गया श्राद्ध


गया जी तीर्थ है। हिन्दू धर्मावलंबियों का विश्वास है कि पिंडदान करने से उनके पितरों को स्वर्गलोक में स्थान मिलेगा। मेरे अनेक मित्र मुझसे जानकारियाँ माँगते रहते हैं।
मुझे भी यहाँ रहते हुए 20 साल से ऊपर हो गए। चूँकि मैं संस्कृत-पालि का छात्र हूँ और समाज, संस्कृति, साधना जैसे विषयों में रुचि रखता हूँ। अतः मित्रों की अपेक्षा सहज है। अलग-अलग लोगों के प्रश्न अलग, जिज्ञासाएं अलग, तो मैं ने सेाचा कि इंटरनेट के जमाने में क्यांे न इन्हंे एक ब्लॉग बनाकर डाल दूँ। मित्रों के एवं उनके मित्रों के भी काम आएगा।
गया को लोग आदरपूर्वक गयाजी कहते हैं। यहाँ पिंडदान करने के लिए आने के पूर्व न केवल गया के बारे में बल्कि आपको अपने देश, कुल, धर्म, तीर्थ एवं मृत्यु के बाद की अवस्था के बारे में भी आरम्भिक एवं मौलिक जानकारियाँ होनी चाहिए तभी तो समझ सकेंगे कि गया-पिण्डदान से जुड़ी बातों का मतलब क्या है; जैसे -

1. पितर एवं देवता
2. मरणोत्तर जीवन की अवधारणा एवं श्राद्ध
3. स्वर्ग और मुक्ति, तथा उनका अंतर
4. कीकट क्षेत्र एवं गयाजी तीर्थ की स्थिति/भूगोल
5. गया-तीर्थ की धार्मिक-सामाजिक संरचना
6. पितृ-पार्वण श्राद्ध की मूल सामग्री
7. तीर्थवृत्ति-सुधार आंदोलन एवं विविध संगठन
8. आधुनिक समाज की समस्याएँ एवं उनका समाधान करने के सूत्र

अंतिम निर्णय तो आपका ही होगा।


गया श्राद्ध संबंधी जानकारी के पहले कुछ मोटी बातें


संस्कार की समझ -
श्राद्ध एक संस्कार है। संस्कार नैमित्तिक कर्म हैं जो जन्म, मृत्यु आदि घटनाओं पर आधारित होते हैं। संस्कार की आज समझ समाप्त हो गई है। लोग लोकलज्जा निवारण हेतु येन केन प्रकारेण संस्कार पूरा करते हैं। चूँकि वास्तविक या केवल लोकलज्जा निवारण हेतु किये गये, दोनों प्रकार के संस्कार में कुछ न कुछ संस्कार तो मन में पड़ता ही है अतः स्थिति स्पष्ट करते हुए सभी संस्कार के दो प्रकार हो सकते हैं - सर्वांगीण और निर्वाहनात्मक अर्थात् केवल लोकलज्जा निवारण हेतु ।
वास्तविक/ सर्वांगीण - सर्वांगीण संस्कार वह है, जिसमें संस्कार की पूरी प्रक्रिया संपन्न की जाय और यह निश्चित किया जाय कि जिस उद्देश्य से जो संस्कार किया जा रहा है, वह ठीक से पूरा हो जाए।
इस प्रकार के संस्कार के अनुष्ठान की पूरी प्रक्रिया का पुनः निर्धारण आवश्यक है क्योंकि आज की जितनी संस्कार पद्धतियाँ चलन में हैं, उनमें संस्कार की ठीक समझ नहीं है और वे सभी निर्वाह तक सीमित हो गई हैं। जो लोग ठीक से संस्कार करना-कराना चाहते हैं, उनके लिए इस प्रकार की विधियाँ अनुकूल होंगी। धीरे- धीरे अन्य लोग भी संस्कार के महत्व को समझकर विधिवत संस्कार आदि अन्य अनुष्ठानों की ओर प्रवृत्त होंगे। अनेक लोग जानकारी एवं समझ के अभाव में सामर्थ्य एवं श्रद्धा होने पर भी सही संस्कार नहीं करा पाते हैं।
निर्वाहनात्मक - बहुत सारे गरीब, मजबूर, परदेशी आदि लोगों के पास न समय होता है, न सामर्थ्य, और न इस बात की चिंता रहती है कि मन, वाणी और शरीर पर कोई संस्कार निर्मित हो रहा है या नहीं ?। उनके संस्कार केवल श्रद्धामूलक है या सामाजिक मजबूरी। ऐसे लोगों पर विधि पूर्वक अनुष्ठान का दबाव डालना जरूरी नहीं है।
ऐसे लोगों के लिए श्रद्धामूलक संक्षिप्त कर्मकाण्ड का प्रावधान किया जाना चाहिए, जिससे जो भी परिणाम हो शुभ हो। उनके चित्त में जटिलता, ग्लानि, कपट, ऋण आदि का बोझ उत्पन्न न हो, न ही समाज में संस्कारों के बारे में भ्रातियाँ उत्पन्न हों।

स्वंय पूजा एवं पुरोहित के नेतृत्व में किये जानेवाली पूजा का अंतर -
आज कल एक नई बहस शुरू हुई है कि आनलाइन पिंडदान होना चाहिये या नहीं। कोई व्यक्ति खर्च वहन कर ले और उसके लिये कोई देसरा पिंडदान कर दे।
इस अंतर को भी समझना जरूरी है। कुछ कामों में मनुष्य की अकेली भूमिका पर्याप्त है, जैसे - शौच, स्नान आदि किंतु उबटन लगाने में तो दूसरे की भूमिका सक्रिय हो जाती है। संकल्प ब्यक्ति स्वयं करता है परंतु उस पर जल या अक्षत का अभिषेक तो दूसरा ही कर सकता है। इसलिए यजमान, पुरोहित तथा अन्य, जैसे- नाई आदि पवनियाँ समाज के लोग, कुल, समाज किसी की भी भूमिका को केवल पुरोहित निभाएँ यह सर्वथा अनुचित है। हिन्दी में यदि विस्तार से इन बातों को समझा दिया जाय तो स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि कहाँ किस रूप में किसकी अनिवार्यता है। जो भी ब्यक्ति उन मंत्रों का उच्चारण ही नहीं कर पाता हो वस्तुतः उसे पुरोहित/आचार्य होने का कोई हक नहीं है।

प्रतिनिधि पूजा-पाठ या अनुष्ठान -
मजदूरी लेकर या देकर पूजा-पाठ या अनुष्ठान के विषय में भारी भ्रांति फैलाई गई है। कथावाचन के लिए जरूरी है कि कोई श्रवण करने वाला हो। यहाँ वक्ता एवं श्रोता का रिश्ता साफ है। पाठ या जप करनेवाले किसी ब्राह्मण की मदद करना भी सीधी-सीधी समझ में आ सकती है किंतु अगर किसी भी ब्राह्ममण या ब्राह्मणेतर के बदले में किसी अन्य ब्राह्ममण के द्वारा जप, पाठ या होम किया जाना सर्वदा फलदायक नहीं हो सकता और ऐसा करना मूल प्रक्रिया के विरूद्ध है। भाव के स्तर पर मिलने वाला लाभ केवल सांयोगिक होता है।
इस प्रक्रिया से धर्म के प्रति अनास्था फैलती है और अंततः सभी को हानि होती है। अतः ब्राह्मणों को कभी भी प्रतिनिधि पूजा का भार नहीं लेना चाहिए। यह तो भृत्य या दासकर्म के समान है। जजमानों को भी समझना चाहिये कि माता-पिता, गुरु, आचार्य या पुत्र, पत्नी आदि की स्वतः सेवा एवं संरक्षण धर्म है न कि नौकरों के द्वारा रिश्तों का निर्वाह कराना।
इस समय केवल धन-लाभ के लिये बिना तीर्थ यात्रा किये ही काशी, गया एवं अन्य तीर्थों में अभिषेक कराने की चलन बनी है। गया में अपने पितरों का पिण्डदान की आन लाइन करने न रकने के पक्ष में बहस जारी है जो शर्मनाक है।
अगर लौकिक संस्कृत के बाद हिन्दी भाषा में पूजा-पाठ अनुष्ठान की विधियों का प्रकाशन पंडितों तथा धर्म शास्त्रियों की सभा द्वारा कराया गया होता और ब्राह्मण यजमान को ठगने की मानसिकता से ऊपर उठते तो यह संकट नहीं होता।

