मंगलवार, 7 अक्तूबर 2014

मेरे गणितीय प्रश्नों के उत्तर 2

वाह रे, अनुपात!
अनुपात से ही बोध है। इस पर पोस्ट आ गया। यह अनुपात अन्य मामलों में कैसे निर्णायक होता है, इसकी बानगी के रूप में क्रमशः कुछ उदाहरण प्रस्तुत होंगे। भारतीय वास्तुशिल्प और मूर्तिकला को तो मानना ही पडता है कि यह माडर्न सायंस के पहले से है, चाहे वह मंदिर हो, किला या अन्य बौद्ध विहार आदि वाली संरचना। सभी जगह निर्माण के पहले डिजाइन, वास्तु के छोटे-भागों का निर्धारण, उन्हें लगाने की क्रमबद्धता आदि की बारीकी भी तो रही ही होगी।  इसी प्रकार बड़ी-छोटी जितनी भी प्रतिमाएं बनीं, उनकी खूबसूरती बताती है कि इनके निर्माण में भी माप-तौल का बारक अंतर रखा गया है। लंबाई, चौड़ाई एवं गहराई सभी आयाम संतुलित हैं, बहुत सारी मूर्तियां तो हूबहू नकल जैसी हैं।
जब इस विषय के ग्रंथों को पढ़ते हैं तो उसके माप फुट, ईंच, या मीटर में नहीं मिलते। वे मिलते हैं- अंगुल, मुट्ठी, बीता, हाथ, पोरसा आदि शब्दावलियों में, जो हर व्यक्ति की दृष्टि से अलग होंगे तो फिर आखिर यह माप इतनी बारीकी से काम कैसे करता रहा और ऐसी जटिल संरचनाओं में भी सफलता कैसे मिली? दरसल भारतीय शैली में माप संबंधी सारी सूचनाएं क्षेत्रीय संदर्भ एवं अनुपात के खांचे में याद रखी और बताई जाती हैं। बहुत बार तो जब अंगुल, मुट्ठी, बीता, हाथ, पोरसा जैसे माप का भी प्रयोग न कर केवल आनुपातिक अंतर का प्रयोग किया जाता है, तब इसका रहस्य खुलता है। विस्तृत उत्तर अगले पोस्ट में.....।

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