शनिवार, 21 अप्रैल 2012

भारतीय कालबोध


भारतीय कालबोध, काल गणना एवं उसकी पारंपरिक पहचान
विशेष अनुरोध –
भारतीय दृष्टि से काल के बोध एवं उसकी सामाजिक पहचान तथा व्यवस्था को समझने के पूर्व कुछ सावधानियां आवश्यक हैं। दरअसल आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से वर्तमान कालबोध प्रगट रूप से यूरोपीय एवं अंदरूनी तौर पर ईशाई है क्योंकि आधुनिक सायंस एवं सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का विकास मुख्यतः यूरोप में हुआ है। इसलिये भारतीय काल बोध एवं काल गणना को समझने के पूर्व अपने मन को कुछ देर के लिये ही सही भारतीय बनाना जरूरी होगा। निबंध पढ़ लेने के बाद आपकी मर्जी आप सहमत हों या न हों परंतु यदि आप यूरोपीय पैमाने एवं चश्मे से भारतीय विषयों को समझना चाहेंगे तो कुझ भी समझ में तो नहीं ही आयेगा, आपके अज्ञान एवं अहंकार का विकास अवश्य होगा। मेरे कहने का आशय यह नहीं है कि भारतीय समझ में दोष नहीं है, फिर भी पहले उस समझ को उसके मूल रूप में समझना ज्ञान का लक्षण होगा न कि बिना समझे ही नकार देना या मजाक उड़ाना या यूरोपीय पैमाने में फिट करने की व्यर्थ कोशिश करना। काल संबंधी भारतीय दृष्टि एवं यूरोपीय दृष्टि में आसमान जमीन अंतर है। यूरोपीय दृष्टि में काल रेखीय है। उसके आरंभ एवं अंत के विंदुओं की पहचान है। मानव जीवन के संदर्भ में जन्म से आरंभ हो कर स्वर्ग या नरक जाने तक काल की सीमा है। भारतीय दृष्टि से काल चक्रीय एवं आवृत्तिमूलक होने से अनादि और अनंत है।
इतना ही नहीं देश तथा काल की सीमा में रहने और देश तथा काल के प्रभाव एवं सीमा से बाहर जाने की भी व्यवस्था है। यह समझ और अभ्यास का विषय है। दिक एवं काल को वैशेषिक की परिभाषा में द्रव्य कहा गया है।
कई पारंपरिक शब्दों को आधुनिक समय की हिन्दी ने इस तरह निगल लिया है कि परंपरागत बातों को हिन्दी में प्रगट करने में समस्या खड़ी हो जाती है। विज्ञान एक ऐसा ही शब्द है। विज्ञान उस सूक्ष्म स्तर के बोध एवं बोध की प्रणाली के लिये प्रयुक्त होता है जिस स्तर पर ज्ञाता एवं ज्ञेय लगभग एक हो जाते हैं। जहां से कलन अर्थात गणना शुरू की जा सकती है। यह गणना ही तो काल का आधार है। गणना करने वाली पद्धति एवं शक्ति को काली कहते हैं। इसलिये स्पष्टीकरण को बचाने हेतु इस आलेख में विज्ञान की जगह सायंस शब्द का प्रयोग किया गया है। तांत्रिक कहने का अर्थ विस्तृत शास्त्र या प्रणाली में विश्वास करने वाला एवं उनकी रचना करने वाला है न कि काला जादू जैसे छिछले अर्थ में प्रयोग हुआ है। तंत्र अर्थात व्यवस्था।
काल के विविध रूप -
काल क्या है? इसका अस्तित्व है भी या नहीं? इस मुददे पर भारत में भी काफी मतभेद हैं फिर भी यह माना गया है कि भारतीय दृष्टि से काल एक बोध है। यह काल बोध गतिसापेक्ष पारस्परिक अनुपातिक बोध है। इस प्रकार कालबोध के लिये गति, पारस्परिक संदर्भ एवं उनमें अनुपातिक अंतर ये तीन मूल घटक हैं। भूगोल एवं खगोल शब्द हिन्दी अनुवाद हेतु गढ़े हुए शब्द नहीं हैं। ये पुराने शब्द हैं। पुराणों में भूगोल का वर्णन अनिवार्य है। खगोल का वर्णन ज्योतिषशास्त्र के ग्रन्थों में आता है। सूर्य चन्द्र एवं अन्य नक्ष्त्रों के सापेक्ष भूगोल (पृथ्वी) की गति संबंधी बोध काल के बोध का आधार है। जैसे भू अर्थात धरती गोल है, ख माने आकाश गोल है, नक्षत्रों राशियों के परिक्रमापथ गोल हैं उसी प्रकार काल कभी गोल है। इसी प्रकार बाह्य अंतरिक्ष में स्थित सूर्य एवं पृथ्वी के सापेक्ष बोध को देश बोध कहते हैं। देश बोध पौर्वा पैर्य (आगे-पीछे) का बोध है, जिसका नियामक सूर्योदय तथा सूर्यास्त है। चन्द्रमा कालबोध का            आधार होता है, देश बोध का नहीं क्योंकि इसके उदय एवं अस्त का स्थान निश्चित नहीं है। इसके बाद पर्वत समुद्र ध्रुव तारा आदि से बोध कराया जाता है।
बौद्ध एवं शांकर अद्वैत वेदांत तथा तांत्रिक शाक्त मत में सापेक्ष बोध की तात्त्विक प्रामाणिकता नहीं है। अतः देशातीत एवं कालातीत होने की बात भी कही गई है। थेरवादी विभज्यवादी पालि साहित्य में वर्णित बौद्ध परंपरा तो काल नक्षत्र आदि की विद्या को तिरच्छान विज्जा अर्थात् मनुष्य को उलझाने वाली विद्या मानती है। उसके विपरीत बौद्धों की दूसरी शाखा के महायानियों एवं वज्रयानियों ने इस पर व्यापक कार्य किया है।
दर असल देश एवं काल के पैमाने अतिसूक्ष्म एवं अति व्यापक-विराट स्तर पर एक से होने लगते हैं। प्रकाश एवं ध्वनि के तरंगों की स्थिति भी ऐसी होने लगती है। अतिसूक्ष्म स्तर पर आजकल काल गणना सूक्ष्म आणविक घड़ी से की जाती है। परंपरागत भारतीय शैली में यह गणना एकाग्रता एवं ध्यान  की विधियों से की जाती है। उस पद्धति में भी अतिसूक्ष्म स्तर पर काल गणना करना कठिन होने लगती है। अंतर मिटने लगते हैं। विराट स्तर पर भी आज की सायंस की शैली में दूरी का माप प्रकाश वर्षों में करना पड़ता है। इसकी चर्चा आगे होगी। भारतीय संस्कृति में अति सूक्ष्म स्तर पर इस मिलन विंदु को नाद-विंदु का मिलन कहते हैं। नाद मतलब घ्वनि, विंदु मतलब दृश्य। यही योगियों, ध्यानियों तांत्रिकों का मध्यम स्तरीय लक्ष्य है। इसके बाद संसार के रहस्य उनकी ध्यान भूमि में प्रगट होते हैं। संसार का रहस्य सूक्ष्मतम पदार्थाे के अस्तित्व एवं उनके स्वभाव के ज्ञान से ही संभव हो सकता है, यह बात सभी को मान्य हो सकता है।
भारतीय ज्ञान के अनुसार जैसे मनुष्य की श्वास एवं चेतना की तीन प्रकार की गतियाँ थोड़े-थोड़े अंतराल पर देखी जाती हैं उसी प्रकार प्रकृति में भी तीन प्रकार की गतियाँ हेाती हैं, - 1. बहिर्मुखता, विघ्वंस और क्रियाशीलता, 2. अंतर्मुखता, संवेदनशीलता, रचनात्मकता और स्वीकार्यता, 3. ज्ञान, तटस्थता और सिमटना। यह अनुभवात्मक विषय है। नाक के बाएँ छिद्र से श्वास चलना, दाहिने से चलना और फिर दोनों से बराबर चलना, अभी तक मार्डन सायंस की दृष्टि से अव्याख्यायित है। फिर भी ऐसा होता है ही। दोनों से चलने की अवधि छोटी होती है। यहाँ मामला साधारणीकरण या मानवीकरण का नहीं है। मनुष्य में यह आवृत्ति और उसका समय व्यक्ति के भेद से भले ही भिन्न हो, प्रकृति में यह स्थिर है। संध्याकाल मध्यकाल है, उसके बाद ढ़ाई घंटे पर आवृत्ति बदलती है अर्थात् सवा घंटा बायाँ, सवा घंटा दायाँ दोंनो में से ढाई मिनट कम कर पाँच मिनट मध्य। प्रकृति के इस काल स्वभाव के अनुरूप मनुष्य यदि अपनी गतिविधियां संचालित करे तो वह प्रकृति के स्व-भाव के साथ उचित तालमेल बनाए हुए होेता है। इसका पहला और सीधा लाभ स्व (रूप) में स्थित होना और स्वास्थ्य की प्राप्ति है। यह अहर्निश दिनरात के बीच आवृत्ति करने वाली काल की प्रक्रिया है।
स्वर साधना, प्राणायाम, ध्यान, संध्या, गायत्री, सभी विधियाँ प्रकृति की श्वास प्रक्रिया के साथ अपनी श्वास क्रिया को समरूप बनाने की हैं। इसका लाभ स्वास्थ्य, शांति, सजगता एवं एकाग्रता का विकास है। इसमें गड़बड़ी हुई की बीमारियाँ पैदा होंगी क्योंकि शरीर की अनैक्षिक गतिविधियाँ अंतःस्रावी प्रणालियाँ प्रकृति की घड़ी से नियंत्रित हैं। विविध प्रकार की साधना की पूरी प्रक्रिया घड़ी मिलाने, ठोक-ठाककर, मरम्मत कर ठीक करने जैसी है। तरंगों की तुलना की जाती है। देश एवं काल के पैमाने मिले-जुले होने लगते हैं। सौरमंडल या ब्रह्माण्ड का संदर्भ लेते हीं समस्या खड़ी हो जाती है। आधुनिक जियोग्राफी में नक्शे केवल अक्षांश या देशांतर या लंबाई के मैट्रिक  पद्धति से नहीं समझे जा सकते। उसमें भी डिग्री, मिनट एवं सेकेण्ड की व्यवस्था की गई है। चौकोर नक्शे में गोल पृथ्वी को को कैसे ठीक से लपेटा जा सकता है।
काल की सापेक्षता के अन्य संदर्भ भी हैं। वय एवं आयु दो बातें हैं। वय के बाद जन्म से जिस दिन की गणना हो 10/20/50 साल हो सकता है। आयु जन्म से मृत्यु पर्यन्त की अवधि है। समझने की सुविधा के नाम पर हिन्दी में इस अंतर को मिटा दिया गया। इस अवधि में श्वास एवं हृदय की गति की संख्या स्थिर मानी जाती है। दीर्घ जीवन का आधार है धीमी हृदय गति, लंबी श्वास ताकि गिनती पूरी न हो। इसके पूर्व की मृत्यु अकाल मृत्यु है। मरने के बाद भी उतने समय तक वह जीव अंतरिक्ष में रहता है, यह विश्वास है।
भारतीय संस्कृति में कालचक्र की मापक घड़ियाँ मोटे तौर पर तीन स्तरों पर काम करती हैं -
    सूर्य घड़ी - सूर्य एवं पृथ्वी के सम्बन्ध पर आधारित
    निमिष-पल घड़़़ी - काल की छोटी ईकाई नापने के लिए
            (यह अनेक प्रकार की होती थी, पानी का बरतन इसका सबसे प्रचलित उदाहरण है)
     चेतना प्रवाह की घड़ी - योग एवं तंत्र शास्त्र में वर्णित स्वर शास्त्र।
भारतीय दृष्टि से इस प्रकार काल का स्वरूप गतिशील एवं सापेक्ष है। सूरज एवं चांद के डूबने-उगने से रात-दिन तथा पखवारे का ज्ञान होता है। गतिशील वस्तुओं के आपसी अंतर से काल का बोध होता है। तब भी काल स्थिर नहीं है। इसी प्रकार काल की अन्य इकाइयां बदलती रहती हैं। इस स्थिति में यह भी एक मौलिक प्रश्न है कि गतिशील काल एवं देश के पैमाने स्थिर ही क्यों रहें? ग्रीनविच टाइम को ही स्टैंडर्ड टाइम क्यों माना जाय?
इसी आधार पर काल की छोटी इकाई को भारत में क्षण कहा जाता है। यह संसार क्षणंभंगुर है। कहने का अर्थ है कि यहाँ सबकुछ क्षण-प्रतिक्षण बदल रहा है। सृष्टि, स्थिति, (अस्तित्व) एवं भंग (विनाश) सब साथ-साथ चल रहा है। इसी प्रकार देश (स्थान) का बोध भी सापेक्ष एवं इस ब्रह्माण्ड में निरंतर बदलते रहता है। पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ब्रह्माण्डीय सामग्रियों जैसे ग्रह, उपग्रह, तारे आदि भी पृथ्वी के मौसम तथा पर्यावरण को प्रभावित करते रहते हैं। पर्यावरण के विविध घटक जैसे पेड़-पौधे, चिड़ियों एवं अन्य जानवर इन सापेक्ष अंतरों को महसूस करते हैं। उनका ज्ञान अनुभवात्मक है। आधुनिक मनुष्य इसे कल्पना एवं विश्लेषण पर आधारित तर्क बुद्धि से ग्रहण करता है। मनुष्य में अनुभनात्मक ज्ञान एवं तार्किक ज्ञान दोनों की क्षमता है। भारत में दोनों प्रणालियों को महत्त्व दिया गया फिर भी अनुभवात्मक को अधिक। पाश्चात्य संस्कृति तर्क एवं यंत्र को अधिक महत्त्व ही नहीं देती अपितु वह अनुभवात्मक  ज्ञान को अप्रामाणिक बता कर यंत्र आधारित ज्ञान को अधिक महत्त्व देती है।
इसके पीछे के स्वार्थ एवं पेंच की कथा लंबी है। उनमें से एक चालाकी यह है कि समय का स्थिर मानक बनाया जाय। ग्रीनविच टाइम को स्टैंडर्ड टाइम बनाया गया। भारतीय स्थिति के अनुसार रात में जब सभी सोए रहते हैं तब दिन बदलता है। यह बदलाव आप बिना घड़ी के कैसे समझ सकते हैं? सूर्योदय के आधार पर जब दिन बदले तो उसे मनुष्य ही नहीं संपूर्ण प्राणिजगत अनुभव करता है। सूर्य का ताप, हवा का वेग एवं चिड़ियों की चहचहाहट की स्वतःस्फूर्त व्यवस्था सूर्योदय से है, न कि स्टैंडर्ड टाइम से।
भारतीय पंचांग में इसीलिए स्थानीय मान, कालमान, दिनमान निकालना, शुभ एवं अशुभ दोनों में जानना जरूरी होता है। यह समझना कि ब्राह्म मुहूर्त में उठना या सूर्याेदय से ढाई घड़ी पहले उठना या चौथे पहर के अंत में उठना एक अनुभव आधारित प्रक्रिया है, जिसमें हम प्रकृति एवं वातावरण से सहज जुड़ते हैं। ग्रीनबिच या स्टैंडर्ड टाइम को मानने वाले एवं हवाई यात्रा करने वाले को भी स्थानीय पर्यावरण एवं समय से बार-बार अनुभवात्मक संतुलन वाला संबंध स्थापित करना पड़ता है।
इस दशा में भी मार्डन सायंस के पक्षघर लोग हर बात पीछे स्टैंडर्ड, वैश्विक स्टैंडर्ड की वकालत ही नहीं करते जो ऐसा नहीं मानते उन्हें निरामूर्ख एवं अन साइंटिपिफक बताते हैं। मैं जान-बूझकर विज्ञान शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा हूं। विज्ञान भारत का पारंपरिक तकनीकी शब्द है। इसलिए सायंस ही सीधे-सीधे ठीक है। इसी प्रकार देश स्थान भी ब्रह्ममाण्ड में स्थिर नहीं है। इसकी भावना लोग अपनी अपनी सुविधा से करते रहे हैं।
इसी प्रकार की स्थिति भवन निर्माण, मूर्तिशास्त्र आदि में सर्वत्र है। मूर्ति शास्त्र में अंगुल प्रमाण है। सबकी ऊंगलियां तो बराबर होती नहीं पिर क्या मूर्तियां सुंदर नहीं हैं। भवनों की भव्यता को कौन नकार सकता है? दरअसल आनुपातिक अंतर से ही दवा, मूर्ति, भवन सबका संतुलन, सौंदर्य एवं सौष्ठव बना रहता है। शिर, मध्यभाग एवं निचले भाग में आनुपातिक अंतर जरूरी है? चाहे वह अंगुल में नापें या ईंच में। ऐसी ही स्थिति संगीत साधना, अनुष्ठान सभी जगह है। उनका अपना सांस्कृतिक महत्त्व है? मंडप का आकार अनुष्ठान करने वाले के आकार के अनुरूप होता है। विवाह का देहाती मंडप दुल्हन के हाथ के नाप से बनता है। यहाँ दुल्हन के साथ मंडप का गहरा संबंध है। भारतीय संस्कृति के अंदरूनी संदर्भों को समझे बिना उसे सही या गलत कह देना सही नहीं है उसमें भी मानकांे का विकेन्द्रीकरण यहाँ की विविधतापूर्ण संस्कृति का सहज रूप है। इसमें प्रामाणिकता था स्टैण्डर्ड की बात को क्यों अनिवार्य माना जाय?
अंग्रेजी हुकुमत में गया जिले की जमींदारों के अहंकारी प्रयोग के किस्से मजेदार थी। उन्होंने अपने को काल से ऊपर सिद्ध करने का हास्यास्पद प्रयास किया। सभी ने मनमाने ढ़ंग से सोने-जगने के समय को ही सूर्योदय-सूर्यास्त एवं संध्या काल घोषित किया।
काल की सांदर्भिकता एवं उसमें तालमेल बिठाने का संकट आज तक खत्म नहीं हुआ। भारतीय संस्कृति में यह संकट बहुत गहरा है। कुछ उलझनों की चर्चा की जा रही है।
प्रचलित रूप से कालबोध के निम्न आधार हैं -
सूर्य एवं पृथ्वी, चन्द्रमा, नक्षत्र, राशियाँ, दिन, बड़ी घटनाएँ, महापुरूषों के जीवन-मृत्यु, उपर्युक्त के बीच घटनेवाली घटनाएँ, जैसे - संक्रांति, ग्रहण आदि, गणना संबंधी उलझनों का विवरण, जैसे - विक्रम संवत् प्रणाली में अधिक मास (मलमास) की व्यवस्था, इनके संबंधों की अनेक छोटी-मोटी बातें जिस पर ज्योतिषी लोग अधिक ध्यान दे पाते हैं, आम आदमी नहीं, जैसे - करण, योग आदि।
राशि-नक्षत्र की चाल अलग है। सूर्य-चन्द्र तथा पृथ्वी आधारित पृथ्वी की निकटवर्ती व्यवस्था में इनकी अवधि के साथ पूरी संगति बन नहीं पाती इसलिए तिथि को घटना-बढ़ाना पड़ता है। साल के 365 दिन, महीने के 30 दिन 15 दिन के पखवारे और सप्ताह में पूरी तरह तालमेल बिठाना एक चुनौती है। इसलिये तिथियों तारीखों को घटाने- बढ़ाने से ले कर तीन साल बाद एक अधिक मास की व्यवस्था भी करनी पड़ती है।
सामाजिक मामलों की जटिलता अलग है। काल प्रवाह में आवृत्तियां तो हैं लेकिन ये सामानांतर हैं। कृष्ण का जन्म तिथि की दृष्टि से अलग, नक्षत्र की दृष्टि से अलग हो तो जन्माष्टमी मनाया कैसे जाय? किसी सम्प्रदाय ने तिथि को मुख्य माना तो उसकी जन्माष्टमी अलग। जिसने नक्षत्र को मुख्य माना उसकी जन्माष्टमी अलग। बिहार में जीभूतवाहन की जयंती जिउतियाके रूप में मनाई जाती है। आस-पास उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश में अष्टमी मनाई जाती है, जिउतिया की उचित तिथि के बारे में बहस चलती रहती है। यह क्षेत्रीयता के सिमटने से उत्पन्न भ्रम की समस्या है।