गया श्राद्ध की अनिवार्यता
देवताओं को भी सारे सुख उपलब्ध नहीं हैं। उन्हें भी सीमाओं का पालन करना पड़ता है। उन्हें भय सताता है कि देवत्व का क्षय न हो जाय और ईष्या भी तंग करती है क्योंकि बड़े-छोटे, स्वामी-दास का भाव वहाँ भी है। आधुनिक दृष्टि से सोंचे तो बहुत सारे लोग ऐसे हैं जो इन्द्र का भी नौकर बनने की जगह मृत्युलोक में स्वतंत्र रहना या दुकानदारी करना पसंद करेंगे।
गीता भी स्वर्ग को त्रिगुणात्मक मानती है और उससे ऊपर उठने को कहती है। सुख-दुःख पाप-पुण्य जैसे द्वन्द्व अकेले रहते ही नहीं।
स्वर्ग के सदृश अवस्थाओं की भी मान्यता है, जैसे गोलोक, विष्णुलोक, शिवलोक आदि। ऐसे में ईमानदार धर्मशास्त्री को किसी एक परंपरा के पक्ष में नहीं पड़ना चाहिए। चाहे तो कोई अपने पिता को स्वर्गलोक, विष्णुलोक या गोलोक में स्थापित करने का अनुष्ठान करे या न करे। गया का पिंडदान त्रिणुणातीत ब्रहमैक्य की भावना वाले भक्ति का अनुष्ठान नहीं है। तादात्म्य केवल शैव परंपरा में है या निर्गुण ब्रहम की उपासना में। विष्णुलोक में तो पार्षद होने तक की ही अधिकतम सुविधा है। हां, व्यूह की एकता, सख्य भाव एवं गोलोक की मानसिकता अलग है।
अतः धर्मशास्त्र में मोक्ष के स्वरूप के वर्णन के साथ उसके अनुष्ठान का वर्णन होना चाहिए। पुराण, उपपुराण या अनुष्ठान पद्वतियाँ किसी एक परंपरा से नियत्रिंत होती हैं और इस तरह वर्णन करती हैं मानों दूसरा है ही नहीं। धर्मशास्त्र चूँकि विविधतापूर्ण समाज के लिये होता है अतः उसे किसी एक का पक्ष नहीं लेना चाहिए।

पंच कोश परिचय
पंचकोश परिचय के बिना सच पूछिए तो सनातन धर्मीय जीवन शैली संभव ही नहीं है। बौद्ध एवं जैन पद्धति से जीने के लिए भी नामांतर से ही सही कुछ न कुछ सीखना जरूरी है।
पंच कोश का यहाँ तात्पर्य है - अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनंदमय कोश की अपने व्यक्तित्व में पहचान एवं उसकी कार्यप्रणाली की समझ तथा उसके अनुसार जीवन में सफल होना। यह व्यावहारिक ज्ञान किसी सिद्ध-संत के लिए उपयोगी हो, ऐसी बात नहीं है। यह तो सभी गृहस्थों के दैनिक जीवन के लिए उपयोगी है।
उत्तर भारत में इसे अनिवार्य माना गया। कम से कम तीन कोश अन्नमय, प्राणमय एवं मनोमय की कार्य प्रणाली जो नहीं समझे, उसे विवाह का अधिकार ही नहीं है। वह भला श्राद्ध क्या करेगा? यहां तक समाज के द्वारा निर्धारित अनिवार्य एवं व्यावहारिक/प्रायोगिक शिक्षा थी, जो औरत-मर्द दोनों के लिए जरूरी थी। इसलियेे इसके प्रशिक्षण की जिम्मेवारी मुख्यतः औरतों को दी गयी थी। सभी मर्द भी उनके नेतृत्व में खुलकर ही क्या बढ़-चढ़ कर इस प्रक्रिया में सीखने-सिखाने में भाग लेते थे। आज भी प्रशिक्षण देने वाले अनुष्ठानों की खाना पूर्ति तो होती है पर वास्तविक शिक्षा जरा सी गलती से चूक जा रही है।
इन अनुष्ठान को सवर्णों में जनेऊ एवं विवाह दोनों समय एवं असवर्णांे में केवल विवाह के समय अवश्य किया जाता है। यह है, हल्दी एवं बार-बार चुमावन का अनुष्ठान। तांत्रिक दृष्टि से चुमावन संपूर्णता देने वाला अक्षताभिषेक है, जो सभी अभिषेकों का अंत एवं श्रेष्ठतम माना जाता है। समाज में यह सर्वमान्य गैर ब्रांडेड अर्थात संप्रदाय के प्रभाव से मुक्त रूप से स्वीकृत है। इसलिये संस्कृत के मूर्ख पंडित एवं कर्मकांडी प्रायोगिक ज्ञान के अभाव के कारण इस अनुष्ठान से चिढते हैं।
इस अनुष्ठान के पूरा होते ही वर या वधू या वटुक जो भी हो योग साधना में वर्णित धारणा, प्रत्याहार एवं तंत्र में वर्णित न्यास तथा कवच को समझने एवं उसका वास्तविक अभ्यास की पात्रता अर्जित कर लेता है। सामाजिक स्वीकृति तथा बड़ों के संरक्षण में किये जाने के कारण इसका कोई भी दुष्परिणाम नहीं होता। इसे सीखने की न्यूनतम उम्र 9 साल है।
आज तो हर प्रक्रिया का समापन मंदिर में देवता के दर्शन एवं पाठ से पूरा कर लिया जाता है। न्यास, कवच, अर्गला, सभी मंत्रों का केवल शाब्दिक उच्चारण मात्र से क्या होगा? यह तो कक्षा एक नहीं, नर्सरी की पढ़ाई हुई।
स्नायु तंतुओं की संवेदना, संरचना को महसूस करना, मन में पड़ने वाले प्रभाव को स्वीकार करना, फिर तटस्थ होना, फिर उसे नियंत्रित करना, असली शिक्षा तो यह है। एकांत, अकेली साधना में जिस अनुभव को प्राप्त करने में कई वर्षों का समय लगता है, उसे परिवार के लोग अपने संरक्षण में मात्र हफ्ते-दस दिन में जबरन सिखा देते थे।
ऐसे अनेक अनुष्ठान हैं, जिन्हंे सामाजिक स्वीकृति है। पूजापाठ तंत्र के नाम पर अंधानुकरण या ठगी से बेहतर है कि पहले समाज में स्वीकृत अनुष्ठानों में जीवन फँूकने का काम किया जाये। विस्तार भय से अब लिखना बंद कर रहा हूँ। शिक्षण-प्रशिक्षण के अभिक्रम या चुनौती के लिए तैयार हूँ। आरंभ में मात्र 10-15 विवाहित जोड़ों की जरूरत है, जो अगली पीढ़ी को सिखा सकें, फिर तो बाबा रामदेव की कपाल भाँति से भी दु्रतगति से यह प्रक्रिया समाज में बढ़ेगी। देहात में आज भी घर-घर में होती ही है। मुश्किल यह है कि देहात के लोग शहर के लोगों की नकल करते हैं, अशिक्षित शिक्षित की और असवर्ण सवर्णों की। इसलिये शिक्षित तथा अभिभावक की उम्रवाले ब्राह्मणों को इस काम के लिये आगे आकर समूह बना कर पारिवारिक एवं संस्थागत स्तर पर प्रशिक्षण देना चाहिए। औरतों में भी शिक्षा के प्रसार के कारण अब उनका भी खुला सहयोग मिलेगा। चंूकि इस प्रशिक्षण में घर की बड़ी-बूढ़ी औरतों का नेतृत्व मान्य होगा अतः स्पष्ट है कि उनकी अभिरुचि अधिक रहेगी। यह तो पहली कड़ी है, आगे भी ऐसी जानकारियां उपलब्ध होती रहेंगी।

