सोमवार, 21 अगस्त 2017

भरोसेमंद मुद्रा

देशी अर्थशास्त्र -
मुद्रा एवं माया
मुद्रा माया का प्रगट रूप है। माया मतलब न पूरी तरह झूठ, न पूरी तरह सच। कब धोखा दे दे, क्या पता? दिखाई-सुनाई कुछ पड़े और सच में तो कुछ और हो। मुद्रा की यही हालात है। अंग्रेजी में मनी और करेंसी कहते हैं। भारत में मुद्रा। भारत में मुद्रा कहने का मतलब तो मुझे पता है। करेंसी क्यों कहते हैं या नोट क्यों कहते हैं ठीक से नहीं पता। शायद नोट मतलब कोई छोटी लिखा पढ़ी हो, इसलिए नोट कहते हैं। रिर्जव बैंक के गवर्नर साहब एक नोट लिखते हैं - छोटी हुंडी कि मैं इतने रुपए दूँगा। आजकल लोग नोट ही देखते हैं, चेक, ड्राफ्ट वगैरह अंग्रेजी नाम वाले प्रकार भी कुछ लोगों को पता है। यह सब हुंडी और उसके मूल सिद्धांत पर विकसित है।
पहले तो ऐसा था कि मुद्रा कि जिम्मेवारी राजा पर और हुंडी की जिम्मेवारी सेठ पर होती थी। सेठ मतलब ऐसा धनी, जिसके यहाँ नगद भी पर्याप्त रहता हो। हुंडी का अविष्कार रास्ते में नगदी लूटे जाने के भय से और धातु की मुद्रा की भार से बचने के लिए किया गया था।
जिस किसी प्रकार से राजा के द्वारा अपनी पहचान वाली आकृति उकेरनी पड़ती थी, उस पक्की पहचान को मुद्रा कहते हैं। राजा, मंत्री से लेकर हर बड़े जिम्मेवार आदमी की शासकीय मुद्रा होती थी। इसे मुहर भी कहते हैं। इस प्रकार मुद्रा, मुहर, नोट वगैरह आए। करेंसी का खेल अलग है, उस पर दूसरी किश्त में।
इस व्यवहार में राजा एवं सेठ की क्षमता तथा विश्वसनीयता ही मूल बात है। दोनों में से कोई भी दीवालिया या धोखेबाज हो जाए तो मुद्रा का कोई मतलब नहीं क्योंकि ये मांगने पर देंगे ही नहीं। सेठ दीवालिया हो सकता है लेकिन राजा नहीं क्योंकि वह संप्रभु है, उसका राज्य की पूरी संपत्ति पर हक है, केवल राजकोश पर ही नहीं अतः उसके दीवालिया होने का प्रश्न ही नहीं। आज भी सेठ, निगम, वगैरह दीवालिया हो जाते हैं, ऐसे में किसी भी रूप में लिखी गई हंुडी, जैसे- नोट, चेक, डॉªफ्ट वगैरह बेकार। कुछ हुंडिया त्रिपक्षीय होती हैं, जैसे- ड्राफ्ट, बैंकर्स चेक वगैरह इसलिए मजबूत बिचौलिए की व्यवस्था रहती है, जैसे- बैंक।
खैर तो फिर आएं माया पर। आज का कागजी नोट, सिक्के धातुवाले ये सच्चे हैं या झूठे? अचानक झूठे कैसे हो गए? इन्हें मानने की मजबूरी क्या है? कैसे बचें इनकी जाल से? ऐसे अनेक प्रश्न हमारे मन में आते हैं।
कोई अनपढ हो तो उसकी मजबूरी है ही। थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे भी फंसते ही हैं और आधुनिकता की अंधी नकल करने वाले बिरले ही बचते हैं वे पूरी तरह फंसते हैं। तब कौन नहीं फसता? पहला, जो इस माया के खेल का आयोजक होता है और दूसरा वह चालाक, जो खेल की बारीकी को भांप कर वख्त पर विदा ले लेता है, पहला है मायापति दूसरा मायावी। इस माया से बचने का उपाय है- माया को जान लेना, असली और मोटे तौर पर। तब उसका बंधन कमजोर रहेगा, तब उसे तोड़ सकेंगे।
सोना-चाँदी या अन्य कोई भी कीमती धातु अथवा जमीन जायदाद को भी लोग माया कहते हैं। उसका मतलब होता है कि व्यक्ति विशेष उस पर कब तक कब्जा रख सकता है और क्या उपयोग कर सकता है, भले ही वह अपने को मालिक समझता हो। जबरन नियंत्रण, दूसरे को वंचित रखने के निजी एवं व्यवस्थागत-कानून-समस्या से संरक्षित बल पर निर्भर होता है। राजा, चोर, लुटेरा, धोखेबाज एवं दुर्घटना नियंत्रण के विघ्न हैं और तन-मन की भोग क्षमता का घटते जाना भोग में निजी विघ्न है। इसलिए सभी धनों को माया या अन्य प्रकार से संदेहस्पद बताया गया। मुद्रा का मामला इससे बिल्कुल अलग है, वह अपने स्वरूप में ही माया है।
सीधा केन्द्रीय मामला है कि मुद्रा मूल्य पर आधारित है। पहले वस्तु के मूल्य में हेराफेरी होती थी, मुद्रा विनिमय का माध्यम थी, सोने-चाँदी के रूप में, सोना-चाँदी का भंडार बनाकर उसके समानुपाती नोट/सिक्का छाप कर। इसके बाद जैसे ही कागज की हुंडी आई-नोट के रूप में सरकार के द्वारा जारी या अन्य व्यक्तियों अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा, मुद्रा राजा, बाजार एवं व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर हो गई। ऐसी स्थिति इसलिए बन पाती है क्योंकि हुंडी हर किसी भी मुद्रा के अभाव में अन्य संपत्तियों के बल पर उनके मूल्य से कम या बराबर सीमा में जायज तौर पर और केवल साख या संभावना के बल पर नाजायज तौर पर वास्तविक मुद्रा से हजारों गुना अधिक मात्रा में विनिमय के माध्यम के रूप में काम करती रहती है।
जब तक नगद भुगतान की स्थिति न आ जाए तब तक जाँच ही कैसे हो? इस प्रकार केवल मूल्य और विश्वास पर अर्थव्यवस्था चलती रहती है। ऐसी स्थिति अनेक लोगों के बीच निरंतर गतिशील अवस्था में बनी रहती है अतः राज्य या उसकी नियामक एंजेंसियों के नियंत्रण से बाहर हो जाती है।
जैसे ही हम नगदी रहित व्यवस्था की ओर बढ़ते हैं तो ध्यान में रखें कि ईमानदार हुंडी हुडी लेखक की संपूर्ण संपत्ति के बराबर तक जारी की जा सकती है और बेईमान हुंडी या संभावना आधारित हुंडी तो अनंत तक लिखी जा सकती है। संपत्ति की सीमा में साख, संभावना, बौद्धिक संपत्ति, पेटेंट अधिकार, व्याज, मुनाफा आदि को रखते ही संपत्ति की सीमा बहुत बढ़ जाती है और कोई भी व्यक्ति ऐसी संपत्ति के आधार पर दीवानी व्यवहार तो करता ही है, उस आधार पर हुंडी भी लिख सकता है। जब सबकुछ केवल डिजिटल रहे तो देनदारी-लेनदारी केवल अभासी रहेगी। यह माया नहीं तो क्या है?
आजकल बेईमानी आधारित कई व्यावसायिक संस्थाओं के स्वरूप बने हैं, जिसमें उसके अंशधारक लाभ के लिए तो हकदार होते हैं घाटा होने पर क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेवार नहीं होते। माना कि 5000 धनराशि और 1000 शेयर वाली 100 लोगों की एक कंपनी है। वह उन व्यक्तियों से अलग एक व्यक्ति हो जाती है। उससे कारोबार शुरू हुआ। इसने 2000 रूपए का कर्ज भी ले लिया। इसे 5000 का शुद्ध लाभ हो गया। वह लाभ तो शेयर धारकों को मिल जाएगा लेकिन यदि 10000 का घाटा हो जाए तो क्या 5000 की कुल संपत्ति के बाद शेयर धारकों से उनकी निजी संचित संपत्ति से क्षतिपूर्ति की जाती है? या सभी शेयर धारकों को दीवालिया घोषित किया जाता है? मुझे अपने देश की किसी ऐसी घटना का पता नहीं है। यहां यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं बड़ी पब्लिक कंपनियों के संदर्भ में कह रहा हूँ।
समाज जब ऐसी खुली बेईमानी/चालाकियों को स्वीकार करता हो, उसमें सारी अर्थव्यवस्था ही अनिश्चय, संभावना और अनियंत्रण का शिकार हो जाती है।
इसे आगे बढ़ाने को सरकार तथा बाजार दोनों की भूमिका होती है। ये दोनों अपने कपटी मायावी आचरण को सही साबित करने के लिए अजीबोगरीब मापदंड बनाते हैं और अर्धसत्य आधारित जटिलतम जाल बुना जाता है। इसे बुनने समझने वाले अर्थशास्त्री और संेधमार दोनों भारी लाभांश हड़पते हैं। एक दूसरे को जनता के हितों का दुश्मन और अपने को मित्र बताते हैं। यह सब चलता रहता है लेकिन ये मायावी लोग अर्थव्यवस्था के भीतरी बेईमानियों के विरूद्ध नहीं बोलते हैं कि -
1.            क्यों मुद्रा सीधे सोने-चाँदी की ही क्यों न कर दी जाए ?
2.            सापेक्ष अवमूल्यन क्यों न कर दिया जाए, जैसे 1000 = 1 रुपया, 1 रुपया = 10 पैसे, नोट तो ऐसे भी कम हो जाएगा, फिर सोने-चाँदी रहने दे। न रहे मुद्रा, न बने नकली। कम से कम बड़ें नोट तो वैसे ही रहे।
3.            छोट सिक्कों का मिला नहीं कारोबार पहले भी होता था आज भी हो सकता है लेकिन उससे उतनी क्षति नहीं होती ।
इसे और गहराई तथा विस्तार में जाने के लिए विनिमय, मूल्य, आश्वासन, लाभ-हानि के सिद्धांतों का विखंडन, गैरजिम्मेदारना कृत्रिम आर्थिक व्यक्तित्व, घाटे की अर्थव्यवस्था, स्थिर मुद्रा, मुद्रार्स्फीति आदि आज के जमाने की बात को तो समझना ही पड़ेगा। इन सारी धोखेबाजियों के बीच पिसती हुए भारतीय आम उत्पादक जनता हजारों साल से अपना बचाव कैसे करती है, कैसे जीती है, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मैंने अर्थव्यवस्था संबंधी ऐसे ही भारतीय विभिन्न मानकों तथा समझ तथा लाचार पर आधारित एक पुस्तक तैयार करने का यह प्रयास है। पहले इसे टुकड़ों में ब्लाग पर प्रस्तुत किया जायेगा फिर जरूरी होने पर प्रकाषित भी किया जा सकता है।
भारत सदियों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कर रहा है और रत्न, सोने आदि को संचय भी करता रहा  है। लुटेरे आक्रमण कर लूटते रहे हैं, फिर भी हमारा स्वर्ण भंडार खाली नहंीं होता क्योंक हम कुछ न कुछ निरंतर बेंच कर स्वर्ण खरीदते रहते हैं क्योंकि अनुभवी शिल्पी और व्यापारियों वाला यह देश जानता है कि सोना अन्य की तुलना में सर्वाधिक मान्य तथा मुसीबत में भरोसे वाला है। भारत में पहले दो पर ही भरोसा किया जाता था- गाय और सोना।
आशा है अपने देश के मन और धन को समझने में मेरे इस प्रयास से कुछ न कुछ सुविधा जरूर होगी।
                                                                                                                                                                                रवीन्द्र पाठक
               