इसका सामाधान पहले निकाला गया था। धार्मिक विश्वास, विवाह, उत्तराधिकारी, संस्कार के प्रति दृष्टिकोण, जलवायु, मुख्य दार्शनिक विचार, प्रमुख ऋषि/आचार्य की दृष्टि से भारत को भौगोलिक स्तर पर बाँट कर सबके लिए अलग-अलग धर्मशास्त्र एवं पंचांग बनाए गये थे। उन पंचांगों में क्षेत्रीय पहचान एवं सामाजिक संरचना की स्पष्ट संगति दिखाई देती है। अ्रग्रेजी राज के सुधारवादी आंदोलन क्षेत्रीयता के घोर विरोधी रहे हैं। आर्य समाजी, ब्रह्मसमाजी, संधी, काँग्रेसी, साम्यवादी, सर्वोदयी सबका एक हाल है। समाजवादियों में लोहिया एवं नरेन्द्र देव अपवाद हैं । बाकी का हाल लगभग वहीहै। इस्लाम एवं ईशाई मत चूँकि क्षेत्रीयता का विरोधी है अतः इनके अनुकरण के आधार पर यहाँ भी विरोध की नकल की गई।
अभी भी उड़ीसा, बंगाल, मिथिला, काशी, पंजाब, उत्तरांचल, कूमायूँ, कश्मीर, राजस्थान, गुजरात, सौराष्ट्र, विदर्भ, कोकण, तेलंग (आंध्र) तमिल क्षेत्रों के अपने पंचांग प्रकाशित होते हैं। हिमाचल, आसाम, मणिपुर आदि के बारे में मैं नहीं कह सकता। ज्योतिष का मुख्य क्षेत्र मगध आज पंचांगहीन है। काशी, मालवा, उत्तर प्रदेश पर काशी पंचांग हावी है। महामना मदन मोहन मालवीय जी ने एक समन्वयवादी पंचांग निकालना शुरू किया। वह काफी हद तक क्षेत्रीय प्रभाव से मुक्त है। परिणामतः कम लोकप्रिय है। बिहार में एक गुमनाम ज्योतिषी थे। चुटकलानंद की चिट्ठी तो लिखते ही थे बिहार सरकार, मिथिला वि0वि एवं सर्वोदय डायरी का पंचांग बनाते थे।
क्षेत्रीय पंचांग में स्थानीय विश्वास, महापुरुष, एवं मान्यताओं की संगति रहती थी। मगध में गुरू यानी बृहस्पति के समान सिद्ध गुरूपाद का महत्व है इसलिए बृहस्पति के उदय की अनिवार्यता शादी विवाह में नहीं है। वैसे भी मगध असुर संस्कृति का क्षेत्र है। मगध, झारखण्ड, उड़ीसा में मकर संक्रांति से वर्ष का आरंभ होता है। क्षेत्रीयता के ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगें। गया एवं गोदावरी क्षेत्र की यात्रा पर यात्रा काल का नियम नहीं लागू होता। पितृपक्ष के निषिद्ध काल में यात्रा की ही जाती है। तीर्थ व्यवस्था से क्षेत्रीयता के अंतरों के बीच भी संबंध दृढ़ होते रहे हैं और परस्पर सम्मान की भावना प्रबल होती रही है।
उपर्युक्त के अतिरिक्त दार्शनिकों, सौदर्यशास्त्रियों, साहित्य समीक्षकों (अलंकार शास्त्रीयों) कवियों ने भी काल एवं उसके बारे में स्वतंत्र रूप से सोचा है। तार्किक दृष्टि से विचार करें तो किसी भी बोध के लिए गति के तीन सूक्ष्म विभाग मानने पडं़ेगे। इन्हें क्षण कहा गया। उत्पत्ति क्षण, स्थिति क्षण एवं भंग क्षण। क्षणभंगवाद प्रसिद्ध बौद्ध मत है। वैदिक दृष्टि से संसार सरकने वाला है। वह ठीक से सरकता रहता है। परिवर्तन भी हेाता रहता है और पुरानी पहचान भी धीरे-धीरे बदलती है। यह बहस अत्यंत गंभीर और जटिल है। संसार की क्षणभंगुरता कहने का एक निश्चित अर्थ तो होना ही चाहिए।
इसी प्रकार की चिंता नया-पुराना को लेकर है। नये में सौदर्य हैं। सौंदर्यप्रिय लोगों को नवीनता आकृष्ट करती है। व्यवस्था एवं आधार के लिए दीर्घजीविता एवं प्राचीनता का महत्त्व है। इस विरोध की संगति इस प्रकार बनाई गई - सौंदर्य की आवृत्ति प्राचीन होने पर भी प्रत्येक उषा नवीन है। ‘‘दिने दिने यन्नवतामुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः’’ महाकवि जगन्नाथ ने माना कि जो रोजबरोज नवीनता लिए हुए हो, वही रमणीय है। महाकवि कालिदास ने बीच का रास्ता निकाला - पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम्संतः परीक्षान्यतरद्भजन्ते मूढ़ः परप्रत्ययनेयबुद्धिः। नवीनता की आवृत्ति और आवृत्ति की नवीनता दोनो ही समाज में स्वीकृत है। आज फैशन इसका सहज उदाहरण है। कुछ दिनों के अंतराल पर फैशन में पुरानी शैली नई बनकर लौटती रहती है।
भारतीय काल बोध -
मानव मन पर कालबोध का गहरा प्रभाव पड़ता है। अतः समझदार लोग जो दुनिया को अपने मन से गुपचुप चलाना चाहते हैं वे कालबोध को प्रभावित करने का प्रयास अवश्य करते हैं।
इस जानबूझकर की गई दाव-पेंच के समानांतर नैसर्गिक कालबोध संस्कृतियों की बुनियादी पहचान है। प्राचीन भारतीय संस्कृति का कालबोध चक्रीय है। समय वापस आयेगा, आता है, लाया जाता है। वापस लाये बिना और काल के चक्रीय प्रवाह से उपर उठे बिना जीवन अधूरा है। मनुष्य का जीवन देश एवं काल के सापेक्ष तो है पर लक्ष्य है - उससे ऊपर जाने अर्थात् काल के प्रवाह से अलग होने की विधि जान लेना। समग्र ध्यान साधना का यही अर्थ है। ईशाई, इस्लाम एवं चार्वाक मत में काल रेखीय है। जीवन के आरंभ से स्वर्ग नरक की यात्रा तक। इसीलिए उनके यहाँ पुर्नजन्म संभव नहीं है। पूर्वजन्म पुनर्जन्म तो वैदिक, बौद्ध, जैन, सांख्य, शैव, शाक्त आदि ही मान सकते हैं। इसीलिए भारतीय संस्कृति में सुख-दुःख, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, कुशल-अकुशल जैसी व्यवस्था ही नहीं कर्म-फल का सिद्धान्त भी कई जन्मोवाली प्रणाली में संगत हो पता है। आज के मनुष्य का चिंतन रेखीय काल प्रवाह वाला है अतः उसे समग्र भारतीय संस्कृति गलत लगेगी ही। दुराचारी की सफलता-विफलता पर समाज का न्यायबोध टिका है। भारतीय दृष्टि से दुराचारी को दंड अगले जन्म में भी मिल सकता है। इसी जीवन में मिलना जरूरी नहीं है। पाप पुण्य की यह व्यवस्था स्वर्ग नरक से थोड़ी भिन्न है।
जन्मांतर ही नहीं इस जन्म संबंधी कालबोध भी भिन्न प्रकार के हैं। एक जन्मवाले कालबोध का महत्व कितना गंभीर है कि कालबोध के आधार पर जीवों (मृत एवं जीवित का वर्गीकरण किया जाता है।) कालबोध से जीव की मनोदशा का पता चलता है। जिस मनुष्य का मन जितनी अधिक देर तक एकाग्र रह सके वह उतना ही बडे मनोबल वाला है। सबसे कम समय तक एकाग्रता प्रेत की होती है। लगभग यही हाल उस व्यक्ति का होता है, जिसके किसी परम आत्मीय की मृत्यु हुई हो और उसने अपने उस मृत का अंतिम संस्कार किया हो। अतः देशी एवं तांत्रिक परम्परा के श्राद्ध के अनुष्ठान में मृत एवं जीवित के काल बोध को ठीक करने की कोशिश/उपाय किये जाते हैं ताकि काल के क्रम में बँधी स्मृतियाँ ठीक हो सकें क्योंकि यदि स्मृति भ्रंश हुआ तो सब गड़बड हो जा सकता है। काल का बोध रूपी होने के कारण स्मृतियों का बहुत महत्व है। काल की विपरीत गति का अर्थ ही है बोध रूपी स्मृतियों के भंडार में झांकना। यह कार्य घ्यान के द्वारा संभव होता है। इसी लिये अनेक जन्मों की जानकारी के लिये एक या अनेक बार मरने की कोई अनिवार्यता नहीं है। जन्म-मृत्यु भी बोध के रूप में मानव मन में संचित है ही। स्वयं जब तक अनेक जन्मों की जानकारी नहीं हो जाती तब तक न तो भले बुरे कर्मों की कार्यप्रणाली के प्रति विश्वास होगा न ही यह निश्चय हो सकेगा कि बार-बार जीने-मरने के काम में लगा रहा जाय या इससे बाहर निकल लिया जाय। स्मृतियों की उलटी यात्रा के सहारे अनेक अन्य सामयिक बातों की भी सही जानकारी होती है। चूंकि दुखद बातें याद करना आदमी नहीं चाहता अतः घ्यानविधियों से बहुत डरता है। उसने पूजा पाठ साधना को इसी कारण से स्मृति की जगह विस्मृति की विधियों के रूप में परिवर्तित कर लिया है। ऐसे कथावाचक एवं धर्माचार्य अधिक लोकप्रिय होते हैं जो दुखद पक्षेां से मनुष्य का घ्यान हटा सकें।
काल विराटतम है। काल के विराटतम से सूक्ष्मतम रूप की ओर मन को ले जाने से मन की अव्यवस्था कम होती है। अतः भारतीय संस्कृति में नियम बना कि काल के विराटतम रूप से सूक्ष्मतम रूप को याद करने की प्रक्रिया द्वारा पहले होश में आया जाय। मन, शांत, सजग एवं स्मृतिवान हो जाय तभी कोई भी संकल्प किया जाय। पता नहीं जिस कार्य का संकल्प किया जा रहा है, उसकी कोई सार्थकता भी है या नहीं इस प्रकार कालस्मरण को हर उपासना, अनुष्ठान, संस्कार, उत्सव एवं संकल्प का अनिवार्य घटक बना दिया गया। हर काम को होश में करने से अच्छी बात क्या हो सकती है। यह काल स्मरण नैसर्गिक कालबोध के अनुसार किया जाता है। सामान्य शुभ कार्यों के लिए शुभ कालखण्डों एवं मुक्ति के लिए शुभ एवं अशुभ दोनांे काल खंडों का स्मरण किया जाता है। उत्तर भारत में राजा विक्रमादित्य सर्वाधिक लोकप्रिय राजा है। अतः संकल्प में वर्तमान संवत्सर गणना में विक्रम संवत्सर का महत्व है। फिर भी शक संवत्सर का भी स्मरण किया जाता है।
काल स्मरण के इस भारतीय महत्व को भारत के राजा महाराजा न समझें यह कैसे हो सकता है। अतः अन्य राजाओं ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्र में अपना-अपना संवत्सर चलाया। यह संवत्सर उस राजा के राज्याधिरोहण वाले वर्ष से आरंभ होता है। शालिवाहन राजाओं एवं शकों का आपसी रिस्ता आधुनिक इतिहास की दृष्टि से चाहे जो हो शक शंवत्सर एवं शालिवाहन संवत्सर को एक माना जाता है। एक वर्ष को संवत्सर कहा जाता है। संक्षेप में संवत् भी कहा जाता है। इस समय नवंबर 2008 ई.सं. के समय विक्रम संवत् 2065, शक 1930 वंगीय 1414, हिजरी 1429 चल रहा है। नैसर्गिक संवत्सर गणना की दृष्टि से इस संवत्सर का नाम प्लव है।
भारत विविधताओं का देश है अतः विविधताएँ काल बोध में भी हैं। दक्षिणी बिहार उड़ीसा का कालबोध लगभग एक है। उत्तरी बिहार, झारखण्ड, छतीसगढ़ एक। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश का अलग। ऐसे ही अन्य क्षेत्रों का।
सूर्य से ऊर्जा ग्रहण करने एवं संचित ऊर्जा से सृष्टि की दृष्टि से काल के दो भाग हैं – आदान= ऊर्जा संचय काल) विसर्ग काल= वि मतलब विशेष, सर्ग मतलब रचना का काल । खेती एवं चिकित्सा के लिए यही काल बोध का बड़ा पैमाना है। ऋतु एवं नक्षत्र इसके भीतर के भाग हैं। ऋतु का महत्व मोटी एवं स्पष्ट बातों के लिए है। महीने एवं पक्ष चन्द्रमा के अनुसार चलते हैं। इसके महत्व को स्वीकार करने पर भी खेती, विवाह-शादी आदि सूर्य एवं नक्षत्रों की स्थिति के अनुसार चलते हैं। किसान की समझ के स्तर पर वर्षा, फसलों के रोग, पुष्टि सब नक्षत्रों पर आधारित हैं। उसके बाद सबसे महत्व दिन का है। ये महत्व सांदर्भिक हैं। किसी काम के लिए चन्द्रमा, किसी के लिए सूर्य एवं किसी के लिए अन्य का महत्व है। मकर संक्रांति भारत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण नैसर्गिक कालबिन्दु है, जहाँ से आम आदमी की वर्ष गणना शुरू होती है। होली, दशहरा आदि राजकीय व्यवस्थाएँ एवं तिथियाँ हैं। आज भी मुख्य निर्णय नैसर्गिक काल गणना पर अधारित होते हैं। इसी तरह अन्य तिथियों का महत्व है। वर्षा ऋतु के चार महीने  के सृष्टिकर्ता के हैं। पालनकर्ता एवं राजा को उस समय सोना पडे़गा। उत्सव मौजमस्ती बाद में होगी फसल आने पर। अतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी हरिशयनी एकादशी को विष्णु सोने चले जाते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी देवोत्थानी को जागते हैं। इस अवधि में व्रत, उपवास, अनुष्ठान होगें किंतु बड़े उत्सव से बचा जायेगा। राजाओं एवं संप्रदायों के धार्मिक वर्चस्व ने इस नियम को काफी तोड़ा भी है। खासकर प्राचीन एवं नवीन दोनो हीं नागर सभ्यताओं ने इसे स्वीकार नहीं किया और दीवाली, दशहरा आदि को व्रत से उत्सव बना दिया। ब्रह्मा काल के अधीन हैं, यह सृष्टिकाल के अधीन है, विष्णु भी काल की व्यवस्था को मानते हैं। शिव महाकाल या कालातीत है। वे संहार करनेवाले हैं। संहार का अर्थ केवल विनाश नहीं होता। संहार अर्थात् समेटना। समेटने में कल की व्यवस्था नहीं भी मानी जा सकती है।
पहले धार्मिक अनुष्ठानों में नैसर्गिक काल एवं उसके पड़ाव तथा काल माप की इकाइयों का बहुत अधिक महत्व था। यूरोपीय प्रभाव बढ़ने से एवं आधुनिक सायंस पर यूरोपीय एवं ईशाई मत का वर्चस्व होने से लोगों को लगता है कि ईशवी संवत् की गणना ही सबसे प्रामाणिक है। शक् संवत्सर की तिथि गणना की प्रामाणिकता अपने आप में भारतीय दृष्टि से अद्वितीय है। इसका बुरा असर यह हुआ कि ईशाई मत  का साइंटिस्टों से खूब झगड़ा होता रहा। संस्कृति के क्षेत्र में भी यूरोपीय सरकारों को लगता रहा कि ईशाई संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करना जरूरी है ताकि हम सिद्ध कर सकें कि औपनिवेशिक सरकारें अज्ञानी, जंगली एवं पिछड़े लोगों को सभ्य बनाने का काम कर रही हैं। मैक्समूलर एवं विंटरनिट्ज ने सबसे घिनौने ढ़ंग से यह काम षडयंत्र पूर्वक किया। ब्रिटेन के National Archive से अब दस्तावेज उपलब्ध हैं और षडयंत्र की बात प्रगट हो चुकी है। आधुनिक भूगर्भ शास्त्र की मजबूरी है कि वह अरबों खरबों वर्ष का हिसाब रखे। उसमें हजार दो हजार साल के पैमाने का क्या महत्व ? लेकिन आधुनिक इतिहासकार इस उलझन से नहीं बच पा रहे क्योंकि उनकी दृष्टि यूरोपीय है, चाहे वे दक्षिणपंथी हों या वामपंथी। दक्षिण पंथियों की पीड़ा है कि शक् संवत्सर राष्ट्रीय संवत्सर क्यों है ? राजा शालिवाहन एवं जीभूतवाहन की कल्याणकारी दृष्टि एवं प्रयास जानने की फुरसत कहाँ और किसे है ? राजा बलि, गयासुर, बाणासुर आदि ने कोई गलत काम नहीं किया, फिर भी षडयंत्रपूर्वक इन्हें बरबाद किया गया।  हिटलर के भारतीय अनुयायियों के लिए भारतीय संस्कृति की विविधता को पचाना कठिन है। यही हाल बामपंथियों का है। उनके लिए भी हर समस्या का सामाधान यूरोप में है तो A.D. या B.C. से अलग सोचने की जरूरत क्या है़, उनकी दृष्टि में में भी सारी अच्छी चीजों का आरंभ तो मार्क्स के बाद ही संभव है। प्रो0 यशपाल हों या अन्य उन्हें यह बुरा नहीं लगता कि आर्यभट्ट, वराहमिहिर आदि के समय को भूगोल भूगर्भ शास्त्र के Black History वाले खंड में रखकर पढ़ाई हेाती है और भारतीय विद्वानों का पक्ष न रखकर यूरोप के पागलपंथी कथाओं का गौरव गाया जाता है।
वराहमिहिर जैसा लोकोपयोगी विद्याओं का संग्रहकर्ता और उदार मन वाला मिलना कठिन है। उन्होंने यवनों को भी जो आचार्य हैं, उन्हें ऋषियों की तरह पूज्य माना है। यूरोप से भी सीखने में कोई बुराई नहीं है। हां, राजनीति एवं अर्थ के प्रपंच को तो समझना ही पड़ेगा। किसी के भी पक्ष में आंख मूंद लेना या गुटबंदी करना ज्ञान का परिचायक नहीं हो सकता। गांधी चतुर एवं नेहरू यूरापीय दृष्टि वाले हैं। उनकी पुस्तक भारत एक खोज में यह स्पष्ट है। काल की इस राजनीति के विरुद्ध भारत में सर्वप्रथम जोरदार से ढंग से विरोध करने वालों में तिलक प्रमुख विद्वान रहे हैं। विदेशी और आधुनिक शिक्षा संपन्न लोगों में प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला हरदयाल ने काल गणना के पेंच वाले मुद्दे पर अपनी विख्यात पुस्तक  Hints for Self Culture में विस्तार से लिखा है। काल के बोधरूपी होने की बात को अपनी नई बात सिद्ध करने वालों में इधर नागपाल चर्चित व्यक्ति हैं। Sir John Woodruff alias Arthur Avalon विदेशी विद्वानों में सबसे सुलझे हुए आदमी रहे हैं। हाल-फिलहाल काल के मुद्दे पर की गई सुनियोजित करनेवाली चालाकियों का विवरण ब्रिटेन के National Archive से निकाल कर आदरणीय धर्मपाल जी ने अपनी पुस्तकों में छापा है।

