गुरुवार, 4 मई 2017

वैश्य, वणिक और शिल्पी


देशी अर्थ शास्त्र
वैश्य, वणिक और शिल्पी
जैसे ही यह मान लिया जाता है कि आरंभ से आज तक भारत एक कृषिप्रधान देश रहा है, एसकी व्यापारिक गतिविधियों की उपेक्षा होने लगती है। यह मामला आज तक चालू है और इससे कई बार लाभ भी मिलता है।
कृषि और छोटे शिल्प को यदि राज्य का समर्थन और संरक्षण न भी मिले तो वे अपनी स्थानीय जरूरत तथा मांग के बल पर जिंदा रहते हैं। इस बाजार पर जब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश या विपणन शामिल नहीं रहता तो इस पर वैश्विक तेजी-मंदी का भी असर कम होता है। इसे संभालने-चलाने वाले आढ़ती भी टैक्स बचाने की जुगत में अधिक कारोबार नगदी ही करते हैं।
पढ़े लिखे लोगों के सामने ही तो यह हो रहा है लेकिन इसे स्वीकारने को न पहले तैयार थे, न आज। पता नहीं कितने प्रकार की हुंडि़या बाजार में हैं। उनमें उत्पादन से उपभोग तक अगर गैर नगद व्यवहार में हो ही जाए तो क्या कर लेगी सरकार? यह एक नयी मौद्रिक प्रणाली जैसी होगी, न बार्टर न पूर्णतः मौद्रिक।
इस उदाहरण को और ऐसी क्रियाओं को अनदेखा करने की प्रवृत्ति पुरानी है। सामान्य समझ वाली वर्ण व्यवस्था की दृष्टि से देखें, जो सच नहीं है, तब भी शिल्पियों को तो वैश्य कोटि में होना ही चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। वैश्य वर्ण से उत्पादक शिल्पिियों को विपणन करने वाले वणिकों ने बाहर धकेलना शुरू कर दिया। लोहानी, लोहिया का मतलब लोहा का उत्पादक नहीं होता बल्कि उसका विपणन करने वाला होता है। उनमें भी जो जितनी महंगी और टिकाउ बस्तु का व्यापार करे, उसका कद उतना ही बड़ा, वही श्रेष्ठ। उसकी श्रेष्ठता धीरे-धीरे बढ़ने लगी और बाद में वह महाजन हो गया। हद तो तब हो गयी जब आढ़त का काम करने वाला बनिया या वणिक ही रहा और शुद्ध नगदी लेनदेन को महाजनी कहा जाने लगा।
महाजनी कारोबार एक प्रकार से राज्य के समानांतर मौद्रिक नियंत्रण का खेल है। सरकारी स्तर पर मुद्रा रूपी दूध को बिना गोल्ड रिजर्व रखे नोट रूपी पानी द्वारा जितना स्फीत यानी पतला किया जाता है, ये महाजन उसे कई गुना अधिक पतला कर देते हैं, समानांतर अनेक प्रकार की हुडियों के द्वारा। इनकी साख जब तक है, इसे रोकना मुश्किल है।
भारत में वैश्य कोटि से अनेक शिल्पी गायब हैं- रहें भी तो कैसे? सूत कातने वाले, पशुपालन करने वाले, दवा बनानेवाले, मूर्ति बनाने वाले, खेती-पानी की व्यवस्था करने वाले इनमें से थाक के थोक ब्राह्मण रहे और आज भी सूत कातना छोड़ कर शेष में इनका बड़ा भाग है। गांधी जी के चेलों ने यदि गैर मिली सूत व्यवसाय से योजनापूर्वक ब्राह्मणों को बाहर करने का काम नहीं किया होता तो कमसे कम पूर्वी भारत में ब्राह्मणों की माली हालात इतनी नहीं बिगड़ती।
चमार को सबसे पहले और कुम्हार को शायद बाद में अछूत श्रेणी में डाला गया। पटहोरी अगरिया, तांती, पटवा आदि अभी वार्णिक पहचान के लिए झूल ही रहे थे कि इसी बीच आरक्षण ने सारा खेल बदल दिया।

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