मुद्रा माया का स्वरूप
मुद्रा रूपी माया निम्नलिखित अनिश्चयों पर आधारित होती है- मूल्य निर्धारण, मानकी करण, विश्वास एवं धोखा। इनका विश्लेषण बारी-बारी से करना होगा।
मूल्य निर्धारण - यह एक सापेक्ष प्रक्रिया है। मूल्य निर्धारण कौन करे? कैसे हो? यहीं से बेईमानी और पक्षपात का आरंभ होता है। पाप के 2 व्यापक आधार माने गए हैं- छल और बल। सभी संस्कृतियों में इसे मुख्य/गौण भेद से स्वीकार किया जाता है। मुझे किसी आपवादिक समाज या संस्कृति की जानकारी नहीं हैं, जहाँ दोनों या दोनों में से कोई भी एक, व्यवहार में आंशिक या पूर्णतः स्वीकृत न हो। भारतीय बिंबों में कहें तो देवता और राक्षस दो समृद्ध एवं संघर्षरत परंपराएँ हैं। इनके समानांतर यक्ष भी धनी हैं। ये देव-राक्षस दोनों के मित्र हैं। कुबेर या देशी भाषा में कारू के पास सबसे बड़ा खजाना रहता है। अपना धन घटने पर सभी उन्हीं पर चढ़ाई करते हैं। कुबेर यक्ष हैं। देवता छल में और राक्षस बल में विश्वास करते हैं। यक्ष सीधी स्पष्ट मैत्री में, दगा करने पर इनसे भयानक दंड मिलता है, क्षमा नहीं होती।
मुद्रा के अधिष्ठाता सच पूछिए तो यक्ष एवं उसकी परंपरा के लोग हैं जो बाद में देवों के अधीन चले गए। सांस्कृतिक संदर्भ आ गया अब आगे समझने में सुविधा होगी।
बार्टर या वस्तु विनिमय में बल प्रयोग होता है, वह भी परस्पर विवशता के शोषण द्वारा। मूल्य जैसी कोई बात वहां नहीं है- बस इतने के बदले में इतना। वर्तमान झारखंड एवं छत्तीसगढ़ के कुछ इलाके में नमक के बदले चिरौंजी एक मंहगा भोदभव वाला विनिमय व्यापारी करते थे। चिरौंजी- वर्तमान मूल्य लगभग 1000 किलो का दुगना नमक 2 किलो देते थे। यह मजबूरी आधारित व्यवहार का उदाहरण हुआ।
विनिमय में मूल्य, माप एवं मुद्रा तीनों के प्रवेश से संगठित व्यापार आरंभ होता है। आरंभ में ये तीनों अलग हैं। आज भी तीनों का स्वतंत्र अस्तित्व है लेकिन आप थोड़ी भी सावधानी से पिछले 100 साल का पता करें तो इस 100 साल में मुद्रा एक ही साथ मूल्य, माप एवं मुद्रा तीनों हैं।

भरोसेमंद मुद्रा
                आज जितने प्रकार के मौद्रिक कारोबार हैं, वे लगातार असुरक्षित होते जा रहे हैं। मुद्रा धारक  को भरोसा नहीं हो पा रहा कि--
1              पता नहीं कि कब महंगाई किती बढ़ जाए और मुद्रा का कितना अवमूल्यन हो जाए, उसकी क्रय शक्ति कितनी कम हो जाए?
2              घर में रखी मुद्रा किस दिन बेकार हो जाए? आप कह सकते हैं कि यह केवल कालेधन के बारे में है लेकिन मुद्रा को बदलने में आने वाली अड़चनों के अनुभव ऐसा नहीं बताते।
3              बैंक में रखी मुद्रा इंटरनेटी शाजिश से अपने खाते से ही गायब हो जाए?
4              अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एंजेंसियां कब किस देश की मुद्रा को सस्ता और कब किसे मंहगा बना दें?
5              और तो और कैसे पता करें कि कौन मुद्रा असली और कौन नकली है, जब विभिन्न देशों की सरकारें ही अपने प्रतिद्वंद्वी को परेशान करने के लिए नकली मुद्रा छाप कर गुप्त लोगों को बांटने लगें।
                ये परिस्थितियां देश एवं विदेश सभी जगह हैं। विनिमय का माध्यम मुद्रा ही जब स्वयं इतने खतरे में हो तो साफ बात है कि पूरा विनिमय, लेन-देन और बचत सभी खतरे में चले जाते हैं।
                सामान्यतः मुद्रा के 2 रूपों के बारे में लोगों को जानकारी है- मूल मुद्रा एवं उस पर आधारित हंुडीनुमा मुद्रा जैसे भारत में 2 से ले कर 2000 तक के नोट। इन पर आधारित अनेक प्रकार के हंुडी कारोबार होते हैं, जो द्विपक्षीय या बहुपक्षीय वायदों पर आधारित होते हैं, जैसे- चेक, ड्राफ्ट वगैरह। ये सभी निरंतर असुरक्षित होते जा रहे हैं।
                ऐसे में एक ऐसी मुद्रा की आवश्यकता है, जो स्थिर हो, जो नकली तौर पर न बने, उसे जारी करने वाला और रखने वाला दोनो कभी भी, किसी हाल में भी दीवालिया न हो सके, किसी की जमा पूंजी घर बैठे रखे-रखे न बरबाद हो सके ना ही कोई अंतरराष्ट्रीय नाजायज दबाव का शिकार हो।
                मैं ऐसी मुद्रा एवं ऐसी मौद्रिक व्यवस्था के बारे में सोच रहा हूं, जो सीधे तौर पर जनता के कब्जे में हो न कि बैंक, सरकार या अंतरराष्ट्रीय संगठनों के। आप लोगों में से क्या किसी की इस विषय में रुचि है? क्या सोचने में सह भागी होना चाहते हैं?
                यदि हां तो कमेंट बाक्स में सहमति और अपनी आरंभिक समझ व्यक्त कर सकते हैं।
भरोसेमंद मुद्रा 2
                पहले जो भारत में अंतर्राष्ट्रीय काराबार होते रहे, उसमें मुद्रा संबंधी व्यवस्था तो होगी ही। वह मुद्रा भी सभी को मान्य होनी चाहिए। ऐसा तो था नहीं कि पहले बेईमान लोग नहीं थे तो मिलावट वगैरह की समस्या से बचाना भी पड़ता होगा। राज्य भी छोटे बड़े अनेक थे और कुछ की समयावधि भी बहुत कम होती थी। ऐसे में क्या होता होगा? और यदि आज वैसी व्यवस्था बनायी जाए तो क्या समस्या या कैसा समाधान होगा?
                मुझे जो जानकारी मिली, उसके अनुसार भारत में कागजी मुद्रा नहीं थी। पाल काल तक धातु की ही मुद्राएं थीं। मुद्रा पर राजकीय चिह्न अंकित होते थे फिर भी उनका मौलिक एवं धातुकीय रूप वास्तविक तथा स्थिर था। मुझे तो लगता है कि मुद्रा नाम सोने की मुद्राओं से शुरू होता था। ऐसी मुद्रा बहुत मंहगी होती थी और दैनंदिन व्यवहार में इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। यह संचय तथा दूरदाज ले जाने या बहुमूल्य दान अथवा वेतन के काम आती थी।
                अधिक तम रुपये भर से दैनंदिन व्यवहार चल जाता था। रुपया मतलब चांदी का लगभग 8 ग्राम से कुछ अधिक का सिक्का, जो हिंदी पट्टी में 1 भर माना जाता है। ‘भर’ बहुमूल्य धातु छोड़  खनिज, मसाला, वगैरह से आगे अनाज आदि तौलने की आरंभिक इकाई होती है। तौल की इससे छोटी इकाई को फिर उसके खंडों में मापा जाता है, जैसे आठ आना भर आदि। आज भी सर्राफा बाजार में यह आंशिक रूप से लागू है।
                सस्ती सामग्री के लिए 1 रुपया बहुत होता था, अतः उससे कम के व्यवहार के लिए कांसे की मुद्रा होती थी, जिसे कार्षापण कहते हैं। उसके नीचे के लिए तांबे का सिक्का कहीं होता था कहीं नहीं या वस्तु विनिमय से काम चलता था। मावन श्रम तथा पशु श्रम के विनिमय के भी कई पेमाने थे, जो विभिन्न पशुओं के अनुसार तय होते थे। बैल एवं मनुष्य के श्रम के बीच के परिवर्तनीय पैमाने 1970-75 तक मेरी जानकारी में चलन में थे। योरप में शायद घोड़े के श्रम को आधार माना जाता था। मूल आशय यह कि सोना-चांदी-कांसा-तांबे की मुद्रा बनती थी।........
अगले पोस्ट में पूरा होगा कि इसमें
--मिलावट/नकलीपन से रक्षा की क्या युक्ति बैठायी गयी थी।
भरोसेमंद मुद्रा 3
                मुद्रा में मिलावट या नकली मुद्रा कब बनती है? तभी जब मुद्रा का बाजार मूल्य उसके भैतिक रूप से बहुत सस्ता हो, जैसे - कागज की मुद्रा या सस्ते धातु की मुद्रा। कागजी मुद्रा मेरी समझसे सुविधा के लिए बनी यह सही नहीं है। जैसे ही मुद्रा के अनुपात में गोल्ड रिजर्व का सिद्धांत वस्तुतः सरकारों के द्वारा मना जाए तो फिर नोट छापने की जरूरत ही क्यों पड़े? कम मुद्रा होने पर उसकी क्रयशक्ति बढ़ जाती है। समस्या का समाधान स्वयं हो जाता है। एक बात और, जरा गौर करें कि एक रुपये से अधिक के सारी मुद्राएं वस्तुतः मुद्रा नहीं, वे तो एक सरकारी हुंडी के समान हैं। मैं ने हुंडी रोकने की बात नहीं की है।
                धातु की मुद्रा के बारे में यह भी एक भ्रम है कि वह वजनी होती है। आज का उदाहरण लें या पहले का, सोना कितना वजनी? यह बात तो इस पर निर्भर करता है कि आप किस नोट से उसे तौलते हैं। नोट की छपाई पर जितना खर्च आता है, उससे बहुत कम यदि एक बार सोने या किसी स्थिर/उचित धातु पर सरकारी मुहर लगाने पर खर्च कर दिया जाए तो परिणामतः वह मुद्रा अपने मूल द्रब्य के बाजार भाव से महंगी हो जाएगी। तब कोई भी उसका प्रतिरूप क्यों बनायेगा? अभी भी नकली मुद्रा नहीं नकली हुडियां बन रही हैं। ये नकली हंुडियां चाहे नोट हों, चेक, ड्राफ्ट या किसी रूप में, उन्हीं में आसानी से मिलावट होती है। जैसे ही मुद्रा मूल धातु की बनेगी सारी समस्या समाप्त।
                रही बात चलन की, तो मुद्रा संबंधी गड़बड़ी सबसे अधिक अंतर्राष्ट्रीय कारोबार में ही होती है। यदि भारत की मुद्रा स्थिर हो जाए, तो उससे खुले आम किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी।
                असली पाप तो ‘सरप्लस इकोनामी’ नहीं, ‘सरप्लस करेंसी’ वाली सरकारी पाप दृष्टि की है, जो आज व्यापक है। ‘सरप्लस करेंसी’ अनजान लोगों के लिए याद दिला दूं - ‘सरप्लस करेंसी’ मतलब बिना गोल्ड रिजर्व रखे, नोट छापते जाना। इस खेल में सरकार, बैंक एवं अनेक केन्द्रीय मजदूर संगठन भारत में सभी एक साथ खेलते रहे। इस पर भी लिखूंगा। इन संगठनों और कामरेडों का नाटक और इनकी असली/नकली क्रांतिकारिता का तो लोगों को पता ही नहीं। ऐसी मूल समस्याओं की पहचान तथा विकल्प दिए बगैर हम समाधान कैसे ढूंढ सकेंगे?
                इसलिए सभी प्रश्न सादर शिरोधार्य हैं।

