बुधवार, 7 मई 2014

लोक सुलभ साधना विधियों की समझ में ह्रास के कारण


लोक सुलभ साधना विधियों की समझ में ह्रास के कारण
भाई जी, श्री विजय प्रकाश शर्मा जी, प्रणामं

मैं आपके सवाल के आने के बाद से सोच रहा हूं कि इस बात को संक्षेप में कहूं तो कैसे कहूं? वैसे तो मैं इस विषय पर लोकाचार रहस्य नाम से एक किताब ही लिख रहा हूं, जिसमें इन सारी बातों की व्याख्या और संदर्भ भी रहेंगे।
आपका सवाल इससे हट कर दूसरा है कि आखिर इनका ह्रास कैसे हुआ?
 मुझे अभी कुछ सूत्र सूझे हैं-
1 वैदिकी करण, पुरुष नेतृत्व और ब्राह्मण नेतृत्व का अतिवाद। ये परस्पर एक दूसरे के समर्थक हो जाते हैं।
2 खेल खेल में या परोक्ष पद्धति से सीखने जीने में यही समस्या है कि समय की फेरबदल के समय इनमें संशोधन बिना सोचे समझे होते हैं क्योंकि सिद्धांत स्पष्ट तो हैं नहीं। अगर स्पष्ट रहे तो उस आधार पर संशोधन कर दिया जाय।
3 18 वीं शताब्दी के बाद धर्मशास्त्रों का संशोधन रुक गया, 19 वीं में संशोधन की जगह सुधारवादी संप्रदाय जैसे- आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज आदि द्वारा सीधे वैदिक कालीन पद्धतियों की नकल बिना सोचे समझे अंगरेजों को ध्यान में रख कर निकाली गई तो साधना और लोक जीवन को समझने की ही जरूरत नहीं महसूस हुई उसमें संशोधन कर कालानुरूप बनाने की किसे हिम्मत और फुरसत।
मैं तो अपने एवं अपने लोगों के लिये विधियां संशोधित कर ही अनुष्ठान, संस्कार करता हूं। बेटे के जनेऊ में इसी तरह संशोधित कर दिया तो लोगों को हैरानी हुई कि लोकाचार पूरी तरह हटाये नहीं गये बल्कि वैदिक कर्मकांड ही अधिक हटाये गये। समावर्तन का भाग तो दुबारा पूरा किया, जब वह 24 साल का हो गया। 12 साल की उम्र में कैसे एक युवक वाली जीवन शैली का उपदेश दिया जा सकता था?
4 मेरे पिताजी एवं बाबा में मतांतर था कि व्यक्तित्व का विकास पतंग उड़ाने से अच्छा होगा या फुटबाल खेलने से? पिताजी की बात सभी समझ सकते थे अतः लोग उनका समर्थन करते थे। बाबा ने अपनी पहले से पतंग खरीदी और उड़ाना सिखाया साथ ही कभी भी पतंग उड़ाते समय विघ्न नहीं किया। मैं ने दोनों का लाभ लिया लेकिन दक्षता पतंगबाजी में मिली।
इस उदाहरण में असली अंतर व्यक्तित्व विकास की समझ का है। बाबा को एक ध्यान योग का प्रखर अभ्यासी बनाना था तो आमान में आंख टिकाने के लिये बच्चे को कैसे प्रेरित करते? बाद में मैं ने इसका उपयोग बच्चों की दूर की आंख की रोशनी ठीक करने तथा उनकी उग्रता विनारण के लिये किया। इसी तरह सामाजिक लक्ष्य बनते हैं। एक समय में यह सामाजिक लक्ष्य था कि किसी को भी ध्यान योग विद्या से अपरिचित नहीं रहने देना है। आज की साक्षरता से भी अधिक तगड़ा लक्ष्य। इसलिये हर सनातनी हिंदू को उसकी मर्जी बेमर्जी के भी उसकी अंतश्चेतना से परिचित करा देना ही है। इसके लिये एक समय सीमा तय की गई - उसके विवाह के पूर्व और उसकी जिम्मेदारी औरतों को सौंपी गई। आरंभ में जाति पांत छोड़ इस काम को पूरा सामाजिक समर्थन दिया गया। परंपरागत औरतों की उस दुनिया में तो अब कोई झांकता भी नहीं है, समझेगा कैसे?
