सोमवार, 23 दिसंबर 2013

अलग अलग संसार


क्या आपने कभी सोचा कि धर्म कर्म की बातें मोटे तौर पर भी लोगों को क्यों नहीं समझ में आतीं? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने की जगह भारतीय बातों को ही बकवास समझ कर नकार देते हैं। आज ईशाइयत इस्लाम की निंदा करने वाले भी इनसे पूर्ण सम्मोहित हैं और सायंस वालों का भी वही हाल है। मुझे जो नहीं समझमें आये उसका अज्ञितत्व ही नहीं है। इससे भारी अज्ञान क्या हो सकता है?
मैं उस धारा का व्यक्ति हूं जो रोज ऐसी चुनौतियां पेश करने का प्रयास करता हो। इस बात की चर्चा फिर होगी। सबसे भारी संकट यह है कि प्रायः सभी प्रख्यात धर्माचार्यों ने मान लिया है कि हमारे पूर्वजोें की समझ  बहुत कमजोर थी। उन्होंने संसार की जो समझ बनाई वह बेकार है। धर्म की कथा प्रवचन करने वालों पर जरा गौर के देखिये कि कितने लोग पाँच कोश, पाँच महाभूत, पाँच इन्द्रियों की भी समझ रखते हों।
जब यही समझ में न आये तो आगे की चर्चा कैसे हो? सारी बातें इसीलिये उलझ जाती हैं। उदाहरण के लिये क्या आपने समझने का प्रयास किया कि पृथ्वी किसे कहते हैं?
मैं ने अपना प्रश्न दुहराया है। पहले लोगों ने अनुमान से उत्तर दिया था। वह केवल ज्योतिष के खगोलीय पक्ष में मान्य है। पंच महाभूत वाली पृथ्वी का लक्षण अर्थात पक्की पहचान है- गंध युक्त होना। जहां जहां गंध है वहां वहां पृथ्वी है। इसी प्रकार अन्य महाभूतों को भी पहचानना होता है। पृथ्वी की पहचान नाक से होती है। अगर नाक कट जाये तब क्या होगा? क्या गंध नहीं आयेगा? फिर गंध एवं पृथ्वी तत्त्व को पहचानने वाली इन्द्रिय आखिर है क्या? इसी तरह हमारी इन्द्रियों की समझ ही समाप्त हो गई? जब पांच महाभूत, इन्द्रिय ही समझ में नहीं आये तो आगे कैसे समझ में आये?
हमारी देश और काल, टाइम और स्पेश की समझ अलग है। उसी के अनुसार तो आगे के सारे वर्णन हैं। इसकी जगह जैसे ही हम यूरोपियन कास्मोलोजी (ब्रह्माण्ड की अवधारणा) में सोच कर तंत्र, शास्त्र, अनुष्ठान आदि समझना चाहेंगे तो सब कुड ऊटपटांग लगेगा ही क्योंकि हम रहते भले भारत में होें सोच तो रहे हैं यूरोपियन या सउदी अरब और फारस की खाड़ी की तरह ।
इसी लिये कम्यूनिस्ट, सोसलिस्ट (कुछेक अपवादों को छोड़), गांधीवादी हो या पक्के संघी किसी को कुछ समझ में नहीं आता क्योंकि हैं सभी दिल दिमाग से यूरोपीय। वीर सावरकर से ले कर सुदर्शन तक गंगा की पवित्रता नहीं समझ पाते। गांधी के आचार्य विनोबा को ग्राम देवी सतबहनि समझ में नहीं आती। सभी यही समझते हैं कि इन बिंबों पर लोगों की बहुत श्रद्धा है इसलिये इन्हें अपनी व्याख्या दे कर अपने विचार का ऊल्लू सीधा कर लिया जाय।
मेरी स्पष्ट समझ है कि ब्रह्माण्ड संबंधी भारतीय समझ के बिना आप भारतीय विषयों को आखिर कहां रख कर, कहां उनकी उपस्थिति समझ कर उनके संबंधों और कार्य प्रणालियों को समझेंगे?

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