भरोसेमंद मुद्रा 4
                जैसे आज की तारीख में बाजार सीधे-सादे ढंग से केवल मांग-आपूर्ति के नियम से नहीं चलता। मूल्य का निर्धारण केवल इसी आधार पर नहीं होता। कृत्रिम मांग उत्पन्न करना, भंडारण के माध्यम से आपूर्ति रोकना, सरकारों द्वारा मूल्य नियंत्रण, कर छूट ही नहीं अंशदान-अनुदान आदि के माध्यम से भी किसी वस्तु के मूल्य को प्रभावित किया जाता है। ऐसा काम पूर्णतः पूंजीवादी तथा मिश्रित अर्थ व्यवस्था वाली दोनो सरकारें करती हैं।
                यहां तक की बात तो अब बहुत लोग जान गये हैं फिर भी अनेक लोग व्याज दर नियंत्रण, जमा-साख अनुपात, सरप्लस करेंसी, कराधान, ऋण नीति, सरकारी परिवहन नीति, जैसे- रेल भाड़े का समेकीकरण आदि उन उपायों को नहीं जानते, जिनके द्वारा सरकारें बाजार में कृत्रि़म मांग उत्पन्न कराती हैं और अर्थव्यवस्था को अपनी मर्जी के अनुरूप पक्षपात पूर्वक नियंत्रित करती हैं।
                इनमें मुद्रा से संबंधित मुख्य चार मामले हैं- 1. बराबर मूल्य के सुरक्षित सोने के बगैर करेंसी जारी करना, 2. हुंडी रूपी नोट/करेंसी को भी मुद्रा घोषित कर देना, 3. इस प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न मुद्रास्फीति को गैर सरकारी हुडियों, जैसे चेक, ड्राफ्ट, बांड वगैरह से उत्पन्न मुद्रास्फीति के साथ मिला कर बताना, 4. धीरे-धीरे बैंक एवं मुद्रा के मुद्रण को भी बाजार के हवाले करते जाना ताकि मुद्रा अबूझ बन जाए और शेयरबाजार की घपले बाजी से ही बड़े पूंजीपतियों, दलालों के हाथ चली जाए।
                यदि मुद्रा धातुरूपी हो और अपने बाजार मूल्य से बस थोड़ी ही अधिक हो तो इतनी घपले बाजी नहीें हो सकती। आंरभ में थोड़ी कठिनाई हो सकती है, खाश कर सोने के बाजार मूल्य के संबंध में। जैसे ही सरकार अपनी स्वर्णनीति को पारदर्शी एवं सोने के आयात को भारी कर से मुक्त कर दे, अनेक माफियाओं, आतंकवादियों का खेल ही खत्म हो जाए। इन पर नियंत्रण में जो खर्च होता है क्या सोने पर आयात के कर से लाभ अधिक होता है? मेरे अंदाजे से उत्तर ‘नहीं’ है क्योंकि यह मसला सामाजिक रार्ष्टीय सुरक्षा तक जाता है।
                सोना बिना जमा किए नोट छापना सरप्लस करेंसी है। इससे तुरत मुद्रा की क्रयशक्ति कम हो जाती है। इसे लगभग गोपनीय ढंग से किया जाता रहा। फिर भी इसकी पहली जानकारी रिजर्व बैंक तथा भारत सरकार के केन्द्रीय कार्यालयों के कर्मियों को पहले मिलती रही, फिर सभी बैंक कर्मियों को। मजदूर नेता गण इस पर हंगामा करते कि इतनी मिलावट की क्षतिपूर्ति होनी चाहिए, यह तो तनख्वाह कम करने का काम हो गया। इससे महंगाई बढ़ेगी ही। इस क्षतिपूर्ति को सच में तो सरप्लस करेंसी की क्षतिपूर्ति कहना चाहिए था लेकिन सरकार तथा सभी राजनैतिक यूनियनें इसे महंगाई भतता कहती रहीं। अनेक वामपंथी या दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री झूठी बहस करते। आंदोलन होता, क्रांति के नारे लगते और तय होता कि यदि मुद्रा में 10 प्रतिशत मिलावट हुई तो किस प्रकार के कर्मचारी को कितना महंगाई भत्ता मिले। सरकारी अफसर एवं नीति निर्माता दबाव बनाए रखते कि कुछ न कुछ गोलमाल अवश्य होना ही चाहिए। किसी भी हाल में केन्द्रीय सरकार एवं बैंक के कर्मियों को 8 प्रतिशत से अधिक भत्ता न मिले एवं अन्य को 2-3 बार की मिलावट के बाद केवल एक बार की क्षतिपूर्ति हो।

                अभी पर्दे के पीछे की कथा जारी है......................

रविवार, 30 जुलाई 2017

आखिर ऐसा क्यों, क्या लिखना ??
इन दिनों मैं लिखना लगभग बंद कर पढ़ने के बकाए काम में लगा हूं। लिखने के कई काम आधे- अधूरे पड़े हैं तो कुछ की शुरुआत ही नहीं हो सकी है। तैयारी में ही लगभग 20 साल बीत  गये।
जिसका आरंभ ही नहीं हो पाया, वह काम है- तंत्रालोक ग्रंथ का हिन्दी अनुवाद। यह  न केवल कश्मीर शैव परंपरा अपितु भारतीय तंत्र परंपरा के कई धाराओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। पता नहीं किसी अन्य भाषा में भी अनुवाद हो पाया या नहीं? अनुवाद के प्रकाशन एवं अनुवाद के मददगार फुटकर मदों में आर्थिक सहयोग की भी समस्या नहीं रही। बिहार योग विद्यालय के श्री स्वामी निरंजनानंद सरस्वती जी इसके लिए सदैव तत्पर रहे।
आज यह बात मैं बहुत भारी मन से लिख रहा हूं। मैं बिना पढ़े आश्वस्त हो गया था कि मैं ने न सही, एक बड़े विद्वान श्री परमहंस मिश्र जी ने यह काम कर दिया और संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी से यह ग्रंथ 8 भागों में प्रकाशित भी हो गया।
इस साल मैं ने समय निकाल कर इसे पढ़ना शुरू किया तब मुझे अपने 2 गुरुओं के द्वारा मेरे लेखन के ऊपर लगायी गयी पाबंदी का औचित्य पूरी तरह सामने आ गया।
आदरणीय मिश्रजी ने बहुत भारी श्रम किया है लेकिन यह सावधानी रखी कि बात आसानी से किसी को समझ में न आए, ...... हिन्दी में लिखें भी तो इस तरह कि अर्थ बोध संस्कृत से भी कठिन हो जाए? मेरे मन में सवाल उभरा --- आखिर ऐसा क्यों, क्या लिखना ??
आ. मिश्रजी भी कश्मीर शैव परंपरा के प्रख्यात गुरु एवं विद्वान पूज्य लक्ष्मणदेवजी के शिष्य होने का दावा करते हैं। लक्ष्मणदेवजी एक विद्वान विदेशी शिष्य हैं- जॉन ह्युग्स। उन्होने लक्ष्मणदेवजी के प्रवचनों के आधार पर एक पुस्तक तैयार की - ‘‘कश्मीर शैविज्म: द सिक्रेट सुप्रिम’’। वाह!!! कितनी सरल और सुबोध? एक      साधारण अंग्रेजी पढ़ने वाले के लिए भी सुगम और अर्थों को पगट करने वाला। इन दोनो को मेरा कोटिशः प्रणाम। अफसोस मिश्र जी!! आपने तो अपने गुरु से यही नहीं सीखा, तो क्यों, क्या लिखा?? संस्कृत पढ़े हिन्दी वालों की यह कैसी मानसिकता है?
अब अपने गुरु निर्देश की बात। पहला निर्देश--अपने आध्यात्मिक गुरु स्व. राम सुरेश पाण्डेय जी से मैं ने जब तंत्रालोक के अनुवाद की बात कही तो उन्होंने कहां देखो जी, पंडितों ने बहुत गडबड़ी की है। क्या तुमने इस ग्रंथ को समझ लिया है कि चले अनुवाद करने? अनुवाद क्यों किया जाता है? उसे सरल करके पाठकों तक पहुचाने के लिए, न कि और अधिक उलझा देने के लिए। मैं मना तो नहीं कर सकता लेकिन जब तक  स्वयं समझ में न आये, तब तक किसी भी पुस्तक का अनुवाद मत करना।
यह कैसे पता चले कि बात समझ में आयी या नहीं?? इसका समाधान मेरे एक अन्य गुरु प्रो. केदारनाथ मिश्र जी ने बताया था कि भारतीय धर्म, दर्शन या संस्कृति की बात जब तुम अंगरेजी में कह सको तो समझ लेना कि समझ गये। हिन्दी में कहने में क्या लगता है? उन्ही तत्सम तथा पारिभाषिक शब्दों को ही नहीं, उन्ही सर्वनामों के साथ केवल हिन्दी की विभक्तियों को जोड़ दो, हो गया अनुवाद, खुद समझ में आये न आये।
भारतीय गुरु विदेशियों पर इतने कृपालु क्यों? इसका एक उत्तर तो यह भी मिला कि जो गुरु स्वयं उदार हो कर विषय को प्रगट करना चाहता हो, उसी तरह बोलता हो वह भला क्यों चाहेगा कि उसके देशी या ब्राह्मण शिष्य कोई भी उसे फिर से उलझायें या अति गुप्त दुरूह बना दें।
आखिर ऐसा क्यों, क्या लिखना ?

गुरुवार, 4 मई 2017

वैश्य, वणिक और शिल्पी


देशी अर्थ शास्त्र
वैश्य, वणिक और शिल्पी
जैसे ही यह मान लिया जाता है कि आरंभ से आज तक भारत एक कृषिप्रधान देश रहा है, एसकी व्यापारिक गतिविधियों की उपेक्षा होने लगती है। यह मामला आज तक चालू है और इससे कई बार लाभ भी मिलता है।
कृषि और छोटे शिल्प को यदि राज्य का समर्थन और संरक्षण न भी मिले तो वे अपनी स्थानीय जरूरत तथा मांग के बल पर जिंदा रहते हैं। इस बाजार पर जब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या विपणन शामिल नहीं रहता तो इस पर वैश्विक तेजी-मंदी का भी असर कम होता है। इसे संभालने-चलाने वाले आढ़ती भी टैक्स बचाने की जुगत में अधिक कारोबार नगदी ही करते हैं।
पढ़े लिखे लोगों के सामने ही तो यह हो रहा है लेकिन इसे स्वीकारने को न पहले तैयार थे, न आज। पता नहीं कितने प्रकार की हुंडि़या बाजार में हैं। उनमें उत्पादन से उपभोग तक अगर गैर नगद व्यवहार में हो ही जाए तो क्या कर लेगी सरकार? यह एक नयी मौद्रिक प्रणाली जैसी होगी, न बार्टर न पूर्णतः मौद्रिक।
इस उदाहरण को और ऐसी क्रियाओं को अनदेखा करने की प्रवृत्ति पुरानी है। सामान्य समझ वाली वर्ण व्यवस्था की दृष्टि से देखें, जो सच नहीं है, तब भी शिल्पियों को तो वैश्य कोटि में होना ही चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। वैश्य वर्ण से उत्पादक शिल्पिियों को विपणन करने वाले वणिकों ने बाहर धकेलना शुरू कर दिया। लोहानी, लोहिया का मतलब लोहा का उत्पादक नहीं होता बल्कि उसका विपणन करने वाला होता है। उनमें भी जो जितनी महंगी और टिकाउ बस्तु का व्यापार करे, उसका कद उतना ही बड़ा, वही श्रेष्ठ। उसकी श्रेष्ठता धीरे-धीरे बढ़ने लगी और बाद में वह महाजन हो गया। हद तो तब हो गयी जब आढ़त का काम करने वाला बनिया या वणिक ही रहा और शुद्ध नगदी लेनदेन को महाजनी कहा जाने लगा।
महाजनी कारोबार एक प्रकार से राज्य के समानांतर मौद्रिक नियंत्रण का खेल है। सरकारी स्तर पर मुद्रा रूपी दूध को बिना गोल्ड रिजर्व रखे नोट रूपी पानी द्वारा जितना स्फीत यानी पतला किया जाता है, ये महाजन उसे कई गुना अधिक पतला कर देते हैं, समानांतर अनेक प्रकार की हुडियों के द्वारा। इनकी साख जब तक है, इसे रोकना मुश्किल है।
भारत में वैश्य कोटि से अनेक शिल्पी गायब हैं- रहें भी तो कैसे? सूत कातने वाले, पशुपालन करने वाले, दवा बनानेवाले, मूर्ति बनाने वाले, खेती-पानी की व्यवस्था करने वाले इनमें से थाक के थोक ब्राह्मण रहे और आज भी सूत कातना छोड़ कर शेष में इनका बड़ा भाग है। गांधी जी के चेलों ने यदि गैर मिली सूत व्यवसाय से योजनापूर्वक ब्राह्मणों को बाहर करने का काम नहीं किया होता तो कमसे कम पूर्वी भारत में ब्राह्मणों की माली हालात इतनी नहीं बिगड़ती।
चमार को सबसे पहले और कुम्हार को शायद बाद में अछूत श्रेणी में डाला गया। पटहोरी अगरिया, तांती, पटवा आदि अभी वार्णिक पहचान के लिए झूल ही रहे थे कि इसी बीच आरक्षण ने सारा खेल बदल दिया।