गया श्राद्ध की तिथि एवं मुहूर्त
गया में पुण्यकर्म के विधान के लिए ज्योतिष संबंधी मान्यताओं में भी अंतर है। यहाँ विवाहादि शुभ कर्मों के लिए भी गुरु का उदित होना जरूरी नहीं है। गया या मगध में यह सर्वत्र नियम है। इतना ही नहीं, जो लोग मगध के बाहर से भी आते हैं वे भी मगध की इस परंपरा की मर्यादा को मानते हैं।
न त्यक्तव्यं गयाश्राद्धं सिंहस्थे च वृहस्पतौ।
अधिमासे सिंह-गुरावस्ते च गुरु-शुक्रयोः।
तीर्थयात्रा न कर्तव्या गयां गोदावरीं विना।
(वायुपुराण)
(वृहस्पति के सिंह राशि पर स्थित होने, अधिक मास, सिंह या गुरु के अस्त होने पर भी या गुरु-शुक्र दोनों के अस्त रहने पर गया एवं गोदावरी के अतिरिक्त तीर्थयात्रा नहीं करनी चाहिए।)




प्रायः पूछे जानेवाले प्रश्न एवं उत्तर

1. पिंडदान में कितना समय लगता है ?
उत्तर- पूरी प्रक्रिया में लगभग 21 दिन, बाकी आपकी शक्ति एवं श्रद्धा तथा समय।
(विशेष जानकारी के लिए पढ़े ...............)

2. कितना खर्च खर्च आता है ?

उत्तर- खर्च की निश्चित सीमा नहीं है। आप अपने लिए क्या सुविधाएं चाहते हैं और किस स्तर के आचार्य से श्राद्ध सम्पन्न कराना चाहते हैं तथा कितने दिनों का, इसी आधार पर खर्च का अनुमान किया जा सकता है।
दान की कोई सीमा नहीं है। गरीब लोग झंुड में सामूहिक पिंडदान बहुत कम खर्च में कर लेते हैं और अमीर लोग अपने लिए एक अकेला आचार्य भी रखते हैं तो उनका खर्च अधिक होता है। इसका कोई निश्चित मानक नहीं है।
मध्यम स्तर पर तीन दिनों के श्राद्ध में , जिसमें आचार्य एकल हो, 5 से 10 हजार तक का खर्च आता है। यह कम या अधिक भी हो सकता है।

3. रहने की व्यवस्था क्या है ?
उत्तर- पंडों के घर, सरकारी कैम्प, धर्मशालाएँ, होटल, निजी घरों के कमरे, जो स्थानीय लोग किराये पर देते हैं। भारत सेवाश्रम संघ की समानान्तर व्यवस्था है। कम से कम 2 महीने पहले बुक करायंे। बोधगया की दूरी 15 किलोमीटर है।

4. क्या पंडे बहुत परेशान करते हैं ?
उत्तर- अब पहले वाली बात नहीं है जब हाथ बाँधकर धर्मसंकट में डालते थे। सभी पंडे परेशान नहीं करते। आज कल तो अनेक लोग पहले से ही सब कुछ तय कर लेते हैं। जब गलत पंडे से सम्पर्क हो जाय तब फँस जा सकते हैं। पंडों के बीच जजमान एवं इलाकों का बँटवारा रहता है। दूसरों का जजमान जब कोई पंडा अपने पास ले जाता है तब झगड़ा होता है, जिसमें जजमान भी फँस जाता है।
अतः सही पंडे की पहचान कर उसके पास जाना चाहिए। इसके लिए पंडों का अपना संगठन गयावाल तीर्थवृत्ति सुधारिणी सभा एवं चौदह सइयाँ कमिटि, पुलिस या भारत सेवाश्रम संघ से सीधा सम्पर्क करना चाहिए।
आने के पहले ही अपने परिवार के पुराने पंडे की जानकारी प्राप्त कर लें। जानकारी न होने पर सरकारी बेबसाइट या मित्र परिवार आदि से मदद लें। दुनिया बदली, तो पंडे भी बदले। जमींदारी उन्मूलन के बाद पंडों का केवल धार्मिक महत्त्व ही बचा है। जमींदारी, रंगदारी को कानूनी या सामाजिक संरक्षण नहीं है। तीर्थ व्यवस्था में भी अनेक लोग लग गये हैं। प्रशासन, धार्मिक संस्थाएँ, ट्रस्ट चलाने वाले सेठ, होटल मालिक सबकी सालाना आमदनी का एक बड़ा भाग इस धार्मिक अवसर पर प्राप्त आय है। सभी अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में लगे रहते हैं। गयावाल पंडों से डरने की जरूरत नहीं है न ही उनके परम्परागत अधिकारों को चुनौती देने की।
धामी, श्रोत्रिय और मग तो आसानी से संतुष्ट होने वाले हैं। ये इतने संगठित भी नहीं है कि किसी तीर्थ यात्री से लड़ेंगे न ही इनके अधिकार क्षेत्र की सभी वेदियों पर सभी लोग जाते हैं ?

5. पंडों की प्रताड़ना से बचाने में क्या आप मदद करेंगे ?
उत्तर- अवश्य, अगर आप ने स्वयं जान-बूझकर गलत पंडों का चुनाव नहीं किया हो। पंडों का अधिकार क्षेत्र पारंपरिक है। कम या अधिक दक्षिणा-दान के विवाद में मदद हो सकती है, परंपरागत अधिकार के मामले में नहीं।

6. कौन पिंडदान कर सकता है ?
उत्तर- वैसे सभी व्यक्ति जो पिंडदान में आस्था रखते हैं और जिनके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी हो।

7. क्या आप पिंडदान करा देंगे ?
उत्तर- मैं पिंडदान कराने का काम नहीं करता। केवल परामर्श दे सकता हूँ। मेरी समझ के अनुसार श्राद्ध के लिए 30 दिन के समय एवं श्रद्धा की आवश्यकता है। जब मैं इतना समय नहीं निकाल सकता तो श्राद्ध क्या कराऊँगा ?

8. क्या पिंडदान कराने से प्रेतबाधा से मुक्ति मिलेगी ?
उत्तर- यह विश्वास का मामला है। बिना पिंडदान भी प्रेतबाधा से मुक्ति मिल सकती है। प्रेतबाधा के लिए दो बातों को व्यक्ति के अंतःकरण/चित्त में स्थापित करना होता है, चाहे वह जिस विधि से हो- भय एवं ग्लानि से मुक्ति, देश एवं काल की नैसर्गिक स्मृति (जो जन्म से रहती है) में आई त्रुटि की मरम्मत। ये किसी भी विधि से सम्पन्न हों, तभी प्रेतबाधा से मुक्ति मिल सकती है।

9. कैसे पता चलेगा कि पिंडदान सफल हुआ या नहीं ?

उत्तर- इसकी कोई पक्की जाँच नहीं है। आपका अपना विश्वास एवं संतोष ही असली है।

10. मच्छरों का क्या हाल है ?
उत्तर- हाल पुराना है। अब गया क्या, अनेक शहरों मंे फैल गए हैं। क्या उनकी मुक्ति के लिए भी आप श्राद्ध करना चाहेंगे ?

11. आप लोग गंदगी हटाने के बारे में कुछ करते क्यों नहीं ?
उत्तर- गंदगी की परिभाषाएँ एवं पहचान अलग-अलग हैं। हमलोग अपने बल पर प्रयास करते हैं। गया तीर्थ हैै। अगर सारे हिन्दुस्तानी लोग गंदगी फैला सकते हैं तो सफाई में भी तो उन्हें योगदान करना चाहिए आपका क्या ख्याल है ? शामिल होइएगा ?

