिनती में काफी दिक्कत आती होगी? या साल के दिनों का कोई व्यावहारिक मानक होगा?
ज्योतिष एवं भारतीय समाज के अन्य पक्षों के जानकार एवं इतिहासज्ञ कुछ इस बात पर प्रकाश डालें तो अच्छा लगेगा।

रविवार, 8 मार्च 2015

गो: वर्गीकरण और नामकरण का खेल


एक उदाहरण लेते हैं- गो का। गो एक उत्तम पशु इसलिये इसे दान, कर या मुनाफे में लिया जाय, न मिले तो लूट लिया जाय। ऐसा बहुत पहले शुरू हो गया। तब, गो की रक्षा श्रेष्ठ धर्म। उसके लिये जान लेने देने में भी हानि नहीं। तब? आदमी ने सोचा कितना अच्छा हो कि हमें भी गाय समझ लिया जाय और हमारी भी रक्षा हो। 
कुछ लोगों के सामने समस्या यह हुई कि हम तो गाय हैं, नहीं हम तो ठहरे आदमी। दूसरे चतुर गुट की समस्या यह कि वाह हम मनुष्यों की कोई पूछ ही नहीं और इस पूंछ वाली गाय का इतना धार्मिक महत्त्व? इसके लिये गो शब्द को बड़ा करना होगा। वह तो बड़ा होगा नहीं तो इसका अर्थ बढ़ाते हैं किसी तरह लेकिन अर्थ बढ़ाने का भी तो आधार होता है। तो आदमी को गाय के समान महत्त्व देने के समाधान के लिये सोचा जाय कि गो शब्द का गाय अर्थ बना कैसे ? 
गो शब्द गति अर्थ वाले गम् धातु से बना था। गो मतलब जिसमें गति हो, बस मिल गया अलादीन का चिराग। हां जी, हां, तो जो भी गतिशील हो वह गो। इस प्रकार केवल गाय ही नहीं पशु मात्र की रक्षा धर्म हो गया। तब बताइये, इस अर्थ में हम कमजोर गरीब आदमी क्या पशु से भी कम महत्त्वपूर्ण हैं? हम भी तो पशु ही हैं, तुलना करके देख लीजिये? लोगों ने सोचा आगे से हमारे देवता भी पशुपतिनाथ होंगे, नेपाल में और बर्तमान झारखंड में हैं भी। इस प्रकार गो शब्द का अर्थ बढ़ कर चलने फिरने वाले सारे पशुओं में फैल गया।
फिर अनेक प्रकार से तुलना की गई। सबसे ज्यादा क्या चलती है? जीभ, यह जीभ ही तो है जो खाने और बोलने के लिये लपलपाती रहती है। यही असली गो है, इसे पकड़ो, इसे नियंत्रित करना होगा या इसके नियंत्रण में जाना होगा? तब से दोनो प्रकार के प्रयास आज तक जारी हैं।
जारी ............