गुरुवार, 2 मार्च 2017

परोक्ष कर एवं भुगतान

घोखाधड़ी एवं शोषण का मायावी जाल
माया का मतलब जो दिखाई पड़े उससे अलग। परोक्ष कर आखिर क्यों लगाया जाता है? इसलिए कि कर दाता को न समझ में आए न महसूस हो। भारत में पहले राज्य द्वारा सीधे-सीधे उत्पादक से छठा या आठवां भाग कर में ले लिया जाता था। आरंभिक स्मृति ग्रंथों में ऐसा लिखा मिलेगा। उस समय लंबी दूरी तक व्यापार करने वाले वणिक्वर्ग एवं अन्य सेवा प्रदाता, जैसे चिकित्सक, सराय चलाने वाले, वेश्याएं, नाचने गाने वाले, आढ़ती एवं सार्थवाह अर्थात मालवाहक चलन में नहीं थे। किसान, शिल्पी एवं स्थानीय बाजार का ढांचा था। उसके बाद दूरदराज माल बेंचने के साथ अन्य जटिल व्यवस्थाएं बनने लगीं। चूंकि उत्पादक से अधिक लाभ सेवा प्रदाता एवं माल बेंचने वाले उठा रहे थे इसलिए राज्य ने उन पर भी शुल्क एवं कर लगाना शुरू कर दिया। कर का स्वरूप मूलतः प्रत्यक्ष होता है एवं कर देने वाले को सीधा समझ में आता है, अनुभव में आता है। इसके आधार पर राजा के व्यवहार तथा पक्षपात को जानना पहचाना आसान होता है। इसके विपरीत विभिन्न स्तरों पर लगाए जाने वाले कर एवं शुल्क को बिचौलिए व्यापारी माल की कीमत में जोड़ते जाते हैं जिससे माल की कीमत बढ़ती जाती है।
ये किसान एवं शिल्पी नहीं हैं। भारत में पहला मायावी आर्थिक षडयंत्र यह हुआ कि कृषि, पशु पालन एवं वाणिज्य तीनों को वैश्य के कर्म की कोटि में सम्मिलित कर दिया गया। शिल्पियों का नामोनिशान तक नहीं। यह घालमेल आप गीता में तो देख सकते हैं लेकिन अन्य समाज व्यवस्था या राजकाल वाले असली व्यावहारिक ग्रथों में नहीं। इससे यह आशंका प्रबल होती है कि गीता का यह अंश कहीं प्रक्षिप्त तो नहीं।
इस प्रकार 3 मुख्य गलत सूचनाएं प्रचारित की गईं, जिसके विरुद्ध समाज व्यवस्था या राजकाल वाले असली व्यावहारिक ग्रंथ, नाटक, यात्रा विवरण आदि अनेक स्रोंतों से पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं। ऐसे असत्य उदाहरण के लिए गौर करें-- 1 ब्राह्मण खेती नहीं करते, 2 शिल्पियों का वर्ण निश्चय नहीं करना तथा उनका अनेक बार उल्लेख तक ही नहीं करना।
मेरे अनुमान से यह पाप भारतीय एवं विेदेशी दोनो प्रकार के बड़े व्यापारियों के दबाव में किया गया। ताकि शिल्पियों को वैश्य की जगह शूद्र वर्ण में स्थान दिलाया जा सके और ब्राह्मणों से जमीन छीन कर बड़े व्यापारियों/वैश्यों के कब्जे में दी जा सके। अन्य षडयंत्रों की तरह जमीनी स्तर पर यह षडयंत्र सफल नहीं हो सका। पालीवाल, कोहली एवं भूमिहार लगातार बड़े स्तर पर भूमि सुधार, जल प्रबंधन, एवं खेती से गहन रूप से जुड़े रहे। भूमहारों की तरह अन्य कई जातियां हैं, जिन्होने ब्राह्मणों के परंपरागत अन्य पेशों को छोड़ भूस्वामित्ववाले पेशे को स्वीकार किया। शेष ब्राह्मणों ने जमीन के साथ अन्य पेशे भी जारी रखे।
कर एवं शुल्क के घालमेल ने राजा के व्यहार को समझने में भारी असुविधा की जैसे आज प्रत्यक्ष कर की जगह परोक्ष कर की चलन अधिक है ताकि उपभोक्ता को पता न चले कि किस सामान पर राज्य कितना कर वसूल कर रहा है।

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

देशी अर्थ शास्त्र: कारू का खजाना


ये कारू कौन हैं? संस्कृत में इन्हें कुबेर कहते हैं। देवता एक वर्ग है। इसके अंतर्गत कई प्रकार के देवता आते हैं। इस वर्ग को देव योनि कहा गया है। देव, असुर, नाग, यक्ष, गंधर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्यक, सिद्ध एवं भूत ये सभी मनुष्यों द्वारा पूजित भी होते हैं इसलिए इन्हें देव योनि भी कहते हैं। यह विवरण ‘अमर कोश’ का है।
कुबेर एक यक्ष हैं। कुछ लोग यक्षों को गुह्यक या गुह्य भी कहते हैं। इनका निवास हिमालय में माना गया है। सारी धन दौलत न सही दुर्लभ धन-दौलत, खाश कर रत्न एवं सोना चांदी जैसे दुर्लभ रत्न इनके पास भारी मात्रा में होता है। इनकी स़्ित्रयां भी संपत्ति पर पूरा हिस्सा रखती हैं। ये मांसाहारी होते हैं और इन्हें मांस के अतिरिक्त सीधा रुघिर पीना भी पसंद आता है।
ये प्रसन्न होने पर मांगने पर प्रचुर धन देते हैं। इनकी औरतें भी घूमती रहती हैं और वे किसी अन्य पुरुष से किसी भी प्रकार, जैसे- मां, बहन, बेटी का संबंध भी बना सकती हैं। ये यक्ष-यक्षिणी वादे के पक्के होते हैं और इन्हें वादा खिलाफी एकदम नामंजूर होता है। जैसे दिल खोल कर देते हैं उसी तरह भयानक रूप से वसूलते भी हैं। ये राज्य या समाज व्यवस्था की जगह निजी वादों एवं अपने संगठनात्मक नियमों में अघिक भरोसा रखते हैं। ये मूलतः शैव हैं और कुबेर शिव से मैत्री भाव रखते हैं। हिमालय में रहने पर भी ये रंग से काले होते हैं, लंबे होते हैं और इनकी स़्ित्रयों के विशाल लंबे स्तन/पयोधर भी होते हैं। इनकीे आराध्य देवी गुह्येश्वरी हैं।
बाद में बौद्ध धर्म में गुह्य समाज साधना परंपरा विकसित हुई। मगध से ले कर हिमालय नेपाल तक इनके केन्द्र विकसित हुए। अन्यत्र भी बने होंगे, जिनका मुझे नहीं पता।
इनके सामाजिक संदर्भ को उपर्युक्त विवरण से समझा जा सकता है। इनका कोई राज्य नहीं होता। मौका पड़ने पर संभी देवता, असुर, नाग या राजा भारी धन इन्हीं से प्राप्त करते हैं। ऐसे प्रसंगों, कथानकों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है। मतलब कि इस पहचान से स्पष्ट होता है कि राज्य व्यवस्था से अलग भी धन की कोई व्यवस्था भारत में हो सकती है और रही है। लक्ष्मी जी समुद्र मंथन से निकली हैं। वे विष्णु भगवान की पत्नी हैं। विष्णु राजा की भांति हैं। इस व्यवस्था में राजा ही राज्य एवं धन दोनों का स्वामी है। यक्ष-यक्षिणियों की समानांतर सत्ता है। वे लक्ष्मी या नारायण विष्णु के अधीन नहीं हैं।
इस प्रकार से भारतीय समाज की अर्थ व्यवस्था का एक अलग चित्र बनता हैं, जो तुलनात्मक रूप से कम चर्चित रहा है। अन्य पक्ष अगली किश्त में।

रविवार, 1 जनवरी 2017

मुद्रा माया का स्वरूप


मुद्रा रूपी माया निम्नलिखित अनिश्चयों पर आधारित होती है- मूल्य निर्धारण, मानकी करण, विश्वास एवं धोखा। इनका विश्लेषण बारी-बारी से करना होगा।
मूल्य निर्धारण - यह एक सापेक्ष प्रक्रिया है। मूल्य निर्धारण कौन करे? कैसे हो? यहीं से बेईमानी और पक्षपात का आरंभ होता है। पाप के 2 व्यापक आधार माने गए हैं- छल और बल। सभी संस्कृतियों में इसे मुख्य/गौण भेद से स्वीकार किया जाता है। मुझे किसी आपवादिक समाज या संस्कृति की जानकारी नहीं हैं, जहाँ दोनों या दोनों में से कोई भी एक, व्यवहार में आंशिक या पूर्णतः स्वीकृत न हो। भारतीय बिंबों में कहें तो देवता और राक्षस दो समृद्ध एवं संघर्षरत परंपराएँ हैं। इनके समानांतर यक्ष भी धनी हैं। ये देव-राक्षस दोनों के मित्र हैं। कुबेर या देशी भाषा में कारू के पास सबसे बड़ा खजाना रहता है। अपना धन घटने पर सभी उन्हीं पर चढ़ाई करते हैं। कुबेर यक्ष हैं। देवता छल में और राक्षस बल में विश्वास करते हैं। यक्ष सीधी स्पष्ट मैत्री में, दगा करने पर इनसे भयानक दंड मिलता है, क्षमा नहीं होती।
मुद्रा के अधिष्ठाता सच पूछिए तो यक्ष एवं उसकी परंपरा के लोग हैं जो बाद में देवों के अधीन चले गए। सांस्कृतिक संदर्भ आ गया अब आगे समझने में सुविधा होगी।
बार्टर या वस्तु विनिमय में बल प्रयोग होता है, वह भी परस्पर विवशता के शोषण द्वारा। मूल्य जैसी कोई बात वहां नहीं है- बस इतने के बदले में इतना। वर्तमान झारखंड एवं छत्तीसगढ़ के कुछ इलाके में नमक के बदले चिरौंजी एक मंहगा भोदभव वाला विनिमय व्यापारी करते थे। चिरौंजी- वर्तमान मूल्य लगभग 1000 किलो का दुगना नमक 2 किलो देते थे। यह मजबूरी आधारित व्यवहार का उदाहरण हुआ।
विनिमय में मूल्य, माप एवं मुद्रा तीनों के प्रवेश से संगठित व्यापार आरंभ होता है। आरंभ में ये तीनों अलग हैं। आज भी तीनों का स्वतंत्र अस्तित्व है लेकिन आप थोड़ी भी सावधानी से पिछले 100 साल का पता करें तो इस 100 साल में मुद्रा एक ही साथ मूल्य, माप एवं मुद्रा तीनों हैं।
पुराने सिक्कों का वजन तय रहता था। रूपया एक सिक्का और वजन दोनों होता था, रुपये का मतलब ही होता था चांदी वाला । रूप का आरंभ चांदी से हाता है। यह दूसरे मायावी तेत्र का वि ाय है। उसी प्रकार अठन्नी वगैरह सर्राफा बाजार 15 साल पहले तक इसी प्रकार चल रहा था। पहले विक्टोरिया मार्क चांदी का सिक्का और बाघ छाप अठन्नी का भाव आनुपातिक रूप से तय था। सोना और मसाले उसी आधार पर तौले जाते थे।
इस प्रकार 1 रूपया, 1 रूपया चाँदी, 1 रूपया या चाँदी का सिक्का स्वतः एक मूल्य का समानुपाती स्थिर रूप था। उस पर मुहर चाहे जिस राजा या व्यापारी की हो। माप एवं गुण में एक ही समान होना ही चाहिए।
नोट छापने की चलन के समय नियम बना कि तात्कालिक नोट मूल्य भर सोना भंडार में रख कर ही नोट छापा जाएगा। इससे मुद्रा की कीमत सोने के संदर्भ में लगभग स्थिर एवं उस पर भुगतान क्षमता स्थिर होती थी। बाजार की अन्य वस्तु में जो मंदी या महंगाई आए रूपये की क्रय शक्ति वही रहती थी। माना जाता है कि 1960 तक भारत में यह नियम था। यह ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें कुछ सामग्री सस्ती, कुछ महंगी हो सकती है, एक ही साथ सबकुछ महंगा नहीं हो सकता। महंगाई मांग-पूर्ति के सापेक्ष होगी।
मुद्रा के क्या-क्या उपयोग हैं इस पर विवाद होता रहता है। हमारे स्कूली इकोनोमिक्स में बताया जाता था - मुद्रा के चार कार्य महान - संचय विनिमय, वितरण और भुगतान। यह नोटयुग वाली नोट पक्षीय व्याख्या है। इसमें 5 वां मापन गायब है।
आपमें से अनेक लोग नहीं जानते कि केवल भौातिक धन ही नहीं; मानव श्रम, पशुश्रम आदि को भी मुदा्र के सापेक्ष परिवर्तन एवं मूल्यांकन की प्रणालियां भारत में विकसित की गई थीं। उदाहरण के लिए एक मजदूर किसान के हल बैल का उपयोग करता है और वह उसका भुगतान अपनी मजदूरी में करना चाहता है, तो इसका क्या आधार-पैमाना होगा? मजदूरी को नगदी या अन्न में परिवर्तन करने की जगह सीधा मानव श्रम = पशु श्रम का सिद्धांत था। पूर्वाेक्त उदाहरणों को सावधानी से देखें तो स्पष्ट होता है कि कई चरणों में विभ्रम, अनिश्चय एवं बेईमानी की काफी गुंजाइश है, जैसे वस्तु, विनिमय के समय अनुपात तय करने में।
मूल्य निर्धारण में आरंभिक दौर में मुद्रा विनिमय का माध्यम था न कि गाय बकरी की तरह, क्षरणशील या उत्पादक। ध्यान में रखे कि एक समय गाय को भी मुद्रा के रूप में उपयोग किया गया था लेकिन यह बहुत पहले जमाने की बात है।
सोना न बढ़ता ह, न घटता है, उसी तरह चाँदी तांबा, जस्ता, वगैरह। इसमें मिलावट या नकली मुद्रा तभी बनती है, जब सिक्के की क्रयशक्ति उसके वास्तविक मूल्य से अधिक हो। नोट वाली बीमारी यहाँ भी हो।
ंजारी....