12. कहाँ ठहरना उचित होगा ?
उत्तर- पहले आप अपनी जरूरत एवं आर्थिक योजना पर विचार करें -
- आवासीय कैंपों में राशि नहीं लगती।
- धर्मशाला में 25 से 100 रूपये में काम चल जाता है।
- भारत सेवाश्रम संघ श्रद्धानुसार राशि स्वीकार करता है।
- पंडे अपने घरों में या अतिथिशालाओं में व्यवस्था करते हैं। उनसे आप बात कर सकते हैं। धोखा भी हो सकता है। स्वतंत्र कमरे की आशा न करें। प्रायः भीड़ होने पर संयुक्त कमरा ही मिलेगा। पंडे लोग आपकी माली हालत का स्वयं अनुमान लगाकर व्यवहार करते हैं। आप जितनी सुविधा चाहंेगे उतनी संपन्नता का आप स्वयं दावा करते हैं तो दान-पुण्य उसी अनुपात से आपको करना चाहिए। बेहतर यही है कि समय पूर्व साफ-सुथरी चर्चा कर कमरा बुक करा लें।

13. घर से क्या7क्या सामान लाना होगा ?
उत्तर- पहनने के कपड़े - रुकने की अवधि के अनुसार दवा वगैरह जो जरूरी हो और आपके लिए जो भी बेहद जरूरी हो। बाकी का सारा सामान बाजार में मिलता है। परम्परानुसार घर से चावल, तिल, जौ का चूर्ण/सतू ला सकते हैं। शेष सामग्री यहाँ मिल जाती है। जेवरात पहनकर मेले में न आएँ तो ही अच्छा है।

14. मुंडन कराना क्या जरूरी है? अगर हाँ, तो कब और कहाँं? मुंडन से बचने का क्या कोई उपाय है?
उत्तर- मुंडन की अलग-अलग क्षेत्रीय परम्पराएँ हैं। अनेक लोग, घर से ही मुंडन करा कर आते हैं। कुछ यहाँ भी कराते हैं। कुछ नहीं भी कराते हैं। इसकी अनिवार्यता नहीं है। वस्तुतः मुंडन निषिद्ध है।

15. योग्य आचार्य कैसे मिलेंगे ?
उत्तर- अगर आप स्वयं संस्कृत भाषा या कर्मकांड के जानकार न हों तो योग्य/अयोग्य समझेगें कैसे? अगर आप इस मुद्दे पर संवेदनशील हैं तो अपने किसी परिचित के माध्यम से आचार्य की व्यवस्था करें।
एक विकल्प यह है कि आप अपना आचार्य अपने साथ स्वयं ला सकते हैं, जो पहले गया में पिंडदान करा चुके हों।

16. क्या जजमान अपना आचार्य/पुरोहित स्वयं ला सकते हैं ?
उत्तर- जी हां, खुशी-खुशी।

17. योग्य आचार्य की दक्षिणा क्या होगी ?
उत्तर- यह तो उन्हीं से पूछना होगा ? कम से कम 1000 रुपये प्रति दिन। आप इसका भुगतान 4-5 मिलकर भी कर सकते हैं। शेष दान में आपकी श्रद्धा।
18. धूर्त लोगों से कैसे बचा जाय ?
उत्तर- लालच में न पड़ें, झूठा परिचय न दें। डरने की कोई बात नहीं है। जरूरत पड़ने पर पुलिस से सम्पर्क करें।

19. कैसे जानंू कि मेरा पंडा कौन है ?
उत्तर- इसके लिए सरकारी वेबसाइट एवं स्टेशन पर लगे पंडालों , भारत सेवाश्रम संघ, पंडा संघ (तीर्थवृत्ति सुधारिणी सभा आदि से सम्पर्क करें। समय पूर्व पूछिएगा तो मैं भी पता कर बता सकता हूँ।

20. क्या पंडे के घर पर ही रुकना जरूरी है ?
उत्तर- नहीं।

21. गया धाम पर कौन ब्राह्मण होते हैं ? ये हमारे यहाँ क्यों नहीं होते ?
उत्तर- हरेक क्षेत्र में अलग-अलग ब्राह्मण होते हैं और तीर्थों के ब्राह्मण तो अलग होते ही हं,ै वे वहाँ कैसे मिलंेगे। यहाँ दो प्रकार के ब्राह्मण इस अनुष्ठान में आपकी मदद करते हैं -
पंडे - जो केवल अनुष्ठान की सफलता का आशीर्वाद देते हैं। इनका क्षेत्र बंटा हुआ है -
गया शहर में - गयावाल एवं धामी पंडे
धर्मारण्य में - श्रोत्रिय
मातंग वापी में - मग ब्राह्मण
पुनपुन घाटों पर - मग ब्राह्मण
श्राद्ध कराने का काम (आचार्यत्व) गयावाल एवं धामी पंडे नहीं कराते। गयावाल बहुत हीं धनी एवं जमींदारी शैली वाले दबंग लोग रहे हैं। अभी भी ये शान शौकत से रहते हैं। इनके कर्मचारी/नौकर ही ज्यादा काम संभालते हैं। इनका आवास शहर के दक्षिणी भाग में है, जो अंदर गया कहा जाता है। इनके घर बड़े-बड़े हैं, धर्मशालाओं की तरह। ये यात्रियों के आवास की भी जिम्मेवारी लेते हैं।
धामी लोग प्रायः आवास की जिम्मेवारी नहीं लेते। धामी पंडे, धामी टोला में रहते हैं। ये तुलनात्मक रूप से गरीब और कम प्रभावी हैं। दोनो एक दूसरे को अप्रामाणिक और स्वयं को सही बताते हैं। आपको इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहिए। ऐतिहासिक शोध करना हो तो बात अलग है। सत्य जानकर आपका कर्मकाण्ड फँस जा सकता है।
इतिहास पर अलग से जानंे- गयावाल पंडे एवं रानी अहिल्या बाई ।
पुरोहित के रूप में सम्पूर्ण भारत के ब्राह्मणों को श्राद्ध कराने का अधिकार है। स्थानीय स्तर पर परम्परा से निम्नलिखित ब्राह्मणों के जातियों के लोग पुरोहिती का काम करते हैं।
मग/शाकद्वीपी, श्रोत्रिय, क्राैंचद्वीपी, कान्यकुब्ज, सरयूपारी, गौड़, मैथिल, बंगाली, उडिया एवं दक्षिण भारतीय, जिनका मैं नाम नहीं जानता। जानना जरूरी इसलिए नहीं कि आप स्वयं चुन सकते हैं। पंडा दबाव नहीं दे सकते कि अमुक व्यक्ति ही पुरोहित होगा।

22. क्या पितृपक्ष में ही पिंडदान होता है या अन्य तिथियों एवं महीनों में भी?
उत्तर- सर्वाधिक लोग इसी अवसर पर आते हैं परन्तु कई क्षेत्रों के लोग दूसरे समय भी आते हैं। यह निर्णय भारत के विविध क्षेत्रीय परम्पराओं के अनुसार होता है।

23. मुझे पितृपक्ष की किन तिथियों में पिंडदान करना चाहिए ?
उत्तर- यह प्रश्न आप अपने कल के बुजुर्गों या पुरोहितो से पूछे तो बेहतर होगा या फिर अपनी क्षेत्रीय पहचान बताएंगे तो मैं पता लगाने का प्रयास कर सकता हूँ।

24. कम से कम कितने दिनों में और कहाँ पिंडदान करें ?
उत्तर- हिन्दू धर्म लचीला है। आप कुछ भी नहीं करें तो आपका कौन क्या बिगाड़ लेगा ? एक से छोटी संख्या तो होती नहीं तो उतने में भी चलेगा। आज की व्यस्त स्थिति में तीन, चार, पाँच सात की भी चलन है। वस्तुतः यह खानापूरी है। पूरे अनुष्ठान में तो सच पूछिए 25 रोज लग ही जाएंगे।

25. क्या स्त्री या पुरुष अकेले भी पिंडदान कर सकते हैं ?
उत्तर- गया में सभी। पति या पत्नी कोई भी पिंडदान कर सकते हैं। सीता ने राम की अनुपस्थिति में पिंडदान किया था।

26. अपने परिवार वालों के अतिरिक्त अन्य का भी पिंडदान किया जा सकता है ?
उत्तर- बेशक, सभी जीव जंतुओं के लिए श्राद्ध किया जा सकता है, जो पितृ लोक निवासी हैं। समस्त देवताओं एवं ऋषियों के लिए तर्पण किया जाता है। मित्र, बंधु बांधव व समस्त संसार के लिए आप पिण्डदान कर सकते हैं, बशर्ते वे जीवित न हों।