गुरुवार, 5 मार्च 2015

हाय कबीरा तू फंसा, अपने घर की फांस


मेरा कबीर पंथियों से बहुत पुराना लगाव है। इसलिये उन पर रोना आता है, खाश कर कबीर पर। कबीर पंथियों ने अनेक विलक्षण काम किये हैं लेकिन कबीर अपनी ही फांस बरबाद हुए क्योंकि संच्चाई की जगह चालाकी करने लगे।
संत और सिद्ध अपनी मौज में रहते हैं, ना काहू से दोश्ती ना काहू से बैर। बातें सीधी करते हैं, मानना हो मानो, न मानना हो, मत मानों। कबीर ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने सरलीकरण की जगह वही जटिलीकरण चुना, जिसकी निंदा वे कर रहे थे, अपने विरोधियों से कई गुना जटिल। बाकी बची खुची पहचान को उनके अनुयायियों ने समाप्त कर दिया।
होली के समय कबीरा और जोगीरा गाया जाता है, उपहास के रूप में भी। वामपंथी हिंदी समालोचक इसके लिये भी हर समस्या के एक मात्र कारण की तरह इस समस्या का भी एक मात्र कारण तथाकथ्ज्ञित रूप से ब्राह्मणों को ठहरा देते हैं। अब जरा आप भी मिलाइये--
1 कबीर को सरल भाषा में बोलने में क्यों परेशानी हुई?
2 अपने ज्ञान को पूर्ववर्तियों से भी गूढ़ या दुरूह कहने की लालच क्यों हुई?
3 कैसी हिंदू मुस्लिम एकता? कोई मुसलमान मानता भी है क्या?
4 माने भी कैसे़? कबीर की तो मूर्तियां भी बनीं और उनके मंदिर भी बने तो पूजा तो           होगी ही।
5 पोथी विरोधी कबीर ने भी फिर मौखिक ही सही, ग्रंथों की रचना क्यों की?
6 पतन भी उसी तरह हुआ, कबीर पंथ एक संप्रदाय बन गया। गृहस्थ की जगह साधु         आये।
7 भारत जैसे अन्य संप्रदायों के मठ बने, वैसे ही कबीर पंथ के।
8 गजब की लंगई कि अभी भी कबीरपंथी पोथी और मूर्तिपूजा का विरोध करते हैं।
9 बनारस केन्द्र बना तो बनारस का सबसे धनी स्वर्ण भंडार वाला मठ कबीर मठ               हुआ।
10 बाबा भोले नाथ के घर से सोने की पत्तर और दीवार में जड़े सिक्कों की चोरी हुई तो        कबीर जी के चबूतरे से सोने की ईंटों की।
11 और अंतिम बात कि जातिवर्चस्व भी तो आना ही था। इस संप्रदाय में कोईरी जाति के लोगों तक महंथी रिजर्ब हो गई तो कुछेक अक्ल के मारे सवर्णों ने बगावत कर एक नया ग्रुप बना लिया।
बेचारे कबीर की गालियां अब किस पर पड़ें? हाय कबीरा तू फंसा, अपने घर की फांस।

रविवार, 1 मार्च 2015

पता नहीं, वह कैसी है?

पता नहीं, वह कैसी है?
कल कई वर्षों बाद एक लड़की दिखी, जो कभी मेरी बेटी जैसी थी और आज 2 बच्चियों की मां है। उसके साथ उसका शौहर भी था और संभवतः उस शौहर की मां भी। वह लड़की मुझे अक्सर याद आती है क्योंकि मैं ने उसे प्यार दिया और उसकी गलतियों (जो मुझे लगीं) पर समझाया बुझाया भी। उसे दिल खोल कर पढ़ा रहा था कि एक काबिल पारंपरिक चिकित्सका लेकिन उसके मन में कुछ और ही चल रहा था। पता नहीं किस चीज की कमी उसे इतना सता रही थी कि उसने बगावत कर इस्लाम स्वीकार किया और शादी की।
समझाने के अतिरिक्त न मैं कुछ कर सकता था न किया लेकिन मुझे उसका मुसलमान बनना और बुर्के से ढंक जाना अच्छा नहीं लगा। आज के समय में ऐसा धर्मांतरण? न समझ में आया न ही अच्छा लगा। उसे पढ़ने, सीखने, घूमने-फिरने, सजने-संवरने, मित्रता करने, कला, कविता घर गृहस्थी हर काम की आजादी उसके परिवार से मिलती दिखती थी। न पर्दा, न बुरका? ब्राह्मण होने के नाते हिंदू धर्म संबंधी स्थिति भी उसकी अच्छी ही थी। स्वयं शिक्षित और खूबसूरत भी। फिर भी उसने एक असवर्ण, मुसलमान, बेरोजगार, धूर्त, कट्टर, सुन्नी मुसलमान से शादी की। परिवार ने उससे संबंध तोड़ लिया, शायद उसकी मंा छुपे-छुपे संबंध रखती हों लेकिन वह सबसे जुदा हो गई।
मुझे उसके बारे में सूचनाएं मिलती थीं लेकिन कल कार के गैराज में उसका पति भी परिवार सहित अचानक आ गया। उसने अभिवादन किया, मैं ने उत्तर दिया लेकिन न उस लड़की ने मुझसे मिलना या अभिवादन करना जरूरी समझा न मेरी हिम्मत हुई जबरन उसके पास जाने की क्योंकि अब तो वह एक पर्दानशीन कही जाने वाली औरत थी। पता नहीं, वह अपने ससुराल में कैसी जिंदगी बिता रही होगी? लड़का अभी भी बेरोजगार ही है या संदिग्ध किश्म का कारोबार कर रहा है, पहले की तरह। बस खैरियत इतनी कि वह बुर्के में नहीं थी।
सुविधा के लिये कह सकता हूं, जो सच नहीं भी हो सकता-- बेचारी ‘‘लभ जेहाद की मारी’’।