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

देशी अर्थशास्त्र - मुद्रा एवं माया

देशी अर्थशास्त्र - मुद्रा एवं माया
मुद्रा माया का प्रगट रूप है। माया मतलब न पूरी तरह झूठ, न पूरी तरह सच। कब धोखा दे दे, क्या पता? दिखाई-सुनाई कुछ पड़े और सच में तो कुछ और हो। मुद्रा की यही हालात है। अंग्रेजी में मनी और करेंसी कहते हैं। भारत में मुद्रा। भारत में मुद्रा कहने का मतलब तो मुझे पता है। करेंसी क्यों कहते हैं या नोट क्यों कहते हैं ठीक से नहीं पता। शायद नोट मतलब कोई छोटी लिखा पढ़ी हो, इसलिए नोट कहते हैं। रिर्जव बैंक के गवर्नर साहब एक नोट लिखते हैं - छोटी हुंडी कि मैं इतने रुपए दूँगा। आजकल लोग नोट ही देखते हैं, चेक, ड्राफ्ट वगैरह अंग्रेजी नाम वाले प्रकार भी कुछ लोगों को पता है। यह सब हुंडी और उसके मूल सिद्धांत पर विकसित है।
पहले तो ऐसा था कि मुद्रा कि जिम्मेवारी राजा पर और हुंडी की जिम्मेवारी सेठ पर होती थी। सेठ मतलब ऐसा धनी, जिसके यहाँ नगद भी पर्याप्त रहता हो। हुंडी का अविष्कार रास्ते में नगदी लूटे जाने के भय से और धातु की मुद्रा की भार से बचने के लिए किया गया था।
जिस किसी प्रकार से राजा के द्वारा अपनी पहचान वाली आकृति उकेरनी पड़ती थी, उस पक्की पहचान को मुद्रा कहते हैं। राजा, मंत्री से लेकर हर बड़े जिम्मेवार आदमी की शासकीय मुद्रा होती थी। इसे मुहर भी कहते हैं। इस प्रकार मुद्रा, मुहर, नोट वगैरह आए। करेंसी का खेल अलग है, उस पर दूसरी किश्त में।
इस व्यवहार में राजा एवं सेठ की क्षमता तथा विश्वसनीयता ही मूल बात है। दोनों में से कोई भी दीवालिया या धोखेबाज हो जाए तो मुद्रा का कोई मतलब नहीं क्योंकि ये मांगने पर देंगे ही नहीं। सेठ दीवालिया हो सकता है लेकिन राजा नहीं क्योंकि वह संप्रभु है, उसका राज्य की पूरी संपत्ति पर हक है, केवल राजकोश पर ही नहीं अतः उसके दीवालिया होने का प्रश्न ही नहीं। आज भी सेठ, निगम, वगैरह दीवालिया हो जाते हैं, ऐसे में किसी भी रूप में लिखी गई हंुडी, जैसे- नोट, चेक, डॉªफ्ट वगैरह बेकार। कुछ हुंडिया त्रिपक्षीय होती हैं, जैसे- ड्राफ्ट, बैंकर्स चेक वगैरह इसलिए मजबूत बिचौलिए की व्यवस्था रहती है, जैसे- बैंक।
खैर तो फिर आएं माया पर। आज का कागजी नोट, सिक्के धातुवाले ये सच्चे हैं या झूठे? अचानक झूठे कैसे हो गए? इन्हें मानने की मजबूरी क्या है? कैसे बचें इनकी जाल से? ऐसे अनेक प्रश्न हमारे मन में आते हैं।
कोई अनपढ हो तो उसकी मजबूरी है ही। थोड़ा बहुत पढ़े-लिखे भी फंसते ही हैं और आधुनिकता की अंधी नकल करने वाले बिरले ही बचते हैं वे पूरी तरह फंसते हैं। तब कौन नहीं फसता? पहला, जो इस माया के खेल का आयोजक होता है और दूसरा वह चालाक, जो खेल की बारीकी को भांप कर वख्त पर विदा ले लेता है, पहला है मायापति दूसरा मायावी। इस माया से बचने का उपाय है- माया को जान लेना, असली और मोटे तौर पर। तब उसका बंधन कमजोर रहेगा, तब उसे तोड़ सकेंगे।
सोना-चाँदी या अन्य कोई भी कीमती धातु अथवा जमीन जायदाद को भी लोग माया कहते हैं। उसका मतलब होता है कि व्यक्ति विशेष उस पर कब तक कब्जा रख सकता है और क्या उपयोग कर सकता है, भले ही वह अपने को मालिक समझता हो। जबरन नियंत्रण, दूसरे को वंचित रखने के निजी एवं व्यवस्थागत-कानून-समस्या से संरक्षित बल पर निर्भर होता है। राजा, चोर, लुटेरा, धोखेबाज एवं दुर्घटना नियंत्रण के विघ्न हैं और तन-मन की भोग क्षमता का घटते जाना भोग में निजी विघ्न है। इसलिए सभी धनों को माया या अन्य प्रकार से संदेहस्पद बताया गया। मुद्रा का मामला इससे बिल्कुल अलग है, वह अपने स्वरूप में ही माया है।
सीधा केन्द्रीय मामला है कि मुद्रा मूल्य पर आधारित है। पहले वस्तु के मूल्य में हेराफेरी होती थी, मुद्रा विनिमय का माध्यम थी, सोने-चाँदी के रूप में, सोना-चाँदी का भंडार बनाकर उसके समानुपाती नोट/सिक्का छाप कर। इसके बाद जैसे ही कागज की हुंडी आई-नोट के रूप में सरकार के द्वारा जारी या अन्य व्यक्तियों अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा, मुद्रा राजा, बाजार एवं व्यक्ति के नियंत्रण से बाहर हो गई। ऐसी स्थिति इसलिए बन पाती है क्योंकि हुंडी हर किसी भी मुद्रा के अभाव में अन्य संपत्तियों के बल पर उनके मूल्य से कम या बराबर सीमा में जायज तौर पर और केवल साख या संभावना के बल पर नाजायज तौर पर वास्तविक मुद्रा से हजारों गुना अधिक मात्रा में विनिमय के माध्यम के रूप में काम करती रहती है।
जब तक नगद भुगतान की स्थिति न आ जाए तब तक जाँच ही कैसे हो? इस प्रकार केवल मूल्य और विश्वास पर अर्थव्यवस्था चलती रहती है। ऐसी स्थिति अनेक लोगों के बीच निरंतर गतिशील अवस्था में बनी रहती है अतः राज्य या उसकी नियामक एंजेंसियों के नियंत्रण से बाहर हो जाती है।
जैसे ही हम नगदी रहित व्यवस्था की ओर बढ़ते हैं तो ध्यान में रखें कि ईमानदार हुंडी हुडी लेखक की संपूर्ण संपत्ति के बराबर तक जारी की जा सकती है और बेईमान हुंडी या संभावना आधारित हुंडी तो अनंत तक लिखी जा सकती है। संपत्ति की सीमा में साख, संभावना, बौद्धिक संपत्ति, पेटेंट अधिकार, व्याज, मुनाफा आदि को रखते ही संपत्ति की सीमा बहुत बढ़ जाती है और कोई भी व्यक्ति ऐसी संपत्ति के आधार पर दीवानी व्यवहार तो करता ही है, उस आधार पर हुंडी भी लिख सकता है। जब सबकुछ केवल डिजिटल रहे तो देनदारी-लेनदारी केवल अभासी रहेगी। यह माया नहीं तो क्या है?
आजकल बेईमानी आधारित कई व्यावसायिक संस्थाओं के स्वरूप बने हैं, जिसमें उसके अंशधारक लाभ के लिए तो हकदार होते हैं घाटा होने पर क्षतिपूर्ति के लिए जिम्मेवार नहीं होते। माना कि 5000 धनराशि और 1000 शेयर वाली 100 लोगों की एक कंपनी है। वह उन व्यक्तियों से अलग एक व्यक्ति हो जाती है। उससे कारोबार शुरू हुआ। इसने 2000 रूपए का कर्ज भी ले लिया। इसे 5000 का शुद्ध लाभ हो गया। वह लाभ तो शेयर धारकों को मिल जाएगा लेकिन यदि 10000 का घाटा हो जाए तो क्या 5000 की कुल संपत्ति के बाद शेयर धारकों से उनकी निजी संचित संपत्ति से क्षतिपूर्ति की जाती है? या सभी शेयर धारकों को दीवालिया घोषित किया जाता है? मुझे अपने देश की किसी ऐसी घटना का पता नहीं है। यहां यह स्पष्ट कर दूँ कि मैं बड़ी पब्लिक कंपनियों के संदर्भ में कह रहा हूँ।
समाज जब ऐसी खुली बेईमानी/चालाकियों को स्वीकार करता हो, उसमें सारी अर्थव्यवस्था ही अनिश्चय, संभावना और अनियंत्रण का शिकार हो जाती है।
इसे आगे बढ़ाने को सरकार तथा बाजार दोनों की भूमिका होती है। ये दोनों अपने कपटी मायावी आचरण को सही साबित करने के लिए अजीबोगरीब मापदंड बनाते हैं और अर्धसत्य आधारित जटिलतम जाल बुना जाता है। इसे बुनने समझने वाले अर्थशास्त्री और संेधमार दोनों भारी लाभांश हड़पते हैं। एक दूसरे को जनता के हितों का दुश्मन और अपने को मित्र बताते हैं। यह सब चलता रहता है लेकिन ये मायावी लोग अर्थव्यवस्था के भीतरी बेईमानियों के विरूद्ध नहीं बोलते हैं कि -
1. क्यों मुद्रा सीधे सोने-चाँदी की ही क्यों न कर दी जाए ?
2. सापेक्ष अवमूल्यन क्यों न कर दिया जाए, जैसे 1000 = 1 रुपया, 1 रुपया = 10 पैसे, नोट तो ऐसे भी कम हो जाएगा, फिर सोने-चाँदी रहने दे। न रहे मुद्रा, न बने नकली। कम से कम बड़ें नोट तो वैसे ही रहे।
3. छोट सिक्कों का मिला नहीं कारोबार पहले भी होता था आज भी हो सकता है लेकिन उससे उतनी क्षति नहीं होती ।
इसे और गहराई तथा विस्तार में जाने के लिए विनिमय, मूल्य, आश्वासन, लाभ-हानि के सिद्धांतों का विखंडन, गैरजिम्मेदारना कृत्रिम आर्थिक व्यक्तित्व, घाटे की अर्थव्यवस्था, स्थिर मुद्रा, मुद्रार्स्फीति आदि आज के जमाने की बात को तो समझना ही पड़ेगा। इन सारी धोखेबाजियों के बीच पिसती हुए भारतीय आम उत्पादक जनता हजारों साल से अपना बचाव कैसे करती है, कैसे जीती है, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मैंने अर्थव्यवस्था संबंधी ऐसे ही भारतीय विभिन्न मानकों तथा समझ तथा लाचार पर आधारित एक पुस्तक तैयार करने का यह प्रयास है। पहले इसे टुकड़ों में ब्लाग पर प्रस्तुत किया जायेगा फिर जरूरी होने पर प्रकाषित भी किया जा सकता है।
भारत सदियों से अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कर रहा है और रत्न, सोने आदि को संचय भी करता रहा  है। लुटेरे आक्रमण कर लूटते रहे हैं, फिर भी हमारा स्वर्ण भंडार खाली नहंीं होता क्योंक हम कुछ न कुछ निरंतर बेंच कर स्वर्ण खरीदते रहते हैं क्योंकि अनुभवी शिल्पी और व्यापारियों वाला यह देश जानता है कि सोना अन्य की तुलना में सर्वाधिक मान्य तथा मुसीबत में भरोसे वाला है। भारत में पहले दो पर ही भरोसा किया जाता था- गाय और सोना।
आशा है अपने देश के मन और धन को समझने में मेरे इस प्रयास से कुछ न कुछ सुविधा जरूर होगी।
रवीन्द्र पाठक