27. गया तीर्थ का वर्णन किन वैदिक ग्रंथों में मिलता है ? इसका ऐतिहासिक साक्ष्य क्या है?
उत्तर- वेदों में नहीं, वायु पुराण में मिलता है। उस अंश की प्रमाणिकता पर आधुनिक विद्वानों को संदेह है, पर गया श्रद्धा तो अति प्राचीन है। दरअसल वायु पुराण के इस अंश की प्राचीन पांडुलिपि का संदर्भ ही नहीं लिखा गया कि किस पांडुलिपि के आधार पर यह अंश छपा। संग्रहालयों में संकलित कुछ पांडुलिपियों में अनेक अंश नहीं मिलते, विशेषकर तीर्थों की आधुनिक स्थिति के मामले में। इसी तरह बनारस के भेलुपुर का वर्णन संदेह पैदा करता है। मूल मामला/आशंका गयावाल ब्राह्मणों की उत्पति वाला है।
गया में रानी अहिल्या बाई के द्वारा जीर्णोद्धार के पहले का नियम, ऐतिहासिक साक्ष्य, शिलालेख वगैरह, कुछ ऐसा नहीं मिलता, जिसमें गयावाल पंडों का वर्णन हो।
गयावालों का धामी पंडों एवं भारत सेवाश्रम संघ के संस्थापक स्वामी प्रणवानन्द से लंबी लड़ाई धार्मिक वर्चस्व एवं पिंड वेदियों पर चढ़ाने को लेकर चली है। यह विवादास्पद विषय है।

28. क्या ब्राह्मणों का दक्षिणा माँगना उचित है ?
उत्तर- बिल्कुल उचित है। दक्षिणा का मतलब है ब्राह्मण की बौद्धिक क्षमता के एवज में दिया जाने वाला पारिश्रमिक। वैदिक काल से मनमानी दक्षिणा माँगी जाती रही है। हाँ, अनिवार्य कर्म जैसे - नित्य एवं नैमित्तिक, नामकरण, विवाह, श्राद्ध आदि पूरी कराना भी ब्राह्मण की जिम्मेवारी है। अतः गरीब आदमी को भी कोई सही ब्राह्मण इसलिए ना नहीं कह सकता कि उसकी मनमानी दक्षिणा वह नहीं दे सकता है।

29. क्या श्राद्ध के समय बच्चों को लाना उचित है ?
उत्तर- छोटे बच्चों को न लाना ही उचित है। वैसे आपकी मर्जी।

30. पिंडदान के लिए प्रस्थान करने हेतु यात्रा का मुहूर्त क्या है ?
उत्तर- परम्परानुसार कहा भी गया है कि गया एवं गोदावरी की यात्रा पर गुरु के अस्त होने आदि का विचार नहीं किया जाता क्योंकि यह तो चातुर्मास में ही होता है।

31. पिंडदान करने के लिए समय का निर्धारण कैसे किया जाता है ?
उत्तर- क्षेत्रीय परम्पराओं के अनुसार।

32. गयावाल पंडों की उपाधियाँ अजीबोगरीब क्यों हैं ?
उत्तर- यह विवादस्पद विषय है। इसका उत्तर गयावालों से ही लीजिएगा जब गया आइएगा।

33. ऑन-लाइन पिंडदान क्या है ?
उत्तर- यह एक नई बहस है कि आपके बदले में कोई व्यक्ति गया में पिंडदान करे और आप इंटरनेट से देखते रहंे और इस आयोजन के लिए भुगतान करें।
इसे गया के पंडों एवं विद्वत-परिषद ने मान्यता नहीं दी है । जब आप ऑन लाईन श्राद्ध नहीं करते तो गया श्राद्ध क्यों करेंगे और प्रतिनिधि किन-किन मामलों में बने, यह बड़ा बिवाद है - धर्मपत्नी तो होती है किन्तु धर्मपति नहीं होता। दत्तक पुत्र तो होता है पर उसकी माता किसी की पत्नी नही हो पाती।

34. क्या इसकी धार्मिक मान्यता है ?
उत्तर- अभी नहीं है, आगे भगवान जानें।

35. क्या इस अवसर पर किसी मित्र या परिवार के यहाँ रुकना मना है ?
उत्तर- श्राद्ध शब्द से ही लोग डरते हैं। श्राद्ध के नियम भी अलग होते हैं तो आपके मित्र को थोड़ी परेशानी तो हेागी, ही और अगर सभी लोग मित्र के घर रुकें तो पंडों के घर कौन रुकेगा? जरूरत पड़ने पर लोग मित्रों के घर रुकते ही हैं। आम तौर पर नहीं रुकते। यह अति धर्म भीरूता या शंकालुचित्त की समस्या है अन्यथा कोई दिक्कत नहीं है। रिश्तेदारों के घर रुकने से पूरा परहेज करें वरना शांति भंग की आशंका बनी रहेगी। दरअसल यह तीर्थयात्रा है, रिश्तेदारी या मित्र के घर मस्ती की यात्रा नहीं है। सारी बातें परिस्थिति सापेक्ष हैं।

36. गया श्राद्ध शुभ कर्म है या अशुभ कर्म ?
उत्तर- यह शुभ-अशुभ से अलग अवसरविशेष पर किया जाने वाला कार्य है। इसे नैमित्तिक एवं पार्वण कहा गया है। अगर आप प्रेत शांति के लिए आते हैं तो अशुभ निवारक है। अगर पितृ-प्रतिष्ठा एवं पितरांे को स्वर्गलोक भेजने के लिए आते है तो यह शुभ ही शुभ है। इसे श्राद्ध नाम के कारण अशुभ नहीं माना जाना चाहिए न ही यह विवाह की तरह मंगलकारी है, जिसके लिए मांगलिक विधियों की आवश्यकता है।

37. क्या इस अवसर पर छूत भी लगती है ?
उत्तर- बिलकुल नहीं। धर्म शास्त्रों में ऐसा विधान नहीं है। सच यह है कि काशी से पश्चिम में रहने वाले लोग काशी पूर्व के क्षेत्र को अपवित्र मानते हैं। वे अहंकार की दुविधा में रहते हैं। गया, जगन्नाथपुरी की यात्रा भी करते हैं और इस अपवित्र क्षेत्र में आने का प्रायश्चित्त भी।
मिथिला राजा रामचन्द्र की ससुराल है अतः वहाँ से हर मामले में हार माननी पड़ती है। मगध के साथ रक्त संबंध और शत्रुता दोनों ही महाभारत काल से ही है। राजा के साथ बेमतलब प्रजा भी हिन्दुस्तान-पाकिस्तान करती रहती है। ऐसे लोगों को घर जाकर पुत्र बिरादरी को भोजन कराकर उसकी स्वीकृति प्राप्त करनी पड़ती थी। कुछ लोग उत्सव की मानसिकता में भंडारा भी कराते हैं और लोगों को अपनी तीर्थयात्रा के गौरव से अभिभूत करना चाहते हैं।

38. क्या गया श्राद्ध के बाद अपने घर में एक वर्ष तक विवाह आदि मांगलिक कार्य की मनाही है ?
उत्तर- बिल्कुल नहीं। सामाजिक दबाव तो केवल भंडारे तक ही सीमित रहता है।

39. क्या बौद्ध एवं जैन भी पिंडदान करते हैं ?
उत्तर- हाँ। नेपाली लोग तो एक हाथ में धर्मचक्र भी साथ-साथ धुमाते रहते हैं। अग्रवाल जैन तो रात-दिन में दो बार धर्म बदलते हैं। उन पर धर्म का नियम कौन लागू कर सकता है। ओसवाल मारवाड़ियों की पकड़ भी दोनो ओर है परन्तु उनका मुख्य धर्म जैन ही है।