बुधवार, 11 अप्रैल 2012

आम आदमी का दर्शन


आम आदमी का दर्शन 1
दर्शन एक क्रिया है जिसे मनुष्य जगे रहने पर प्रायः करता रहता है। आँख भी दो तरह की मानी गई - भीतरी और बाहरी। चलन और प्रधानता के कारण दर्शन से होने वाला ज्ञान अन्य ज्ञानों पर हावी होता चला गया। आँखवाला सुननेवाले, अनुभव करनेवाले, चलनेवाले एवं काम करनेवाले से श्रेष्ठ होता चला गया। आदमी बेवकूफी की ओर बढ़ गया।
आँख की तुलना में अन्य चार इन्द्रियों की उपेक्षा हो गई। फिर अर्थ और सिकुड़े, दर्शन का अर्थ बदलता गया। बारीकी से देखना, विपश्यना, प्रेक्षा, अंतर्दर्शन आदि मन से किए जानेवाले कार्य एवं अनुभव दर्शन शब्द के अर्थ होते गए।
आँख खोल कर देखने की अपनी जो भी सीमा हो आम आदमी उसे झुठलाता नकारता नहीं है। आम आदमी ज्ञान एवं अनुभव के अन्य स्रोतों के साथ उसका सामंजस्य बनाने का प्रयास करता है। यह आम आदमी का दर्शन है।
मनुष्य मात्र का अध्ययन करनेवाले नए शास्त्र को Anthropology /मानवविज्ञान/नृ-शास्त्र नाम से जाना जाता है। यह शास्त्र सायंस माना जाता है। मानवशास्त्र यह स्वीकार करता है कि हर समुदाय की अपनी Cosmology होती है। वह संपूर्ण अस्तित्व को अपनी समझ के अनुसार वर्गीकृत तथा व्याख्यायित करता रहता है। समाज में नए-पुराने का समावेश एवं लोप चलता रहता है और उसे स्वीकारने-हटाने को वह समुदाय अपनी दृष्टि से युक्तिसंगत ठहराता है। इस सहज प्रक्रिया को देखने से स्पष्ट है कि आम आदमी दर्शन का सृष्टिकर्ता, अनुभवी एवं परिष्कारक भी है।
भारत का आम आदमी अजीब हालात में रहता रहा है। उसे सदैव विविधता एवं विरोधों के बीच संगति बनानी पड़ती है। परिणामतः भारतीय आम आदमी का दर्शन क्षेत्रीय दृष्टि, संगति एवं समन्वय की विधि से विकसित दर्शन है। व्यक्ति, विचार एवं व्यवस्था ( धार्मिक/अर्थिक ) का आदान-प्रदान पूरे भारत में होता रहा है। कभी कष्मीर , कभी मगध , कभी नैमिषारण्य , कभी सौराष्ट्र और कभी नवद्वीप या तेलंगाना आदि में विकसित व्यवस्थाएँ सुदूर क्षेत्रों को प्रभावित करती रही हैं। बाद में बाहर से आए इस्लाम एवं ईसाइयत के साथ सामंजस्य की प्रक्रिया आज भी जारी है। मैंने मगध की सांस्कृतिक विरासतनामक पुस्तक में इनके कुछ नमूने संकलित किये हैं।
खेती करनेवाले किसान को जैन दर्शन अनुकूल नहीं पड़ता। कीट-पतंग खेती में मरेंगे ही। उनकी हिंसा होगी ही। अहिंसा का महत्त्व भी है ही। जैन एवं वैदिक विद्वान अपनी श्रेष्ठता के लिए लड़ते रहे। आम आदमी ने तय किया कि श्रेष्ठ तो अहिंसा ही रहेगी। बिना जुताई वाली नैसर्गिक फसल को किसी एक दिन के लिए अधिक पवित्र मान लेते हैं या इसी तरह का कोई दूसरा उपाय भी कर लेते हैं फिर भी किसान के द्वारा खेती में हुई हिंसा भौतिक हिंसा भले ही हो मानसिक हिंसा नहीं है क्योंकि खेती में उत्पादन उद्देश्य है, हिंसा नहीं। अनजाने हुए पाप की भरपाई दान-व्रत आदि से अर्जित पुण्य के द्वारा हो जाएगी। यही आम आदमी का दर्शन है। वह विशिष्ट वैष्य समाज की तरह यह ढांेग नहीं करना चाहता कि वाणिज्य-व्यवसाय अहिंसक आजीविका या आय का स्रोत है और खेती हिंसक है।
सारे दर्शन विद्या की बात करते हैं और झगड़ते भी रहते हैं। क्या विद्वान होने के लिए झगड़ालु होना जरूरी है ? भारत के आम आदमी ने इसे समझा और जो लोग तत्त्वज्ञान की बारीकियों का झगड़ा छोड़ सबके भले की बात सोचें उन्हीं को आम आदमी के बीच प्रतिष्ठा मिली। बुद्ध ने ऐसे प्रश्नों को टाल दिया। अपने को कृषक एवं वैद्य घोषित किया तब जाकर उन्हें स्वीकृति मिली।
कुछ दिनों बाद त्रिपिटकों में बुद्धोपदेश संहिताबद्ध हो गया। ऊपर से क्षत्रियों की जन्म से ही श्रेष्ठता की मान्यता और उसमें भी शाक्यवंशियों का वर्चस्व बढ़ने लगा। आम आदमी ने समझ लिया कि झगड़ा शुरू हो गया। मगध में बुद्ध की ऐतिहासिकता के विरूद्ध महायान शुरू हुआ। सभी को अपना-अपना बुद्ध मानने की सुविधा मिल गई। संकीर्णता वाले बुद्ध को केवल मुनि का दर्जा देकर पदावनत कर दिया गया। वे शाक्यमुनि बनकर सीमित हो गए।
यह संसार ही भगवान हैइस मत से आम आदमी सुविधा महसूस करता है। कोई भी वह चाहे विशिष्ट व्यक्ति या शक्तिसंपन्न कुछ भी हो, चाहे वह जड़ हो, या चेतन देवता भी हो सकता है। इस महायान मत में अपना-अपना देवता गढ़ने की सुविधा है। उस देवता का स्वरूप, आकार जो चाहें जैसे रखें।
इस संसार को भगवान ने बनाया हैइस मत के साथ भी काम चल जाता है। इस मत को मानने पर भगवान तो गढ़ नहीं सकते तो इस्लाम मानने के बाद की तरह जिन्न-जिन्नात, पीर फकीर, दरवेश, चुडै़ल से काम चला लिया जाता है। मंदिर/मस्जिद पर आफत आये तो भगवान निराकार, मौका मिला तो साकार। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद गया में तबलीगी मत का बहुत बड़ा समागम हुआ। सारी आशंकाओं के बाद भी कोई गड़बड़ी नहीं हुई। मौलाना साहब से अखबारवालों ने पूछा कि बाबरी मस्जिद टूटने पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है? मौलाना साहब ने कहा - खुदा की मर्जी से जब तक था तब तक था। उसकी मर्जी नहीं रही सो टूट गया या तोड़ दिया गया। इसमें मुसलमानों को करना क्या है ? खुदा का घर, खुदा जानें।
भारत का आम आदमी सुखवादी है। मगध के दलित समाज में जीउतियाएक महत्त्वपूर्ण उत्सव है। यह दुःख का पर्व है लेकिन दुख कितने दिन याद रहे। जीउतिया उत्सव हो गया। मुहर्रम भले ही उदासी का त्योहार हो, ताजिया का उत्साह देखते ही बनता है। क्या हिंदू क्या मुसलमान है तो हिंदुस्तानी दिल वाला।
ये कुछ नमूने हैं कि आद आदमी कैसे सोचता और व्यवहार करता है।