रविवार, 4 दिसंबर 2016

देशी अर्थशास्त्र को समझने की मेरी मजबूरी

देशी अर्थशास्त्र 2
देशी अर्थशास्त्र को समझने की मेरी मजबूरी 
देशी अर्थशास्त्र, अर्थव्यवस्था और उसकी समझ तथा उसके प्रति विश्वास पारंपरिक है, न कि यह कोई अतीतकालीन बात है। मेरा गांव किसी भी नगर पालिका से कम से कम 40 की.मी. की दूरी पर एक नदी के किनारे बसा हुआ, जमाने से व्यावसायिक गतिविधियों वाला देहाती गांव है। मैं ऐ से ही गांव के एक किसान परिवार में पैदा हुआ, जो ग्रामीण स्तर पर खेती के साथ-साथ चिकित्सा, अध्ययन-अध्यापन, एवं ब्राह्मण जातियों में प्रचलित अन्य कार्यों के साथ राजनीति तथा समाज सेवा में भी लगा रहा। मेरे गांव में लगभग 19 जातियां हैं, 2 धर्म तथा कई हिन्दू संप्रदायों के लोग। इसलिए मुझे विविधता सहज उपलब्ध हो गई। साथ ही पारंपरिक व्यवसायों के किस्से एवं उनके दुख-दर्द भी मालूम होते रहे।
एक उठापटक वाले मध्यम वर्गीय परिवार में होने के कारण हम लोगों ने खेती भी की है और एक समय में अपने प्रकार का सफल किसान भी रहा हूं। स्नातकोत्तर के बाद एक बार दिल लगा कर खेती की और पर्याप्त उत्पादन के बाद भी उसमें होने वाले लगातार घाटे को समझ पाने की तलाश में सफल-विफल किसानों से ले कर कई धारा के किसान नेताओं, पत्रकारों, आढ़तियों एवं कालेज के प्रोफसरों से समझने की कोशिश करता रहा। इस बीच कई बार कोई फार्मूला मिलते ही प्रफुल्लित हो जाता और अपने घर परिवार में  अभिभावकों को उसका माहात्म्य भी सुनाता। मुझसे मेरी पिछली पीढ़ी के लोग केवल इस तर्क के साथ असहमत हो जाते कि अपने गांव या उसके आस-पास क्या किसी ने ऐसा किया है, जो हम करें?
इस क्रम में जब मेरे समय के नए जमाने के प्रसिद्ध किसान नेता, जो अब पुराने जमाने वाले हो गए श्री शरद जोशी की किताब पढ़ी तब यह पता चला कि भारत में किसान और उनके परिवार के लोग दिनानुदिन गरीब क्यों होते जा रहे हैं। मेरे पिता जी अब केवल कथाशेष चीनी मिलों में किसानों के बकाए का मुकदमा लड़ रहे थे, जो वे जीत कर भी हार गये। भुगतान तो नहीं का नहीं ही हुआ।
चाहे चावल का थोक व्यापार हो या लकड़ी, बांस का या धातु का अथवा दवा बनाने के लिए कच्चे सामान का, चाहे वह मछुआरों की सहयोग समिति का मामाला हो या नाविकों के संगठन का, अथवा किसान सहयोग समिति पर माफियागिरी एवं जातीय वर्चस्व स्थापित करने का, सारे अंदरूनी किस्से चाहे-अनचाहे सुनता रहा। प्रेस चलाया, प्रकाशन का व्यवसाय किया, लघु पत्रकारिता की। यह इसलिए कह रहा हूं क्योंकि यह स्वयं भोगा हुआ या भोगे हुए अपने स्वजनों, परिजनों के अनुभव पर आधारित है, किसी एक किताब की पीएच.डी. वाली थीसिस का कोई अंश नहीं है। समझने की उलझनें जब बढ़ीं तो पूरे मघ्य भारत के विभिन्न प्रायोगिक केन्द्रों का दौरा भी किया और समझने की कोशिश की। खादी, ग्रोद्योग के प्रयोग, सरकारी असरकारी, बिना कमीशन मिशन वाली खादी से मोदीब्रांड खादी समझने के लिए, महाराष्ट्र-गुजरात भी गया। दक्षिण के रेशमपालक गांवों की यात्रा की। बहुत थोड़ा लेकिल हिमालय के कुछ गांवों में भी गया।
सवाल यह हो सकता है कि इतना सब होने के बाद तो मुझे भारत के आधुनिक आर्थिक प्रयोगों  के पक्ष-विपक्ष पर लिखना चाहिए था। मैं देशी अर्थ शास्त्र को ले कर क्यों लिखने बैठ गया? इस पर खुलाशा अगले पोस्ट में।

शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

देशी अर्थशास्त्र

परंपरा
आज अर्थ शास्त्र शब्द से जो मतलब निकला जाता है, वह है-आदम स्मिथ वाला पाश्चात्य अर्थशास्त्र, जो इकोनोमिक्स का तर्जुमा है। इससे एक सर्वथा झूठी समझ बनी है कि इस इकोनोमिक्स के पहले भारत में न अर्थशास्त्र था, न वैसी कोई गहरी समझ या व्यवस्था थी। यह समझ एक ओर अपने समाज एवं परंपरा के प्रति हिकारत का भाव विकसित करती है तो दूसरी ओर यह उलझन भी पैदा करती है कि भारतीय समाज की न केवल पुरानी बल्कि कई आधुनिक गतिविधियां भी आध्ुनिक दृष्टि से समझ में नहीं आतीं। उदाहरण के लिए गाय या भैंस को पालने की सामाजिक स्वीकृति के बाद भी कुछ जातियों को दूध बेंचने की छूट थी और कुछ को नहीं, जबकि दूध बेंचने से प्रतिबंधित जातियां प्रभावशाली और खेती-पशुपालन का रोजगार करने वाली जातियां हैं। 
आधुनिक शिक्षा में जब इकोनोमिक्स का इतिहास पढ़ाया जाता है, उसमें अपवाद स्वरूप भले ही बताया जाता हो कि भारत में भी अर्थव्यवस्था एवं आर्थिक गतिविधियों पर गहन चिंतन एवं उन्हें नियंत्रित करने का काम हुआ है, उसे इकोनोमिक्स के इतिहास में स्थान नहीं दिया जाता क्योंकि ऐसा करने पर तो प्रचलित सारी धारणाएं ही भरभरा कर बिखर जाएंगी और इस अहंकार की तुष्टि संभव नहीं होगी कि योरप ही भौतिक ज्ञान का एक मात्र स्रोत और केन्द्र रहा है, भारत ने भले ही अध्यात्म के क्षेत्र में कुछ किया हो। ना ही इस बात का आधार बन सकेगा कि योरोपीय इकोनोमिक्स पढ़ने वालों को बड़ा पद और ऊंची तनख्वाह मिलनी चाहिए।
इस बेईमानी के कारण योरप प्रभावित आज के अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न भी पैदा नहीं होता कि आखिर उत्तर भारत के मौर्य वंश एवं दक्षिण के चोल-चालुक्य जैसे बड़े राज्यों के समय बिना किसी शास्त्र या सिद्धांत के राजकीय और सामाजिक व्यवस्था चलती कैसे होगी? एक अजीब सा झूठा मुहावरा चलाया गया है कि ‘भारत एक कृषि प्रधान देश रहा है’ और उससे आगे बढ़ कर बात पीछे कहा जाता है कि ‘भारत की ग्रामीण आबादी का 70 या 80 प्रतिशत भाग केवल खेती का काम करता रहा है।’ यदि इसे ही सच मान लिया जाए तो भारत पर लगातार आक्रमण करने वाले लुटेरे क्या अनाज लूटने या जानवर लूटने आते थे? पुराने खंडहर एवं इतिहास के अन्य स्रोतों से क्या लोहा, लकड़ी या अन्य धातु से बनी कोई सामग्री नहीं मिली? यहां के लोग कपड़ा नहीं पहनते थे या चिकित्सा का कोई शास्त्र यहां नहीं था? यहां के बड़े व्यापारी क्या बेंचने दूरदूर तक जाते थे? इतनी बड़ी मात्रा में सोना बार बार इकट्ठा कैसे हो जाता था? ऐसे अनेक प्रश्नों का कोई उत्तर आपको आधुनिक इकोनोमिक्स पढ़ने वाले नहीं दे पायेंगे। छोडि़ए पुरानी बातों को कुछ देर के लिए एक हाल-फिलहाल वाला सवाल है कि जब पश्चिम भयावह मंदी की चपेट में आया उस समय भारत में ऐसा क्या था कि यहां के बाजार पर उसका कोई खाश असर नहीं हुआ? सवाल बहुत सारे हैं।
केवल राज्य के साथ मिल कर या कारपोरेट लूट के अंग के रूप में व्यापार या नौकरी नहीं करनी हो, भारत के लोगों के हित में आर्थिक चिंतन या गतिविधि करनी हो और इन प्रश्नों का यदि उत्तर पाना हो तो देशी अर्थ शास्त्र को समझना ही होगा। आप यदि पूर्णतः शहरी हैं तो अपनी पूर्व धारणा को छोड़ देशी सत्य के लिए उदार बनना होगा और यदि आप देहाती क्षेत्र के हैं तो अपने बचपन से वर्तमान तक में एक क्रमबद्ध स्मृति यात्रा करते ही अनेक बातें सरलता से समझ में आने लगेंगी। उस आधार पर अपनी पिछिली पीढि़यों की स्थिति का भी आप अंदाजा आसानी से लगाकर परंपरा की परिवर्तनशील निरंतरता को सहज समझ सकेगे। 
इस क्रम में भारत की खाशियत विविधता एवं उसमें एकता को तो देखना पहचानना ही होगा। यह एैसा विषय है कि आप नहीं कह सकते कि आप इसे परिचित नहीं है या इसकी आपको कोई जरूरत नहीं है। उलटे आप भी रोजमर्रे में इसकी समस्या से जूझते-जुझाते, कुंढते-हंसते या अपनी चालाकी पर मंद-मंद मुस्कराते हुए अथवा अट्टाहास करते हुए जीते हैं। 
मैं अपने पश्चिम प्रेमी वामपंथी और दक्षिण पंथी दोनो प्रकार के मित्रों से उनके इस प्रचार के विरुद्ध जाने के लिए क्षमा भी नहीं मांग सकता कि भारत में तो कोई ज्ञान-चिंतन कभी था ही नहीं, न आज की समस्याओं की व्याख्या करने की उसमें क्षमता है, फिर भला समाधान कैसे मिलेगा? सच यह है कि आपने तो यह शब्दिक पाखंड ही इसलिए किया ताकि हमारी विशाल ज्ञान राशि और वांग्मय में आपके मौलिक होने का दावा ही न डूब जाए। कई अन्य कारण भी हैं, फिलहाल हम रुकेंगे। 
इसके लिए भारतीय आर्थिक चिंतन-ज्ञान परंपरा में एक यायावरी करते हैं और देखते हैं कि कहां क्या मिल जाता है और किसके काम का, उसमें से क्या निकलता है? आप साथ देंगे तो मेरी यात्रा का एकांत मुझे कम सतायेगा। 
आप लोगों से पूर्णतः भिन्न मुझमें ऐसी कोई मौलिकता नहीं है जो कुछ नया कहने की औकात दे सके। इसीलिए मुझे अपने पर भरोसा है कि इस कथा में कुछ न कुछ आपके लिए भी अपना कहने-समझने के लायक जरूर मिलेगा।
यह शृंखला मेरे ब्लाग बहुरंग और फेसबुक पर दोनो जगह उपलब्ध रहेगी। जो लोग पूरे या किसी छूटे हुए अंश को पढ़ना देखना चाहें, वे मेरे ब्लाग बहुरंग के लेवेल देशी अर्थशास्त्र को क्लिक कर एक साथ सारे पोस्ट देख सकेगे।