40. अन्य धर्मावलंबियों भी क्या पिंडदान कर सकते हैं ?
उत्तर- परम्परा से तो नहीं करते । जो विष्णु को ही नहीं मानते उनकी विष्णुलोक में क्यों श्रद्धा होने लगी। आज के युग में विदेशी/एन.आर.आई. की बड़ी औकात है। उनके लिए धर्म-मर्यादा का कोई
बन्धन नहीं।
41. विष्णुपद मंदिर का द्वार पश्चिम में क्यों हैं ?
उत्तर- यह नया है। एक जिला अधिकारी ने यात्रियों की सुविधा के लिए बनवाया है। इस पर वास्तु कीदृष्टि से विचार व्यर्थ है।
42. गया गजाधर का क्या मतलब है ?
उत्तर- गजाधर का मतलब है गदाधारी विष्णु। विष्णुपद मंदिर तो केवल पिंडवेदी है। मूल मंदिर तो उसके सटे गदाधर-गजाधर विष्णु का है और उसके सामने देवधाट खुलता है। यह थोड़ा क्षतिग्रस्त है। इसका वास्तु शिल्प अलग है। विष्णुपद मंदिर तो अहिल्या बाई का बनवाया हुआ है।
43. उडियाएल सतुआ पितरन के क्यों कहते हैं ?
उत्तर- प्रेतशिला पहाड़ी पर एक शिला खंड है। यह सबसे ऊँचा है। पिंडवेदी के पास ही स्थित इस वेदी पर सतू डाला जाता है जो हवा के झोंके के साथ चारो तरफ छा जाता है। लोग यह भावना करते है कि जन्म जन्मांन्तर में भी जिन पितरो को मुझसे पिंड पाने की इच्छा रही हो वे सभी सतू को पाकर तृप्त हों।
इसे ही मुहावरे का रूप दिया गया कि जो व्यर्थ चला गया, उसे छूठी श्रद्धा का रूप देकर गौरव पूर्ण बताया जा रहा है।
44. पिंड वेदियाँ कितनी हैं ? कहाँ-कहाँ पिंडदान जरूरी है ?
उत्तर- सारी पिंडवेदियों की संख्या एवं स्थान के बारे में मतांतर हैं। कई पिंडवेदियों पर अतिक्रमण हो गया है और मकान बन गए हैं ।
गयावाल पंडे दावा तो सर्वाधिक करते हैं परन्तु उनकी रुचि यही रहती है कि विष्णुपद के आसपास उनके वर्चस्व क्षेत्र तक में ही सारी पिंडदान की प्रक्रिया पूरी हो जाए। एसलिए जिसे जो मन में आता है, बताता है। वायु पुराण के अनुसार पूरे गया क्षेत्र में पिंड वेदियाँ हैं।
प्रोफेसर गणेश सिंघल, भूगोल विभाग, मगध विश्वविद्यालय ने इस पर शोध किया है। इस समय प्रचलित वेदियों के चित्र एवं सूची अलग से दिए जाएंगे वहीं से आप समझ सकते हैं।

45. क्या इस विषय पर कोई प्रामाणिक पुस्तक उपलब्ध है ?
उत्तर- उपर्युक्त। गीताप्रेस गोरखपुर के द्वारा एक पुस्तक इस विषय पर प्रकाशित की गई है। यह भारत के पश्चिमी क्षेत्र जैसे - उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश पंजाब, राजस्थान, हरियाणा आदि के लिये उपयोगी है। अन्य हिंदी भाषी लोग भी इस पुस्तक के आधार पर गया श्राद्ध के विषय में अच्छी जानकारी पा सकते हैं। मूल्य मात्र 20 रुपये हैं। आसानी से उपलब्ध भी है।
वैसे मानववैज्ञानिक दृष्टि से प्रो. एल.पी. विद्यार्थी की पुस्तक राँची से प्रकाशित है।

46. सामान्य श्राद्ध एवं गया श्राद्ध में क्या अंतर है ?
उत्तर- सामान्य श्राद्ध मृत्यु के बाद वार्षिकी तक किए जाने वाले श्राद्ध को कहते हैं। गया श्राद्ध पार्वण श्राद्ध है। यह पितृपक्ष के विशेष पर्व पर आयोजित होता है।

47. क्या सभी जगहों पर गाड़ियाँ जाती हैं ?
उत्तर- नहीं। भीड़ के कारण कई जगहों पर सवारी ले जाना मना रहता है और पहाड़ियों तथा नदी तालाब के आसपास तक ही चार पहिया वाहन जा सकते हैं।

48. पहाड़ी पर चढने की क्या व्यवस्था है ?
उत्तर- पालकी/डोली पर बैठाकर मजदूर कंधों पर लादकर उन्हें ले जाते हैं जो पहाड़ी पर नहीं चढ़ सकते।

49. गया के आस-पास क्या दर्शनीय है ?
उत्तर- बोधगया, राजगिर, नालन्दा, पावापुरी, पारसनाथ, कौआकोल, इटखोरी बगैरह।

50. गया का कौन सा सामान मशहूर है और कहाँ से खरीदना चाहिए ?
उत्तर- मिठाइयों में - तिलकुट और अनरसा। (इसे रमना या टेकारी रोड से खरीदें)
कपड़ों में हैण्डलूम - मानपुर से।
मिक्सड रेशमी वस्त्र - मानपुर एवं नवादा से।
पत्थर के सामान - चाँदचौरा एवं पत्थलकट्टी गाँव से।
51. क्या गाइड की व्यवस्था है ?
उत्तर- नहीं। पंडे ही मार्गदर्शक की व्यवस्था करते हैं। यह तीर्थ अनुष्ठान की बात है, पर्यटन की नहीं कि गाईड मिलेंगे।
52. इस समय गया की शांति-व्यवस्था कैसी है ?
उत्तर- ठीक ठाक है। सामान्य है।

53. क्या अपना पिंडदान स्वयं भी किया जा सकता है ?
उत्तर- हाँ अगर आपने अपना श्राद्ध स्वयं जीवित रहते हुए भी कर लिया हो तो गया श्राद्ध भी कर सकते हैं।

54. मेरे संतान का देहांत हो गया है। क्या पिता पुत्र का पिंडदान कर सकता है ?
उत्तर- हाँ, ऐसा संभव है, परम्परा से मान्य है।

55. क्या पिंडदान के समय या मंदिर में पूजा-पाठ अनुष्ठान में जातीय स्तर पर कोई रोक-टोक है?
उत्तर- नही,ं सभी वर्णों की सभी जातियों को पिंडदान का अधिकार है।



गया तीर्थ की दुर्दशा

गया तीर्थ है। मतलब - यह तीर्थ के लक्षणों से भरा पूरा है। तीर्थ के लक्षण हैं -
तीर्थ - अर्थात् पारंगत, निष्णात, सीमा को पार किया हुआ, उच्चतम स्थान पर स्थित, जल/जलाशयों से भरा-पूरा, जो तीर के पास स्थित हो,- नदी, समुद्र या बड़ा जलाशय, चाहे जो भी हो।
गया तीर्थ में तीर्थ के सभी लक्षण मौजूद हैं। यहाँ पितरों को प्रेतलोक एवं पितरलोक से ऊँचे स्वर्गलोक में स्थापित कराने वाली पिंडदान की प्रणाली उपलब्ध है। पवित्र फल्गू नदी के किनारे यह अवस्थित है। फल्गू नदी के साथ-साथ पौराणिक वर्णन के अनुसार गया क्षेत्र अनेक नदियों, सरोवरों एवं कुंडों से भरा-पूरा है, जिनका जल अति उत्तम है, आज भले ही उनकी दुर्दशा हो।
गया में फल्गू नदी का स्वरूप मौलिक है। वह केवल यहीं पर है। बाकी के जलाशय अन्य क्षेत्रों से आमंत्रित है,ं जो स्वर्ग एवं भारत के अन्य भू-भागों से देवताओं के साथ आमंत्रित हैं। अगर यह विश्वास सही है कि गया में गजाधर विष्णु एवं ब्रह्मा, गयासुर के शरीर पर शिला की स्थापना कर उस पर विराजमान हैं, इस कारण गया तीर्थ पुण्य क्षेत्र है तो उसी तरह यह भी विश्वास करना होगा कि यहाँ के अन्य छोटे-बड़े सरोवर, झरने, सरिताएँ भी परम पवित्र हैं। आज का दुविधा में है चाहे वे पंडे पुराहति हों या जजमान। यह तो कोई बात नहीं हुई कि तीर्थप पवित्र है और सरोवर पवित्र नहीं हैं।
इन जलाशयों का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है -
1. नदी -फल्गु/निरंजना अभी जिसकी स्थिति बनी हुई है।
2. मोहाने - मोहना
3. इन दोनों के संगम क्षेत्र का विशाल मैदान धर्मारण्य
4. मातंगवापी - मतंग ऋषि की उपासना भूमि
5. मधूसूदन क्षेत्र एवं मधुश्रवा/मंदश्रवा (मंदसरवा) सरिता, जो अब सीवर लाइन में तब्दील हो गई
6. कपिल धारा -सरिता/झरना ब्रह्मयोनि पहाड़ी से निकलने वाली
7. गदालोल सरोवर जो अब अतिक्रमण एवं गंदगी के कारण विलुप्त की प्रक्रिया में है।
8. रूक्मिणी सरोवर - अभी भी ठीक है।
9. वैतरणी धारा - नाले में तब्दील
10. वैतरणी सरोवर है। ब्रह्मसत सरोवर है। दोनों आपस में जुड़े हैं।
11. गोदावरी तालाव बचा हुआ है, धारा नाले में तब्दील
12. सूर्यकुंड तालाब है।
13. सीता कुंड
14. रामसागर का आकार छोटा हो गया है।
15. पितामहेश्वर तालाब
16. रामकुंड
17. ब्रह्मकुंड