भारत में दर्शन की तीन मुख्य चिंताएँ हैं-
क-औचित्य एवं संगति।
ख-संसार का तात्त्विक एवं सूक्ष्मरूप, सृष्टि से प्रलय तक।
ग-मन एवं सृष्टि की कार्य प्रणाली का ज्ञान।
उपर्युक्त तीनों चिंताएं केवल विद्वानों, साधकों या धर्माचार्यों की चिंता क्षेत्र के ही अंतर्गत नहीं आतीं। आम आदमी भी हर बार संवाद तथा प्रयोग के माध्यम से उनकी परीक्षा कर संशोधनों के साथ पुष्टि करता है या उन्हें अस्वीकार कर देता है।
वर्तमान के व्यवहार एवं कार्यक्रमों का अतीत तथा भविष्य से संगति मिलाना जरूरी होता है। यह दर्शन का ही क्षेत्र है। इस उद्देश्य से आम आदमी विविध मतों को आंशिक रूप से स्वीकार करता है यही विशिष्ट से उसका अंतर है। इसीलिए किसी एक संप्रदाय के मठ या राजनैतिक पार्टी में दूसरे मत का समावेश हो न हो किसी परिवार गांव या मुहल्ले में विविध मतों के लोग पर्याप्त मात्रा में मिल जा सकते हैं। भूमि , पशु , जल , वृक्ष-वनस्पति , अपने , पराए , जीवन , मृत्यु , मृत्यु के बाद , जन्म के पूर्व , ये सभी बातें आम आदमी की चिंता एवं चिंतन के विषय हैं।
तत्त्वज्ञान के बारे में आम आदमी अपनी भूल सुधारता है और फंसता भी है। घर का जोगी जोगड़ा अन्य गांव का सिद्ध। एक नीचे वाली दुनिया है और दूसरी इसके ऊपर, ऊपर वाला है। यह आम आदमी का वर्गीकरण है। इस वर्गीकरण के अतिरिक्त अन्य वर्गीकरण विशिष्ट लोगों के हैं, आम आदमी का नहीं। बाकी वर्गीकरण इन्हीं दो के अवांतर विभाग हैं, तो जो भी हों, हुआ करें।
तत्त्वचिंतन की दृष्टि से स्व-भाव और पर-भाव पर आम आदमी से चर्चा करते-करते थक जाएंगे फिर भी चर्चा पूरी नहीं होगी क्योंकि हरि अनंत हरि कथा अनंता।
भारत में मन की कार्य प्रणाली भी आम आदमी की चिंता/चिंतन का विषय है। वह इन मामलों में पूरी रुचि लेता है। उदाहरण के लिए किसी का मन अकारण बेचैन होता है तो वह सोचता है मेरा कोई स्मरण कर रहा है। मानो तो देवता नहीं तो पत्थर, जाकी रही भावना जैसी हरि मूरत देखी तिन तैसी , मन माने का मेला नहीं तो सबसे भला अकेला , जाके पाँव न फटे बिवाई सो का जाने पीर पराई , हमारे हरि हारिल की लकड़ी , डुमरी के फूल , पढ़ पूत चन्द्रिका जा में चढ़े हंडिका , आपन हारल, मेहरी के मारल आदि अनेक वाक्य एवं वाक्यांश आम आदमी के दर्शन एवं चिंतन को सूत्र रूप में व्यक्त करते हैं।
मनुष्य के पास ज्ञान के जो साधन हैं उनमें दृष्टि का बहुत महत्त्व है। हिन्दुस्तान में शब्दों का मायाजाल दूसरों को फंसाने के लिए बनाया जाता है। अगर आपके पास दृष्टि न हो तो क्या होगा ? मायावी व्यक्ति के शब्द जाल में आप फंस जाएंगे। जो बंधन में बंधा, जो फंसा उसका जीवन पशु के समान होता है। उसकी गरदन, कमर या नांक में रस्सी फंसा दी जाएगी। उसका उपयोग किया जायेगा या फिर भेंड बकरे की तरह रोंए, खाल से लेकर मांस तक सबका उपयोग विशेष व्यवसाय की दृष्टिवाला मनुष्य कर लेगा। इसलिए पाश/फाँस को जो व्यक्ति जाने वही ज्ञानी, देखनेवाला दªष्टा है और जो इससे निकल गया या फाँस को तोड़ डाला वह साधक या सिद्ध।
आप भी जानते होंगे और आपके इलाके में कोई न कोई कहावत होगी कि चिकनी-चुपड़ी बातें करनेवाला और बातों में घुमानेवाला मनुष्य खतरनाक/धोखेबाज होता है। अतः आँखें खुली रखिए।
दृष्टि, दर्शन इन शब्दों का प्रयोग देखने की क्रिया एवं देखने के मूल साधन आँख दोनों के लिए होता है। ज्ञानार्जन में दृष्टि के महत्त्व के कारण संपूर्ण ज्ञानार्जन प्रक्रिया को ही दर्शन कहा गया। भारत में ज्ञान एवं दर्शन की बातें करने का अधिकार सबको रहा है। हर व्यक्ति के भीतर ज्ञानार्जन की अनंत संभावनाएँ मानी गई हैं। ज्ञान जो अनंत है उसकी उपलब्धि आँख, कान, नाक, चमड़ी सभी से हो रही है फिर भी देखने एवं सुनने में सर्वाधिक ऊर्जा लगती है और इसलिए इन दोनों का महत्त्व है। देखना भी दो तरह का हो सकता है-
(क)- वह देखना जो दिखाई दे रहा हो और
(ख)- अपनी या किसी दूसरी की पसंद से देखना।
आम आदमी को आँख खोलने पर प्रकृति के नजारे दिखाई पड़ते हैं। सूरज , चाँद , तारे , धरती , आसमान , मरना-जीना , बीमारी , नदियाँ , पहाड़ , समुद्र , बडे-छोटे पौधे , जानवर , तितली , बाढ़ , महामारी और पता नहीं ऐसी कितनी चीजें उसे दिखाई पड़ जाती हैं। यह सब उसके चारो ओर होते है। चूँकि दिल-दिमाग उसके पास है तो वह बहुत कुछ जान लेता है और अपनी जरूरत तथा पसंद के आधार पर बहुत कुछ मान भी लेता है। यह जानने-मानने की प्रक्रिया सतत् चलती रहती है। यह ज्ञान ही आम आदमी का दर्शन है। इसी के बल पर उसकी जिंदगी चलती है। आम आदमी के दर्शन का कोई पूर्व निर्धारित लक्ष्य या दिशा नहीं होती। ऐसा होते ही वह आदमी आम से खाश हो जाता है। इसलिए आम आदमी का दर्शन व्यापक एवं अनंत संभावनाओं वाला होता है। इस विपुलता एवं संपन्नता से खाश आदमी को बहुत जलन होती है।
सामान्य मनुष्य विशिष्ट मनुष्य
साधारणतः सभी आदमी साधारण आदमी ही होते हैं। उनकी जिंदगी की हालातें भी साधारण होती हैं किंतु लगभग हर आदमी में विशिष्ट बनने की पैदाइशी दिली बीमारी रहती है, जो बड़ा होने के साथ बढ़ती जाती है। यह बीमारी अगर आम आदमी की बुनियादी बातों की सीमा में रहती है तो निबाह हो जाता है लेकिन जब यह बहुत अधिक बढ़ने लगती है तो वह बीमार आदमी अपने एवं दूसरे दोनों के लिए बहुत घातक हो जाती है । कभी-कभी किसी देश या काल-खंड में यह बीमारी संक्रामक रोग की तरह विकसित हो जाती है तब यह महामारी की तरह भयानक विनाश करती है। इससे युद्ध जैसी घटनाएँ तो होती ही हैं जो प्रगट दिखाई देती हैं। कभी-कभी लोगों को यह घुन की तरह पीढ़ी दर पीढ़ी भीतर ही भीतर खाने लगती है।
आम आदमी भर पेट खाता है। जैसा पेट, वैसा भोजन। हमारे इलाके के लाला लोग (कायस्थ, जमींदार) भर पेट केवल माँस-मछली खाते थे। दारू पीते कम थे, उसमें स्नान अधिक करते थे लेकिन जहाँ तक रोटी की बात है विशिष्ट आदमी होने के नाते उनका आदर्श था ‘‘एक रोटी बस, लाला हैं कि पस ’’, पस माने पशु। लालाजी की नजर में भर पेट रोटी तो जानवर खाता है।
आम आदमी ठहाका लगाकर हँसता है , रोता है , गाता है , चीखता- चिल्लाता गाली देता है , मारपीट करता है और फिर उसी से दोस्ती भी कर लेता है। विशिष्ट आदमी चैता, होली की मंडली में गाने, नाचने में बेइज्ज्ती महसूस करता है। वह बाई जी का गाना सुनता है, नाचता नहीं, नचाता है।
आम आदमी दोनों आँखों से गरदन घुमाकर चारो तरफ देखता है। एक तरफ देखने से वह आश्वस्त नहीं हो पाता। खास आदमी एक आँख मूँदकर दूरबीन से तारे देखता रहता है और उसे पड़ोसी का घर दिखाई नहीं देता, न बीमार बूढ़ा बाप, न खूबसूरत हसीना। उसे अपनी आँख से अधिक दूरबीन पर भरोसा होता है और पड़ोस का बच्चा दूरबीन से देखने पर दिखाई ही नहीं देता तो दूरबीन वाला पहाड़ पर चढ़कर बच्चे को देखता है। ऐसे अनेक मामले हो सकते हैं।
आजकल संपत्ति को लेकर चिंताएँ अधिक हैं। इसी कारण संपत्ति के दर्शन बनाए जा रहे हैं। आम आदमी आसानी से देखता महसूस करता है कि जो व्यक्ति घूम-घूमकर दूर की संपत्ति देख पाता है उसकी लालच उतनी ही बड़ी होती है। आम आदमी को बचपन में चाँद की परछाईं पकड़ने की इच्छा होती थी किंतु वह अपने अनुभव से जान जाता था कि यह तो बचकानापन है। विशिष्ट आदमी चाँद पर कॉलोनी बसाना चाहता है। इसके लिए बड़ी मशीन चाहिए और बड़ी मशीन के लिए बहुत इंधन चाहिए क्योंकि मशीन बहुत अधिक तेल पीती है तो तेलवाले मुल्कों पर कब्जा चाहिए। इस प्रकार यह साफ है कि आम आदमी का दर्शन जीने का दर्शन है। अपने परिवेश के साथ संपूर्णता में जीना उसे परंपरा से प्राप्त सहज लक्ष्य है और इसके पक्ष में उसका दर्शन है जो उसकी पीढ़ी दर पीढ़ी अनुभव पर आधारित है।
आम आदमी जानता है कि जर, जोरू और जमीन को लेकर झगड़े होते हैं। साथ ही यह भी जानता है कि संपत्ति संबंधी नियम देश-देश में बदलते रहते हैं। अतः उसे अपनी बेटी को समझाना पड़ता है कि ससुराल का कायदा कानून समझ लेना क्योंकि तुम्हारी शादी परदेश में हो रही है। अपने देश में झंझट होगी तो पंचायत के बल पर निपट ही लेंगे। भारत में हिन्दू उत्तराधिकार नियम के बाद भी अपवाद छोड़कर बेटी भाई से हिस्सा माँगती ही नहीं। उसे स्पष्ट है कि यह कैसे होगा कि दोनों जगह हिस्सा मिलेगा और मैके में जिंदगी भर रूतबा भी चलेगा?
आम औरत तभी अपने को औरत महसूस करती है जब माँ बन लेती है। बाँझ को पूरी औरत का दर्जा नहीं है क्योंकि इसी मामले में वह मर्द से अधिक है क्योंकि कोई भी, कितना भी ताकतवर मर्द बाप के पेट से नहीं पैदा होता ?
आजकल आम आदमी का दर्शन खतरे में है। यह पहली बार नहीं है। पहले भी ऐसा होता रहा है। आम आदमी फिर भी रास्ता निकालता है इस बार भी निकालेगा ऐसी उम्मीद है।
आम आदमी को मालूम है कि तीन कोस पर पानी बदले पाँच कोस पर बानी