शनिवार, 10 सितंबर 2016

भाषा बोध 1

वागर्थ 4
भाषा बोध -
अन्विताभिधान वाद और अभिहितान्वय वाद
प्रश्न यह है कि यह जो मुंह से निकलने वाली बैखरी वाणी है, जो निकलते ही बिखर जाती है, उससे शब्द अर्थ के बीच के संबंध का बोध किस तरह होता है?
लोगों ने इस पर ध्यान दिया तो पहली बात यह समझ में आई कि गाय शब्द और उस चौपाया पशु के बीच का जो सबंध है कि यह गाय है, ऐसे संबंधों की समझ धीरे-धीरे बचपन से शुरू हो कर बढ़ती है। इस संबंध को भारतीय लोगों ने एक तकनीकी नाम दिया ‘अन्वय’। जब तक संबंध नहीं समझ में आए तब तक यदि कोई दूसरा व्यक्ति किसी भी भाषा के शब्द का उच्चारण करे, उसे समझ पाना नामुमकिन है। इस पर लगभग सहमति रही कि हां, यह तो जरूरी है।
इसके बाद प्रश्न यह उठा कि शब्द अर्थ के बीच के संबंध को बचनप में समझा कैसे जाता है? उसमें भी प्रश्न उठा कि बच्चा/बच्ची पहले शब्द एवं उसके अर्थ के बीच के संबंध को समझते हैं या सीधे वाक्य एवं उसके अर्थ को? यह मामला आज बहुत लंबे समय से आज तक विवादास्पद बना हुआ है। ऐसा नहीं है कि आप यदि चाहें तो गौर फरमा कर इसे समझ नहीं सकते लेकिल न लोग प्रयास करते हैं न सत्तावादी लोग इस समझ को विकसित होने देते हैं कि यदि सामान्य मनुष्य अपने सामान्य ज्ञान से एवं तर्क से ऐसे रहस्यमय लगने वाले प्रश्नों का हल खोजने लगे तो वह मानव सभ्यता कही जाने वाली व्यवस्था के लिए मुसीबत हो जायेगा।
दर्शन, राजनीति, धर्म, शिक्षा पद्धति, योग साधना जैसे विषयों की प्रयोग शाला किश्म के एक उत्पाती परिवार तथा क्षेत्र में मैं बदकिश्मती से पैदा हो गया। उसमें भी दुर्योग से मैं एक प्रयोग के पात्र के रूप में चुन लिया गया। दर्द यह कि किस प्रयोग का क्या परिणाम आ रहा है, जो मुझ पर हो रहा है, यह मुझसे कोई पूछता ही नहीं था। उलटे मनोनुकूल परिणाम न आने पर प्रयोग कर्ता मेरी ही पिटाई करने लगते। इसलिए मैं जानता हूं कि सच में होता क्या है, भले ही शिक्षाशास्त्रियों को बात समझ में न आई हो। मुझे तब सबसे अधिक मजा आता था जब सिखाने वाले आपस में लड़ जाते और मेरी शिक्षा बंद कर दी जाती। मेरी किताबें, कापियां स्लेट वगैरह वे ही फाड़ देते या फेंक देते। यी अपने आप में एक रोचक लेकिन मेरे लिए दर्दनाक मामला रहा है।
जो लोग चलनवादी और व्यवस्थावादी हैं उनका वर्णमाला, व्याकरण, शब्दकोश, सही उच्चारण आदि के प्रति अनुराग होता है। बच्चा चाहे जैसे सीखता हो ये अपने इन साधनों के गौरव को कम होने नहीं देना चाहते। ये सिखाते भी उसी तरह हैं और उसे ही न केवल सही वरन सत्य मनवाने के लिए हर जोर आजमाइश को उचित मानते हैं, मारपीट तक को। हमारे शिक्षण संस्थान तथा तथा शिक्षक लगभग इन्हीं की गिरफ्त में हैं। इनकी मान्यता है कि पहले वर्णमाला, फिर शब्द, फिर व्याकरण सहित वाक्य के माध्यम से शब्द और अर्थ के बीच के संबंध का बोध होता है।
ये मूर्ख पंडित निरक्षरों के भाषा बोध की क्या व्याख्या करेंगे?
आज इतना ही चर्चा जारी रहेगी

बुधवार, 7 सितंबर 2016

वर्णमाला एवं शब्दार्थ

वर्णमाला एवं शब्दार्थ संबंध
भारत देश अन्य देशों से इस मामले में भिन्न है कि यहां जितना ध्यान शब्दों पर दिया गया, उससे कई गुना अधिक ध्यान वर्णों के स्वरूप और उनकी विशेषताओं पर दिया गया। बहुत थोड़े अंतर से भारतीय भाषाओं की वर्णमाला लगभग एक है। मैं यहां उर्दू को नहीं गिन रहा। वर्णमाला का विशेष महत्व बीज मंत्रों की संरचना या धारिणी मंत्रों में होती है। उस परिप्रेक्ष्य में वैदिक, बौद्ध, जैन सभी एक हैं। वर्ण अर्थहीन नहीं होते। वे स्वयं नाम एवं अर्थ देानो हैं।
कुछ शब्द सुनने में एक वर्ण लगते हैं लेकिन वे पूरे शब्द होते हैं, जैसे- ‘क’, जिसका अर्थ होता है- जल, ‘ख’- जिसका अर्थ होता है- आकाश, वगैरह लेकिन सभी वर्णों के इसी तरह अर्थ भी हों यह जरूरी नहीं है। एक या एक से अधिक वर्णों के योग से शब्द बनते हैं, ये किसी अर्थ, मतलब वस्तु, क्रिया या भाव के नाम होते हैं। इन नामों को सुनने या सुनाने में एक अर्थ बोध होता हैै। उस प्रक्रिया को जोड़ कर भाषा बन जाती है।
इस संदर्भ में लोगों ने जानने की कोशिश की कि आखिर शब्द और अर्थ के बीच का संबंध हमारे दिलोदिमाग में बैठता कैसे है? कैसे कैसे शब्द से ले कर वाक्य तक की जटिलता को हमारा मस्तिष्क समझता और याद रखता है। इस मुद्दे पर शिक्षा शास्त्री, भाषाविद और शिक्षा शास्त्री दो खेमें में बहुत पहले से बंटे हुए हैं। जब से खड़ी बोली हिंदी का निर्माण हुआ, तबसे यह विवाद इधर भी आ गया। हमारे जमाने में ही प्राथमिक हिन्दी पुस्तक में यह विवाद आ गया था। मनोहर पोथी, गीताप्रेस की किताबें वर्ण माला, फिर शब्द तब वाक्य सिखाने के पक्ष में रहीं। इनके विपरीत ‘लिखो-पढ़ो’ शृंखला की सरकारी पुस्तकें सीधे वाक्य सिखाने वाली थीं। इस मामले में यह जानना रोचक होगा कि इस बहस का पुराना शास्त्रीय नाम क्या है और इनके तर्क क्या हैं? वैसे उस जमाने के हिंन्दी शिक्षक इसे नूतन खोज या आविष्कार की ही तरह पेश करते थे और पुराने शिक्षकों को हिकारत से देखते थे और पुराने शिक्षक अपने ज्ञान को परंपरागत तथा अनुभव सिद्ध बताते थे और नये वालों को कुतर्की सरकारी गुलाम बताते थे।
परंपरागत शास्त्रों में इस बहस को अन्विताभिधानवाद और अभिहितान्वय वाद के नाम से जाना जाता है। यह मजेदार चर्चा अगली पोस्ट में जिसमें बकरी, गाय, एक बच्चा और कुछ अन्य लोग मुख्य किरदार का रोल निभाएंगे।

रविवार, 4 सितंबर 2016

वागर्थ 2 --- शब्द, नाद, वाक्


शब्द, नाद, वाक्
ये तीनो नाम चलते हैं। शब्द और अर्थ तो सभी जानते हैं, नाद प्रायः ध्वनि के लिए प्रयुक्त होता है। नाद किसी भी प्रकार की ध्वनि को कहा जा सकता है। वाक् लगभग मानव की ध्वनि के लिए रूढ़ जैसा हो गया है।
इन तीनों को मिला कर शब्द के चार स्तर माने गए हैं। बैखरी- जो मुंह से बाहर निकलती है, जिसके आधार पर शब्द और अर्थ के बीच संबंध बनते हैं। मध्यमा- लगभग भुनभुनाने जैसी मानवीय आवाज, जो दूसरे को ठीक से सुनाई न पड़े। परा- मन के भीतर की आवाज, जो दूसरे को सुनाई न पड़े। पश्यंती- प्राकृतिक, सूक्ष्मतम ध्वनि, जिसे ध्यान भूमि में तटस्थ भाव से देखा/अनुभव किया जाए।
इस संार में ज्यादा उलझनें और चालाकियां बैखरी और परा के साथ है। विशेषज्ञ बैखरी स्तर के नाद का भी उचित-अनुचित अनेक प्रयोग करते हैं। यह काम केवल भारत में ही नहीं होता, लगभग सभी जगहों पर होता है।
सुविधा के लिए पहले बैखरी की कार्यप्रणाली और उससे संबंधित सामाजिक खेल को समझने का प्रयास करेंगे।
अगले पोस्ट में -
वर्णमाला एवं शब्दार्थ संबंध