इनके अतिरिक्त अन्य जलाशय एवं छोटी सरिताएँ जो कभी धार्मिक महत्व की थीं वो धीरे-धीरे लुप्त हो गईं क्योंकि पंडा समाज एवं अन्य तीर्थ पुरोहितों की रुचि जलाशयों की रक्षा में नहीं रहती। वे केवल वेदियों की रक्षा में रुचि दिखलाते हैं। जहाँ से उन्हे सीधे तौर पर आमदनी होती है।
जिस तरह फल्गू में अतिक्रमण होता जा रहा है उससें तो लगता है कि गया शहर से किसी दिन फल्गू ही विलुप्त हो जाएगी।


गया श्राद्ध का तटस्थ विवरण
गया में आकर पिंडदान करने वाले जजमान से लेकर यहाँ के दो प्रमुख पंडों - धामी एवं गयावाल तथा श्राद्ध के आचार्य, विभिन्न ब्राह्मण जातियों के लोग तथा तीर्थ व्यवसाय से जुड़े अन्य लोग, प्रशासन आदि सभी मुख्यतः किसी किसी तरह खानापूर्ति करने एवं कमाई की जुगत में रहते हैं।

वास्तविक अनुष्ठान -
आचार्यों के निर्देशन में इस तरह अनुष्ठान का पालन कि जजमान के चिदाकाश में उसे अपने पूर्वज/मृतात्मा दिखाई दंे, उनसे बातचीत हो सके, उनकी अधूरी इच्छाएँ पूरी कर उन्हें तृप्त एवं स्थिर किया जा सके।
उनके पितरों/मृतात्माओं के चित्त की अशांति दूर हो, उन्हें देश एवं काल का ठीक से बोध हो जाय और वे स्वर्ग के सुख का भोग कर सकंे।
इसके लिए विविध स्थानों पर विभिन्न समयों पर अनुष्ठान करना पड़ता है। आचार्य को चिदाकाश संबंधी पूरी विद्या आनी चाहिए ताकि वह जजमान एवं उसके पितरों के साथ संबंध स्थापित करा सके। यह एक प्रकार से जजमान को एक विशेष मनोदशा में एकाग्र करने एवं पुनः वापस लाने की विद्या है।
श्राद्ध संबंधी ग्रंथों में इस विद्या का विस्तृत विवरण मिलता है और शैव आगमों में ऐंद्रजालिक प्रयोग की छूट है। तंत्रालोक में आप इसे विस्तार से पढ़ सकते हैं। गरुड़ पुराण, वायु पुराण से भी इसकी पृष्टि होती है।

फलश्रुति एवं जजमानों का पलायनवाद -
पूजा-पाठ की पुस्तकों के अंत में फलश्रुति लिखने की परंपरा बच्चों को स्कूल भेजने के लिए वस्ता, टैक्सी, बिस्किट देने की तरह है। इसका प्रलोभन मूलक उपदेश से अनुष्ठान की भूल भावना आहत होती है।
इसी प्रकार श्रद्धा का अर्थ जब तक ज्ञान एवं भक्ति दोनों रहता है तब तक तो खैरियत है कि किस बात की श्रद्धा, किसके प्रति श्रद्धा इसकी समझ ठीक है। इससे भिन्न या उलटी श्रद्धा बहुत खतरनाक और मनमौजी है। हर धूर्त आदमी की श्रद्धा है कि उसे छोड़कर सभी पुण्यात्मा है और उन्हें पुण्यात्मा बने रहना चाहिए। दो शत्रु एक साथ श्रद्धा पूर्वक प्रार्थना करते हैं कि उनकी रक्षा एवं उनके शत्रु का संहार भगवान करवा दे। ऐसी श्रद्धा तो भगवान को भी संकट में डाल सकती है।
लाचार लोगों के लिए सुविधा दी गई कि बड़ा अनुष्ठान नहीं तो कुछ कम, उससे भी कुछ कम, और कुछ नहीं तो इतना तो सही कर ही डालिए। इस सुविधा का परिणाम यह है कि अनेक लोग लाचारी में नहीं शरीर एवं धन बचाने के लिए सबसे संक्षिप्त कार्यक्रम करना चाहते हैं।
पंडा एवं आचार्य भी जजमान के सुर में ही सुर मिलाते हैं। इस प्रकार यह पलायन आनलााइन पिंडदान तक आ पहुँचा है।
आज कल बड़े से बड़े आचार्य अनुष्ठान पद्धतियों की सफलता इसी बात से देखते हैं कि भौतिक रुप से कार्य किस सीमा तक संपन्न हुआ न कि अधिमानसिक स्तर पर क्या घटित हुआ।
श्राद्ध के साथ जुड़ी अन्य परोक्ष विधियो की ओर ध्यान देने की तो फुरसत ही नहीं है।

पिंड, तीर्थ क्षेत्र एंव वेदियों का संक्षेपीकरण

गया जी तीर्थ क्षेत्र मे देवी-देवताओ, मंदिरों, एवं उनके पुजारियांे की भरमार है। आम आदमी समझ ही नहीं पाता कि कहाँ पूजा करें, कहाँ चढावा चढाएँ, कहाँ नहीं।
सभी जगहांे पर बतानेवाले बताएँगे कि इसी स्थान एंव यहीं के देवताओं का महत्त्व सबसे अधिक है।
देवताओ की बात छोडिय,े मंदिर के दरवाजे पर बैठे ब्राह्मण का तर्क यह है कि द्वारपाल की पूजा के बगैर मुख्य आराध्य देवता की पूजा निस्फल है।
ऐसी उलझनें तीर्थ क्षेत्र में आती ही हैं। अनेक मंदिर देवी-देवता, पूजा की दुकानें, घंटे घडियाल की आवाज, तरह-तरह लोगों की भीड़, शोर-शराबा ये सब ही तो एक सम्मोहक माहौल बनाते हैं।
मंडल निर्माण
अलंकार देखते ही र्स्वग की कल्पना साकार रुप लेने लगती है। यह मनुष्य है ही ऐसा । सितारा हाटलांे के लान एंव पार्क मे भी शोभायुक्त अलंकृत पंडाल का निमार्ण करवाता है और उसे वाटरप्रूफ से लेकर ए0सी0 तक की सुविधायुक्त करवाता है। इसी तरह के दोलायमान चित्तवालांे के लिए तीर्थ बडे़ ही उत्तम हैं। यहाँ रहकर स्वर्गलोक या जैसा चाहे कल्पना लोक आप गढ़ सकते हैं।