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

मजहबी दंगों की रोकथाम

मजहबी दंगों की रोकथाम

मैं संप्रदाय शब्द के पारंपरिक अर्थ से परिचित हूँ इसलिए सांप्रदायिक दंगा कहना गलत समझता हूँ। दंगे तो मजहबी और गैर मजहबी किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। संप्रदाय का मतलब होता है किसी खास बात को ठीक ढंग से दूसरों एवं दूसरी पीढ़ी, उत्तराधिकारी तक सही तरह से पहुँचाना। यह केवल ‘दाय’ अर्थात् उत्तराधिकार ही नहीं बल्कि ठीक ढंग से और पूरी तरह से (पंरपरा ज्ञान आदि को)पहुँचाने का अर्थ रखता है।
भारत के सभी संप्रदाय अपने को पूर्णतः ठीक समझते हैं, यहाँ तक तो ठीक है किंतु दूसरे को किसी न किसी रूप में गलत या हीन समझते हैं, यही झगड़े की बात है। भारतीय वैदिक संप्रदायों की कट्टरता यह है कि अपनी श्रेष्ठता एवं पहचान बरकरार रखने के लिये अपनी विद्या, साधना या परंपरा की जानकारी यथासंभव गुप्त रखी जाय और दूसरी परंपरा को उसे प्राप्त न होने दी जाय। दूसरे की निंदा करने की तो परोक्षतः स्वीकृति है पर यहाँ आदि काल से दूसरे के आचार-विचार को बदलने की अनिवार्यता का प्रावधान नहीं है।
भारत में दूसरों के विचारों को बदलने का काम पहली बार संगठित रूप से बौद्धों ने शुरू किया, जिसमें प्रलोभनों एवं प्रभावों का उपयोग हुआ और प्रभावशाली वर्ग की समस्या आने पर उन प्रलोभनों पर बंदिशें भी लगीं। बौद्ध धर्म विश्व का संभवतः पहला संगठित धर्म है जहाँ विचार या धर्म की सत्ता की जगह संगठन की सत्ता को भी बराबरी का दर्जा दिया गया है और संगठन चलाने के नियमों के ऊपर सैकड़ों किताबें विस्तार से लिखी गयी है। बौद्ध धर्म तक धर्म प्रचार के लिए प्रलोभनों तक की मान्यता दी गयी जो ईशाई मत एवं इस्लाम के आने तक धर्मयुद्ध में परिणत हो गई। पहले युद्ध लड़ना धर्मसंगत था परंतु धर्म के लिये युद्ध या दो धर्मों के बीच युद्ध को सामाजिक स्वीकृति नहीं थी।
ईशा एवं मुहम्मद के संगठित धर्मों की समाज पर पकड़ एवं एशिया में बौद्ध-वैदिक धर्म के लोगों की पराजय से एक निष्कर्ष निकाला गया कि बौद्धों एवं वैदिकों को भी संगठित होना चाहिए तथा मुसलमान एवं ईशाईयों की तरह धर्मयुद्ध लड़ना चाहिए। इसके बाद भारत में भी वैदिक, बौद्ध, शैव-वैष्णव, सिया-सुन्नी, मुसलमान, इशाई, सिख, मराठों का युद्ध जारी रहा जिसे धार्मिक कार्य समझा गया। अपने धर्म की रक्षा प्राण देकर भी करना जरूरी समझा गया।
इसके समानान्तर छल-प्रपंच भी चलते रहे। इसके रोचक एवं दारुण अनेक उदहरण मिलते हैं। भारत में भी इस प्रकार के आपसी झगड़े को दूर करने के लिए भी काफी उपाय हुए फिर भी झगड़े एवं दंगे की समस्या आज तक बनी हुई है।
मेरे सामाजिक जीवन की कहानी ही दंगा रोकने की कला सीखने से हुई। इसके पहले छात्रों की सीमा वाले काम सीखने एवं प्रयोग का काम होता था। मैं एक दिन वर्ष 1983 में रेडियो के लिए प्रहसन लिखने का काम बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बिरला हास्टल की लान में कर रहा था। शहर में कर्फ्यू लगा था। सामाजिक काम कैसे किया जाय, इस पर हमलोगोें की मंडली तरह-तरह के शोध एवं प्रयोग करती थी जो हर बार नई एवं प्रयोगात्मक रहती थी, मसलन रेैगिंग रोक देना, छात्र संघ का चुनाव रोक देना, मौलिक लेखन, गायन, पेंटिंग की चुनौती पैदा कर स्थापित लोगों को दिग्भ्रमित कर देना आदि। हमारी मंडली बेशक प्रतिभासम्पन्न एवं भयानक दुस्साहसी थी, जिससे बाद में अपराधीगण भी डरते थे। जबकि हमने कभी किसी भी प्रकार की तोड़-फोड़ या मार-पीट नहीं की। हाँ, जीवंत नाटक, जीवंत कविता एवं जीवंत हस्तक्षेप का प्रयोग अवश्य होता था। मुझे मंडली के प्रयोगवादी खर्च के लिए छात्रवृत्ति (400 रूपये प्रति माह) के अतिरिक्त राशि की भी व्यवस्था करनी पड़ती थी, जिसके लिए मैं प्रहसन लेखन का काम करता था। डॉ॰ भानु शंकर मेहता जैसे वरिष्ठ प्रहसन लेखक के बाद रेडियो का दूसरा जूनियर प्रहसन लेखक मैं था। इससे भी चार पांच सौ रुपये कमा लेता था।
दंगे की भावनात्मक तपिश तो थी किन्तु समझ नहीं थी कि क्या किया जाय? किसी तरह कफर््यू पास जुगाड़ करने का प्रयास किया गया। जिसमें सफलता तो नहीं मिली पर दंगे के भयावह रूप का साक्षात्कार हुआ। इस मूर्खतापूर्ण और दुस्साहसिक प्रयास का वर्णन मैं ने अलग से किया है।
कर्फ्यू-पास
बात 1982-83 की है। मैं का0 हि0 वि0 वि0 में शोध छात्र था। हम लोगों की एक मंडली थी। उसमें कई जूनियर-सीनियर छात्र थे। बनारस शहर में उन दिनों प्रतिवर्ष हिन्दू-मुस्लिम दंगे होते थे। दंगा होते ही कर्फ्यू लागू। हमलोग छात्रावास में रहते थे। बस परिसर तक हमारी गतिविधियां हों या जो घर जाना चाहें उन्हें सुरक्षित बस से स्टेशन भेजा जाता था।
शहर में दंगा था, जाड़े का समय, मैं लान में चटाई पर लेटा रेडियो के लिए नाटक लिख रहा था। स्कालरशिप 400 रुपये की थी, हास्य रूपक में मुझे 250 रुपये मिलते तो मंडली का खर्चा चलता। बी0ए0 का एक छात्र आया और ताना मारा कि शहर जल रहा है और भैया आप इतने निश्ंिचत होकर हास्य रूपक लिख रहे हैं, कहाँ गई आपकी संवेदनशीलता?
मैंने समझाया - भाई कर्फ्यू में क्या करें?
उसनेे कहा - यही सोचिए कि क्या करें?
तय यह हुआ कि परिस्थिति का अध्ययन कर कुछ रिलीफ सामग्री वि.वि. से जमा कर दंगा पीड़ितो में बाँटा जाय, कुछ बयान बाजी हो। फिर समस्या सामने आई कि बिना कफर््यू पास के जायें तो कैसे जाएँ।
मेरे मित्र श्री बैकुंठ पाण्डेय जी भी शोध छात्र थे। अंततः हम दोनों ने तय किया कि तत्कालीन जिलाधिकारी भूरे लाल (जो ईमानदारी एवं कड़ाई के लिए कुख्यात थे।) उनसे ही मिला जाय।
योजना यूं बनी कि एक बड़े सादे कागज पर हास्टल में उपलब्ध सभी प्रकार की मुहरें लगाई जायं एवं फर्जी दस्तख्त कर दिए जायँ। हमलोगों ने वैसा ही किया और गली-दरगली घूमते पत्रकार बने श्री भूरे लाल तक पहुँच गए। कर्फ्यू में घूमने का अनुभव विवित्र था। पुलिस वाले कुत्तों को खदेड़ रहे थे। एक सिपाही तो पोल पर ही लाठियाँ बरसा रहा था। बेंत की लाठी झाडू की तरह आगे के शिरे पर हो गई थी।
किसी तरह जब हमलोग जिलाधिकारी के पास पहुँचे तो श्रीमान् भूरेलाल स्तब्ध। हमने अपनी मंशा/योजना बताई। वे हँसे, बोले आप लोगों ने कानून का मजाक बना रखा है, तब तक नगर पुलिस उपाधीक्षक श्री द्विवेदी आ गए, वे और चकित। उन्होंने पूछा ये लोग क्या चाहते हैं? कर्फ्यू पास? जिलाधिकारी पुनः हँसे - भाई हमारा कर्फ्यू पास तो आधे पोस्टकार्ड आकार का है आप लोग अपनी कोट पर जिना बड़ा र्क्फ्यू पास चिपकाए हैं उतना बड़ा तो छापा ही नहीं।
इस पास पर जब आप भूरे लाल के सामने खड़े हैं और मैं आपको जेल नहीं भेज रहा हूँ तो समझिये कि आप लोगों के लायक हमारे पास कर्फ्यू पास हमारे पास नहीं है। जरा बचकर लौटिएगा और जाने के पहले गली-मुहल्लों का समाचार भी बताते जाइए।
बाद में हमने दंगा निरोधक तंत्र एवं शास्त्र भी विकसित किया एवं सन् 1985 तक दंगा रोकने में पूरी सफलता पाई। गया में भी मेरा सामाजिक जीवन इसी कार्य से प्रारंभ हुआ।
दंगे का बार-बार होना मेरे मन में सवाल पैदा करता था कि इसका कोई न कोई आपसी तारतम्य होगा जो समझ में नहीं आ रहा है। मैंने सवौदयी लोगों से सीखने का सोचा कि आखिर दंगे में काम कैसे करते है? गाँधी, बिनोवा, जयप्रकाश जैसे व्यक्ति की महानता की कथा और शांति सेना के बगैर क्या केाई साधारण व्यक्ति दंगा रोकने का काम नहीं कर सकता। मैं उस समय शोध-छात्र था।
कफर््यू की हालात में हीं मैं गली दर गली होते हुए राजघाट सवं सेवा संघ के परिसर में पहुँचा। उस समय वहां तीन हस्ती मौजूद थे सर्व श्री रामचन्द्र राही, कृष्णराज मेहता एवं आचार्य राममूर्त्ति नारायण देसाई जी प्रवास पर थे। इनसे कनिष्ट माने जाने वाले श्री अमरनाथ भाई आदि भी परिसर में ही थे।
शांति सेना के अध्यक्ष होने के नाते मैं पहले राममूर्ति जी से मिला जो कहीं व्याख्यान देने जाने वाले थे। हमारे कुछ प्रश्न थे - बनारस में दंगे की रोकथाम कैसे करनी चाहिए ? आप इसमें क्या भूमिका निभा सकते हैं ? और दंगे बार-बार क्यों होते हैं ?
आचार्य जी का उत्तर था - ‘देखो जी नौजवान, बनारस में दंगे अक्सर होते रहते हैं, बनारस में हमारी ‘शांति सेना’ का संगठन नहीं है। हम अखिल भारतीय स्तर पर काम करते हैं। अगर इन छोटी-छोटी बातों में उलझे रहे तो राष्ट्रीय स्तर का काम नहीं कर सकते।’ उस समय आचार्य जी अखिल भारतीय शांति सेना के मुखिया थे।
मैं भूखा-प्यासा उदास राही जी के पास गया। उन्होंने कहा - ‘भाई , शांति सेना का काम तो आचार्य जी का है, मैं इसमें क्या कर सकता हूँ। रही बात नौजवानों को काम सिखाने की तो तुम अमरनाथ भाई से मिलो वे सर्वोदय एवं गाँधी मार्ग के टेªनिंग देते हैं।’
मेरा मन दंगाईयों से अधिक इन सर्वोदयी लोगों पर भड़का हुआ था। मन में ठन गया कि इन्हे इस बार शहर बनारस में नंगा करके छोड़ना है ताकि ये बनारस में दुबारा आने की हिम्मत न करें, राजघाट में रहना तो बहुत दूर की बात है और इनसे सीखने को कुछ मिलना नही है, शयद स्वयं भी कुछ नहीं आता। फिर भी अमरनाथ भाई से मिलने चला गया। पहले गुड़-पानी, फिर भोजन तब बात। यह हुई नौजवानों को सिखाने वाले से पहलेी मुलाकात। गुस्सा कुछ ठंढाया पर उत्तर वही बेतुके कि पहले संगठन था अब मेरी जिम्मेवारी अखिल भारतीय हो गई, समय नहीं है कि कुछ कर सकंे।
अमरनाथ भाई के आवास से निकलते हीं एक साईकिल प्रेमी बुजुर्ग मिले - भगवान काका। उन्होंने राही जी के यहाँ हमारी चर्चा सुनी थी। टोका और रोका। बोले मैं तुम्हें दंगे में काम करना बता सकता हूँ। बुद्धिजीवी सर्वोदयी उन्हें निरा मूर्ख प्राणी मानते थे। उन्होंने अपनी जमा पूँजी से रत्न सूत्र निकालकर मुझे सौपे कि दंगें की हालात में कफर््यू लगने पर निरा बेवकूफी भरा काम न करो। पहले पता होना चाहिए कि इस शहर में वस्तुतः संवेदनशील और उदार लोग कौन हैं। उनके पते एवं फोन नम्बर की एक डायरेक्टरी होनी चाहिए और अखबार बांटने वालों से दोस्ती करनी पड़ती है ताकि अफवाहों के बीच सच्ची खबर जाय। आकाशवाणी की बहुत सकारात्मक भूमिका हो सकती है। मैं तुम्हें कुछ नाम, पते एवं फोन नम्बर के साथ दे रहा हूँ, ये भले लोग है परन्तु ये मुझे ठीक से नहीं जानते। इनसे मदद लेकर कर्फ्यू के बाद शांति पायी की जा सकती है। मेरा मन दंगा-पीड़ितों को राहत पहुँचाने का नहीं दंगा रोकने का शास्त्र जानने का था।
मैं ने फोन पर अपने अदरणीय, परमप्रिय, वात्सत्यमय श्री सत्य प्रकाश मित्तल जी से सारी कथा ब्यथा सुना दी कि अगर गाँधीवादी, समाजवादी और अपने को धर्म निरपेक्ष कहने वाले लोगों ने दंगा रोकने में सक्रिय भूमिका नहीं निभाई तो मैं सबका भंडा फोड़ करूँगा। वे मेरे स्वभाव एवं मंडली से पूर्णतः परिचित थे। आदरणीय मित्तल चाचाजी समाजवादी आंदोलन वाले और गांधी विद्या संस्थान में कार्यरत थे।
का.हि.वि.वि परिसर में कफर््यू नहीं था अतः हमने कुलपति से लेकर माननीय प्रोफेसरों तक से अनुरोध किया कि वे दंगा रोकने की अपील करें। बी.एच.यू. के कुलपति और शहर के माननीय लोगों ने अपील जारी करने से इंकार कर दिया क्योंकि कुछ लोगों के लिये यह स्तरीय कार्य नहीं था और मँजे हुए लोग दंगे की राजनीति में परोक्षतः शामिल थे।
इसके समानांतर संवेदनशील नौजवानों की पहल पर मैडम क़मरजहाँ जो उस समय उर्दू विभाग में व्याख्याता थीं कि अगुआई में कफर््यू तोड़कर शहर के मशहूर शायर नजीर बनारसी के आवास तक शांतियात्रा निकालने की घोषणा की गई। अखबारों में दोनों समाचार सप्रयास छपवाए गये, माहौल बनाया गया। हमारे दुस्साहस से परिचित पुलिस प्रशासन ने हमें गिरफ्तार नहीं किया और कर्फ्यू भी वापस ले लिया गया। दंगा निपट गया।
आदरणीय मित्तल चाचाजी ने मुझे बुलाया और समझाया कि तुम जिल समाजवादियों, सर्वोदयी या वामपंथी लोगों से सक्रियता चाहते हो वे भीतर से खोखले हैं, उनके पास संगठन है ही नहीं तो करेंगे क्या? पूरे शहर में मुश्किल से ऐसे 50-100 लोग हैं जो अपने को अखिल भारतीय या क्षेत्रीय संस्था या संगठन का प्रमुख बताते हैं। उन पर क्रोध ठीक नहीं है। मैं ने पूछा कि सर्वसेवा संघ का क्या शहर के प्रति कोई कर्त्तव्य नहीं है? कहाँ गया पड़ोस धर्म और मैत्री।
दंगा पीड़ितों को राहत सामग्री पहुँचाई गई। चंदा शिक्षकों सं लिया गया। हमारी युवा मंडली का नाम हर महीने दो महीने में बदल जाती थी। चूँकि हम नारद नामकी पत्रिका निकालते थे अतः कुछ लोग की बी.एच.यू. के भीतर हमें ‘नारद परिवार’ भी कहते थे। मित्र मंडली ने तय किया कि -
1. दंगे की समाजमनोवैज्ञानिक प्रक्रिया को समझा जाय।
2. शहर के सज्जनों की सूची तैयार की जाय।
3. परिचर्चाएँ आयोजित हों और
4. ऐसा आदमी ढँूढा जाय जिसे दंगे में काम करने का वास्तविक अनुभव हो।
सर्व सेवा संघ से उसके खोखलेपन से अधिक हम दुर्व्यवहार से पीड़ित थे अतः उनकी उदासीनता नकरात्मकता पर अगले दंगे के समय अखबारों में फीचर छापने का निर्णय लिया गया। धर्मनिरपेक्ष धारा के कई लोग अब हमसे बात करने लगे थे। बनारस के तीनों विश्वविद्यालयों के समाजशास्त्र एवं संबद्ध विषयों के प्रोफेसरों से बात हुई किंतु किसी से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। उस समय राजनीति विज्ञान विभाग में एक विवादास्पद अध्यापक प्रो. हरिहरनाथ त्रिपाठी रहते थे। उनकी रूचि छात्रों को व्यावहारिक राजनीति समझाने में रहती थी। उनकी विचित्रता के किस्से खूब प्रचलित थे। उनके सामने भी प्रश्न रखा गया - दंगा कैसे होता है और इसे कैसे रोका जाय?
त्रिपाठी जी ने कहा - दंगा आरंभ में किसी घटना से शुरू होता है जो अफवाहों के साथ मिलकर एक ड्राईव बन जाता है, अगर तुम कांउटर ड्राइव बना सको तो दंगा रोक सकते हो। मसले पर हल्की रोशनी पड़ी। उलझन यह कि दंगा पता नहीं कब शुरू हो? इतने बड़े शहर में काउंटर ड्राईव कैसे बने? अफवाहों को रोकने की विद्या तो सीख ली गयी थी पर ताकत नहीं थी। त्रिपाठी जी बोले - काउंटर ड्राईव बनाना तुम्हारा काम, मैं उस मामले में कुछ नहीं बोल सकता।