दरसल सोदाहरण खोल कर न बताने तथा विद्याधर व्यक्ति एवं समुदाय को सामाजिक संरक्षण के अभाव ने बहुत सारी समस्याएं पैदा कर दीं। अब बिना उनके मार्ग दर्शन के झूठी नकल पर विद्या कब तक टिकती और दोनो तरफ के छल ने बहुत कुछ नष्ट कर दिया। बचा वही जो उनकी समझ में पूरी तरह नहीं आया और लोगों को उसमें रस मिलता रहा। इसलिये धर्म के तीन पक्ष ही अधिक प्रचलित हैं- उत्सव-मनोरंजन, सामुदायिकता, वर्चस्व प्रदर्शन। अन्य उपाय तो बस इन्हें एक रहस्यमयी संपुष्टि के लिये होते हैं।
5 एक और अंदरूनी बात, जैसे सबसे कमजोर और घटिया शिक्षा वाले को प्राथमिक शिक्षा में  डालने की चलन है, उसी तरह कर्मकांड की है। संस्कृत अनेक बड़े बड़े विद्वान जो कर्मकांड कराते भी रहे योग, तंत्र और धर्मशास्त्र के ग्रंथ पढ़ते ही नहीं थे। सफेद झूठ बालते थे साहित्य व्याकरण, दर्शन आदि के बल पर उनकी प्रतिष्ठा रहती थी। हम लोगों ने ऐसे पंडितों से जब जो चाहा कहवाया मानवता के पक्ष में।
इतने में कितना कह पाया, पता नहीं। कुछ संप्रेषित हो सका तो प्रयास को सार्थक मानूं।
मैं आपके सवाल के आने के बाद से सोच रहा हूं कि इस बात को संक्षेप में कहूं तो कैसे कहूं? वैसे तो मैं इस विषय पर लोकाचार रहस्य नाम से एक किताब ही लिख रहा हूं, जिसमें इन सारी बातों की व्याख्या और संदर्भ भी रहेंगे।
आपका सवाल इससे हट कर दूसरा है कि आखिर इनका ह्रास कैसे हुआ?
 मुझे अभी कुछ सूत्र सूझे हैं-
1 वैदिकी करण, पुरुष नेतृत्व और ब्राह्मण नेतृत्व का अतिवाद। ये परस्पर एक दूसरे के समर्थक हो जाते हैं।
2 खेल खेल में या परोक्ष पद्धति से सीखने जीने में यही समस्या है कि समय की फेरबदल के समय इनमें संशोधन बिना सोचे समझे होते हैं क्योंकि सिद्धांत स्पष्ट तो हैं नहीं। अगर स्पष्ट रहे तो उस आधार पर संशोधन कर दिया जाय।
3 18 वीं शताब्दी के बाद धर्मशास्त्रों का संशोधन रुक गया, 19 वीं में संशोधन की जगह सुधारवादी संप्रदाय जैसे- आर्यसमाज, ब्रह्मसमाज आदि द्वारा सीधे वैदिक कालीन पद्धतियों की नकल बिना सोचे समझे अंगरेजों को ध्यान में रख कर निकाली गई तो साधना और लोक जीवन को समझने की ही जरूरत नहीं महसूस हुई उसमें संशोधन कर कालानुरूप बनाने की किसे हिम्मत और फुरसत।
मैं तो अपने एवं अपने लोगों के लिये विधियां संशोधित कर ही अनुष्ठान, संस्कार करता हूं। बेटे के जनेऊ में इसी तरह संशोधित कर दिया तो लोगों को हैरानी हुई कि लोकाचार पूरी तरह हटाये नहीं गये बल्कि वैदिक कर्मकांड ही अधिक हटाये गये। समावर्तन का भाग तो दुबारा पूरा किया, जब वह 24 साल का हो गया। 12 साल की उम्र में कैसे एक युवक वाली जीवन शैली का उपदेश दिया जा सकता था?