गया मे न आएँ तो ही अच्छा।
अगर आप:-
1. काशी के पश्चिम या कर्मनाशा नदी के पश्चिम के रहनवाले पारंपरिक हिन्दू हैं।
2. आपकी श्रद्धा केवल देवताओं के प्रति है।
3. पक्के वैष्णव हैं।
4. श्रौतसूत्रांे का निष्ठा पूर्वक पालन करना चाहते हैं।
5. संर्पूण भारत मे केवल वैदिक व्यवस्था होने का सपना देखते हैं।
6. व्रात्यांे असुरो के पुण्य से घृणा रखते हों
7. आर्यवंशियों की श्रेष्ठता के सर्मथक हों
8. स्वर्ग एंव मोक्ष दोनो का सुख एक साथ भोगना चाहते हैं।
9. तप से अधिक यज्ञ को महत्व देते हैं ।
क्योकि - आप जैसे लोगो की चालाकियों/ कपटपूर्ण आचरणांे के बाद भी आपको चुभनेवाली अनेक बाते यहाँ अभी भी हैं।
10. यह केवल विष्णु या वैष्णवों का क्षेत्र नहीं है। यह आपकी धरती से थोड़ी अलग शुद्धरुप से असुर भूमि है।
12. गयासुर का शरीर ही पुण्य क्षेत्र है।
13. गयासुर ने तप के द्वारा बिना हिंसा या छल के अपने शुभ कर्मों के बल पर पुण्य देह अर्जित किया। अब आपकी औकात तो है नहीं कि इस क्षेत्र को अपवित्र कहें।
14. विष्णु सहित सारे देवतागण यहाँ रहने को प्रतिज्ञाबद्ध हैं।
15. ब्रह्मा एवं शिव को ठगने वालों की यहाँ मर्दन की पूरी व्यवस्था है। ब्रह्मा यहाँ शिव भक्त एवं शिव रूपी हैं। अनेक वेदिंयों एवं मंदिरों में शिव की अराधना करनी पड़ेगी। गयावालों के अतिरिक्त बाकी सभी पंडे, गदाधर विष्णु मंदिर के पुजारी भी मुख्यतः शैव, शाक्त या सौर हैं। शीलांेछवृत्ति वाले श्रोत्रिय आज भी परम संतोषी एवं सौम्य हैं, उन्हें किसी राजा द्वारा प्रदत्त उपाधि की जरूरत हीं नहीं पड़ी।
15. अगर आप दक्षिण भारतीय कट्टर ब्राह्मण/क्षत्रिय हैं तो और भी न आएँ । यह तो पंचगौड़ और पंचद्रविड विभाग से अलग मगध क्षेत्र है। यहाँ के तीर्थों एवं गाँवों में (नव आगन्तुको को छोड़) वे ही ब्राह्मण रहते हैं जिनके आस्तित्व को ही शंकराचार्य जी नकारते हैं। आप भी जिन्हें ब्राह्मण मानने में सकुचाते हैं भले ही आप भी उत्तरी भारत के ही किसी भाग से पहले गये हों।
16. आपकी ज्योतिष संबंधी मान्यताएँ भी यहाँ नहीं चलतीं। न गुर्वस्त की चिंता न शुक्रास्त का विचार, दरवाजा सालों भर खुला है, है न गड़बड़ी वाली बात।
17. दरअसल आप एक कपटी भगवान के भक्त हैं, उन्होंने आपको फँसा दिया है। गया एवं जगन्नाथपुरी में वास करने वालों को भी अपना कर इस क्षेत्र को तीर्थ बना दिया। आपको स्मृति ग्रंथों की उलझन में डाल दिया। विष्णु की माया से कौन बच सका?
18. धर्म के व्यवसाय में आपका वर्चस्व एवं एकाधिकार यहां काम नहीं कर रहा है। फिर भी - आपको आना ही है अपनी बेईमानी, घृणा, चालाकी सभी के साथ क्योंकि गया तीर्थ के प्रति श्रद्धा एवं आकर्षण आपको खींच लाएगा। अब हँसते-रोते, कंुढ़ते हुए पिंडदान भी करेंगे और वापस जाकर अपने गाँव के इलाके में प्रायश्चित का अनुष्ठान भी करेगें।
क्या कीजिएगा ? है कोई बचने का उपाय?
यह भारत है। यहाँ लोगों केा जोड़ने एवं उनके अहंकार तथा क्षेत्रीय वर्चस्व की झूठ को तोड़ने के लिए तीर्थ व्यवस्था बनाई गई है।
आप ही क्यों पूरा भारत एवं पूरे भारत के लोग सभी सर्वश्रेष्ठ हैं।
यह सीधी बात तो पचती नहीं न ?

26 टिप्‍पणियां:

  1. bAHUT SUNDAR , UPYOGI , BHRAM BHANJAK AUR SAMSAMYIK DRISHTI SE PURN AALEKH. BADHAAI.

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  2. बहुत ही विस्तृत और उपयोगी जानकारी है , बाकि तो पंडों की मेहरबानी पर है .

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  3. मै िशवाड़ चौथ का बरवाडा सवाई माधोपुर से हू मुझे वहा कौनसे पंडे से िपण़ड दान करवाना चाहिये मेरे दादा दादी पापा मम़मी और कुछ परिवार वालो का िपणड दान करना िकतना समय व िकतना पैसा लगेगा बताये

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  4. पूर्ण विधि विधान से श्राद्ध एवं अनुष्ठान (बिना शॉर्टकट के) करवाने हेतु समय,खर्च एवं आचार्य पर आपका मार्गदर्शन चाहिए ।

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  5. Beti apne maa baap ka pinddan kar sakti he

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  6. तर्कपूर्ण वर्णन किया है गयाजी का ओर गया में पिंड दान का ओर वहां के पंडो की व्याख्या बड़े साहसिक ढंग से की है .... बधाई के पात्र है महोदय

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  7. Agar ek bete ne pita ka pind daan kar duya ho to kya baad me dusra beta bhi pind daan kar skta h? Jawab zarur de kuki ghar me esi sthiti ban gai h.

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  8. गया जी पिंड दान के लिए घर से जाते समय और गया जी से घर आने पर क्या क्या साबधानी का ख्याल रखें I और गया जी से आने के बाद किसी धार्मिक स्थान जाया जा सकता हे. कृपया जवाब दें.

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  9. Sir, Gayaji mein pind daan ke baad varshik shraadh krwane ki aavashyakta hai kya?

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  10. Bahut achi jaankari mili hai apse .abhi 15 tarik ko mujhe ana hai.yadi kisi chiz ki avasyakta padi to kya help ho sakti hai?

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  11. Bahut achi jaankari mili hai apse .abhi 15 tarik ko mujhe ana hai.yadi kisi chiz ki avasyakta padi to kya help ho sakti hai?

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  12. तीर्थ गया मे पितृ पिण्ड दान करने के बाद घर मे श्राध्दपक्ष मे पितृ तर्पण करना उचित है|क्या?

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  13. तीर्थ गया मे पितृ पिण्ड दान करने के बाद घर मे श्राध्दपक्ष मे पितृ तर्पण करना उचित है|क्या?

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  14. Mere pitaji ka dehant Oct 2018 ko hua hai me konse sal Gaya AA sakta hu pindadan kr liye ? Reply

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  15. मेरे पिता का स्वर्गवास 31वर्ष पहले हुआ था क्या उनका पिंडदान अब किया जा सकता है ।
    माँ का अभी 18 माह पहले हुआ है ।
    कृपया मार्ग दर्शन देने की कृपा करें ।

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  16. Kya gaya shradh mata ya pita me se ek ki mirtu par gaya shradh kiya ja Shakta hai

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  17. BAAP KA DEHANT 15 SAAL PAHLE HO CHUKA HAI MAA AABHI JIWIT HAI. KYA MAI AAPNE BAAP KA PIND DAAN KAR SAKTA HU YA NAHI ? PLEASE REPLY.

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  18. बहुत शानदार जानकारी धन्यवाद मंगला देवी पर भी लिखियेगा।

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  19. मैं उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले का रहने वाला हूँ । गयाजी आकर अपने पितरों का तर्पण करना चाहता हूँ, मेरे परिवार में और कोई नहीं है, घर से गयाजी तक आने की सम्पूर्ण प्रक्रिया जानना चाहता हूँ । साथ ही गयाजी में जिस पंडाजी द्वारा मेरे द्वारा श्राद्धकर्म किया जाएगा उनके संपर्क करने का माध्यम चाहता हूं । यह भी जानना चाहता हूं कि किस समय गयाजी श्राद्धकर्म के लिए आऊँ । सादर

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  20. मेरे माता पिता दोनों जीवित हैं। किन्तु सामान्य श्राद्ध करने में अक्षम हैं। क्या उनके स्थान पर मै अपने दादा दादी का श्राद्ध कर सकता हूं।

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