पैसे तो अपने पास होते नहीं थे। न बैनर, न नाम, न चंदा, न रजिस्ट्रेशन, न पार्टी। राजनीतिज्ञ हमें समझ नहीं पाते थे। पत्रकारों की दृष्टि में हमारी मंडली शिरफिरे बेवकूफों की थी, जो खतरनाक थी। श्री रवीन्द्र भाई जो उस समय सर्व सेवा संघ के अध्यक्ष थे और असम में रहते थे, उनके भाई प्रोफेसर जगन्नाथ उपाध्याय तक मित्तल जी के माध्यम से जानकारियाँ पहुँचीं और उन्हांेने भाँप लिया कि शहर में रहने वाले सर्वोदयी लोगों की प्रतिष्ठा धूल में मिलकर रहेगी। वे एक तो सक्रिय नहीं होते थे और न ही उन पर अखबारी समाचारों का असर होता था। हमारी योजना थी कि सर्व सेवा संघ के लोगों के ह्नदय परिवर्तन हेतु और उन्हें गाँाधी के पड़ोस धर्म की याद दिलाने हेतु शहर में रैली निकाली जायेगी और सर्वसेवा संघ के सामने सत्याग्रह/धरना/उपवास किया जायेगा। प्रो. जगन्नाथ उपाध्याय के कहने पर रवीन्द्र भाई (रवीन्द्र उपाध्याय) की बेचैनी बढ़ी और गाँधी विद्या संस्थान तथा सर्वसेवा संघ की ओर से हमारे मान-मनौवल का पूरा प्रयास हुआ। इसमें नारायण देशाई की बेटी डॉ संघमित्रा बहन, बद्री भाई एवं उनकी पत्नी की विशेष अभिरुचि रही। उन्होंने कबीर मठ में एक सभा बुलाई और सभी गाँधिवादियों (जो आपस में बिखरे थे), समाजवादियों, धर्मनिरपेक्ष लोगों ने घोषणा की कि तुम लोगों को हमारा समर्थन होगा। विनोबाप्रेमी शरद कुमार साधक ने तो यहाँ तक कहा कि जब हम लोगों के साथ शहर में संगठन है ही नहीं तो ये बच्चे जो कहें हमें मान लेना चाहिए और इस प्रकार एकनागरिक शांति मंच बना, जिसका मैं संयोजक बना। मेरी उम्र उस समय मात्र 23/24 साल थी। राही जी, मेहता जी और राममूर्ति जी के हृदय पर हमारे रोने, गुस्सा करने या सामाजिक कामों का कोई असर नहीं पड़ा। ये ऑल इंडिया बनकर निर्द्वन्द भाव से अपने बंगलों में सुरक्षित रहे। हमने भी लाचारी में गुस्सा थूका, किंतु कसक रह ही गई।
एक बार बजरंग दल ने सिखों एवं मुसलमानों से बदला लेने की चुनौती दी। जीवन में पहला अवसर था जब खुली चुनौती हो, वह भी सबके सामने, एक गोष्ठी में। दरअसल गोष्ठी शांति के निमित्त बुलाई गई थी, जिसमें खुली चुनौती आ गई।
हमने चुनौती स्वीकार की । अब ड्राईव की जगह काउंटर ड्राईव बनाना था। हमलोगों ने थोड़ा झूठ का सहारा लिया क्योंकि मृतप्राय संस्था-संगठनों को एकजुट करने से अच्छा या कि सभी के बैनरों तले शांति मार्च निकाले जाएं। अफलातून अपना प्ले काडर््स हाथ में रखने वाली तख्तियाँ इस शर्त के साथ देने पर तैयार हो गए कि उन्हें चुनाव-प्रचार के लिये सही सलामत वापिस मिल जाए। 15-20 से 30-40 की संख्या में वरिष्ठ लोग और 20-25 नौजवानों की अपनी मंडली रोज जूलूस निकाले। जिसे अखबार में नाम छपवाना हो, उसे हमारे नाश्ते भोजन की व्यवस्था पक्के तौर पर करनी पड़ती थी। हम अपना नाम नहीं छपवाते थे। इस प्रकार 15-20 रैलियों एवं अपीलों से एक माहौल बन गया। कम्यूनिस्ट पार्टी के लोगों ने भी दूरी बनाते हुए अपनी रैली निकाली। काँग्रेस, भाजपाई परेशान, संघी ठिठके हुए कि अचानक शहर बनारस में इतना उत्साह और जागृति कहाँ से आई कि सभी मैदान में कूद गए।
एक दिन उपद्रवियों का मनोबल तोड़ने के लिए विशाल मार्च निकाला जाना तय हुआ। इस बार सभी धाराओं के उदार लोग एकजुट हुए। इस रैली/मार्च की खाशियत यह थी कि दिन भर पूरे शहर में घूमने वाली थी। आरंभ बिंदु तय था किंतु भ्रमण पथ और समाप्ति तय नहीं थी। समसामयिक समाचारों से भरे पर्चे प्रेस से ताजे-ताजे छपते और बंटते थे।
प्रशासन, पुलिस, गुप्तचरवाले परेशान कि आज होगा क्या? आरंभ विंदु पर 500 लोगों से आरंभ कर अंत तक 2000 लोगों की लंबी कतार गली दर गली घूमी। चूँकि रास्ता न पहले से तय था न रैली पर उपद्रवी पत्थर आदि फेंक सके। गोपनीयता ऐसी कि संयोजक को भी पता नहीं। हर चौमुहाने/दोमुहाने पर ही अगली दिशा तय होती थी।
उपद्रवी हार गए, मान बैठे कि इस बार एकाध हत्या भले हो जाय, दंगा नहीं होगा। हमें भी अहंकार हो गया। साथ ही सालाना रश्म की तरह दंगा कराने वालों या मनमुताबिक दंगा कराने वालों को भी यह सालने लगा कि कोई समूह दंगा रोकने की व्यवस्थित कार्य प्रणाली विकसित करे यह तो ठीक नहीं। नई पीढ़ी के उदीयमान धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञों को भी भीतर-भीतर बात साल रही थी। लिहाजा दो धर्म निरपेक्ष महानुभावों ने दंगा कराने का निर्णय लिया। एक थे प्रसिद्ध गाँधीवादी, पूर्व पत्रकार, पूर्व केन्द्रीय मंत्री, वगैरह उपाधि से विभूषित।
बनारस के औरंगाबाद इलाके में दंगा हुआ। दो-तीन लोग मारे गए। हमें भी बड़ी चिंता हुई कि अब क्या करें? खैर, सच हाथ लगा। हमने रेडियो पत्रकार बन सीधा उन्हीं से उनके घर जाकर दंगा रोकनी की अपील करने को कहा। युद्ध मनोबल और दक्षता का था कि हमें मालूम है कि दंगे के पीछे कौन है, और हम आपका भंडा-फोड़ भी कर सकते हैं। गालियों की बौछारों से हमारा स्वागत हुआ। गुडों को हमें पीटने का आदेश दिया गया। हमने भी हिम्मत नहीं हारी, हम उनके पुत्रवधू से मिले और कहा कि अगर आप अपनी राजनीति चमकाना चाहती हैं तो आप ही अपील जारी कीजिए वरना हमारी भी रोजी-रोटी का मामला है, हमें कहना तो पड़ेगा ही कि दद्दा ने अपील जारी नहीं की।
हमारे नाश्ते पानी के बंदोबश्ती के साथ-साथ बहूजी ने अपील जारी की। दूसरे दिन से शांति बहाल हो गई। राजनैतिक गलियारे में चर्चा रही और हमारे बनारस में रहते दंगा नहीं हो सका।
ठीक इसी तरह एक धर्मनिरपेक्ष डाक्टर साहब थे। वे हिन्दू-मुसलमान ही नहीं शिया-सुन्नी के बीच भी दंगा-फसाद कराने में प्रवीण थे। बनारस छोड़ने के बाद मुझे उनका रहस्य पता चला। उस्ताद इतने कि हमारी शांति समिति के सदस्य भी थे।
इस घटनाओं के बीच के अंतराल में हमने सीखने का काम जारी रखा। यह सीखना ब्यक्तिगत चर्चा संपर्क यात्रा से लेकर सभा-संगोष्ठी में सक्रिय भागीदारी तक के रूप में रहा। इस शिक्षा के निष्कर्षसूत्र निम्न हैं -
स्थितियाँ:-
’ दंगे प्रायः पूर्व नियोजित होते हैं।
’ अफवाह शुरू में फैलाना पड़ता है, बाद में स्वंय दिन-दूरी रात-चौगुनी की गति से अफवाहें नए-नए रूप धारण कर फैलती हैं।
’ कर्फ्यू में पुलिस बहसी हो जाती है। आदमी न मिलने पर कुत्तों एवं कोई न मिलने पर बिजली-टेलिफोन में खंभांे तक को पीटने से नहीं छोड़ती।
’ हिन्दू, बौद्ध, मुसलमान, ईशाई एवं सिख इन सभी के मन में लाख सदाशयता के बाद भी अपने को श्रेष्ठ मानने/साबित करने की वासना बची रहती है।
’ सनातनी परंपरा वाले एवं दिगंबर जैनियों को छोड़कर बाकी के सभी लोग दूसरे को अपनी मंडली/धर्म में सम्मिलित करने के प्रलोभनकारी या दवाबकारी उपायों को उचित मानते हैं।
’ भारतीय मुस्लिम जमींदार परिवार के लोगों को यह पीड़ा सताती रहती है कि अंग्रजों के बाद उनकी हुकूमत क्यों नहीं रही? वे अपने को ठगा हुआ महसूस करते हैं? शायद किसी को समझ नहीं आता कि भारत का धर्म आधारित बँटवारे का असली रूप क्या होता?
’ मुस्लिम सवर्णों की तुलना में मुस्लिम असवर्ण अधिक उदार होतें हैं, किंतु हिन्दू असवर्ण नहीं।
’ इस्लाम एवं ईशाई पुरोहित तथा मौलवी सूफियों के खिलाफ हैं, और सच में सूफियों की स्वीकृति हिन्दू समाज में है न कि मुसलमानों में। कबीर पंथ तो केवल हिन्दू लोगों में ही मान्य है।
’ बहुत सारे दंगे चुनावों में वोट का घु्रवीकरण एवं बाजार में वर्चस्व के लिये कराये जाते हैं।
’ शहरों, कस्बों में ही अक्सर दंगे होते हैं। गाँवों में दंगा फैलाना मुश्किल है क्योंकि अफवाहें तुरंत मर जाती हैं। मुस्लिम कट्टरवादी ताकतें गाँवो में तनाव फैलाने से डरती हैं कि प्रतिक्रिया बहुत भयावह होगी।
’ ईशाई कट्टरवाद बहुत व्यवस्थित और संगठित होता है। पकड़ जाने पर वे मुलायम होकर काम निकाल लेते हैं।
’ ईशाई, मुस्लिम एवं हिन्दू कट्टरवादी ताकतों को राष्ट्रहित के विरुद्ध जाने एवं विदेशी ताकतों से हाल मिलाते देर नहीं लगती।
’ हथियार बेंचनेवाले सर्वाधिक निष्पक्ष होते है। वे धर्मों, जातियों में अंतर नहीं करते, चाहे ऐसे सौदागर अंतरराष्ट्रीय स्तर के बड़े हों या ग्रामीण स्तर के छोटे।
’ अखबारी लोगों की समझ प्रायः संकुचित होती है।
’ पुलिस अक्सर पक्षपात करती है।
’ धर्म की सांगठनिक एकता एवं लगाव तथा राष्ट्र प्रेम का द्वन्द गहरा होता है, अगर वह राष्ट्र मिश्रित आबादी वाला हो।
’ जैन को छोड़ सभी मतों में मूलतः दो ही कोटियाँ हैं- धार्मिक या विधर्मी। कोई भी धर्म अपने अतिरिक्त दूसरे को स्वीकार नहीं करता।
’ भारतीय संस्कृति एवं धर्म का लचीलापन अन्य को पचता नहीं है।
’ अब छूआछूत की चंगुल के ढीला पड़ते ही ईशाई एवं मुसलमान सांस्कृतिक दृष्टि से डरे-डरे रहते हैं।
’ उदारवादी हिन्दू संप्रदाय जैसे - आर्य समाज आदि सनातनियों से अधिक कट्टर हैं।
’ हिन्दू-मुसलमान वस्त्र व्यवसायी अधिक लड़ते हैं और हीरा व्यवसायी सबसे कम।
’ वामपंथी लोगों को मुस्लिम कट्टरवाद कम बुरा लगता है और इतिहास की घटनाओं के केवल एक पक्ष को देखते हैं। इसी तरह संघी लोग सभी मुसलमानों में दोष देखते हैं।
’ आधुनिक मिश्रित कालोनियों में दंगे न के बराबर होते हैं।
समाधान/अनुभूत उपाय:
’ दंगों को रोका जा सकता है।
’ विश्वसनीय एवं तटस्थ लोगों द्वारा खंडन किये जाने एवं मीडिया के समर्थन से अफवाहें रुक सकती हैं।
’ टेलिफोन/मोबाईल का उपयोग अफवाह रोकने में किया जा सकता है।
’ दंगा रोकने के लिये धर्म के गंभीर मुद्दों की चर्चा न कर मानवता का आधार लेना चाहिए।
’ पुलिस-प्रशासन प्रायः दंगा फैलाना नहीं चाहता पर राजनीतिज्ञों के दवाब में उसे बढ़ाता है। अतः दंगा रोकने के लिये सत्ताधारी एवं विपक्षी दोनों दलों के कुछ प्रभावशाली नेताओं से पूर्व संपर्क एवं समर्थन जरूरी होता है।
’ तटस्थ नागरिकों की अपील एवं शांतिमार्च बहुत उपयोगी होते हैं।
’ ऐसे कार्यों मे पूर्णतः तटस्थता एवं सच्चाई पर चलना जरूरी है।
’ संवेदनशील इलाकों में पहले से ही नेटवर्क बनाकर रात्रि पहरे के लिये फोन-बूथ बनाना उपयोगी होता है।
’ कार्यक्रम को उपद्रवी लोगों से बचाने के लिए पहले से यात्रा की दिशा एवं गंतब्य तय नहीं करना चाहिए।
’ दंगा रोकने में स्थानीय संबंधों को आधार बनाने से बहुत सुविधा होती है। ईश्वर का राज्य या धर्मराज्य, रामराज्य बनाने का दावा या औचित्य केाई भी संगठन खुलेआम नहीं साबित कर पाता और उसमें भी छल-बल के प्रयोग का तो औचित्य हीं नहीं है, न कह पाता है। प्रायः प्रतिक्रिया दर प्रतिक्रिया को सही ठहराया जाता है। जिसका सीधा उत्तर होता है - हमें जब यहीं साथ रहना है तो दूर के झगड़े को क्यों लाएँ, क्या स्थानीय युद्ध से देश-विदेश की समस्या का समाधान हो सकता है?
’ जहाँ कहीं भी कट्टरवादी शिक्षा के केन्द्र होते हैं वहाँ स्थाई शांति या प्रेम संभव नहीं होता। व्यवहार में ऐसे केन्द्र धर्म को आचरण की जगह राजनीति के आधार के रूप में घोषित करते हैं, या प्रयोग करते हैं। अतः कौवाली, मुशायरा आदि संस्कृतिक कार्यक्रम के बारे में भूलकर भी इनसे या मौलवियों से राय/अनुमति लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए। आम जनता तो इसमें रूचि रखती ही है और कट्टरवादी भी अपनी दरगाह को थोड़े ही तोड़ेगे न कौवाली मुशायरा बंद कराने आएँगें।
’ धर्म पर नास्तिकतावादी टिप्पणी करने से बेहतर यह कहना है कि हमें तो ठीक-ठीक पता ही नहीं कि सच्चाई क्या ह?ै यह ऊपर वाला ही जाने। यहाँ हमें मिल-जुलकर रहने से खुदा या भगवान जो भी होगा, खुश रहेगा।
’ जिन शहरों में दंगे प्रायः होते हैं वहाँ कुछ स्थाई किश्म की समस्याएँ बनाकर रखी जाती हैं ताकि जब जरूरत हो, उस मसले को विवाद का कारण बनाया जा सके।
’ नागरिक अपील में गैर धार्मिक छवि के अराजनीतिक लोगों से अधिक पारंपरिक एवं धार्मिक छवि वाले अराजनैतिक लोगों की बातों का असर होता है।
कुल मिलाकर सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन्माद एवं शांति की आवाज में से किसकी आवाज अधिक बुलंद है और लगातार विश्वसनीयता पूर्वक लोगों तक पहुँच रही है। स्वाभाविक है कि ऐसा काम अचानक से नहीं किया जा सकता। यह तो उस शहर के सज्जन, अनुभवी एवं भरोसेमंद लोगों के बल पर ही हो सकता है।
बनारस छोड़कर मैं गया में रहने लगा तो एक बार ऐसा संकट बाबरी मस्जिद तोड़ने की रात यहाँ भी आया। गया शहर में तनाव तो शिलापूजन एवं कार सेवकों की यात्रा के समय से ही बना हुआ था। चूँकि पुराना इतिहास दंगे का नहीं है अतः दंगे की न तो व्यवस्थित तैयारी थी, न ढाँचा। फिर भी हम लोगों ने ऊपर वर्णित उपायों को आजमा कर उस हाल में भी शहर की शांति बनाए रखी।
आम आदमी का संवाद: कुछ महीनों बाद पुनः एक आशंका उभरी। तबलीकी की जमात का बड़ा अखिल भारतीय स्तर का जलशा करने का निर्णय गया में तबलीकी जमात की ओर से किया गया था। 4 लाख की आवादी वाले शहर में बाहर से 1 लाख लोगों के आने का अनुमान था। प्रशासन डरा हुआ था। प्रशासन ने रेलवे स्टेशन, बस स्टाप वगैरह से समारोह स्थल तक लोगों केे आने-जाने के मार्गों का निर्धारण किया। फिर भी तबलीकी जमात के लोगों ने पूर्णतः सहजता का परिचय दिया। शहर के विभिन्न गली, नुक्कड़ों से गुजरते हुए लोग समारोह स्थल पर पहुँचे। जहां मन किया नमाज पढ़ा और खाना खाया। हाँ नमाज पढ़ने से पहले मकान मालिक से अनुमति माँगी तो भला कौन नमाज पढ़ने से रोके, भगवान या खुदा नाराज होगें तो ? घर से माँग कर पानी पिया और साथ में लाया हुआ खाना खाया। जलसा पूरा हुआ, लोग उसी तरह धीमी गति में गपशप करते चले गए। इस सहज मिलन में दंगे की कोई तरकीब काम नहीं आई। प्रशासन एवं राजनीति को भी थोड़ा यश देना ही चाहिए क्योंकि लालू प्रसाद जी एवं उनके अनुयायी ‘माई’ मुस्लिम $ यादव समीकरण वाले थे और गया में उसके अनुयायियों में मुस्लिमों में शेख और हिन्दुओं में यादव के बिना लड़ेगें कौन ? लड़ाने वाली जातियाँ अन्य हो सकती हैं। छोटी-मोटी बातों पर स्वयं लड़ने की हिम्मत सबको नहीं होती। इस प्रक्रिया में लोगों में आपसी धार्मिक चर्चा भी हुई। अखबार एवं बोट बैंक वाले दुःखी रहे। अखबार के लोगों ने मस्जिद तोड़े जाने पर सवाल पूछा? मौलाना साहेब ने कहा अल्लाह की बंदगी करने की जगह मस्जिद तो होती है। अगर खुदा ने ही मस्जिद की हिफाजत नहीं की तो उसकी मर्जी, वो जाने, उसकी इबादतगाह को उसके बंदों ने तोड़ दिया, तो मैं इस पर क्या करूँ? और तबलीकी जमात के लोग क्या करेंगे? उनका काम अल्लाह के बताए रास्ते पर चलना है, बाकी का काम अल्लाहताला का है।
काश! यह बात और लोगों की भी समझ में आ जाती।