4 मेरे पिताजी एवं बाबा में मतांतर था कि व्यक्तित्व का विकास पतंग उड़ाने से अच्छा होगा या फुटबाल खेलने से? पिताजी की बात सभी समझ सकते थे अतः लोग उनका समर्थन करते थे। बाबा ने अपनी पहले से पतंग खरीदी और उड़ाना सिखाया साथ ही कभी भी पतंग उड़ाते समय विघ्न नहीं किया। मैं ने दोनों का लाभ लिया लेकिन दक्षता पतंगबाजी में मिली।
इस उदाहरण में असली अंतर व्यक्तित्व विकास की समझ का है। बाबा को एक ध्यान योग का प्रखर अभ्यासी बनाना था तो आमान में आंख टिकाने के लिये बच्चे को कैसे प्रेरित करते? बाद में मैं ने इसका उपयोग बच्चों की दूर की आंख की रोशनी ठीक करने तथा उनकी उग्रता विनारण के लिये किया। इसी तरह सामाजिक लक्ष्य बनते हैं। एक समय में यह सामाजिक लक्ष्य था कि किसी को भी ध्यान योग विद्या से अपरिचित नहीं रहने देना है। आज की साक्षरता से भी अधिक तगड़ा लक्ष्य। इसलिये हर सनातनी हिंदू को उसकी मर्जी बेमर्जी के भी उसकी अंतश्चेतना से परिचित करा देना ही है। इसके लिये एक समय सीमा तय की गई - उसके विवाह के पूर्व और उसकी जिम्मेदारी औरतों को सौंपी गई। आरंभ में जाति पांत छोड़ इस काम को पूरा सामाजिक समर्थन दिया गया। परंपरागत औरतों की उस दुनिया में तो अब कोई झांकता भी नहीं है, समझेगा कैसे?
दरसल सोदाहरण खोल कर न बताने तथा विद्याधर व्यक्ति एवं समुदाय को सामाजिक संरक्षण के अभाव ने बहुत सारी समस्याएं पैदा कर दीं। अब बिना उनके मार्ग दर्शन के झूठी नकल पर विद्या कब तक टिकती और दोनो तरफ के छल ने बहुत कुछ नष्ट कर दिया। बचा वही जो उनकी समझ में पूरी तरह नहीं आया और लोगों को उसमें रस मिलता रहा। इसलिये धर्म के तीन पक्ष ही अधिक प्रचलित हैं- उत्सव-मनोरंजन, सामुदायिकता, वर्चस्व प्रदर्शन। अन्य उपाय तो बस इन्हें एक रहस्यमयी संपुष्टि के लिये होते हैं।
5 एक और अंदरूनी बात, जैसे सबसे कमजोर और घटिया शिक्षा वाले को प्राथमिक शिक्षा में  डालने की चलन है, उसी तरह कर्मकांड की है। संस्कृत अनेक बड़े बड़े विद्वान जो कर्मकांड कराते भी रहे योग, तंत्र और धर्मशास्त्र के ग्रंथ पढ़ते ही नहीं थे। सफेद झूठ बालते थे साहित्य व्याकरण, दर्शन आदि के बल पर उनकी प्रतिष्ठा रहती थी। हम लोगों ने ऐसे पंडितों से जब जो चाहा कहवाया मानवता के पक्ष में।
इतने में कितना कह पाया, पता नहीं। कुछ संप्रेषित हो सका तो प्रयास को सार्थक मानूं।

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