शनिवार, 3 सितंबर 2016

बहुरंग: वागर्थ

बहुरंग: वागर्थ

वागर्थ

वागर्थ 1
वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे, पार्वती-परमेश्वरौ।।
वाक्-वाणी एवं उसका अर्थ मिलकर हुए वागर्थ। ये आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े रहते हैं। ऐसे वागर्थ की तरह जुड़े हुए, संसार के माता-पिता पार्वती एवं परमेश्वर की मैं वंदना करता हूं, वाक्-वाणी एवं उसके अर्थ की ठीक समझ के लिए।
मैं बचपन से महा कवि कालिदास एवं गोस्वामी तुलसीदास जी की, रामचरित मानस वाली  मंगलाचरण वंदना दुहरा रहा हूं।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।
मंगलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ।।
 वाक्-वाणी एवं उसके अर्थ की ठीक समझ के प्रयास में मैं भी लगा हुआ हूं। कुछ समझा भी बाकी का शेष है। जब कालिदास/तुलसीदास जी जैसे लोग लगे हुए रहे तो मुझे देर लग रही है तो इसमें बहुत घबराने की बात नहीं है। बात ही बहुत तगड़ी है- पहले तो वाक् एवं उसके अर्थ के स्वरूप को समझना, फिर वाक् एवं उसके अर्थ के बीच जुड़ाव को समझना, फिर इस संसार में इनकी व्यापक भूमिका को पहचानना होगा तब जा कर कहा सकूंगा कि हां, अब मैं ने भी ठीक से समझ लिया है।
आप चाहे तुलसीदास जी को मानें न मानें, आस्तिक हों या नास्तिक, वैदिक हों या बौद्ध या अन्य मतावलंबी वाक् एवं उसके अर्थ की व्यूह रचना से बच नहीं सकते। हमारे जीवन में परस्पर संबंधों का बहुत बड़ा भाग इसी सरल या जटिल व्यूह रचना पर आधारित है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है और हम कई बार पता नहीं सच या झूठ गौरवान्वित महसूस कराए जाते हैं कि भाषा हमें अन्य जीवों से विशिष्ट बनाती है। मैं ने सोचा कि कोई व्यक्ति यदि मुझे अन्य जीवों-योनियों में घूमने की विद्या सिखा दे तभी कह सकूंगा कि मनुष्य की अभिव्यक्ति एवं अन्य जीवों की अभिव्यक्ति में क्या अंतर है क्योंकि अभिव्यक्ति और संवाद तो अन्य जीवों में भी हो ही रहा है।
खैर, फिलहाल अन्य जीवों की बात छोडि़ए जरा मनुष्य के भीतर ही वाक् एवं उसके अर्थ की स्थिति को जानने-समझने का प्रयास किया जाए। यह एैसा विषय है कि आप नहीं कह सकते कि आप इसे परिचित नहीं है या इसकी आपको कोई जरूरत नहीं है। उलटे आप भी रोजमर्रे में इसकी समस्या से जूझते-जुझाते, कुंढते-हंसते या अपनी चालाकी पर मंद-मंद मुस्कराते हुए अथवा अट्टाहास करते हुए जीते हैं। फिर भी यह वागथ्र हमारे कब्जे में आता ही नहीं है, यह हमारी बेचैनियों में से एक है। हममें से जो जितने पढ़े लिखे औब बातों का व्यवसाय करने वाले या बातों के माध्यम से जीवन चलाने वाले होते हैं, उन्हें यह समस्या बहुत सताती है। धर्म, राजनीति, बाजार, सत्ता के विभिन्न केन्द्र और उनके प्रतिद्वंद्वियों तथा प्रतिस्पधिंयों के बीच रातदिन वाक्-युद्ध चलता रहता है। भारत के लोगों ने इसे अपने ढंग से समझने का प्रयास किया, बहुत विस्तार और गहराई में जा कर।
मैं अपने पश्चिम प्रेमी वामपंथी और दक्षिण पंथी दोनो प्रकार के मित्रों से उनके इस प्रचार के विरुद्ध जाने के लिए क्षमा भी नहीं मांग सकता कि भारत में तो कोई ज्ञान-चिंतन कभी था ही नहीं, न आज की समस्याओं की व्याख्या करने की उसमें क्षमता है, फिर भला समाधान कैसे मिलेगा? सच यह है कि आपने तो यह शब्कि पाखंड ही इसलिए किया ताकि हमारी विशाल ज्ञान राशि और वांग्मय में आपके मौलिक होने का दावा ही न डूब जाए। कई अन्य कारण भी हैं, फिलहाल हम रुकेंगे केवल वाक् एवं उसके अर्थ तक।
इसके लिए भारतीय चिंतन-ज्ञान परंपरा में एक यायावरी करते हैं और देखते हैं कि कहां क्या मिल जाता है और किसके काम का, उसमें से क्या निकलता है? आप साथ देंगे तो मेरी यात्रा का एकांत मुझे कम सतायेगा। वैसे मैं यह तो कह नहीं सकता कि यह पूर्णतः स्वांतः सुखाय है लेकिन उसके मूल में वह जरूर है क्योंकि इस यात्रा का निपर्णय तो मैं ने स्वयं लिया है।
मेरी यह यात्रा कथा नाना पुराण-निगम-आगम से सम्मत ही रहेगी। मैं इस लायक ही नहीं कि कोई नई बात कह सकूं। मुझमें कोई नयापन है ही क्या? न आप लोगों से पूर्णतः भिन्न ऐसी कोई मौलिकता है जो कुछ नया कहने की औकात दे सके। इसीलिए मुझे अपने पर भरोसा है कि इस कथा में कुछ न कुछ आपके लिए भी अपना कहने-समझने के लायक जरूर मिलेगा।
यह शृंखला मेरे ब्लाग बहुरंग और फेसबुक पर दोनो जगह उपलब्ध रहेगी। जो लोग पूरे या किसी छूटे हुए अंश को पढ़ना देखना चाहें, वे मेरे ब्लाग बहुरंग के लेवेल वागर्थ को क्लिक कर एक साथ सारे पोस्ट देख सकेगे।

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

रस की अनुभूति होती है। कैसे? यह न पूछिए

रसानुभूति 2
रस की अनुभूति होती है। कैसे? यह न पूछिए क्योंकि यह तो सभी को कमोबेश होती ही है, कम से कम षट् रस वाली या नव रस वाली या उससे भी अधिक।
असली मामला यह है कि मन भरता नहीं है। भरे तो कैसे? क्योंकि कभी मात्रा में कमी तो कभी बहुत कम समय मिला। मन करता हे कि काश यह अनुकूल अनुभूति कुछ देर और रहती। स्वादिष्ट भोजन थोड़ा और मिलता, मन भरा नहीं। तब किया क्या जाय? मानव इसी जुगाड़ में लगा है।
कुछ सोचते हैं रसानुभूति के पर्याप्त या उससे अधिक संसाधन इकट्ठे करें तो मन भर जाए। कुछ सोचते हैं - इसमें तो भोगने का समय ही नहीं बचेगा तो समय का भी प्रबंध करें और जल्दी जल्दी भोग लें। यह जल्दबाजी भी कम संकट नहीं पैदा करती। मन हो या इन्द्रियां या तन वे ही थक जाते हैं बीमार पड़ जाते हैं। तन एवं इन्द्रियों के लिए अनुकूलता या प्रतिकूलता में तो समानता भी रहती है ओर कुछ टिकाउपन भी लेकिन मन का क्या भरोसा अभी कुछ चाहिए और कुछ देर बाद उससे बिलकुल अलग, तो फिर पूरी, मन भर रसानुभूति हो कैसे?
इन्हीं प्रश्नों के उत्तर में रसायन वाले रस से शरीर को ठीक रखने, षड् रस तथा पुष्टिकारक रक्त, मज्जा आदि से तन एवं इन्द्रियों को पुष्ट करने तथा भाव रस से मन एवं संजीवनी रस से आत्म तत्त्व मतलब संपूर्ण व्यक्तित्व को सरस बनाने की कला का विकास भारत में हुआ। यह तब तक सार्थक है जब तक मानव जीवन है। नाम, रूप, परंपरा तथा कुल एवं क्षेत्र की दृष्टि से विधियें में अंतर आता है लेकिन रस मूलतः एक है।
रस मूलतः एक ही है, इस बात की चर्चा अगले पोस्ट में।

रसो वै सः वह रस है

रसानुभूति 2
रसो वै सः वह रस है
इस वेद वाक्य को भी ब्रह्म का अर्थ बताने वाला माना जाता है। मतलब कि वह ब्रह्म रस है। रस शब्द कई अर्थों  में प्रयुक्त हुआ है, जिनमें मुख्य हैं- 1 जीभ से चखा जाने वाला स्वाद रूपी रस- षट् रसए 2 द्रव का पर्यायवाची जैसे सभी तरल पदार्थ, जो अपने साथ जुड़ी चीजों को संभाल कर रखते हैं, जीवन देते हैं, जल आदि, 3 पारा एवं गंधक का योग एवं ऐसी दवाएं, जिनमें पारा-गंधक का योग मिला हो, अनेक आयुर्वेदिक दवाएं, 4 काब्य/नाट्य या गान से मिलने वाली मन को खुश करने वाली अनुभूति, 5 ध्यान, योग, तंत्र आदि के अभ्यास से अपने भीतर के आनंद स्रोत तथा जीवन स्रोत से कण एवं/या विपुल रूप में चखा/अनुभूत किया जाने वाला।
रस के इन 5 अर्थों के अतिरिक्त इनके अर्थ विस्तार से भी कई अर्थ निकल सकते हैं। कोई रस के किसी एक पक्ष के बारे में बताते हुए भी कह सकता है कि वह (उसके अभिप्रेत या विवेच्य) अर्थ, भोजन, काव्य, दृश्य, अनुभूति, आदि कुछ भी रस है या सरस रसयुक्त है। साथ ही वह ब्रह्म का ही अंश है।
यदि कोई अपने को योगी, तांत्रिक (परंपरागत अर्थ में न कि काला जादू वाले) या किसी दर्शन के प्रणेता/भाष्यकार मान कर बात करे तो उसकी जिम्मेवारी उपर्युक्त सभी अर्थों में रस के अर्थ, महत्व, स्वरूप, उसकी अनुभूति/उपलब्धि का मार्ग बताने की होती है।
रससिद्धांत का निरूपण किसी आदर्शवाद, कल्पना, मिथ, चाली बात नहीं है। यहां तो बताना पड़ेगा कि भोजन कैसे स्वादु बनेगा? मूर्तियों या कला के अन्य उपादानों में सौंदर्यबोध की प्रक्रिया क्या होगी? और पैमाने क्या होंगे? वगैरह।  इसी तरह मंचीय प्रक्रिया का विधान भी बताना होगा और काव्य मीमांसा भी जिसे संस्कृत में अलंकार शास्त्र भी कहते हैं।  इन सबके साथ पूजा-पाठ, ध्यान, योग लोक-व्यवहार, कृषि, संगीत, और पता नहीं कितनी सारी बातें, जैसे - मृत्यु तथा उसके बाद सरस जन्म भी।
इन बातों के एक एक पक्ष पर तो कई लोगों ने प्रकाश डाला है लेकिन उनसे आगे बढ़ कर तंत्रालोक जैसे महान ग्रथ के रचयिता श्रीमान अभिनव गुप्त ने सभी पक्षों पर प्रकाश डाला है और उसकी प्रक्रिया अनेक उपायों के साथ बताई है।
भरत मुनि का प्रसिद्ध सूत्र है- ‘‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’’। काव्य कला आदि में विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारि भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
इन सारी बातों के विस्तार की मूल प्रक्रिया एवं रहस्य मनुष्य के तन, मस्तिष्क, इन्द्रियां, मन एवं उससे गहरी जो भी मानें, उनकी कार्य प्रणालियों का संसार की सामग्रियों से उनके संबंधों के विवेचन में निहित है।
संक्षेप में कहें तो व्यक्तित्व, अंतःकरण का बाह्य संसार से संबंध तथा उसके परिणामस्वरूप होने वाली अनुभूति या अंतस्थ जप, ध्यान आदि से प्राप्त होने वाली जीवनदायी अनुभूतियां  रस के स्रोत तथा प्रक्रियाएं हैं।
अगली किश्तों में जारी

बुधवार, 9 मार्च 2016

उदार समावेशी धर्म की जरूरत 2nd

संकीर्णतावादी धाराओं की प्रमुख विशेषताएं
समावेशी उदार सनातन धर्म ? सच कहें तो ऐसा कोई एक छोटा-मोटा समूह नहीं है। यह भारतीय बहुसंख्यक समाज का धर्म है, जिसमें अनेक संकीर्णतावादी धाराएं पनपती और विलुप्त होती रहती हैं। अंततः वे भी उसी मुख्य धारा में शामिल हो जाती हैं।
इन संकीर्णतावादी धाराओं के प्रति समाज के कुछ लोगों में प्रबल आकर्षण होता है क्योंकि वे निम्न दावे करती हैं, जो प्रचलित परंपराओं के विरुद्ध या भिन्न होती हैं, जैसे- वे प्रचलित रूढि़यों के विरुद्ध हैं, उनके प्रवर्तक ज्ञान पहले वालों से श्रेष्ठ है, इसमें नयापन है, पुराने बंधन नहीं हैं, काफी प्रभावशाली लोग इसे अपना रहे हैं, या अमुक विचार या पहचान वाले लोगों के विरुद्ध है, वगैरह।
कुछेक भक्ति आंदोलनों को छोड़ दें तो ऊपर से सुधारवादी या उदारवादी लगने वाली ये धाराएं मूलतः बड़े पैमाने पर समाज के बहुसंख्यक वर्ग के प्रति हिकारत और द्वेष भाव तथा प्रतिक्रयावादी कार्यक्रमों से भरी होती हैं। इनकी प्रेरणा के मूल स्रोत प्रायः बाहरी होते हैं और कई बार इनकी कार्यप्रणाली भी बाहरी शैली वाली होती है। कई बार तो समकालीन राजनीति से प्रचारित, प्रसारित और पोषित भी होते हैं।
भीड़, नयापन, प्रतिक्रिया और नये किश्म के संगठन के कारण उदार समावेशी समाज इन्हें भी एक नये प्रयोग के तौर पर लेता है। बाद चल कर अपने ही पाखंड तथा अंतर्द्वंद्वों के कारण आकर्षण खोते ही इनके अनुयायियों को भी बहुसंख्यक धारा में पुनः वापस आ जाना पड़ता है। सबसे नए और बड़े उदाहरणों में आर्य समाज है। आर्यसमाजी लोग तेजी के साथ सनातनी धारा में लौटे और लौट रहे हैं। कुछ दिनों बाद बस कुछेक औपचारिकताओं के अतिरिक्त सनातनी तथा आय्रसमाजी का फर्क करना कठिन हो जाएगा क्योंकि बहुसंख्यक समाज ने आर्यसमाज की वैचारिक बातों को छोड़ सुविधा वाली बातें अपना लीं तो फिर क्या आर्यसमाजी? क्या सनातनी? जब जैसी सुविधा, तब वैसी पहचान और काम।