रविवार, 11 मार्च 2012

उपनिषदों की उलटी शिक्षा

उपनिषदों की उलटी शिक्षा
मेरी अपनी निजी याददाश्त के अनुसार मैं ने अपने परिवार का चयन नहीं किया। मेरे जन्म के पहले या मेरे पुत्र के जन्म के पहले तक का निर्णय दूसरों के हाथ था। मेरे हाथ रहता तो शायद मैं दूसरा निर्णय लेता क्योंकि मेरा घर-परिवार, प्रयोगवादी, कठोर परिश्रमी एवं सदैव उथल-पुथल में रहने वाला था। पर्याप्त यश/अपयश के भीतर अनेक प्रयोग सामाजिक, राजनैतिक, परिवारिक एवं साधना के स्तर पर हो रहे थे। शास्त्रार्थ के कलह में घर का चूल्हा-चौका भी प्रभावित हो जाता था। मेरे परबाबा (प्रपितामह) दो भाई थे। एक नियमित संध्या पूजा करते थे। वे रामानंदी वैष्णव थे। शिक्षा प्रथमा या मध्यमा स्तर की थी। आज की तुलना में 10वीं-12वीं तक की। उनके छोटे भाई बड़े विद्वान, 4 विषयों में तीर्थ अर्थात स्नातकोतर उपाधि वाले थे। वे संध्या नहीं करते थे। प्रतिदिन कुर्सी पर बैठकर पैर लटका कर गीता पाठ करते थे। दोनों एक दूसरे को ढोंगी और नास्तिक समझते थे। इसके बावजूद वे एक दूसरे को प्यार बहुत करते थे और झगड़े के बाद रूठने-मनाने, पंचायत बिठाने का काम भी होता था। इन दोनों की लड़ाई में मुझे फायदा होता था कि पढ़ाई से छुट्टी। किसी बाहरी विद्वान या साधक के आने पर पुआ-पूड़ी का लाभ अतिरिक्त था। ऐसे ही माहौल में मेरे पितामह का जन्म और विकास हुआ था। उन्होंने अनेक रहस्यों का स्वयं पता किया और उसमें से ही एक है उपनिषदों की उलटी शिक्षा।
गीता एवं ईशावाश्योपनिषद तो मुझे कंठस्थ था ही एक दिन मुझे उपनिषद पढ़ाने का काम मेरे पितामह ने शुरू किया। उस समय तक वे एक क्रांतिकारी, काँग्रेसी, भूदानी, फलाहारी, तीन गायत्री पुरश्चरणकर्ता, अनेक संस्थाओं के अध्यक्ष/सचिव आदि हो चुके थे। घुमक्कडी़ का अनुभव भी उनका उस समय 60 साल का था। साधु-संतों की लंबी-चौड़ी मित्र मंडली थी। इस परिवेश के जाने बगैर आप समझ ही नहीं सकेंगे कि एक पितामह अपने पोते को उलटे क्रम से उपनिषद क्यों पढ़ा रहा था।
मैं 108 उपनिषदों वाली पुस्तक लेकर बैठा, खेमराम वंेकटदास, मुंबई वाला। वे (पितामह) बोले अंतिम उपनिषद खोलो और पढ़ो। नाम था अल्लोपनिषद। मैं चाैंका, ये क्या? इस किताब में तो हजरत मुहम्मद साहब तो भगवान के अवतार हैं, नारायण की छवि हैं। मैं ने इस्लाम की मुख्य शिक्षाएँ पढ़ीं। प्रश्न तो उठना ही था क्योंकि तबतक सामान्य संस्कृत वाक्यों के अर्थ समझ में आ जाते थे। अनुवाद के सहारे की आवश्यकता नहीं थी। धार्मिक ग्रंथों के वर्णनों पर अनेक लोगों के मन में प्रश्न इसलिए नहीं उभरते क्योंकि वे उसे समझते ही नहीं। मैंने सवाल पूछ ही लिया कि ये कैसा उपनिषद है? उपनिषदों की संख्या कितनी है? ये उपनिषद इतने भिन्न क्यों हैं? और आज तक सभी किताबें तो आदि से अंत तक पढ़ाई र्गइं। इस संकलन को आप उल्टे क्रम से क्यों पढ़ाना चाहते हैं?
उन्होंने बताया -
क) महान संस्कृतियाँ यू हीं नहीं महान बनतीं।
महान व्यक्ति, समाज, धर्म या संस्कृति सभी को अपने दिल एवं दिमाग दोनों को खुला रखना पड़ता है ताकि उसमें अन्य का समावेश हो जाय। इस्लाम ने चाहे जितनी भी लड़ाई लड़ी हो लेकिन उसमें किसी दूसरे को समाविष्ट करने की प्रणाली ही नहीं है। भारत में बातें वेदों तक सीमित नहीं है। वेदों, उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों, उपपुराणों, रामायणों एवं अन्य ग्रंथों की संख्या निरंतर बढ़ती रही। इसी क्रम में किसी ने अल्लोपनिषद लिख दिया। तुम भी चाहो, बड़े होकर एक उपनिषद लिख देना। इसमें बुरा क्या है?
उपनिषद की तो नहीं लेकिन एक नए पुराण प्रज्ञा-पुराण लिखे-जाने की सूचना मुझे मिली । गायत्री समूह वालों ने प्रयास किया है परंतु पुराने आर्य समाजी होने के कारण बेचारे श्री राम शर्मा जी भारतीय संस्कृति समझ ही नहीं पाए। उनका पुराण आगे चलकर पुराण नहीं बन पाएगा जबतक कि उनके चेले गुरु की गलती सुधारते नहीं। अर्थात आगे के 6 एवं पीछे के 8 तीन पृष्ठों का बदलकर भगवान व्यास की बेनामी सिंगल ब्रांडवाली अनादि अनंत ट्रस्ट की पूँजी में सम्म्लिित नहीं करते। व्यास के अतिरिक्त पुराण का रचनाकार दूसरा कैसा हो सकता है?
ख) खैर तो दूसरी बात यह कि वैदिक काल का समाज तो बहुत पहले का है। न वे परिस्थितियाँ है न साधना की वैसी विधियाँ न वैसे भेद-प्रभेद। आज के समाज एवं उनमें प्रचलित संप्रदायों के मूल सिद्धांतों की समझ के लिए सबसे सुविधाजनक है इन छोटे-छोटे परवर्ती उपनिषदों को पढ़ना। इससे सांस्कृतिक इतिहास की कड़ियाँ व्यवस्थित रूप से ज्ञात होंगी। इसके बाद फिर मेरी उल्टी शिक्षा का सिलसिला चलता रहा। एक उपनिषद, एक संप्रदाय, एक अखाड़ा, उसकी मूल मान्यताएँ अन्य से अंतर, साधना की प्रणाली, समाज में उनका योगदान एवं अधिकार इन सभी बातों की चर्चा साथ-साथ चली, जैसे- नागा साधु को सभी मठों मंदिरों से जबरन वमूली का सामाजिक अधिकार क्यों है क्योंकि इन्होंने अन्य संप्रदायों के लिए भी लड़ाई लड़ी।
ग) परवर्ती उपनिषदों की भाषा लौकिक अर्थात वेद के बाद वाली संस्कृत भाषा है। इसे समझना आसान तो पड़ता है साथ ही धीरे-धीरे पुरानी शैली एवं भाषा की समझ बढ़ती है तो पूर्ववर्ती उपनिषदों को समझना आसान होने लगता है। तभी सही मायने में प्रायोगिक परंपरा के साथ वैदिक उपनिषद समझ में आते हैं।
घ) भारतीय साधना संस्कृति कैसे समकालीन मान्यताओं परंपराओं से प्रभावित होती गई, इसे समझने के लिए नारायणोपनिषद, वज्रसूचिकोपनिषद आदि संप्रदाय वालों की ये छोटी पुस्तकें बहुत उपयोगी हैं। योग की सीधी बातें योगशिखोपनिषद में हैं।
अगर आप भी भारतीय साधना परंपरा को जानना पहचानना चाहते हैं। अनेकता में एकता की प्रक्रिया को समझना चाहते हैं तो एक बार उपनिषदों को उलट कर पढ़िए। संस्कृत में परेशानी हो तो अनुवाद पढ़िये।

सोमवार, 2 जनवरी 2012

धर्मशास्त्र का पुनः संस्करण

पिछले 200 वर्षों से सनातन धर्मावलंबियों ने अपने लिये धर्मशास्त्र का पुनः संस्करण नहीं निकाला। इसके कारण एक ओर अनेक कालबाह्य बातें बेमतलब चल रहीं हैं तो दूसरी कुरीतियों को बल मिल रहा है। अतः एक नये संस्करण हेतु हिम्मत करने की जरूरत है। प्रस्ताव आपके समक्ष है। पूरी सामग्री नये पृष्ठ अभिनव धर्मशास्त्र पर देखें । आपका - ब्लॉग लेखक

शनिवार, 20 अगस्त 2011

भारतीय संस्कृति एवं समाज समझने के सूत्र


भारतीय संस्कृति एवं समाज समझने के सूत्र
मामला केवल शिक्षा का नहीं है। समाज के बारे में समझ का है। बातें आगे बढ़ें उसके पहले मैं आपको अपनी समझ, संदर्भ एवं सीमाओं के बारे में बताना चाहता हूँ।
भारतीय संस्कृति के संबंध में आम आदमी और राज्य व्यवस्था, राजाओं के अनवरत युद्धरत रहने पर भी शिक्षा, शिक्षा प्रणाली, संस्कृति, व्यवसाय का जारी रहना, विभिन्न लोगों का भारत आगमन एवं समाज का भाग बनना आदि बातों पर तो गलत अवधारणाएँ स्थापित की ही गई हैं। सबसे बड़ी समस्या है आम आदमी की जिंदगी में स्थापित प्रायोगिक बातों को एक मिथक या केवल विश्वास मानकर उसे खारिज कर देना। इस अंतिम गलती से तो पूरे समाज को मूर्ख, पागल या अंधविश्वासी मानना ही पड़ेगा।
उलटे अब योग और तंत्र के पीछे फिर दौड़ना भी शुरू हो गया। मैं दोनो ही संदर्भों में सत्य को सामने लाने का प्रयास करता हूँ । प्रायोगिक बातों को, जो अनुष्ठान, चलन, रीतिरिवाजों के रूप में समाज में स्वीकृत हैं स्पष्ट करने का प्रयास करता हूँ। इसे तर्क एवं अनुभव से जाना समझा जा सकता है। इसके पक्ष में परंपरागत प्रयोग पक्षीय योग एवं तंत्र शास्त्र के ग्रंथों को संदर्भ के रूप में उल्लिखित किया जा सकता है। आधुनिक ग्रंथों को जो इन बातों पर विश्वास ही नहीं करते उनका क्या संदर्भ दूँ?
उदाहरण के लिये - चिदाकाश धारणा योग-तंत्र धारा की वह आधारभूमि है जहाँ अनेक छोटी-बड़ी साधनाएँ सीखी जाती हैं। रोग निवारण का काम किया जाता है, छोटे-मोटे चमत्कार होते हैं या फिर ध्यान की गहराई में जाने की साधना होती है। कोई व्यक्ति अगर चिदाकाश धारणा के अस्तित्व को माने तब न आगे की बात समझ में आए। केवल एक मिथक या केवल विश्वास मानकर उसे खारिज कर देने की आधार भूमि में प्रायोगिक बात कैसे समझाई जाय?
मैं तंत्र की लोकोपयोगी बातों को सरलीकृत करके बताता हूँ । एक तरह से तंत्र की सारी बातें एक तरफ से गुप्त हैं लेकिन गोपनियता तो समझें कि है क्या? ऐसी गोपनीयता से समाज का क्या भला-बुरा हो रहा है?
’ समझदार और उदार लोगों के द्वारा लोकोपयोगी उतम बातों को एवं तंत्र की असांप्रदायिक (नन ब्रांडेड) मूल विधियों को स्त्रियों के द्वारा मुख्यतः किये जानेवाले सामाजिक/सामुदायिक अनुष्ठानों में सम्मिलित कर दिया गया।
’ वैदिक पंडित हों या बौद्ध पंडित अथवा नए युग के सेक्युलर बुद्धिजीवी, चाहे सोच-समझ कर इन अनुष्ठानों को नष्ट करनेवाले पुराने/नए संप्रदायों के लोग, किसी का ध्यान भी इनकी तरफ नहीं गया। अनुष्ठान व्यापक रूप से बच गए। दुकानदार दूसरों के माल को खराब कह रहे हैं असली माल आम आदमी के पास है।
’ समाज में स्वीकृति होने के कारण पुराने वैदिक आचार्य हों या नए या साम्यवादी, सर्वोदयी सबके घर में (कुछ कट्टर लोगों को छोड़कर) काशी से पूर्व में बहुसंख्यक स्मार्त (स्मृतियों के अनुरूप चलने वाले) लोगों के बीच तंत्र का वर्चस्व जन्म से श्राद्ध पर्यंत अभी भी चल रहा था नहीं, चल रहा है। इस नासमझी के सुप्रभाव से विधियाँ बची रहीं परंतु शव की तरह, बिना बिजली के पंखे-मोटर की तरह।
’ पहले भी अग्निहोत्री ब्राह्मण के घर भी दो आग ही रहती थी - यज्ञकंुुड की और चूल्हे की। अंतिम आग तीसरी आग तो डोम महाराज के श्मशान कुंड में रहती है या साधक की रीढ़ की हड्डी में। अब न तो घर, न कुंड, न श्मशान कहीं न आग रखी जाती है, न उसकी समझ बाकी है। हां बेमतलब कठोपनिषद पढ़ा जा रहा है- त्रि नाचिकेतस्तृभिरेतदग्नि या इष्टका यावतीर्वा यथा वा। न आग का पता, न ईंट का, फिर हवन हो तो कैसे? मृत्यु के पार जाना तो बहुत दूर की बात हुई।
’ काशी के पूर्व का श्राद्ध चांडाल एवं शूद्रों के साथ भोजन किए बगैर पूरा ही नहीं होता। वेद का चलता कहां है? किस पंरपरागत ब्राह्मण की औकात है कि श्राद्ध से शूद्रों को निकाल बाहर करे?
इस प्रकार देखें तो समझ की समस्या मूल है न कि गोपनियता की। आयुर्वेद एवं ज्योतिष में तो गोपनीयता है ही नहीं। जिनकी गठरी में कुछ है ही नहीं, वे ही अपनी खानदानी विद्या और गोपनीयता का हल्ला अधिक मचाए हुए हैं।
सच पूछिए तो कुल मिलाकर 20-25 अनुष्ठान विधियाँ हैं, इनमें ही सारे पुरुषार्थ - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपाय सम्मिलित हैं। सामूहिक किंतु गुप्त रूप से इन्हें तीन-चार साल में सीखा जा सकता है। पारिवारिक/सामाजिक रूप से अधिक से अधिक तीन-चार महीने में। फिर मूर्खों के आडंबर को देखिए और हँसिए। अनुष्ठान भी वही पुराने मगध-मिथिला बंगाल के चिरपरिचित: - संकल्प, न्यास, उद्धार (बीज, मंत्र एवं ऋषि संबंधी) कवच, मटकोर, हल्दी, चुमावन, मंडपाच्छादन, मंडप खोलना आदि ? और कुछ व्रत -
कार्तिक स्नान, माघी मौन, अन्नकूट (गोधन) छठ, नवरात्रि जैसे प्रगट और कुछ गुप्त जैसे अनुष्ठान -गीत गाना, मटकोर, अनुलेपन (उबटन लगाना) विवाह के बाद का चतुर्थी कर्म, लाग बैठना, आशीर्वाद/अभिषेक/चैता गायन, जँतसार गायन, खाट बुनने का गीत गाना, सुतली, सूत जनेऊ बनाने का अनुष्ठान। यही अगर किसी संप्रदाय में दीक्षित होकर ब्रांडेड फार्म में अनेक देवी-देवता या बिना देवी-देवता की जगह किसी एक देवता एवं उनके व्यूह या परिवार के देवता रूपी ब्रांड के साथ सीखा जाय तो 4 से 8 साल लग जायेगा।
मामला तन एवं मन के संबंधों के साथ प्रकृति के से उनके संबंधों को समझने का है, स्वाद, रूप, स्पर्श, ध्वनि, गंध, गीत वन्दना सबको।
एक उदाहरण देखिए -
वैदिक अनुष्ठान में -
कोई व्यक्ति, उपवास या मौन के साथ (जो न के बराबर होता है) मंत्र पढ़ता है, किसी देवता (माना हुआ) को सामग्री अर्पित करता है, ब्राह्मणों को भोजन कराता है, बात समाप्त।
सामाजिक/परिवारिक तंत्र सम्मत में -
भावी वर/वधू को मंडप में सबके समक्ष बिठाया गया। इसके पूर्व कई दिनों से उबटन मालिश चल रही है। साथ ही श्लील-अश्लील चर्चा एवं छेड़-छाड़ भी, वह भी अकेले में नहीं। अब महिलाएँ परीक्षा लेने एवं उसकी अनुभूति को दृढ़ कराने का सम्मिलित अनुष्ठान करती हैं। पंडित मंत्र पढ़ते हैं - कांडात् कांडत् प्ररोहन्ति पुरूषः पुरूषोपरि . . . . .! दूर्वा से हल्दी सभी जोड़ांे पर पैर से शिर तक स्पर्श कराई जा रही है। जैसे दूब की गांठें हैं उसी तरह मानव शरीर में संधियाँ हैं, उनके बीच भी चेतना का प्रवाह है, यह स्मारक (स्मरण दिलाने वाला इशारा करनेवाला) मंत्र है।
भावी वर-वधू न बोल सकता है, न हिल सकता है, बैठे रहना एवं स्पर्श की अनुमूर्ति पर ध्यान केन्द्रित करना है (यही छूट दी गयी है) पहले श्रेष्ठ लोग, फिर हुड़दंग। पूरी होली, हँसी मजाक सब, भाभी वगैरह की छेड़-छाड़ मतलब- स्नायु तंतुओं, मन को उत्तेजित करना, शिथिल होने पर बार-बार उत्तेजित किया जाना और उस सबके बीच सबके समक्ष हाय-हाय! करने की जगह अधिक से अधिक मुस्कुराने की सुविधा के साथ मौन पूर्वक संयमित, शांत रहना।
यह अनुष्ठान तो गाँव-देहात में बचा हुआ है परंतु चेतना तथा स्नायु तंतुओं पर ध्यान देने की बात छूट गई है। स्कूल चल रहा है, शिक्षा नहीं हो रही।
इसी प्रकार से अनेक अन्य उदाहरण हैं। तंत्र के ब्रांडेड फार्म आज भी इंटरनेटी/विदेशी बाजार में खूब उपलब्ध हैं। कामसूत्र जो पूर्णत राजाओं एवं सामंतों की विलास लीला का शास्त्र है, जिसमें कहीं भी समाज एवं संयम नहीं है और चेतना की अंतर्यात्रा का तो रिश्ता ही नहीं है तंत्र शास्त्र का ग्रंथ बन गया है। कहाँ शिव-पार्वती का संबंध और कहाँ काम सूत्र।
मैंने इसीलिए सुरतिसूत्र नाम से एक किताब लिखी है। केवल बाह्यानुभूति पर आधारित जीवन भारतीय जीवन नहीं है। इसी तरह केवल आंतरिक अनुभूति की बात एकांगी है, लोक की उपेक्षा के नकली दावे से भरा पाखंड है। अंतर एवं बाह्य उभयविध अनुभूति के साथ भारतीय जीवन चलता है।
आरंभ से ही दो प्रकार के परस्पर विरोधी उपाय वैदिक, बौद्ध जैन सभी धाराओं में होते रहे -
’ विद्या को सरल, सुलभ लोकोपयोगी बनाने का प्रयास
’ विद्या को हड़पने, ब्रांडिंग करने, अपने समुदाय/समूह के हित एवं वर्चस्व को निरंतर बनाए रखने का प्रयास।
आदिवासी/मूलवासी या सहज विकसित समाज के लोग अपनी विद्या को तो गुप्त या अपने लोगों तक सीमित रखने का प्रयास करते थे पर चालबाजी और ब्रांडिंग नहीं थी। विद्या की जातीय सीमा होने पर भी परस्पर आदान-प्रदान चलता था। संगठित बेईमानी संप्रदाय वालों ने शुरू की। इनके आदि प्रणेता गौतम बुद्ध हुए। उन्होंने ही सत्य/धर्म भले ही वह सापेक्ष हो उसकी बराबरी में संगठन/संघ को लाया। बुद्ध, संघ और धर्म की बराबरी ने अनेक संकट उत्पन्न किए।

भारत को समझने में भूल
भारत को समझने में कई स्तरों पर भूल की जाती है। कुछ भूल भारतीय शैली की है, कुछ आधुनिक एवं पाश्चात्य शैली की। दोनों ही शैलियों में भूल अनजान लोगों से ही होती है, जिसकी अधिकांश भूलों को लोगों के द्वारा दुहराए जाने के लिए संकीर्ण एवं वर्चस्ववादी लोगों ने गलत मापदंड बनाए। भारत में विभिन्न संप्रदायों ने विभिन्न राजे-रजवाड़ों एवं सेठों का सही एवं गलत दोनों प्रकार उपयोग किया।
साम्राज्यवादी लोगों ने अपनी श्रेष्ठता, वर्चस्व और शोषण के लिए भी पूरा वैचारिक स्तर का षडयंत्र किया, जिसके शिकार उनके देश के लोग भी हुए।
इनमें मुख्य भूलें निम्न हैं -
’ सभ्यता विकास की चरणबद्ध प्रक्रिया को ऐतिहासिक काल खंडों के अधीन मानना।
’ मार्क्स के चिंतन को हर मामले में अकाट्य मानना, उसी के अनुसार विकास की व्याख्या करना।
’ आर्य/अनार्य/द्रविड़ जैसे वर्गीकरण को आज की भारतीय समाज व्यवस्था में ढूढ़ना।
’ आधुनिक विज्ञान एवं परंपरा दोनों की सुविधानुसार घालमेल कर पक्षपाती निष्कर्ष निकालना।
’ राज्य, राजा एवं उसकी शासकीय सीमा एवं सांस्कृतिक धार्मिक सीमा को अलग-अलग नहीं मानना, जैसे- मगध को लें तो मगध सांस्कृतिक/धार्मिक रूप से न तो वर्तमान मगध प्रमंडल है, नहीं उज्जैन तक फैला हुआ, न मौर्यकालीन। वह स्थिर है, कर्मनाशा से पूरब, किउल से पश्चिम एवं गंगा से दक्षिण ।
’ स्रौत, स्मार्त धर्म की व्यवस्था के प्रति अनादर ताकि शैव, शाक्त, वैष्णव, आदि विविध संप्रदायों को अखिल भारतीय आचार के रूप में स्थापित किया जा सके।
’ बौद्ध, जैन, लोकायत, सहज प्रकृतिवादियों के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करना और चुपके से उनके द्वारा आविष्कृत विद्या को आत्मसात कर लेना।
’ परस्पर एक दूसरे को बिंबों/साधनों/भावों एवं विधियों का स्वयं गलत अर्थ आरोपित कर पुनः उनका व्यर्थ खंडन करना। इसे पूर्व पक्ष को प्रदूषित करना कहा जाता है।
’ शंकराचार्य-मंडनमिश्र के शास्त्रार्थ तक संदर्भहीन अनेकार्थक बातों के प्रयोग को विद्वत्ता माना जाता था। मिथिला में एक जबर्दश्त क्रांतिकारी चिंतन विकसित हुआ कि सटीक संदर्भयुक्त बात बोलना ही ज्ञानी का लक्षण है। इसे नव्य न्याय कहते हैं। नव्य न्याय के अनविष्कार के बाद बात बदलने की सुविधा जब समाप्त हो गई तो आज की पीएच. डी. के विषयों की मौलिकता वाली समस्या आ खड़ी हुई। सारे विद्या वारिधि तो हो नहीं सकते थे तो कुतर्क शास्त्रार्थ को ही शास्त्रार्थ मानना पड़ा।
’ ऐसे अनर्गल दुष्प्रभावों से मुक्त होकर भारतीय संस्कृति को जानने-समझने एवं जीने का सही तरीका भी है -
सही तरीका -
’ सांस्कृतिक क्षेत्रों को पहचानना एवं सांस्कृतिक प्रभावों को समझना ।
’ वेद-से उपनिषदों तक संस्कृति की यात्रा को पूरा न मानकर वेद-उपनिषद सूत्रग्रंथ, स्मृति, पुराण, उपपुराण, निबंध, ग्रंथों के रूप में ग्रंथों की पहचान करना एवं उनके क्षेत्रीय स्वरूप को समझना।
’ इसी प्रकार आगम परंपरा में भी वैदिक, बौद्ध, जैन आगम, तंत्र संप्रदाय, लोक की विविधता के तंत्र में समावेश के तरीके, समयचार एवं काल चक्र तंत्र के एकाकार होने की प्रक्रिया को समझना।
’ अलिखित फिर भी सर्वमान्य मूल्यों की समझ जैसे-पुराणों, आगमों का कोई लेखक नहीं होता किंतु मंत्रों/अनुष्ठानों के प्रवर्तक ऋषि होते हैं, आदि।
’ उपनिषदों को उलट कर पढ़ना एवं संप्रदायों की साधना विधियों तथा मूल चिंतन की समझ।
’ नए देवी-देवता तथा संप्रदायों के आविर्भाव-तिरोभाव की समझ।
इस दृष्टि से जब समझने का प्रयास होगा तभी सही ढंग से भारतीय संस्कृति संबंधी किसी शंका का समाधान हो सकेगा अन्यथा भगवान की लीला कथा के रूप में कृष्ण का सीता से और जानकी का कृष्ण से भी विवाह सिद्ध किया ही जा सकता है।